Categories
Poetry

जाने क्या हो गया सवेरों को!

आज फिर से मैं अपने एक अत्यंत प्रिय कवि स्वर्गीय रमेश रंजक जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ|

जीवन में बहुत तरह की परिस्थितियों, बहुत सी परीक्षाओं से गुज़रना पड़ता है, आज तो पूरी मानव-जाति को कोरोना की परीक्षा देनी पड़ी है और हमारे देश पर यह संकट इस समय कुछ अधिक ही गहरा है|

इस परिवेश में, आज मुझे आज यह गीत याद आ रहा है, लीजिए प्रस्तुत है-  

अब की यह बरस
बड़ा तरस-तरस बीता
दीवारें नहीं पुतीं, रंग नहीं आए
एक-एक माह बाँध, खींच-खींच लाए
अब की यह बरस

जाने क्या हो गया सवेरों को
रोगी की तरह उठे खाट से
रूखे-सूखे दिन पर दिन गए
किसी नदी के सूने घाट-से

हमजोली शाखों के हाथ-पाँव
पानी में तैर नहीं पाए

शामें सब सरकारी हो गईं
अपनापन पेट में दबोच कर
छाती पर से शहर गुज़र गया
जाने कितना निरीह सोच कर

बिस्तर तक माथे की मेज़ पर
काग़ज़ दो-चार फड़फड़ाए

वेतन की पूर्णिमा नहीं लगी
दशमी के चाँद से अधिक हमें
शीशों को तोड़ गई कालिमा
समझे फिर कौन आस्तिक हमें

खिड़की से एक धार ओज कर
हम आधी देह भर नहाए

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार|

*******

Categories
Poetry

दीवार की मरम्मत!

एक बार फिर से आज एक पुरानी ब्लॉग पोस्ट शेयर कर रहा हूँ|

आज भी मैं विख्यात अंग्रेजी कवि श्री रॉबर्ट फ्रॉस्ट की एक कविता का भावानुवाद और उसके बाद मूल कविता प्रस्तुत कर रहा हूँ। पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया कविता का भावानुवाद-

दीवार की मरम्मत

ऐसा कुछ है, जो दीवार को पसंद नहीं करता,
वह, उसके नीचे जमी हुई जमीन को नीचे से फुला देता है,
और ऊपर लगे पत्थरों को धूप में फैला देता है;
और बीच में इतनी जगह बना देता है कि दो लोग भी सटकर पार हो सकते हैं।


शिकारियों द्वारा किए गए ऐसे कामों की बात अलग हैं:
मैंने उनको देखा है और उसकी मरम्मत की है
जहाँ वे एक भी पत्थर को अपनी जगह नहीं लगा रहने देंगे,
लेकिन किसी छिपे हुए खरगोश को अवश्य बाहर निकाल लेंगे,
अपने भौंकते कुत्ते को खुश करने के लिए।


मैं दीवारों में बने ऐसे संकरे रास्तों की बात कर रहा हूँ,
जिनको किसी ने बनते नहीं देखा, इसकी आवाज़ भी नहीं सुनी।
लेकिन वसंत में मरम्मत का समय आने पर, हम उन्हें वहाँ पाते हैं।

मैं अपने पड़ौसी को पहाड़ी के पार;
और जब किसी दिन हम उस लाइन पर एक साथ चलने-
और अपने बीच की दीवार को फिर से दुरुस्त करने के लिए मिलते हैं,
तब यह जानने का अवसर देता हूँ।
जब हम चलते हैं, तो वह दीवार अपने बीच रखते हैं।


और प्रत्येक बड़ा पत्थर जो किसी भी तरफ गिर गया है,
और कुछ छोटे सपाट टुकड़े और कुछ गेंद जैसे गोल,
उनको सही स्थान पर स्थिर करने के लिए, हमें कुछ समय तक प्रयास करना होता है:
“जहाँ हो वहीं बने रहो, जब तक हम पीठ नहीं फेर लेते!”
उन पत्थरों पर काम करते समय हम अपनी उंगलियों को भी खुरदुरा बना लेते हैं।


अरे, यह भी एक प्रकार का मैदानी खेल है,
एक-एक खिलाड़ी, दोनो तरफ, यह इससे थोड़ा अधिक है:
जहाँ पर यह है, वहाँ हमें दीवार की जरूरत नहीं है;

उसके देवदार (सनोबर) के पेड़ हैं और मेरा सेब का बगीचा,
मेरे सेब के पेड़ उस पार कभी नहीं जाएंगे,
और उसके सनोबर के नीचे जाकर चिल्गोजे नहीं खाएंगे, मैं उससे कहता हूँ।
वह इतना ही कहता है, “अच्छी बाड़ लगाने से अच्छे पड़ौसी बनते हैं।”


वसंत मेरे मस्तिष्क में शरारत की तरह आता है, मुझे लगता है
अगर मैं उसके दिमाग में एक बात डाल सकूं:
“वे लोग अच्छे पड़ौसी क्यों बनते हैं? क्या ये
वहाँ नहीं होता जहाँ गाय होती हैं? लेकिन यहाँ तो कोई गाय नहीं है।


दीवार बनाने से पहले मैं पूछना चाहता हूँ,
क्या है जिसे मैं दीवार के अंदर या किसे उससे बाहर कर रहा हूँ,
और किसको मेरे कारण खतरा हो सकता था।

कुछ है, जिसे दीवार पसंद नहीं है,
“वह इसको गिरा हुआ देखना चाहता है।” मैं उसको “पारलौकिक बौना” कह सकता हूँ,
परंतु वह वास्तव में बौना नहीं है, और शायद मैं हूँ।


उसने अपने आपसे कहा, मैं उसको वहाँ देख रहा हूँ,
वह अपने हर हाथ में एक पत्थर को मजबूती से ऊपर उठाकर ला रहा है
पाषाण युग के बर्बर हथियार की तरह,
मुझे लगता है कि वह अंधेरे में चल रहा है,
केवल जंगलों का और पेड़ों की छायाओं का अंधेरा नहीं,
वह अपने पिता के कहने के अनुसार नहीं चलेगा,
और वह इसका विचार बहुत अच्छी तरह रखना चाहता है,
वह फिर से कहता है, “अच्छी बाड़ लगाने से अच्छे पड़ौसी बनते हैं।”


– रॉबर्ट फ्रॉस्ट
और अब मूल अंग्रेजी कविता-

Mending Wall

Something there is that doesn’t love a wall,
That sends the frozen-ground-swell under it,
And spills the upper boulders in the sun;
And makes gaps even two can pass abreast.
The work of hunters is another thing:
I have come after them and made repair
Where they have left not one stone on a stone,
But they would have the rabbit out of hiding,
To please the yelping dogs. The gaps I mean,
No one has seen them made or heard them made,

But at spring mending-time we find them there.

I let my neighbour know beyond the hill;
And on a day we meet to walk the line
And set the wall between us once again.
We keep the wall between us as we go.
To each the boulders that have fallen to each.


And some are loaves and some so nearly balls
We have to use a spell to make them balance:
“Stay where you are until our backs are turned!”
We wear our fingers rough with handling them.

Oh, just another kind of out-door game,
One on a side. It comes to little more:
There where it is we do not need the wall:
He is all pine and I am apple orchard.
My apple trees will never get across
And eat the cones under his pines, I tell him.


He only says, “Good fences make good neighbours.”
Spring is the mischief in me, and I wonder
If I could put a notion in his head:
“Why do they make good neighbours? Isn’t it
Where there are cows? But here there are no cows.

Before I built a wall I’d ask to know
What I was walling in or walling out,
And to whom I was like to give offence.


Something there is that doesn’t love a wall,
That wants it down.” I could say “Elves” to him,
But it’s not elves exactly, and I’d rather
He said it for himself. I see him there
Bringing a stone grasped firmly by the top
In each hand, like an old-stone savage armed.

He moves in darkness as it seems to me,
Not of woods only and the shade of trees.
He will not go behind his father’s saying,
And he likes having thought of it so well

He says again, “Good fences make good neighbours.”

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार|

********

Categories
Uncategorized

मोह मोह के धागे!

आज अपने एक मित्र और सहकर्मी के प्रसंग में बात करना चाहूँगा| ये मेरे साथी मेरे बॉस थे, परंतु उनसे बात करते हुए मुझे कभी यह लगा ही नहीं कि वो मेरे बॉस थे| वैसे इस तरह का अनुभव मेरा बहुत से लोगों के साथ रहा है, परंतु उन सबमें शायद ये सबसे सज्जन व्यक्ति थे|

लीजिए मैं उनका सरनेम बता देता हूँ- मिस्टर मूर्ति, हैदराबाद के रहने वाले थे, इतना जान लेने के बाद ही हम अक्सर किसी व्यक्ति को दक्षिण भारतीय अथवा यहाँ तक कि ‘मद्रासी’ भी कह देते हैं|

मूर्ति जी को इस पर सख्त आपत्ति थी, उनको अपनी अलग पहचान बहुत प्यारी थी, वे कहते थे कि वे मध्य भारत से हैं| एक-दो बार तो हमारी कंपनी के उच्च पदाधिकारियों ने उन पर एहसान जताते हुए उनका चेन्नई अथवा केरल स्थानांतरण करने का प्रस्ताव किया| उनका कहना था कि जहां वे मेरे साथ तैनात थे, उत्तर प्रदेश के रायबरेली जिले में, वहाँ से अपने घर जाना उनके लिए ज्यादा आसान है, बनिस्बत केरल अथवा चेन्नई के अनेक इलाकों से वहाँ जाने के!

खैर मैं और मूर्ति जी हमउम्र भी थे और मैनेजमेंट द्वारा समान रूप से सताए गए भी| हम अक्सर अपने मन की बात खुलकर किया करते थे| हाँ मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि हम दोनों समान रूप से संवेदनशील भी थे| एक प्रसंग उनका बताया हुआ याद आ रहा है, कुल मिलाकर एक दृश्य है इस घटना में!

मूर्ति जी विशुद्ध रूप से शाकाहारी थे, मेरी ही तरह और उनके घर में उन्होंने किसी समय एक श्वान अथवा ‘डॉगी’ भी पाला हुआ था, दूसरा नाम लेने पर मुझे घर में डांट पड़ सकती है, वो तो बेचारे सड़क पर हुआ करते हैं| हाँ तो उनका यह डॉगी, नस्ल मुझे याद नहीं, उन्होंने बताई तो थी, ऐसे आकार का था, जैसा कोई घोड़े का बच्चा होता है| वे उसको घर पर सब्जियाँ आदि ही खिलाते थे, और वह उनको ही खाता था|

अब यह पता नहीं कि मूर्ति जी ने कब और कैसे यह डॉगी रख लिया था क्योंकि उनकी धर्मपत्नी को इस प्रजाति से बिल्कुल प्रेम नहीं था| जैसे-तैसे मूर्ति जी का प्रेम उसके प्रवास को खींचता रहा लेकिन अंत में संभवतः डॉगी को दूर करने की अपनी मांग के लिए उनकी धर्मपत्नी को, ऐसा मजबूत आधार मिल गया कि डॉगी को अब विदा किया ही  जाए, और अंततः मूर्ति जी उसको शायद उसी तरह जंगल में छोड़कर आ गए, जैसे शायद लक्ष्मण जी सीता-माता को वन में छोड़कर आए होंगे|

मैंने बताया था कि यह प्रसंग एक क्षण का, अथवा कहें कि एक दृश्य का है| जैसा अभी तक हुआ वह तो बहुत बार हो चुका होगा शायद! मूर्ति जी भी धीरे-धीरे इसको भूल रहे थे| तभी की बात है कि कार द्वारा कहीं जाते समय वे एक सिग्नल पर रुके और कुछ सोच रहे थे, तभी उनको अपने गाल पर कुछ गीला स्पर्श महसूस हुआ, देखा तो उनका वही पुराना डॉगी, उसकी ऊंचाई तो अच्छी थी ही, उसने कार की विंडो में मुंह डालकर उनका मुंह चूम लिया था|

इस प्रसंग में, वास्तव में मुझे याद करते ही आँखों में आँसू आ जाते हैं, लेकिन यह संतोष की बात है कि वह डॉगी अपने नए परिवेश में ठीक से एडजस्ट हो गया था, हम ऐसे ही सोचते हैं, ऊपर वाला भी तो है ना सभी प्राणियों की रक्षा करने के लिए|  

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार|

*******

Categories
Film Song

भीगी पलकें न झुका!

आज मुझे मेरे प्रिय गायक स्वर्गीय मुकेश जी का गाया एक बहुत सुंदर गीत याद आ रहा है | फिल्म- साथी के लिए इस गीत को लिखा था मजरूह सुल्तानपुरी साहब ने और इसका संगीत दिया था- नौशाद साहब ने|

कुल मिलाकर इस गीत में ऐसा दिव्य वातावरण तैयार होता है, ऐसा लगता है की प्रेम का एक अनोखा स्वरूप उद्घाटित होता है, जिसमें प्रेम और पूजा, आपस में घुल-मिल जाते हैं| लीजिए इस अमर गीत का आनंद लीजिए-

हुस्न-ए-जानां इधर आ,
आईना हूँ मैं तेरा|
मैं संवारूंगा तुझे,
सारे ग़म दे-दे मुझे,
भीगी पलकें न झुका,
आईना हूँ मैं तेरा|


कितने ही दाग उठाए तूने,
मेरे दिन-रात सजाए तूने,
चूम लूँ आ मैं तेरी पलकों को,
दे दूँ ये उम्र तेरी ज़ुल्फों को,
ले के आँखों के दिए,
मुस्कुरा मेरे लिए,
मेरी तस्वीर-ए-वफ़ा,
आईना हूँ मैं तेरा|


तेरी चाहत है इबादत मेरी,
देखता रहता हूँ सूरत तेरी,
घर तेरे दम से है मंदिर मेरा,
तू है देवी मैं पुजारी तेरा,
सज़दे सौ बार करूं,
आ तुझे प्यार करूं,
मेरे आगोश में आ,
आईना हूँ मैं तेरा|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
*******

Categories
Poetry

जिस दिन अपने जूड़े में ,उसने कुछ फूल सजाये थे!

लीजिए एक बार फिर से जनाब क़तील शिफ़ाई साहब की एक ग़ज़ल का आनंद लेते हैं| जैसा कि आप जानते ही हैं क़तील साहब भारतीय उपमहाद्वीप के एक महान शायर थे और अनेक प्रसिद्ध गायकों ने उनकी ग़ज़लों आदि को अपना स्वर दिया है|

यह भी क़तील साहब की अलग किस्म की ग़ज़ल है, हमारे इरादे कुछ और होते हैं, लेकिन होता वही है जो होना होता है, लीजिए इस ग़ज़ल का आनंद लीजिए-

हिज्र की पहली शाम के साये दूर उफ़क़ तक छाये थे,
हम जब उसके शहर से निकले सब रास्ते सँवलाये थे|

जाने वो क्या सोच रहा था अपने दिल में सारी रात,
प्यार की बातें करते करते उस के नैन भर आये थे|

मेरे अन्दर चली थी आँधी ठीक उसी दिन पतझड़ की,
जिस दिन अपने जूड़े में उसने कुछ फूल सजाये थे|

उसने कितने प्यार से अपना कुफ़्र दिया नज़राने में,
हम अपने ईमान का सौदा जिससे करने आये थे|


कैसे जाती मेरे बदन से बीते लम्हों की ख़ुश्बू,
ख़्वाबों की उस बस्ती में कुछ फूल मेरे हम-साये थे|

कैसा प्यारा मंज़र था जब देख के अपने साथी को,
पेड़ पे बैठी इक चिड़िया ने अपने पर फैलाये थे|


रुख़्सत के दिन भीगी आँखों उसका वो कहना हाए “क़तील”,
तुम को लौट ही जाना था तो इस नगरी क्यूँ आये थे|

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
*******

Categories
Poetry

तुम बाद-ए-सबा कहलाओ तो क्या!

आज फिर से एक ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ, जिसे लिखा है ‘ओबेदुल्लाह अलीम’ साहब ने और ग़ुलाम अली साहब ने गाया है|

ग़ुलाम अली साहब का एक प्रसंग याद आ रहा है, मेरे बच्चों को मालूम है कि मुझे ग़ुलाम अली जी बहुत पसंद हैं, तो बेटे ने सीरी फोर्ट ऑडिटोरियम, नई दिल्ली में उनके प्रोग्राम के लिए 5000 रु का एक टिकट मेरे लिए खरीदा और मैं वो प्रोग्राम सुनने गया| इस कार्यक्रम में एक श्रोता ने फरमाइश की- ‘इतनी मुद्दत बाद मिले हो’, ग़ुलाम अली जी फरमाइश को समझ गए, लेकिन बोले मैं तो आता ही रहता हूँ, आप ही नहीं आए होंगे|

मैं कहना यह चाहता था कि वो समय अलग था, जब ग़ुलाम अली साहब जैसे पाकिस्तानी कलाकार यहाँ आते रहते थे, अब तो यह लगभग असंभव हो गया है|


अपने ये कवि-शायर कभी कितने सीधे लगते हैं, जो जितना मिल जाए उसमें संतुष्ट होने की कोशिश करते हैं| अब जैसे इस ग़ज़ल में ही शायर महोदय कहते हैं कि कुछ दिन मेरी आँखों में बस जाओ, फिर भले ही ख्वाब बनकर क्यों न रह जाओ|


बहुत सुंदर ग़ज़ल है, इसका आनंद लीजिए-

कुछ दिन तो बसो मेरी आँखों में,
फिर ख़्वाब अगर हो जाओ तो क्या|


कोई रंग तो दो मेरे चेहरे को,
फिर ज़ख़्म अगर महकाओ तो क्या|


एक आईना था सो टूट गया,
अब खुद से अगर शरमाओ तो क्या|


मैं तन्हा था, मैं तन्हा हूँ,
तुम आओ तो क्या न आओ तो क्या|


जब हम ही न महके फिर साहिब,
तुम बाद-ए-सबा कहलाओ क्या|


जब देखने वाला कोई नहीं,
बुझ जाओ तो क्या, जल जाओ तो क्या|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
*******

Categories
Film Song

नींद सूरज-सितारों को आने लगे!

वक़्त भी क्या-क्या चालें चलता है, आज तो देश और दुनिया के लिए मानो परीक्षा की घड़ी है| वक़्त की इस चाल की चिंता तो हम सभी को करनी है और करनी भी पड़ेगी, लेकिन यहाँ मैं इससे अलग जाते हुए नायिका की चाल, चालबाजी नहीं जी, सिर्फ ‘चाल’, उसके चलने के अंदाज़ के बारे में बात करूंगा, क्योंकि कवि-शायर तो उसकी हर अदा पर कुर्बान जाते हैं, जिसमें ‘चाल’ भी शामिल है|

हालांकि पाक़ीज़ा फिल्म में तो राजकुमार नायिका की चाल पर पाबंदी लगा देना चाहते हैं, जब वो ट्रेन में सोती हुई नायिका देखकर कहते हैं- ‘आपके पाँव बहुत सुंदर हैं, इन्हें ज़मीन पर मत उतारना’!


खैर चाल के बारे में बात भी मैं अपने प्रिय गायक मुकेश जी की गाई गीत पंक्तियों के साथ करूंगा-


तौबा ये मतवाली चाल,
झुक जाए फूलों की डाल, चांद और सूरज आकर मांगें
तुझसे रंग-ओ-जमाल,
हसीना तेरी मिसाल कहाँ|


मुकेश जी की आवाज में ही एक और गीत की पंक्तियाँ याद आ रही हैं, जिसे नीरज जी ने लिखा है-


चाल ऐसी है मदहोश मस्ती भरी,
नींद सूरज-सितारों को आने लगे,
इतने नाज़ुक क़दम चूम पाएँ अगर,
सोते-सोते बियाबान गाने लगें,
मत महावर रचाओ बहुत पाँव में,
फर्श का मर्मरी दिल दहल जाएगा|


अब क्या करूं फिर से मुकेश जी का ही गाया एक और गीत याद आ रहा है-


गोरी तेरे चलने पे, मेरा दिल कुर्बां,
तेरा चलना, तेरा रुकना, तेरा मुड़ना तौबा,
मेरा दिल कुर्बां|


लीजिए एक और गीत याद आ रहा है ‘चाल’ पर-


ठुमक-ठुमक मत चलो, हाँ जी मत चलो,
किसी का दिल धड़केगा,
मंद-मंद मत हंसो, हाँ जी मत हंसो,
कोई प्यासा भटकेगा|

वैसे जब नायिका की गलियों की तरफ नायक जाता है, तब उसकी चाल भी कुछ अलग ही होती है न-

चल मेरे दिल, लहरा के चल,

मौसम भी है, वादा भी है|

उसकी गली का फासला,

थोड़ा भी है, ज्यादा भी है|


अब इसके बाद क्या कहूँ, एक गीत की पंक्तियाँ फिलहाल याद आ रही हैं-


हम चल रहे थे, तुम चल रहे थे,
मगर दुनिया वालों के दिल जल रहे थे|


तो भाई मेरे जलने की कोई बात नहीं है, सब चलते रहें, ये दुनिया भी चलती रहे और सब खुश रहें|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
*******

Categories
Film Song

दर्द के नाम से वाक़िफ़ न जहां हो कोई !

आज एक गीत याद आ रहा है, फिल्म- ‘नई रोशनी’ से, यह गीत मोहम्मद रफ़ी साहब ने फिल्म अभिनेता- स्वर्गीय राज कुमार जी के लिए गाया है| राज कुमार जी नशे की एक्टिंग काफी अच्छी करते थे| उनका ‘वक़्त’ फिल्म का एक संवाद बहुत प्रसिद्ध है- ‘जिनके घर शीशे के हों, वो दूसरे के घर पर पत्थर नहीं फेंकते, मिस्टर शेनोय!” हाँ तो, इस गीत के लेखक थे – राजेन्द्र कृष्ण जी और संगीत दिया था- रवि जी ने|


ये ज़िंदगी भी ऐसी है कि जब तक ठीक से चलती रहे, हम ज्यादा सोचते ही नहीं लेकिन जब पटरी से उतर जाती है, तब इंसान क्या-क्या नहीं सोचता! यही लगता है कि ये सब लोग जीवन को जी कैसे लेते हैं, हम इनकी तरह क्यों नहीं जी पाते! लीजिए यह गीत पढ़िये और उस फिल्म की जो याद आए या इसको सुनकर जो कुछ भी आप महसूस करते हैं, उसको आने दीजिए जी-


किस तरह जीते हैं ये लोग
बता दो यारो,
हम को भी जीने का
अंदाज़ सिखा दो यारो|
किस तरह जीते हैं ये लोग
बता दो यारो|


प्यार लेते हैं कहाँ से
यह ज़माने वाले,
उन गली कूचों का
रस्ता तो दिखा दो यारो|
हम को भी जीने का
अंदाज़ सिखा दो यारो|


दर्द के नाम से
वाक़िफ़ न जहाँ हो कोई,
ऐसी महफ़िल में हमें भी तो
बिठा दो यारो|
हम को भी जीने का अंदाज़
सिखा दो यारो|


साथ देना है तो
खुद पीने की आदत डालो,
वर्ना मैखाने का दर
हम से छुड़ा दो यारो|
हम को भी जीने का अंदाज़
सिखा दो यारो,
किस तरह जीते हैं ये लोग
बता दो यारो|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
*******

Categories
Uncategorized

दुख हरो द्वारकानाथ शरण मैं तेरी!

आज फिर से पुरानी पोस्ट का दिन है, लीजिए मैं अपनी एक पुरानी पोस्ट, फिर से शेयर कर रहा हूँ|

चलिए पुराने पन्ने पलटते हुए, एक क़दम और आगे बढ़ते हैं।
आज फिर से जीवन का एक पुराना पृष्ठ, कुछ पुरानी यादें, एक पुराना ब्लॉग!


जयपुर पहुंच गए लेकिन काफी कुछ पीछे छूट गया। मेरी मां, जिनके लिए हमारा वह पुराना मोहल्ला अपने गांव जैसा था, बल्कि मायका भी था क्योंकि उनके भतीजे- वकील साहब वहीं रहते थे। वो दिल्ली नहीं छोड़ पाईं। एक-दो बार हमारे साथ गईं भी, जहाँ भी हम थे, लेकिन वहाँ नहीं रुक पाईं।


एक और बात हम दिल्ली से जयपुर ट्रेन में बैठकर चले गए थे, एक दो अटैची साथ लेकर, कोई और लगेज नहीं था हमारे साथ। जो सामान हमारा छूटा, घरेलू सामान थोड़ा बहुत मां के पास रहा, बाकी 50-60 किलो तो रहा ही होगा, किताबों और पत्रिकाओं के रूप में। पत्रिकाओं में सबसे बड़ा भाग था सारिका के अंक, जिनमें बहुत से कथा- ऋषि विशेषांक भी थे, जिनमें दुनिया भर के श्रेष्ठ लेखकों की रचनाएं शामिल थीं।
पता नहीं क्यों मुझे एक पाकिस्तानी लेखक की रचना याद आ रही है, जो ऐसे ही एक अंक में छपी थी। कहानी संक्षेप में यहाँ दोहरा देता हूँ-
महानगर पालिका में बहस हो रही थी कि ‘रेड-लाइट एरिया’, शहर के बीचों-बीच क्यों बना है। काफी लंबी बहस के बाद फैसला हुआ कि इन लोगों को नगर की सीमा के बाहर बसा दिया जाए। ऐसा ही किया गया, पहले वहाँ एक पान वाले ने अपनी दुकान खोली, चाय वाला आया, फिर कुछ और दुकानें खुलीं।


दस साल बाद, महानगर पालिका में फिर से बहस हो रही थी कि ‘रेड-लाइट एरिया’, शहर के बीचों-बीच क्यों बना है!


खैर, ये तो मुझे याद आया और मैंने संक्षेप में कहानी शेयर कर ली। मैं बता यह रहा था कि हम अपना साहित्य भंडार वकील साहब के यहाँ छोड़ आए, जो मेरे बड़े भाई लगते थे। उन्होंने कुछ वर्षों तक इस अमानत की बंधी हुई पोटलियों को संभालकर रखा, बाद में चूहों में साहित्य पिपासा कुछ अधिक जाग गई तो उन्होंने यह सब लायब्रेरी में दे दिया।


दिल्ली के जो महत्वपूर्ण वृतांत छूट गए, उनमें एक यह भी है कि हमने बच्चों की एक पत्रिका ‘कलरव’ के कुछ अंक भी प्रकाशित किए थे। दिल्ली प्रेस में मेरे एक साथी थे- श्री रमेश राणा, जिनको मेरी साहित्यिक प्रतिभा में कुछ ज्यादा ही विश्वास था, उन्होंने यह प्रस्ताव रखा। इसमें संपादन की ज़िम्मेदारी मेरी थी, बाकी सब उनके जिम्मे था। मैं सामग्री का चयन करता था और ‘नन्हे नागरिक से’ शीर्षक से संपादकीय भी लिखता था। यह संपादकीय सबसे सुरक्षित था, क्योंकि नन्हे पाठकों से कोई शिकायत मिलने की गुंजाइश नहीं थी। श्री बालकवि वैरागी ने इस पत्रिका के लिए कई रचनाएं भेजीं और उपयोगी सुझाव भी दिए।


अब याद नहीं कि इस पत्रिका के कितने अंक छपे थे और इस प्रयास में कितना आर्थिक नुकसान हुआ ये तो भाई रमेश राणा ही जानते होंगे क्योंकि मेरा तो एक धेला भी खर्च नहीं हुआ था। बस एक अनुभव था-


किन राहों से दूर है मंज़िल, कौन सा रस्ता आसां है,
हम जब थककर रुक जाएंगे, औरों को समझाएंगे।


जयपुर के बाद हम बिहार के संथाल परगना इलाके में गए, जो अब झारखंड में आता है। कुछ प्रसंग तो ऐसे हैं, जो जैसे समय आता है, मुझे याद आते हैं और मैं शेयर करता जाता हूँ, लेकिन बिहार में कार्यग्रहण का किस्सा ऐसा है, जिसे सुनाने की मुझे भी बेचैनी रहती है, वो सब मैं अगले ब्लॉग में बताऊंगा। (यह पोस्ट मैंने पिछले सप्ताह ही शेयर की है|)


फिलहाल मैं यह बता दूं कि ईश्वर की कृपा से मुझे कभी किसी नौकरी के लिए सिफारिश की ज़रूरत नहीं पड़ी और मैं जब इंटरव्यू देने जाता था तब मैं बता देता था कि मैं यहाँ ज्वाइन करने वाला हूँ। हाँ मैं मुकेश जी का गाया यह भजन भी अक्सर गाता था और गाते-गाते मेरी आंखों में आंसू निकल आते थे-

तुम कहाँ छुपे भगवान करो मत देरी।
दुख हरो द्वारकानाथ शरण मैं तेरी।


यही सुना है दीनबंधु तुम सबका दुःख हर लेते,
जो निराश हैं उनकी झोली, आशा से भर देते,
अगर सुदामा होता मैं तो दौड़ द्वारका आता,
पांव आंसुओं से धोकर मैं, मन की आग बुझाता,
तुम बनो नहीं अनजान सुनो भगवान, करो मत देरी।

दुख हरो द्वारकानाथ शरण मैं तेरी।


जो भी शरण तुम्हारी आता, उसको धीर बंधाते,
नहीं डूबने दाता, नैया पार लगाते,
तुम न सुनोगे तो किसको मैं, अपनी व्यथा सुनाऊं,
द्वार तुम्हारा छोड़ के भगवन, और कहाँ मैं जाऊं।
प्रभु कब से रहा पुकार, मैं तेरे द्वार करो मत देरी।
दुख हरो द्वारकानाथ शरण मैं तेरी।


सब कुछ देता है ऊपर वाला, लेकिन फिर-

बहुत दिया देने वाले ने तुझको,
आंचल ही न समाए तो क्या कीजे।



फिलहाल इतना ही,
नमस्कार।
*******







Categories
Poetry

अब तुझे मैं याद आना चाहता हूँ !

एक बार फिर से आज जनाब क़तील शिफ़ाई साहब की एक ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ| क़तील साहब भारतीय के एक अत्यंत लोकप्रिय शायर रहे हैं| उनकी इस ग़ज़ल को जगजीत सिंह जी ने भी गाया है|

कवि/शायरों की कैसी-कैसी ख्वाहिशें होती हैं, जैसे इस ग़ज़ल में ही क़तील साहब ने कुछ बेहतरीन ख़्वाहिशों का ज़िक्र किया है, जो किसी कवि/शायर की ही हो सकती हैं| लीजिए इस लोकप्रिय ग़ज़ल का आनंद लीजिए –   

अपने होंठों पर सजाना चाहता हूँ,
आ तुझे मैं गुनगुनाना चाहता हूँ|

कोई आँसू तेरे दामन पर गिराकर
बूँद को मोती बनाना चाहता हूँ


थक गया मैं करते-करते याद तुझको
अब तुझे मैं याद आना चाहता हूँ

छा रहा है सारी बस्ती में अँधेरा
रोशनी हो, घर जलाना चाहता हूँ

आख़री हिचकी तेरे ज़ानों पे आये
मौत भी मैं शायराना चाहता हूँ

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार|

                        *******