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निर्बीज क्यों हो चले हम!

आज मैं एक बार फिर हिन्दी के श्रेष्ठ कवि और गीतकार श्री सोम ठाकुर जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| सोम ठाकुर जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं|

लीजिए आज प्रस्तुत है श्री सोम ठाकुर जी का यह गीत–


इस तरह निर्बीज -से
क्यों हो चले हम आज
हरियल घास पर बैठे हुए

कहाँ हैं अंकुर हमारे
तने – शाखें
ध्वंस बोलो पर सहमकर
टिकी आँखें
तृप्ति का कैसा समंदर हम तरेंगे
मरुथलों की प्यास पर बैठे हुए|

शोक मुद्राएँ
सुबह को दी किसी ने
शाम को दुर्दांत हलचल दी
गाल पर मलने चले थे
रंग -लाल गुलाल
लेकिन राख मल दी
किस लहू की कंदरा में चल पड़े
अरदास पर बैठे हुए
हरियल घास पर बैठे हुए|


(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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ज़माने में यही होता रहा है!

मोहब्बत में ‘फ़िराक़’ इतना न ग़म कर,
ज़माने में यही होता रहा है|

फ़िराक़ गोरखपुरी

जुदा आग़ाज़ से अंजाम से दूर!

जुदा आग़ाज़ से अंजाम से दूर,
मोहब्बत इक मुसलसल माजरा है|

फ़िराक़ गोरखपुरी

इस रंग से शरमा रहा है!

गुलाबी होती जाती हैं फ़ज़ाएँ,
कोई इस रंग से शरमा रहा है|

फ़िराक़ गोरखपुरी

तेरा दर्द अब तक जागता है!

जिसे चौंका के तूने फेर ली आँख,
वो तेरा दर्द अब तक जागता है|

फ़िराक़ गोरखपुरी

प्यार तुझ पर आ गया है!

शिकायत तेरी दिल से करते करते,
अचानक प्यार तुझ पर आ गया है|

फ़िराक़ गोरखपुरी

मोहब्बत को बड़ा धोका रहा है!

न जी ख़ुश कर सका तेरा करम भी,
मोहब्बत को बड़ा धोका रहा है|

फ़िराक़ गोरखपुरी

निगाहों को बड़ा धोका हुआ है!

हिजाबों को समझ बैठा मैं जल्वा,
निगाहों को बड़ा धोका हुआ है|

फ़िराक़ गोरखपुरी

कभी आँखों में आँसू आ गया है!

कभी ख़ुश कर गई मुझको तिरी याद,
कभी आँखों में आँसू आ गया है|

फ़िराक़ गोरखपुरी

मेरी ज़िंदगी मुझ से ख़फ़ा है!

तिरा ग़म क्या है बस ये जानता हूँ,
कि मेरी ज़िंदगी मुझ से ख़फ़ा है|

फ़िराक़ गोरखपुरी

शब-ए-फ़ुर्क़त मुझे क्या हो गया है!

समझता हूँ कि तू मुझ से जुदा है,
शब-ए-फ़ुर्क़त मुझे क्या हो गया है|

फ़िराक़ गोरखपुरी