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यह कवि का घर है !

डॉ रामदरश मिश्र जी, जिनकी रचना मैं आज शेयर कर रहा हूँ, वे हिन्दी के प्रतिष्ठित साहित्यकार हैं और कविता, कहानी तथा उपन्यास लेखन, सभी क्षेत्रों में समान रूप से सक्रिय एवं सम्मानित हैं|

आज की उनकी इस रचना में भी उन्होंने कवि की अलग प्रकार की दृष्टि और दर्शन का परिचय दिया है-



गेंदे के बड़े-बड़े जीवंत फूल
बेरहमी से तोड़ लिए गए
और बाज़ार में आकर बिकने लगे|

बाज़ार से ख़रीदे जाकर वे
पत्थर के चरणों पर चढ़ा दिए गए,
फिर फेंक दिए गए कूड़े की तरह|

मैं दर्द से भर आया
और उनकी पंखुड़ियाँ रोप दीं
अपनी आँगन-वाटिका की मिट्टी में,
अब वे लाल-लाल, पीले-पीले, बड़े-बड़े फूल बनकर
दहक रहे हैं|


मैं उनके बीच बैठकर उनसे संवाद करता हूँ,
वे अपनी सुगंध और रंगों की भाषा में
मुझे वसंत का गीत सुनाते हैं|


और मैं उनसे कहता हूँ —
जीओ मित्रो !
पूरा जीवन जीओ उल्लास के साथ,
अब न यहाँ बाज़ार आएगा
और न पत्थर के देवता पर तुम्हें चढ़ाने के लिए धर्म,
यह कवि का घर है !



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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बस यही एक अच्छी बात है!

आज एक ऐसे रचनाकार की रचना शेयर कर रहा हूँ, जिनकी कोई रचना शायद मैंने पहले शेयर नहीं की है| श्री राजेन्द्र राजन एक श्रेष्ठ रचनाकार हैं जिन्होंने अनेक श्रेष्ठ कविताएं, गीत और कहानियाँ लिखी हैं|

आज मैं उनकी एक सुंदर रचना शेयर कर रहा हूँ-


मेरे मन में
नफ़रत और गुस्से की आग,
कुंठाओं के किस्से,
और ईर्ष्या का नंगा नाच है|

मेरे मन में अंधी महत्वाकांक्षाएं,
और दुष्ट कल्पनाएं हैं|

मेरे मन में
बहुत से पाप,
और भयानक वासना है|

ईश्वर की कृपा से
बस यही एक अच्छी बात है,
कि यह सब मेरे सामर्थ्य से परे है|

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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दिल को वही काम आ गया!

आज फिर से मैं अपने प्रिय गायक मुकेश जी का गाया एक और गीत शेयर कर रहा हूँ| खास बात ये है आज का ये गीत मुकेश जी ने शम्मी कपूर जी के लिए गाया था, शायद मुकेश जी ने बहुत कम गीत गाये होंगे शम्मी कपूर जी के लिए, मुझे तो कोई और याद नहीं है| फिल्म- ‘ब्लफ़ मास्टर’ के लिए यह गीत- राजेन्द्र कृष्ण जी ने लिखा था और इसका संगीत दिया था – आनंद वीर जी शाह ने|


लीजिए प्रस्तुत है मुकेश जी का गाया, कुछ अलग किस्म का यह गीत, जिसमें प्यार करने न करने के बारे में कुछ तर्क-वितर्क किया गया है-

सोचा था प्यार हम न करेंगे,
सूरत पे यार हम न मरेंगे,
लेकिन किसी पे दिल आ गया|
सोचा था प्यार हम न करेंगे||

बहुत ख़ाक दुनिया की छानी थी हमने,
अब तक किसी की न मानी थी हमने,
धोखे में दिल कैसे आ गया|
सोचा था प्यार हम न करेंगे|


अगर दिल न देते बड़ा नाम करते,
मगर प्यार से बड़ा काम करते,
दिल को यही काम आ गया|


सोचा था प्यार हम न करेंगे
सूरत पे यार हम न मरेंगे
फिर भी किसी पे दिल आ गया|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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हम आपकी आँखों से नींदें ही उड़ा दें तो!

आज गुरुदत्त जी की फिल्म-प्यासा का एक गीत शेयर कर रहा हूँ, जिसे रफी साहब और गीता दत्त जी ने गाया है| इसमें यही सब बताया गया कि नायिका का प्यार पाने के लिए आशिक़ महोदय किस हद तक जाने को तैयार रहते हैं और क्या-क्या सहना पड़ता है मासूम से आशिक़ को|


यह मजेदार गीत, जिसका संगीत दिया है एस डी बर्मन साहब ने और गीतकार हैं – साहिर लुधियानवी जी| लीजिए प्रस्तुत है यह गीत-

हम आपकी आँखों में, इस दिल को बसा दें तो,
हम मूँद के पलकों को, इस दिल को सज़ा दें तो|

इन ज़ुल्फ़ों में गूँथेंगे हम फूल मुहब्बत के,
ज़ुल्फ़ों को झटक कर हम ये फूल गिरा दें तो|
हम आपकी आँखों में…

हम आपको ख्वाबों में ला, ला के सतायेंगे,
हम आपकी आँखों से नींदें ही उड़ा दें तो|
हम आपकी आँखों में…

हम आपके कदमों पर गिर जायेंगे ग़श खाकर,
इस पर भी न हम अपने आंचल की हवा दें तो|
हम आपकी आँखों में…

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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शिशु की दुनिया – रवीन्द्रनाथ ठाकुर

आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। आज भी मैंने अनुवाद के लिए अंग्रेजी कविता को ऑनलाइन उपलब्ध कविताओं में से लिया है, पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘Baby’s World’ का भावानुवाद-


गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता

शिशु की दुनिया


चाहता हूँ कि मैं, अपने शिशु के हृदय की दुनिया के शांत किनारे पर बैठ जाऊं,
मैं जानता हूँ कि इसमें सितारे हैं, जो उससे बात करते हैं, और आकाश जो उसे प्रसन्न करने के लिए
अपने नादान बादलों और इंद्रधनुषों के साथ, उसके चेहरे पर झुक जाता है|
जो ऐसा विश्वास दिलाते हैं कि वे मूक हैं, और दिखाते हैं, कि वे कभी चल-फिर नहीं सकते|
वे चुपके से खिसक कर उसकी खिड़की तक आ जाते हैं,अपनी कहानियों,
और चमकीले खिलौनों से भरी तश्तरियों के साथ|
मैं चाहता हूँ कि मैं उस मार्ग पर चल सकूँ, जो मेरे शिशु के मन से होकर निकलता है और सभी सीमाओं के पार चलता चला जाता है;
जहां कल्पित राजाओं के दूत, निरंतर इधर-उधर भागते रहते हैं, ऐसे राज्यों के बीच, जिनका इतिहास में कोई उल्लेख नहीं है;
जहां विवेक अपने ही नियमों से पतंगें बनाकर उनको उड़ाता है, सत्य, तथ्यों को उनकी बेड़ियों से मुक्त करता है|


-रवींद्रनाथ ठाकुर




और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार पर मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-


Baby’s World


I wish I could take a quiet corner in the heart of my baby’s very
own world.
I know it has stars that talk to him, and a sky that stoops
down to his face to amuse him with its silly clouds and rainbows.
Those who make believe to be dumb, and look as if they never
could move, come creeping to his window with their stories and with
trays crowded with bright toys.
I wish I could travel by the road that crosses baby’s mind,
and out beyond all bounds;
Where messengers run errands for no cause between the kingdoms
of kings of no history;
Where Reason makes kites of her laws and flies them, the Truth
sets Fact free from its fetters.


-Rabindranath Tagore

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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मेरी तस्वीर अधूरी रहनी थी!

आज फिर से प्रस्तुत है, एक और पुरानी ब्लॉग पोस्ट-

हिंदी के एक अत्यंत श्रेष्ठ गीतकार थे श्री भारत भूषण जी, मेरठ के रहने वाले थे और काव्य मंचों पर मधुरता बिखेरते थे। मैं यह नहीं कह सकता कि वे सबसे लोकप्रिय थे, परंतु जो लोग कवि-सम्मेलनों में कविता, गीतों के आस्वादन के लिए जाते थे, उनको भारत भूषण जी के गीतों से बहुत सुकून मिलता था।


वैसे भारत भूषण जी ने बहुत से अमर गीत लिखे हैं- ‘चक्की पर गेहूं लिए खड़ा, मैं सोच रहा उखड़ा- उखड़ा, क्यों दो पाटों वाली चाकी, बाबा कबीर को रुला गई’; ‘मैं बनफूल भला मेरा, कैसा खिलना, क्या मुर्झाना’, ‘आधी उमर करके धुआं, ये तो कहो किसके हुए’ आदि-आदि।

आज जो गीत मुझे बरबस याद आ रहा है वह एक ऐसा गीत है, जिसमें वे लोग जो जीवन में मनचाही उपलब्धियां नहीं कर पाते, असफल रहते हैं, वे अपने आप को किस तरह समझाते हैं, बहुत सुंदर उपमाएं दी हैं इस गीत में भारत भूषण जी ने, प्रस्तुत यह गीत-

तू मन अनमना न कर अपना, इसमें कुछ दोष नहीं तेरा,
धरती के कागज़ पर मेरी, तस्वीर अधूरी रहनी थी।

रेती पर लिखे नाम जैसा, मुझको दो घड़ी उभरना था,
मलयानिल के बहकाने पर, बस एक प्रभात निखरना था,
गूंगे के मनोभाव जैसे, वाणी स्वीकार न कर पाए,
ऐसे ही मेरा हृदय कुसुम, असमर्पित सूख बिखरना था।

जैसे कोई प्यासा मरता, जल के अभाव में विष पी ले,
मेरे जीवन में भी ऐसी, कोई मजबूरी रहनी थी।
धरती के कागज़ पर मेरी तस्वीर अधूरी रहनी थी॥

इच्छाओं के उगते बिरुवे, सब के सब सफल नहीं होते,
हर एक लहर के जूड़े में, अरुणारे कमल नहीं होते,
माटी का अंतर नहीं मगर, अंतर रेखाओं का तो है,
हर एक दीप के हंसने को, शीशे के महल नहीं होते।


दर्पण में परछाई जैसे, दीखे तो पर अनछुई रहे,
सारे सुख वैभव से यूं ही, मेरी भी दूरी रहनी थी।
धरती के कागज़ पर मेरी, तस्वीर अधूरी रहनी थी॥

मैंने शायद गत जन्मों में, अधबने नीड़ तोड़े होंगे,
चातक का स्वर सुनने वाले, बादल वापस मोड़े होंगे,
ऐसा अपराध किया होगा, जिसकी कुछ क्षमा नहीं होती,
तितली के पर नोचे होंगे, हिरणों के दृग फोड़े होंगे।

मुझको आजन्म भटकना था, मन में कस्तूरी रहनी थी।
धरती के कागज़ पर मेरी, तस्वीर अधूरी रहनी थी।।


इस गीत के साथ मैं उस महान गीतकार का विनम्र स्मरण करता हूँ।

नमस्कार

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अब दो आलम में उजाले ही उजाले होंगे!

आज सोचता हूँ कि गुलाम अली जी की गाई एक और ग़ज़ल शेयर करूं| इस ग़ज़ल के लेखक हैं ज़नाब परवेज़ जालंधरी साहब|


इस ग़ज़ल में मानो एक चुनौती है, या कहें कि जो अपने आपको कुर्बान करने को तैयार हो, वही ‘तुमसे’ इश्क़ कर पाएगा, कहा गया है न, ‘शीश उतारे भुईं धरे, सो पैठे घर माहीं’| चुनौती तो बड़ी ज़बरदस्त है ना!


लीजिए प्रस्तुत है यह खूबसूरत ग़ज़ल-

जिनके होंठों पे हँसी पाँव में छाले होंगे
हाँ वही लोग तेरे चाहने वाले होंगे|

मय बरसती है फ़ज़ाओं पे नशा तारीं है,
मेरे साक़ी ने कहीं जाम उछाले होंगे|

उनसे मफ़हूम-ए-ग़म-ए-ज़ीस्त अदा हो शायद,
अश्क़ जो दामन-ए-मिजग़ाँ ने सम्भाले होंगे|

शम्मा ले आये हैं हम जल्वागह-ए-जानाँ से,
अब दो आलम में उजाले ही उजाले होंगे|

हम बड़े नाज़ से आये थे तेरी महफ़िल में,
क्या ख़बर थी लब-ए-इज़हार पे ताले होंगे|


आज के लिए इतना ही
नमस्कार|
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ये कहानी फिर सही!

कविताओं और शायरी के मामले में, मूल परंपरा तो यही रही है कि हम रचनाओं को उनके रचयिता याने कवि अथवा शायर के नाम से जानते रहे हैं| लेकिन यह भी सच्चाई है कि बहुत सी अच्छी रचनाएँ सामान्य जनता तक तभी पहुँच पाती हैं जब उन्हें कोई अच्छा गायक, अच्छे संगीत के साथ गाता है| इसके लिए हमें उन विख्यात गायकों का आभारी होना चाहिए जिनके कारण बहुत सी बार गुमनाम शायर भी प्रकाश में आ पाते हैं|


आज मैं गुलाम अली साहब की गाई एक प्रसिद्ध गजल शेयर कर रहा हूँ, जिसे जनाब मसरूर अनवर साहब ने लिखा है|


लीजिए प्रस्तुत है यह ग़ज़ल, मुझे विश्वास है कि आपने इसे अवश्य सुना होगा-


हमको किसके ग़म ने मारा, ये कहानी फिर सही
किसने तोड़ा दिल हमारा, ये कहानी फिर सही
हमको किसके ग़म ने…

दिल के लुटने का सबब पूछो न सबके सामने
नाम आएगा तुम्हारा, ये कहानी फिर सही
हमको किसके ग़म ने…

नफरतों के तीर खाकर, दोस्तों के शहर में
हमने किस किस को पुकारा, ये कहानी फिर सही
हमको किसके ग़म ने…

क्या बताएँ प्यार की बाजी, वफ़ा की राह में
कौन जीता कौन हारा, ये कहानी फिर सही
हमको किसके ग़म ने..


आज के लिए इतना ही
नमस्कार|
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कोई पार नदी के गाता!

हिन्दी कवि सम्मेलनों के मंचों पर किसी समय हरिवंशराय बच्चन जी का ऐसा नाम था, जिसके लोग दीवाने हुआ करते थे| वह उनकी मधुशाला हो या लोकगीत शैली में लिखा गया उनका गीत- ‘ए री महुआ के नीचे मोती झरें’, ‘अग्निपथ,अग्निपथ,अग्निपथ’ आदि-आदि|


एक बात माननी पड़ेगी मुझे उनको कवि-सम्मेलन में साक्षात सुनने का सौभाग्य नहीं मिला, हाँ एक बार आकाशवाणी में उनका साक्षात्कार हुआ था, जिसके लिए मैं अपने प्रोफेसर एवं कवि-मित्र स्वर्गीय डॉ सुखबीर सिंह जी के साथ उनको, नई दिल्ली में उनके घर से लेकर आया था, और इंटरव्यू के दौरान स्टूडिओ में उनके साथ था|


लीजिए प्रस्तुत है बच्चन जी का यह खूबसूरत गीत-


कोई पार नदी के गाता!

भंग निशा की नीरवता कर,
इस देहाती गाने का स्वर,
ककड़ी के खेतों से उठकर,
आता जमुना पर लहराता!
कोई पार नदी के गाता!

होंगे भाई-बंधु निकट ही,
कभी सोचते होंगे यह भी,
इस तट पर भी बैठा कोई
उसकी तानों से सुख पाता!
कोई पार नदी के गाता!

आज न जाने क्यों होता मन
सुनकर यह एकाकी गायन,
सदा इसे मैं सुनता रहता,
सदा इसे यह गाता जाता!
कोई पार नदी के गाता!


आज के लिए इतना ही
नमस्कार|
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मैं नहीं कोई तो साहिल पे उतर जाएगा!

आज एक बार फिर मैं भारतीय उपमहाद्वीप में शायरी के क्षेत्र की एक  महान शख्सियत रहे ज़नाब अहमद फ़राज़ साहब की एक प्रसिद्ध ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ| फराज़ साहब भारत में बहुत लोकप्रिय रहे हैं और अनेक प्रमुख ग़ज़ल गायकों ने उनके गीत-ग़ज़लों आदि को गाया है|

लीजिए प्रस्तुत है ये खूबसूरत ग़ज़ल-

आँख से दूर न हो दिल से उतर जाएगा
वक़्त का क्या है गुज़रता है गुज़र जाएगा|

इतना मानूस न हो ख़िल्वत-ए-ग़म से अपनी
तू कभी ख़ुद को भी देखेगा तो डर जाएगा|

तुम सर-ए-राह-ए-वफ़ा देखते रह जाओगे
और वो बाम-ए-रफ़ाक़त से उतर जाएगा|

किसी ख़ंज़र किसी तलवार को तक़्लीफ़ न दो
मरने वाला तो फ़क़त बात से मर जाएगा|

ज़िन्दगी तेरी अता है तो ये जानेवाला
तेरी बख़्शीश तेरी दहलीज़ पे धर जाएगा|

डूबते-डूबते कश्ती को उछाला दे दूँ
मैं नहीं कोई तो साहिल पे उतर जाएगा|

ज़ब्त लाज़िम है मगर दुख है क़यामत का “फ़राज़”
ज़ालिम अब के भी न रोयेगा तो मर जाएगा|

आज के लिए इतना ही

नमस्कार|   

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