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अब रात गुजरने वाली है!

आज मैं 1951 में रिलीज़ हुई राजकपूर जी की फिल्म- ‘आवारा’ का एक गीत शेयर कर रहा हूँ, जिसे हसरत जयपुरी जी ने लिखा था और शंकर जयकिशन जी की संगीत जगत की प्रसिद्ध जोड़ी के संगीत निर्देशन में लता मंगेशकर जी ने अपने मधुर कंठ से यह गीत गाया था|

लीजिए आज प्रस्तुत है यह मधुर गीत-

आ जाओ तड़पते हैं अरमां,
अब रात गुजरनेवाली है
मैं रोऊँ यहाँ, तुम चुप हो वहाँ,
अब रात गुजरनेवाली है|

चाँद की रंगत उड़ने लगी
वो तारों के दिल अब डूब गये, डूब गये
है दर्दभरा बेचैन समा,
अब रात गुजरनेवाली है|


इस चाँद के डोले में आई नज़र
ये रात की दुल्हन चल दी किधर, चल दी किधर
आवाज़ तो दो, खोये हो कहाँ,
अब रात गुजरनेवाली है|

घबरा के नज़र भी हार गई
तकदीर को भी नींद आने लगी, नींद आने लगी
तुम आते नहीं, मैं जाऊँ कहाँ,
अब रात गुजरनेवाली है|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार
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सौ वर्ष बाद!

आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य संकलनों से लेता हूँ। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘A Hundred Years Hence’ का भावानुवाद-


गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता

सौ वर्ष बाद

कौन है वह
जो इतने चाव के साथ
पढ़ता होगा मेरी कविताएं
आज से सौ वर्ष बाद!


क्या तुम तक पहुंचा पाऊँगा मैं

वसंत की इस ताज़ा सुबह से मिलने वाले आनंद का मामूली सा अंश भी
वह पुष्प जो आज खिलता है
वह गीत जो पक्षी गाते हैं
आज अस्त होते सूर्य की चमक
जिसमें प्रेम की मेरी भावनाएं घुली-मिली हैं?

फिर भी एक क्षण के लिए
तुम अपना दक्षिणी द्वार खोलो
और खिड़की के पास बैठकर,
दूर क्षितिज की ओर देखो
और अपनी अन्तर्दृष्टि में इस परिदृष्य को निर्मित करो-


आज से सौ वर्ष पूर्व
आनंद की एक बेचैन तरंग आसमानों से नीचे उतरी थी
और उसने इस जगत के हृदय को छुआ था
आनंद से सराबोर प्रारंभिक वसंत
जो किसी सीमा में नहीं बंध रहा था
और अपने फड़फड़ाते पंख पसार रहा था |


दक्षिणी पवन चली
पुष्पों और पराग की गंध से लदी हुई
तभी अचानक
उन्होंने समूचे विश्व को यौवन से परिपूर्ण चमक से भर दिया
सौ वर्ष पूर्व|

उस दिन एक युवा कवि जागता रहा
गीतों से भरे अधीर हृदय के साथ
उमंग से भरकर
जिसके मन में बहुत से भावों को व्यक्त करने का उत्साह था
जैसे कि पुष्प खिलने के लिए अंगड़ाई ले रहे हों
आज से सौ वर्ष पहले!

सौ वर्ष बाद
तुम्हारे घरों में कोई
युवा कवि क्या गाता है!


उसके लिए
अपनी तरफ से वसंत के अनुभव की ये अभिव्यक्तियाँ भेज रहा हूँ|
एक क्षण के लिए इन्हें गूंजने दो,
अपने वसंत में, अपने दिल की धड़कनों में|
मधुमक्खियों की गुंजार में,
पत्तियों की सरसराहट में
आज से सौ वर्ष बाद|

-रवींद्रनाथ ठाकुर

और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-



A Hundred Years Hence

A hundred years hence
Who it is
With such curiosity
Reads my poems
A hundred years hence!
Shall I be able to send you
An iota of joy of this fresh spring morning
The flower that blooms today
The songs that the birds sing
The glow of today’s setting sun
Filled with my feelings of love?
Yet for a moment
Open up your southern gate
And take your seat at the window
Look at the far horizon
And visualize in your mind’s eye –
One day a hundred years ago
A restless ecstasy drifted from the skies
And touched the heart of this world
The early spring mad with joy
Knew no bounds
Spreading its restless wings
The southern breeze blew
Carrying the scent of flowers’ pollen
All on a sudden soon
They coloured the world with a youthful glow
A hundred years ago.
That day a young poet kept awake
With an excited heart filled with songs
With so much ardour
Anxious to express so many things
Like buds of flowers straining to bloom
One day a hundred years ago.
A hundred years hence
What young poet
Sings songs in your homes!
For him
I send my tidings of joy of this spring.
Let it echo for a moment
In your spring, in your heartbeats,
In the humming of the bees
In the rustling of the leaves
A hundred years hence.

Rabindranath Tagore

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।
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ओ जाने वाले हो सके तो!

कल हमारे प्रिय गायक, महान कलाकार और इंसान मुकेश चंद्र माथुर जी का जन्म दिन है| जिन्हें हम प्रेम से सिर्फ ‘मुकेश’ नाम से पुकारते हैं|

उनकी स्मृति में प्रस्तुत आज का यह गीत फिल्म- ‘बंदिनी’ से है, जिसे लिखा था शैलेन्द्र जी ने और इसका संगीत दिया था सचिन देव बर्मन जी ने|

मुकेश जी के गाए गीत मुझ जैसे बहुत से लोगों को जीवन जीने की प्रेरणा देते हैं|

आइए आज उस महान गायक की स्मृति में उनका गाया यह गीत दोहराते हैं-


ओ जाने वाले हो सके तो लौट के आना,
ये घाट तू ये बाट कहीं भूल न जाना|


बचपन के तेरे मीत तेरे संग के सहारे,
ढूंढेंगे तुझे गली-गली सब ये ग़म के मारे|
पूछेगी हर निगाह कल तेरा ठिकाना|
ओ जाने वाले —

है तेरा वहां कौन सभी लोग हैं पराए,
परदेश की गर्दिश में कहीं, तू भी खो न जाए|
कांटों भरी डगर है तू दामन बचाना|
ओ जाने वाले—


दे देके ये आवाज कोई हर घड़ी बुलाए,
फिर जाए जो उस पार कभी लौट के न आए,
है भेद ये कैसा कोई कुछ तो बताना|
ओ जाने वाले हो सके तो लौट के आना|



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार
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खामोशी पहचाने कौन!

एक बार फिर से आज मैं अपने अत्यंत प्रिय शायरों में से एक, स्वर्गीय निदा फ़ाज़ली साहब का लिखा एक गीत शेयर कर रहा हूँ, जिसे जगजीत सिंह-चित्रा सिंह की सुरीली जोड़ी ने बहुत खूबसूरत अंदाज में गाया है|

निदा फ़ाज़ली साहब ने कुछ बेमिसाल गीत, ग़ज़लें और दोहे लिखे हैं और यह भी उनमें शामिल है| इंसानी भावनाओं को बहुत खूबसूरत अभिव्यक्ति निदा साहब की रचनाओं में मिलती है|

लीजिए आज प्रस्तुत है, निदा फ़ाज़ली साहब का यह सुंदर गीत –

मुँह की बात सुने हर कोई
दिल के दर्द को जाने कौन,
आवाज़ों के बाज़ारों में
ख़ामोशी पहचाने कौन।

सदियों-सदियों वही तमाशा
रस्ता-रस्ता लम्बी खोज
लेकिन जब हम मिल जाते हैं
खो जाता है जाने कौन।


जाने क्या-क्या बोल रहा था
सरहद, प्यार, किताबें, ख़ून
कल मेरी नींदों में छुपकर
जाग रहा था जाने कौन।

मैं उसकी परछाई हूँ या
वो मेरा आईना है
मेरे ही घर में रहता है
मेरे जैसा जाने कौन।


किरन-किरन अलसाता सूरज
पलक-पलक खुलती नींदें
धीमे-धीमे बिखर रहा है
ज़र्रा-ज़र्रा जाने कौन।

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार

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जनकवि शैलेन्द्र

फिल्मी दुनिया के जनकवि स्वर्गीय शैलेन्द्र जी की मृत्यु होने पर जनकवि बाबा नागार्जुन जी द्वारा उनके प्रति श्रद्धांजलि स्वरूप लिखी गई एक रचना आज शेयर कर रहा हूँ| इस कविता से मालूम होता कि बाबा नागार्जुन के मन में, फिल्मी दुनिया में सक्रिय अपने इस सृजनशील साथी के प्रति कितना स्नेह, लगाव और आदर था|


लीजिए आज बाबा नागार्जुन जी द्वारा शैलेन्द्र जी के प्रति उनकी श्रद्धांजलि के रूप में लिखी गई इस कविता का आस्वादन करते हैं-


गीतों के जादूगर का मैं छंदों से तर्पण करता हूँ ।’

सच बतलाऊँ तुम प्रतिभा के ज्योतिपुत्र थे,छाया क्या थी,
भली-भाँति देखा था मैंने, दिल ही दिल थे, काया क्या थी ।

जहाँ कहीं भी अंतर्मन से, ॠतुओं की सरगम सुनते थे,
ताज़े कोमल शब्दों से तुम रेशम की जाली बुनते थे ।

जन मन जब हुलसित होता था, वह थिरकन भी पढ़ते थे तुम,
साथी थे, मज़दूर-पुत्र थे, झंडा लेकर बढ़ते थे तुम ।


युग की अनुगुंजित पीड़ा ही घोर घन-घटा-सी छाई
प्रिय भाई शैलेन्द्र, तुम्हारी पंक्ति-पंक्ति नभ में लहराई ।

तिकड़म अलग रही मुस्काती, ओह, तुम्हारे पास न आई,
फ़िल्म-जगत की जटिल विषमता, आख़िर तुमको रास न आई ।

ओ जन मन के सजग चितेरे, जब-जब याद तुम्हारी आती,
आँखें हो उठती हैं गीली, फटने-सी लगती है छाती ।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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वही थोड़ा सा आदमी!

अशोक वाजपेयी जी आधुनिक कवियों की जमात में अग्रिम पंक्ति में नज़र आते हैं| उन्होंने मध्य प्रदेश में और केंद्र में भी सांस्कृतिक उत्थान से जुड़े अनेक पदों को सुशोभित किया| मध्य प्रदेश का ‘भारत भवन’ उनका सांस्कृतिक गतिविधियों के संचालन हेतु बहुत बड़ा कदम था|


लीजिए आज प्रस्तुत है, अशोक वाजपेयी जी की यह कविता –

अगर बच सका
तो वही बचेगा
हम सबमें थोड़ा-सा आदमी–

जो रौब के सामने नहीं गिड़गिड़ाता,
अपने बच्चे के नंबर बढ़वाने नहीं जाता मास्टर के घर,

जो रास्ते पर पड़े घायल को सब काम छोड़कर
सबसे पहले अस्पताल पहुंचाने का जतन करता है,
जो अपने सामने हुई वारदात की गवाही देने से नहीं हिचकिचाता–


वही थोड़ा-सा आदमी–
जो धोखा खाता है पर प्रेम करने से नहीं चूकता,

जो अपनी बेटी के अच्छे फ्राक के लिए
दूसरे बच्चों को थिगड़े पहनने पर मजबूर नहीं करता,

जो दूध में पानी मिलाने से हिचकता है,
जो अपनी चुपड़ी खाते हुए दूसरे की सूखी के बारे में सोचता है,

वही थोड़ा-सा आदमी–
जो बूढ़ों के पास बैठने से नहीं ऊबता
जो अपने घर को चीजों का गोदाम होने से बचाता है,

जो दुख को अर्जी में बदलने की मजबूरी पर दुखी होता है
और दुनिया को नरक बना देने के लिए दूसरों को ही नहीं कोसता

वही थोड़ा-सा आदमी–
जिसे ख़बर है कि
वृक्ष अपनी पत्तियों से गाता है अहरह एक हरा गान,
आकाश लिखता है नक्षत्रों की झिलमिल में एक दीप्त वाक्य,
पक्षी आंगन में बिखेर जाते हैं एक अज्ञात व्याकरण


वही थोड़ा-सा आदमी–
अगर बच सका तो
वही बचेगा।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार

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बस प्यार ही प्यार पले !

आज किशोर कुमार जी द्वारा स्वयं निर्मित फिल्म – ‘दूर गगन की छाँव में’ के लिए उनके ही द्वारा गाया गया एक गीत शेयर कर रहा हूँ, इस गीत का संगीत भी किशोर कुमार जी ने ही दिया है और इसमें उनके पुत्र अमित कुमार की भी आवाज है|

कुल मिलाकर ये एक बहुत सुंदर और आशावादी गीत है, लीजिए प्रस्तुत है ये गीत-  

आ चल के तुझे मैं लेके चलूँ एक ऐसे गगन के तले,

जहाँ ग़म भी ना हो, आँसू भी ना हो, बस प्यार ही प्यार पले|

++++

सूरज की पहली किरण से आशा का सवेरा जागे

चंदा की किरण से धुलकर घनघोर अंधेरा भागे,

कभी धूप खिले, कभी छाँव मिले, लंबी सी डगर ना खले|

+++++

जहाँ दूर नज़र दौड़ाएं, आज़ाद गगन लहराये

जहाँ रंगबिरंगे पंछी आशा का संदेसा लाये, 

सपनों में पली, हँसती हो कली, जहाँ शाम सुहानी ढले|

++++

सपनों के ऐसे जहां में, जहाँ प्यार ही प्यार खिला हो

हम जा के वहाँ खो जाएं, शिकवा ना कोई गीला हो,

कहीं बैर ना हो, कोई गैर ना हो, सब मिल के यूँ चलते चलें|

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार|

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जो लेके एक भी अच्छी ख़बर नहीं आते!

वसीम बरेलवी साहब आज के एक मशहूर शायर हैं जो अपने सहज भाव से कही गए, गहराई से भरे शेरों से जनता को बांध लेते हैं| मैंने भी अपने संस्थान के लिए किए गए आयोजनों में दो बार उनको आमंत्रित किया था|

लीजिए आज प्रस्तुत है, जनाब वसीम बरेलवी साहब की यह ग़ज़ल–

तुम्हारी राह में मिट्टी के घर नहीं आते,
इसीलिए तो तुम्हें हम नज़र नहीं आते|

मुहब्बतों के दिनों की यही ख़राबी है,
ये रूठ जाएँ तो फिर लौटकर नहीं आते|

जिन्हें सलीका है तहज़ीब-ए-ग़म समझने का,
उन्हीं के रोने में आँसू नज़र नहीं आते|


ख़ुशी की आँख में आँसू की भी जगह रखना,
बुरे ज़माने कभी पूछकर नहीं आते|

बिसात-ए-इश्क पे बढ़ना किसे नहीं आता,
यह और बात कि बचने के घर नहीं आते|

‘वसीम’ जहन बनाते हैं तो वही अख़बार,
जो ले के एक भी अच्छी ख़बर नहीं आते|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार
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ज्यों कीं त्यों धर दीनी चदरिया!

आज मन हो रहा कि संत कबीर दास जी को याद कर लें| कवि-कलाकार आदि आज की ज़िंदगी का चित्रण अपने हिसाब से करते रहते हैं और हम उनकी प्रस्तुति को देखते/पढ़ते रहते हैं| आज देखते हैं कि संत कबीर दास जी के इस बारे में क्या विचार हैं| वैसे इस भजन की पंक्तियों का अनेक फिल्मी गीतों आदि में भी प्रयोग किया गया है|

लीजिए आज प्रस्तुत है, संत कबीर साहब का यह भजन–



झीनी झीनी बीनी चदरिया ॥
काहे कै ताना काहे कै भरनी,
कौन तार से बीनी चदरिया ॥ १॥

इडा पिङ्गला ताना भरनी,
सुखमन तार से बीनी चदरिया ॥ २॥

आठ कँवल दल चरखा डोलै,
पाँच तत्त्व गुन तीनी चदरिया ॥ ३॥

साँ को सियत मास दस लागे,
ठोंक ठोंक कै बीनी चदरिया ॥ ४॥

सो चादर सुर नर मुनि ओढी,
ओढि कै मैली कीनी चदरिया ॥ ५॥

दास कबीर जतन करि ओढी,
ज्यों कीं त्यों धर दीनी चदरिया ॥ ६॥


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार
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तुम हो जाओ अविचल!

आज मैं पुनः अपनी एक पुरानी ब्लॉग पोस्ट दोहरा रहा हूँ|

आज मैं विख्यात कवि, नोबेल पुरस्कार विजेता- श्री पाब्लो नेरुदा की मूल रूप से ‘स्पेनिश’ भाषा में लिखी गई एक कविता के अंग्रेजी अनुवाद के आधार पर उसका भावानुवाद और उसके बाद अंग्रेजी में अनूदित कविता, जिसका मैंने अनुवाद किया है, उसको प्रस्तुत करने का प्रयास करूंगा। आज के लिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया कविता का भावानुवाद-


पाब्लो नेरुदा


मैं चाहता हूँ कि तुम हो जाओ अविचल



मैं चाहता हूँ कि तुम रहो अविचल- स्थिर, शांत
जैसे कि तुम यहाँ हो ही नहीं
और तुम सुनो मेरी आवाज, बहुत दूर से
और मेरी आवाज तुम्हे छू नहीं पाए,
ऐसा लगे कि जैसे तुम्हारे नेत्र कहीं उड़ गए हों,
और ऐसा लगता है कि किसी चुंबन ने तुम्हारे मुंह को बंद कर दिया है,
जैसे सभी पदार्थ, मेरी आत्मा से भरे हैं
और तुम उन पदार्थों से बाहर निकलती हो,
मेरी आत्मा से भरी हुई,
तुम मेरी आत्मा की तरह हो,
स्वप्न की एक तितली,
और तुम इस एक शब्द की तरह हो: अवसाद,


मैं चाहता हूँ कि तुम रहो अविचल- स्थिर, शांत
और तुम बहुत दूर लगती हो,
ऐसा लगता है जैसे तुम विलाप कर रही हो,
एक तितली, कपोत की तरह गुटर-गूं कर रही है,
और तुम मुझे बहुत दूर से सुनती हो,
और मेरी आवाज तुम तक नहीं पहुंचती है,
मुझे आने दो, जिससे मैं तुम्हारे मौन में स्थिर हो जाऊं,
और मुझे बात करने दो तुमसे, तुम्हारे मौन के माध्यम से,
यह एक दमकता दीप है,
सरल, जैसे एक अंगूठी
तुम एक रात की तरह हो,
अपनी स्थिरता और चमकते नक्षत्रों के साथ,

तुम्हारा मौन एक सितारे का मौन है,
उतना ही सुदूर और खरा।


मैं चाहता हूँ कि तुम रहो अविचल- स्थिर, शांत
ऐसे कि जैसे तुम यहाँ हो ही नहीं,
बहुत दूर हो और उदासी से भरी,
मानो तुम मर गई होती,
और फिर एक शब्द, एक मुस्कान काफी है,
मैं खुश हूँ;
क्योंकि यह सच नहीं है।


और अब वह अंग्रेजी अनुवाद, जिसके आधार मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-



Pablo Neruda


I Like For You To Be Still


I like for you to be still
It is as though you are absent
And you hear me from far away
And my voice does not touch you
It seems as though your eyes had flown away
And it seems that a kiss had sealed your mouth
As all things are filled with my soul
You emerge from the things
Filled with my soul
You are like my soul
A butterfly of dream

And you are like the word: Melancholy

I like for you to be still
And you seem far away
It sounds as though you are lamenting
A butterfly cooing like a dove
And you hear me from far away
And my voice does not reach you
Let me come to be still in your silence
And let me talk to you with your silence
That is bright as a lamp
Simple, as a ring
You are like the night
With its stillness and constellations
Your silence is that of a star

As remote and candid

I like for you to be still
It is as though you are absent
Distant and full of sorrow
So you would’ve died
One word then, One smile is enough
And I’m happy;
Happy that it’s not true


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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