दोस्तों की दोस्ती है सामने मेरे!

जब दोस्तों की दोस्ती है सामने मेरे,
दुनिया में दुश्मनी की मिसालों को क्या करूँ|

राजेश रेड्डी

उठते सवालों को क्या करूँ!

मैं जानता हूँ सोचना अब एक जुर्म है,
लेकिन मैं दिल में उठते सवालों को क्या करूँ|

राजेश रेड्डी

मैं शिवालों को क्या करूँ!

दिल ही बहुत है मेरा इबादत के वास्ते,
मस्जिद को क्या करूँ मैं शिवालों को क्या करूँ|

राजेश रेड्डी

पाँवों के छालों को क्या करूँ!

चलना ही है मुझे मेरी मंज़िल है मीलों दूर,
मुश्किल ये है कि पाँवों के छालों को क्या करूँ|

राजेश रेड्डी

उजालों को क्या करूँ!

मेरे ख़ुदा मैं अपने ख़यालों को क्या करूँ,
अंधों के इस नगर में उजालों को क्या करूँ|

राजेश रेड्डी

कहीं तिश्नगी बेहिसाब है!

कहीं आँसुओं की है दास्ताँ, कहीं मुस्कुराहटों का बयाँ,
कहीं बर्क़तों की है बारिशें कहीं तिश्नगी बेहिसाब है|

राजेश रेड्डी

कहीं मेहरबां बेहिसाब है!

कहीं खो दिया कहीं पा लिया, कहीं रो लिया कहीं गा लिया,
कहीं छीन लेती है हर ख़ुशी, कहीं मेहरबां बेहिसाब है|

राजेश रेड्डी

हर ओर कलियुग के चरण!

स्वर्गीय भारत भूषण जी का एक गीत और आज शेयर कर रहा हूँ| भारत भूषण जी एक ऐसे गीतकार थे जिनके बारे में कहा जा सकता है कि वे अपने समय से काफी आगे की बात कहते थे| कवि सम्मेलनों में उनका काव्य पाठ सुनना एक विलक्षण अनुभव होता था|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय भारत भूषण जी का यह गीत –

हर ओर कलियुग के चरण
मन स्मरण कर अशरण शरण।


धरती रंभाती गाय सी
अन्तोन्मुखी की हाय सी
संवेदना असहाय सी
आतंकमय वातावरण।

प्रत्येक क्षण विष दंश है
हर दिवस अधिक नृशंस है
व्याकुल परम् मनु वंश है
जीवन हुआ जाता मरण।

सब धर्म गंधक हो गये
सब लक्ष्य तन तक हो गये
सद्भाव बन्धक हो गये
असमाप्त तम का अवतरण।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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इक अजीब सी ये नक़ाब है!

कहीं छाँव है कहीं धूप है कहीं और ही कोई रूप है,
कई चेहरे इस में छुपे हुए, इक अजीब सी ये नक़ाब है|

राजेश रेड्डी

ये जो ज़िन्दगी की किताब है!

ये जो ज़िन्दगी की किताब है, ये किताब भी क्या किताब है|
कहीं इक हसीन सा ख़्वाब है कहीं जान-लेवा अज़ाब* है|

वेदना*

राजेश रेड्डी