लो चांद निकल आया!

आज एक गीत फिल्म ‘एक बार मुस्कुरा दो’ से, हमारे प्रिय गायक मुकेश जी और आशा भौंसले जी के मधुर युगल स्वरों में, इसका संगीत तैयार किया है ओ. पी.नैयर जी ने और गीत लिखा था एस एच बिहारी जी ने| आशा जी और मुकेश जी का यह रोमांटिक युगल गीत आज भी हमारे मन में गूंजता रहता है|

लीजिए प्रस्तुत हैं फिल्म- ‘एक बार मुस्कुरा दो’ के लिए आशा जी और मुकेश जी द्वारा गाये गए इस मधुर गीत के बोल :


चेहरे से ज़रा आंचल
जब आपने सरकाया,
दुनिया ये पुकार उठी,
लो चांद निकल आया|

माना के वो हीरा हो,
मुश्किल से जो हाथ आये,
इतना भी ना तड़पाओ,
के जान निकल जाये|

छोड़ो जी ना ये झगड़े,
एक बार मुस्कुरा दो,
तकदीर है क्या अपनी,
मैंने जो तुम्हें पाया|


वैसे तो मुझे तुम पर
पूरा ही भरोसा है,
कैसे वो भुला दूं मैं
जो आँखों ने देखा है|

छेड़ोगे, दिल तोड़ोगे,
एक बार मुस्कुरा दो
इतनी सी शिकायत पर,
कितना मुझे तड़पाया|

दुनिया ये पुकार उठी,
लो चांद निकल आया|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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चंचल लड़की जैसी मां!

बांट के अपना चेहरा, माथा, आँखें जाने कहाँ गई|
फटे पुराने इक अलबम में, चंचल लड़की जैसी मां|

निदा फ़ाज़ली

चलती नटनी जैसी मां!

बीवी, बेटी, बहन, पड़ोसन,थोड़ी थोड़ी सी सब में|
दिन भर इक रस्सी के ऊपर, चलती नटनी जैसी मां|

निदा फ़ाज़ली

मुर्ग़े की आवाज़ से खुलती!

चिड़ियों के चहकार में गूंजे, राधा-मोहन अली-अली|
मुर्ग़े की आवाज़ से खुलती, घर की कुंडी जैसी मां |

निदा फ़ाज़ली

आधी सोई आधी जागी!

बाँस की खुर्री खाट के ऊपर, हर आहट पर कान धरे|
आधी सोई आधी जागी,थकी दोपहरी जैसी मां |

निदा फ़ाज़ली

बेसन की सोंधी रोटी पर!

बेसन की सोंधी रोटी पर, खट्टी चटनी जैसी मां,
याद आती है चौका-बासन, चिमटा फुकनी जैसी मां |

निदा फ़ाज़ली

आँधियों ने गोद में हमको खिलाया है !

आज मैं हिन्दी के श्रेष्ठ रचनाकार और कादंबिनी पत्रिका के यशस्वी संपादक रहे स्वर्गीय रामानंद दोषी जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| दोषी जी का गीत ‘मन होता है पारा, ऐसे देखा नहीं करो’ बहुत प्रसिद्ध हुआ था|

इस रचना में दोषी जी ने हमारे महान राष्ट्र की गौरव वंदना बड़े श्रेष्ठ तरीके से प्रस्तुत की है| लीजिए प्रस्तुत है स्वर्गीय रामानंद दोषी जी की यह कविता –

आँधियों ने गोद में हमको खिलाया है न भूलो,
कंटकों ने सिर हमें सादर झुकाया है न भूलो,
सिन्धु का मथकर कलेजा हम सुधा भी शोध लाए,
औ’ हमारे तेज से सूरज लजाया है न भूलो।

वे हमीं तो हैं कि इक हुंकार से यह भूमि कांपी,
वे हमीं तो हैं जिन्होंने तीन डग में सृष्टि नापी,
और वे भी हम कि जिनकी सभ्यता के विजय रथ की
धूल उड़ कर छोड़ आई छाप अपनी विश्वव्यापी।

वक्र हो आई भृकुटि तो ये अचल नगराज डोले,
दश दिशाओं के सकल दिक्पाल ये गजराज डोले,
डोल उट्ठी है धरा, अम्बर, भुवन, नक्षत्र-मंडल,
ढीठ अत्याचारियों के अहंकारी ताज डोले।


सुयश की प्रस्तर-शिला पर चिह्न गहरे हैं हमारे,
ज्ञान-शिखरों पर धवल ध्वज-चिन्ह हैं लहरे हमारे,
वेग जिनका यों कि जैसे काल की अंगड़ाइयाँ हों,
उन तरंगों में निडर जलयान ठहरे हैं हमारे।

मस्त योगी हैं कि हम सुख देखकर सबका सुखी हैं,
कुछ अजब मन है कि हम दुख देखकर सबका दुखी हैं,
तुम हमारी चोटियों की बर्फ़ को यों मत कुरेदो,
दहकता लावा हृदय में है कि हम ज्वालामुखी हैं।

लास्य भी हमने किए हैं और तांडव भी किए हैं,
वंश मीरा और शिव के, विष पिया है औ’ जिए हैं,
दूध माँ का, या कि चन्दन, या कि केसर जो समझ लो,
यह हमारे देश की रज है कि हम इसके लिए हैं।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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कोई दरीचा खुला न था!

राशिद किसे सुनाते गली में तेरी गज़ल,
उसके मकां का कोई दरीचा खुला न था।

मुमताज़ राशिद

हवा का पता न था!

पत्तों के टूटने की सदा घुट के रह गई,
जंगल में दूर-दूर, हवा का पता न था।

मुमताज़ राशिद

अपना शरीक-ए-ग़म!

परछाइयों के शहर की तनहाइयां न पूछ,
अपना शरीक-ए-ग़म कोई अपने सिवा न था।

मुमताज़ राशिद