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धागों बिंधे ग़ुलाब हमारे पास नहीं!

आज फिर से एक पुरानी ब्लॉग पोस्ट शेयर कर रहा हूँ| आज मन है कि अत्यंत सरल हृदय, प्रेम गीतों के बादशाह और स्वाभिमानी कवि स्वर्गीय किशन सरोज जी का स्मरण करूं|

प्रसिद्ध गीत कवि स्व. श्री किशन सरोज जी का स्मरण करते हुए उनका एक गीत आज शेयर कर रहा हूँ, वैसे तो उनका हर गीत बेमिसाल है| किशन सरोज जी प्रेम के और विरह के गीतों के सुकुमार बादशाह थे, अक्सर उन्होंने कवि सम्मेलनों में ईमानदार और सृजनशील कवियों की जो स्थिति होती है, हल्की-फुल्की कविताओं के माहौल में उनको क्या कुछ सहना पड़ता है, इस व्यथा को अभिव्यक्ति दी है, किशन सरोज जी का एक ऐसा ही गीत आज प्रस्तुत है-

नागफनी आँचल में बांध सको तो आना
धागों बिंधे ग़ुलाब हमारे पास नहीं।

हम तो ठहरे निपट अभागे
आधे सोये, आधे जागे,
थोड़े सुख के लिये उम्र भर
गाते फिरे भीड़ के आगे,
कहाँ-कहाँ हम कितनी बार हुए अपमानित,
इसका सही हिसाब, हमारे पास नहीं।


हमने व्यथा अनमनी बेची,
तन की ज्योति कंचनी बेची,
कुछ न मिला तो अंधियारों को,
मिट्टी मोल चांदनी बेची।
गीत रचे जो हमने उन्हें याद रखना तुम
रत्नों मढ़ी किताब, हमारे पास नहीं।


झिलमिल करतीं मधुशालाएँ,
दिन ढलते ही हमें रिझाएँ,
घड़ी-घड़ी हर घूँट-घूँट हम,
जी-जी जाएँ, मर-मर जाएँ,
पीकर जिसको चित्र तुम्हारा धुंधला जाए,
इतनी कड़ी शराब, हमारे पास नहीं।


आखर-आखर दीपक बाले,
खोले हमने मन के ताले,
तुम बिन हमें न भाए पल भर,
अभिनन्दन के शाल-दुशाले,
अबके बिछुड़े कहाँ मिलेंगे, ये मत पूछो,
कोई अभी जवाब, हमारे पास नहीं।

-किशन सरोज

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।
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रंगीन खिलौने – रवीन्द्रनाथ ठाकुर

आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य संकलन- ‘PoemHunter.com’ से लेता हूँ। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘Coloured Toys’ का भावानुवाद-

गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता

रंगीन खिलौने

जब मैं तुम्हारे लिए रंगीन खिलौने लाता हूँ, मेरे बच्चे
मैं समझ जाता हूँ कि रंगों का इतना प्रदर्शन क्यों है- बादलों में, पानी पर,
और पुष्पों को इतनी आभा से क्यों रंगा गया है,
—जब मैं तुम्हें रंगीन खिलौने देता हूँ मेरे बच्चे|

जब मैं गीत गाता हूँ , तुम्हें नचाने के लिए
मैं सचमुच जान जाता हूँ कि पत्तियों में संगीत क्यों है,
और क्यों लहरें अपनी ध्वनियों का समूह-गान, ध्यान से सुनती भूमि को भेजती हैं

— जब मैं गीत गाता हूँ, तुम्हें नचाने के लिए|


जब मैं उपहार लाता हूँ, तुम्हारे ललचाते हाथों के लिए
मैं जान जाता हूँ कि पुष्पों के प्यालों में मधु क्यों भरा होता है
और क्यों फलों के भीतर गुप्त रूप से मधुर रस भर जाता है
— जब मैं उपहार लाता हूँ, तुम्हारे ललचाते हाथों के लिए|


जब मैं तुम्हारा चेहरा चूमता हूँ, जिससे तुम मुस्कुराओ, मेरे प्रिय,
मैं निस्संदेह यह समझ जाता हूँ कि आकाश से सुबह के प्रकाश के साथ, कौन सा आनंद प्रवाहित होकर आता है,
और वह कौन सा उल्लास है, जो ग्रीष्म की हवा मेरे शरीर में भर देती है
— जब मैं तुम्हारा चेहरा चूमता हूँ, जिससे तुम मुस्कुराओ|



-रवींद्रनाथ ठाकुर

और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-


Coloured Toys


When I bring to you coloured toys, my child,
I understand why there is such a play of colors on clouds, on water,
and why flowers are painted in tints
—when I give coloured toys to you, my child.

When I sing to make you dance
I truly now why there is music in leaves,
and why waves send their chorus of voices to the heart of the listening earth
—when I sing to make you dance.

When I bring sweet things to your greedy hands
I know why there is honey in the cup of the flowers
and why fruits are secretly filled with sweet juice
—when I bring sweet things to your greedy hands.

When I kiss your face to make you smile, my darling,
I surely understand what pleasure streams from the sky in morning light,
and what delight that is that is which the summer breeze brings to my body

—when I kiss you to make you smile.


-Rabindranath Tagore

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।
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हम हैं अनाड़ी!

आज 1959 में रिलीज हुई फिल्म -अनाड़ी, का एक गीत शेयर कर रहा हूँ, जिसे शैलेन्द्र जी ने लिखा है और शंकर जयकिशन जी ने इसका संगीत दिया है| इस गीत के लिए गीत लेखन, संगीत और गायन तीनों श्रेणियों में सर्वश्रेष्ठ होने के लिए फिल्मफेयर पुरस्कार प्रदान किए गए थे|

राजकपूर साहब पर फिल्माए गए इस गीत को गाया था मेरे प्रिय गायक – मुकेश जी ने|

कुछ बातों को हम आज के ज़माने में ज्यादा महत्व नहीं देते हैं, उनमें से एक है सादगी, ईमानदारी, सरलता| निदा फाज़ली साहब की एक पंक्ति मुझे बहुत अच्छी लगती है- ‘सोच-समझ वालों को थोड़ी नादानी दे मौला‘|

खैर आज आप इस अमर गीत का आनंद लीजिए-

सब कुछ सीखा हमने, ना सीखी होशियारी
सच है दुनिया वालों, कि हम हैं अनाड़ी |

दुनिया ने कितना समझाया, कौन है अपना कौन पराया,
फिर भी दिल की चोट छुपाकर, हमने आपका दिल बहलाया|
खुद ही मर मिटाने की ये ज़िद है हमारी|

सच है दुनिया वालों, कि हम हैं अनाड़ी ||

दिल का चमन उजड़ते देखा, प्यार का रंग उतरते देखा,
हमने हर जीने वाले को, धन दौलत पर मरते देखा,
दिल पे मरने वाले, मरेंगे भिखारी|
सच है दुनिया वालों, कि हम हैं अनाड़ी ||


असली नकली चेहरे देखे, दिल पे सौ सौ पहरे देखे,
मेरे दुखते दिल से पूछो, क्या-क्या ख्वाब सुनहरे देखे,
टूटा जिस तारे पे, नजर थी हमारी|
सच है दुनिया वालों, कि हम हैं अनाड़ी ||

आज के लिए इतना ही|

नमस्कार|

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Memoirs Poetry

पर दिलों पर हुक़ूमत हमारी रही!

आज फिर से पुरानी पोस्ट का दिन है, लीजिए मैं अपनी एक पुरानी पोस्ट, फिर से शेयर कर रहा हूँ|

यह उस समय की एक पोस्ट है जब मैं अपने जीवन के विभिन्न पड़ावों, सेवा स्थलों के अनुभवों के बारे में लिख रहा था| ये सभी पुरानी ब्लॉग पोस्ट आप कभी फुर्सत में पढ़ सकते हैं, इनमें श्रेष्ठ कवियों की रचनाएँ भी शामिल हैं|

लगभग ढाई वर्ष के लखनऊ प्रवास और सात वर्ष के ऊंचाहार प्रवास की कुछ छिटपुट घटनाएं याद करने का प्रयास करता हूँ।

एक घटना जो याद आ रही है, वह है लखनऊ के पिकप प्रेक्षागृह में आयोजित कवि सम्मेलन, जिसमें श्री सोम ठाकुर, माणिक वर्मा जी, पं. चंद्रशेखर मिश्र, ओम प्रकाश आदित्य जी आदि के अलावा डॉ. वसीम बरेलवी भी शामिल हुए थे।

इस आयोजन के समय पं. चंद्र शेखर मिश्र जी से काफी विस्तार से बातचीत हुई थी और कुछ समय बाद ही शायद उनका देहांत भी हो गया था। मुझे वाराणसी में अस्सी घाट के निकट उनके आवास पर जाने का भी अवसर मिला था। बहुत श्रेष्ठ रचनाकार थे और विशेष रूप से भोजपुरी साहित्य को उनकी भेंट अतुल्य है। ओम प्रकाश आदित्य जी और माणिक वर्मा जी तो इसके बाद भी हमारे एक-दो आयोजनों में ऊंचाहार आए थे। हास्य-व्यंग्य में जिस गरिमा को उन्होंने बनाए रखा, वह बेमिसाल है। आज वे भी हमारे बीच नहीं हैं, उनको मेरी विनम्र श्रंद्धांजलि।

इस आयोजन की प्रमुख विशेषताओं में डॉ. वसीम बरेलवी की शायरी और श्री सोम ठाकुर जी का काव्य पाठ रहे थे। मुझे आज भी याद है सोम जी ने जब इस आयोजन में अपने गीत ‘ये प्याला प्रेम का प्याला है’ का पाठ किया था तब श्रोता मदमस्त हो गए थे।

मुझे ऊंचाहार के लिए एक आयोजन निश्चित करने का प्रसंग याद आ रहा है। भोजपुरी अभिनेता और गायक (जो अभी राजनेता बन गए हैं) श्री मनोज तिवारी का कार्यक्रम निश्चित करना था। जैसा कि एनटीपीसी में होता है, इसके लिए मानव संसाधन, वित्त और शायद क्रय विभाग के सदस्यों को शामिल करते हुए एक कमेटी बनाई गई। सुल्तानपुर में रामलीला के मंच पर, श्री मनोज तिवारी का कार्यक्रम था, यह निश्चित हुआ कि वहाँ जाकर ही हम उनसे बात करेंगे।

इसमें कोई संदेह नहीं कि श्री मनोज तिवारी बहुत लोकप्रिय जन-गायक रहे हैं। यह निश्चित हुआ कि वे कार्यक्रम के बाद चुपचाप अपनी जीप में एक देहाती टाइप रेस्टोरेंट में आ जाएंगे और हम लोग वहीं उनसे मिलकर बात कर लेंगे। इस प्रकार हम लोग कुछ उसी अंदाज में उस रात मिले, जैसे फिल्मों में गैंग्स्टर मिलते हैं। फर्क इतना है कि हमारे हाथों में बंदूकों की जगह कागज़-कलम थे।
बाद में तिवारी जी ने यह भी बताया कि फिल्मों में जाने से पहले वे भी ओएनजीसी में हिंदी अनुवादक के रूप में कार्य करते थे। खैर यह कार्यक्रम भी अन्य कार्यक्रमों की तरह अत्यंत सफल रहा।

अंत में सोम ठाकुर जी की एक श्रेष्ठ रचना प्रस्तुत है, जिसमें बताया गया है कि अमर तो कवि-कलाकार ही होते हैं, क्योंकि वे हमारे दिलों पर राज करते हैं-

यूं दिये पर हर इक रात भारी रही, रोशनी के लिए जंग जारी रही
हम कि जो रात में भोर बोये रहे, सीप में मोतियों को संजोए रहे।


क्या करें हम समंदर के विस्तार का, जिसके पानी की हर बूंद खारी रही।


वक्त का जो हर इक पल भुनाते रहे, जो सदा जग-सुहाती सुनाते रहे,
वो हैं शामिल ज़हीनों की फेहरिस्त में, सरफिरों में हमारी शुमारी रही।


लोग थे जो ज़माने पे छाए रहे, जिनके घर सत्य भी सिर झुकाए रहे।
उनके पर्चम भले ही किलों पर रहे, पर दिलों पर हुक़ूमत हमारी रही।


वक्त के वो कदम चूमकर क्या करे, राजधानी में वो घूमकर क्या करे।
वो किसी शाह के घर मिलेगा नहीं, सोम की तो फक़ीरों से यारी रही।


फिलहाल इतना ही,
नमस्कार।

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Film Song

संसार है एक नदिया!

साथियो आज मैं आपके साथ शेयर कर रहा हूँ 1975 में रिलीज़ हुई फ़िल्म- ‘रफ्तार’ का एक गीत जिसे – अभिलाष जी ने लिखा था। इस शानदार गीत को मेरे परम प्रिय गायक मुकेश जी ने आशा भौंसले जी के साथ गाया था और इसके लिए संगीत दिया था सोनिक जी ने। इस गीत को मदनपुरी जी और अभिनेत्री मौसमी चटर्जी जी पर फिल्माया गया था।

इस गीत में, एक अलग प्रकार से जीवन दर्शन प्रस्तुत किया गया है और यह बहुत सुंदर गीत है-

संसार है इक नदिया
दुःख सुख दो किनारे हैं!
न जाने कहाँ जाएँ
हम बहते धारे हैं!!
संसार है इक नदिया….


चलते हुए जीवन की,
रफ़्तार में एक लय है!
इक राग में इक सुर में,
संसार की हर शय है !!
संसार की हर शय है!!


इक तार पे गर्दिश में,
ये चाँद सितारे है!
न जाने कहाँ जाएँ,
हम बहते धारे हैं!!
संसार है इक नदिया….


धरती पे अम्बर की,
आँखों से बरसती हैं!
इक रोज़ यही बूंदें,
फिर बादल बनती हैं!
इस बनने बिगड़ने के,
दस्तूर में सारे हैं!


कोई भी किसी के लिए,
अपना न पराया है!
रिश्तों के उजाले में,
हर आदमी साया है!
हर आदमी साया है!!

क़ुदरता के भी देखो तो,
ये खेल निराले हैं!
न जाने कहाँ जाएँ,
हम बहते धारे हैं!!
संसार है इक नदिया……


है कौन वो दुनिया में,
न पाप किया जिसने!
बिन उलझे कांटो से,
हैं फूल चुने किसने!
हैं फूल चुने किसने!!
बेदाग नहीं कोई,
यहां पापी सारे हैं!
संसार है एक नदिया!


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|

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मनवा तो सावन -सावन रहा!

आज फिर से अपने प्रिय कवियों में से एक, माननीय सोम ठाकुर जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| अपने संस्थान में कवि सम्मेलनों के आयोजन के क्रम में आदरणीय सोम जी से अनेक बार भेंट हुई थी|

मुझे एक प्रसंग विशेष याद आ रहा है, जब सोम जी संचालन कर रहे थे, तब कवि सम्मेलन पहले खुले में हो रहा था, बारिश हो जाने के कारण उसको हॉल में शिफ्ट किया गया और यह कवि सम्मेलन सुबह चार बजे राष्ट्र गान के साथ सुबह तक चला| इस आयोजन की एक और विशेषता इसमें स्वर्गीय किशन सरोज जी द्वारा प्रस्तुत गीत भी थे| जैसे- ‘वो देखो कुहरे में, चन्दन वन डूब गया’ और सोम ठाकुर जी का गीत- ‘ये प्याला प्रेम का प्याला है, तू नाच के और नचाकर पी’|

मैंने अनेक बार सोम जी के राष्ट्रभक्ति और भाषा के सम्मान, स्वाभिमान से संबंधी गीत शेयर किए हैं, आज इस रूमानी गीत का आनंद लीजिए-

देह हुई फागुन तो क्या हुआ
रे मितवा
मनवा तो सावन -सावन रहा|

इतना विश्वास किया अपनों पर
चंद्रमा रखा हम ने सपनों पर
हमको जग की चित्तरसारी में
हर चेहरा दर्पण -दर्पण रहा|
रे मितवा
देह हुई फागुन तो क्या हुआ|


बस इतना ही धरम –करम भाया
अपनाया जो, जी भर अपनाया
हमको तो सदा प्रेम -मंदिर का
हर रजकन चंदन -चंदन रहा|
रे मितवा
देह हुई फागुन तो क्या हुआ|

कौन रखे याद इस कहानी को
कहाँ मिले शरण आग पानी को
गुँथी हुई बाँहों में मुक्ति मिली
बाकी सुख बंधन -बंधन रहा|
रे मितवा
देह हुई फागुन तो क्या हुआ|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|

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आओ कि कोई ख़्वाब बुनें कल के वास्ते!

साहिर लुधियानवी साहब हिंदुस्तान के जाने-माने शायर थे, जिनके गीतों और शायरी का हमारी फिल्मों में भी खूब इस्तेमाल किया गया है| साहिर साहब बहुत स्वाभिमानी व्यक्ति थे, पहले फिल्मों में शायर का नाम नहीं लिखा जाता था| साहिर साहब ने यह शर्त रखी कि मैं फिल्म के लिए गीत तभी लिखूंगा, जब मेरा नाम भी प्रदर्शित किया जाए, और इसके बाद ही गीतकारों का नाम प्रदर्शित करना प्रारंभ हुआ|

साहिर साहब की आज की यह नज़्म भी अपने आप में लाजवाब है, लीजिए इसका आनंद लीजिए-


आओ कि कोई ख़्वाब बुनें कल के वास्ते
वरना ये रात आज के संगीन दौर की,
डस लेगी जान-ओ-दिल को कुछ ऐसे कि जान-ओ-दिल
ता-उम्र फिर न कोई हसीं ख़्वाब बुन सकें|

गो हम से भागती रही ये तेज़-गाम उम्र,
ख़्वाबों के आसरे पे कटी है तमाम उम्र,


ज़ुल्फ़ों के ख़्वाब, होंठों के ख़्वाब, और बदन के ख़्वाब
मेराज-ए-फ़न के ख़्वाब, कमाल-ए-सुख़न के ख़्वाब,

तहज़ीब-ए-ज़िन्दगी के, फ़रोग़-ए-वतन के ख़्वाब
ज़िन्दाँ के ख़्वाब, कूचा-ए-दार-ओ-रसन के ख़्वाब,

ये ख़्वाब ही तो अपनी जवानी के पास थे
ये ख़्वाब ही तो अपने अमल के असास थे,
ये ख़्वाब मर गये हैं तो बे-रंग है हयात
यूँ है कि जैसे दस्त-ए-तह-ए-सन्ग है हयात|


आओ कि कोई ख़्वाब बुनें कल के वास्ते
वरना ये रात आज के संगीन दौर की,
डस लेगी जान-ओ-दिल को कुछ ऐसे कि जान-ओ-दिल
ता-उम्र फिर न कोई हसीं ख़्वाब बुन सकें|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|

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A wax doll, walking in Hot Desert!

A question have been asked in #IndiSpire this time, in response to which we have to tell- which is our favourite poem and why!

I have mainly been a reader of Hindi literature and poetry, though I have read and translated various English poems of Wordsworth, Tagore and many more poets and shared them through my blog posts.


Among Hindi poets there are poems like ‘Ram Ki Shakti Puja’ by Nirala ji, some poems written by Jay Shankar Prasad ji, Dinkar Ji and many other great poets I can mention.


But the poem- a small Sonnet or ‘Geet’ by late Bharat Bhushan ji is one, which I can relate to and love a lot. In this poem the poet refers to the life today, in which we are struggling at so many levels and the poet refers to the poetry line by Kabir Das ji, which says- ‘chalti chaaki dekhkar, diya kabira roy, do paatan ke beech me, saabut bacha na koy’. Kabir Das ji while looking the wheat grinding machine (Chakki) remembers that in our life, we get crushed between the two worlds, this where we live and one where we have to go after death.


Referring to this poetry line Bharat Bhushan ji says that today we are being crushed between so many layers, facing so many challenges and he explains some of these levels, which I would refer to shortly-


Firstly, he says the person who was born to do some creative work, say write poems etc. becomes a clerk and all his creativity dies in writing applications, for seeking various permissions, for leave etc. And all smiles, dreams die before they could blossom.


Further he says that children demand what they desire, toys and other things but the person is not in a position to provide all that, all hopes are short lived.

Lastly, he explains how actually poems/sonnets that reach our hearts are born, for that he gives an example that we have to live a life, with so many hardships, as if ‘a doll made of wax is walking on its feet in a desert, in hot summer noon Sun’.


This is a small sonnet but it presents the life of a common man, the struggle at various levels, that I can relate with it and like it very much.
Here is the Sonnet written by late Bharat Bhushan Ji, which I am referring to-

चक्की पर गेंहू लिए खड़ा मैं सोच रहा उखड़ा उखड़ा,
क्यों दो पाटों वाली साखी बाबा कबीर को रुला गई।

लेखनी मिली थी गीतव्रता प्रार्थना- पत्र लिखते बीती,
जर्जर उदासियों के कपड़े थक गई हँसी सीती- सीती,
हर चाह देर में सोकर भी दिन से पहले कुलमुला गई।

कन्धों पर चढ़ अगली पीढ़ी ज़िद करती है गुब्बारों की,
यत्नों से कई गुनी ऊँची डाली है लाल अनारों की,
प्रत्येक किरण पल भर बहला काले कम्बल में सुला गई।


गीतों की जन्म-कुंडली में संभावित थी यह अनहोनी,
मोमिया मूर्ति को पैदल ही मरुथल की दोपहरी ढोनी,
खंडित भी जाना पड़ा वहाँ, जिन्दगी जहाँ भी बुला गई।


This is my humble submission in response to the #IndiSpire prompt- We all have grown up reading many poems. which is your favourite poem? and why? #favouritepoem

Thanks for reading.

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दूसरा बनवास !

कैफ़ी आज़मी साहब हमारे देश के ऐसे मशहूर शायरों में शामिल थे, जिनका नाम शायरी की दुनिया में बहुत आदर के साथ लिया जाता है| आज उनकी जो नज़्म मैं शेयर कर रहा हूँ उसमें उन्होंने बताया है कि मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम जी यदि बाबरी मस्जिद का गिराया जाना देखते तो उनको कैसा महसूस होता|


लीजिए आज प्रस्तुत है कैफ़ी साहब की यह भावपूर्ण नज़्म-


राम बन-बास से जब लौट के घर में आए,
याद जंगल बहुत आया जो नगर में आए|

रक़्स-ए-दीवानगी आँगन में जो देखा होगा
छः दिसम्बर को श्रीराम ने सोचा होगा
इतने दीवाने कहाँ से मिरे घर में आए|

जगमगाते थे जहाँ राम के क़दमों के निशाँ
प्यार की कहकशाँ लेती थी अंगड़ाई जहाँ,
मोड़ नफ़रत के उसी राहगुज़र में आए|


धर्म क्या उनका था, क्या ज़ात थी, ये जानता कौन
घर न जलता तो उन्हें रात में पहचानता कौन
घर जलाने को मिरा लोग जो घर में आए|

शाकाहारी थे मेरे दोस्त तुम्हारे ख़ंजर
तुम ने बाबर की तरफ़ फेंके थे सारे पत्थर
है मिरे सर की ख़ता, ज़ख़्म जो सर में आए|


पाँव सरजू में अभी राम ने धोए भी न थे
कि नज़र आए वहाँ ख़ून के गहरे धब्बे
पाँव धोए बिना सरजू के किनारे से उठे
राम ये कहते हुए अपने द्वारे से उठे,

राजधानी की फ़ज़ा आई नहीं रास मुझे
छः दिसम्बर को मिला दूसरा बनबास मुझे|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|

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कहीं चलो ना, जी !

आज स्वर्गीय कैलाश गौतम जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ| अपने संस्थान में कवि सम्मेलनों का आयोजन करते-करते कैलाश जी से अच्छी मित्रता हो गई थी, बहुत सरल हृदय व्यक्ति थे| उनकी रचनाएँ जो बहुत प्रसिद्ध थीं, उनमें ‘अमौस्या का मेला’ और ‘कचहरी’ – ‘भले डांट घर में तू बीवी की खाना, भले जाके जंगल में धूनी रमाना,—- मगर मेरे बेटे कचहरी न जाना’| बहुत जबर्दस्त माहौल बनाती है ये कविता|

फिलहाल आज की कविता का आनंद लीजिए, यह भी कैलाश गौतम जी की एक सुंदर रचना है-

आज का मौसम कितना प्यारा
कहीं चलो ना, जी !
बलिया, बक्सर, पटना, आरा
कहीं चलो ना, जी !

हम भी ऊब गए हैं इन
ऊँची दीवारों से,
कटकर जीना पड़ता है
मौलिक अधिकारों से ।
मानो भी प्रस्ताव हमारा
कहीं चलो ना, जी !


बोल रहा है मोर अकेला
आज सबेरे से,
वन में लगा हुआ है मेला
आज सबेरे से ।
मेरा भी मन पारा -पारा
कहीं चलो ना, जी !

झील ताल अमराई पर्वत
कबसे टेर रहे,
संकट में है धूप का टुकड़ा
बादल घेर रहे ।
कितना कोई करे किनारा
कहीं चलो ना, जी !


सुनती नहीं हवा भी कैसी
आग लगाती है,
भूख जगाती है यह सोई
प्यास जगाती है ।
सूख न जाए रस की धारा
कहीं चलो ना, जी !


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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