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अब तुझे मैं याद आना चाहता हूँ !

एक बार फिर से आज जनाब क़तील शिफ़ाई साहब की एक ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ| क़तील साहब भारतीय के एक अत्यंत लोकप्रिय शायर रहे हैं| उनकी इस ग़ज़ल को जगजीत सिंह जी ने भी गाया है|

कवि/शायरों की कैसी-कैसी ख्वाहिशें होती हैं, जैसे इस ग़ज़ल में ही क़तील साहब ने कुछ बेहतरीन ख़्वाहिशों का ज़िक्र किया है, जो किसी कवि/शायर की ही हो सकती हैं| लीजिए इस लोकप्रिय ग़ज़ल का आनंद लीजिए –   

अपने होंठों पर सजाना चाहता हूँ,
आ तुझे मैं गुनगुनाना चाहता हूँ|

कोई आँसू तेरे दामन पर गिराकर
बूँद को मोती बनाना चाहता हूँ


थक गया मैं करते-करते याद तुझको
अब तुझे मैं याद आना चाहता हूँ

छा रहा है सारी बस्ती में अँधेरा
रोशनी हो, घर जलाना चाहता हूँ

आख़री हिचकी तेरे ज़ानों पे आये
मौत भी मैं शायराना चाहता हूँ

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार|

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कालेज स्टूडेंट!

कभी कभी हल्की-फुल्की बात भी करनी चाहिए, यही सोचते हुए आज काका हाथरसी जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ| अपने ज़माने में काका जी काव्य-मंच की एक ज़रूरी आइटम माने जाते थे| बाद में तो कुछ ऐसा होता गया की मंचों पर हास्य कविताओं का ही बोलबाला हो गया| वैसे यह संतुलन बनता-बिगड़ता रहता है|

लीजिए आज आप स्वर्गीय काका जी की यह रचना पढ़ लीजिए, और हाँ इसमें दिमाग लगाने की बिलकुल आवश्यकता नहीं है, एक छात्र का विवरण है इसमें, यद्यपि तब से अब तक ज़माना बहुत बदल चुका है-


फादर ने बनवा दिये तीन कोट¸ छै पैंट¸
लल्लू मेरा बन गया कालिज स्टूडैंट।
कालिज स्टूडैंट¸ हुए होस्टल में भरती¸
दिन भर बिस्कुट चरें¸ शाम को खायें इमरती।
कहें काका कविराय¸ बुद्धि पर डाली चादर¸
मौज कर रहे पुत्र¸ हडि्डयां घिसते फादर।


पढ़ना–लिखना व्यर्थ हैं¸ दिन भर खेलो खेल¸
होते रहु दो साल तक फर्स्ट इयर में फेल।
फर्स्ट इयर में फेल¸ जेब में कंघा डाला¸
साइकिल ले चल दिए¸ लगा कमरे का ताला।
कहें काका कविराय¸ गेटकीपर से लड़कर¸
मुफ़्त सिनेमा देख¸ कोच पर बैठ अकड़कर।


प्रोफ़ेसर या प्रिंसिपल बोलें जब प्रतिकूल¸
लाठी लेकर तोड़ दो मेज़ और स्टूल।
मेज़ और स्टूल¸ चलाओ ऐसी हाकी¸
शीशा और किवाड़ बचे नहिं एकउ बाकी।
कहें काका कवि, राय भयंकर तुमको देता¸
बन सकते हो इसी तरह ‘बिगड़े दिल नेता।’


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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कौवों ने खुजलाईं पांखें, कई दिनों के बाद!

बंगाल के चुनाव परिणामों को लेकर कुछ कहने का मन हो रहा है| कल देखा कि राजदीप सरदेसाई बहुत दिनों के बाद, अपनी दीदी के बंगाल चुनावों में विजयी होने के उपलक्ष्य में प्रसन्नचित्त होकर उनका इंटरव्यू ले रहे थे| बहुत दिनों के बाद ऐसा मौका आता है जब राजदीप, बरखा दत्त, रवीश कुमार, विनोद दुआ जैसे गए जमाने के लाडले पत्रकारों को अपनी खुशी ज़ाहिर करने का मौका मिलता है|

सचमुच मोदी जी ने बहुत सारे लोगों की दुकान पर ताला लगा दिया है| बहुत से नेता, जैसे – यशवंत सिन्हा, शरद यादव, अरुण शौरी, शत्रुघ्न सिन्हा आदि-आदि तो कुर्सी न मिलने पर यह सोचकर बाहर गए थे कि अभी विपक्ष को एक करेंगे और मोदी जी को बाहर करके फिर से कोई अच्छी सी गद्दी पा जाएंगे! कुछ नहीं हुआ, तब ऐसा कोई मौका आने से, इनको लगता है कि शायद अंतिम यात्रा से पहले इनको, कुछ समय कुर्सी मैया की गोद में सोने का मौका मिल जाए|


पता नहीं क्यों ऐसे में बाबा नागार्जुन जी की ‘अकाल के बाद’ कविता याद आती है, जिसमें बताया गया है कि अकाल के बाद जब घर में अनाज के दाने आते हैं, तब घर से जुड़े प्राणियों में कैसे फिर से जान आ जाती है, जैसे चूल्हा- चक्की से होने वाले उत्पादन के आधार पर- छिपकलियाँ, चूहे, कानी कुतिया और कौए भी, सब सक्रिय हो जाते हैं |

और यहाँ जबरन लगभग रिटायर हो चुके राजनेता और राजदीप जैसे स्तरहीन पत्रकार, जो आंदोलन के दौरान स्पष्ट रूप से दुर्घटनावश हुई मृत्यु के मामले में भी संदेह पैदा करना चाहते हैं, नए सपने देखने लगते हैं|


अभी देखा जाए तो 5 राज्यों के चुनाव में हुआ क्या है? किसने क्या खोया है? कांग्रेस लगातार अस्तित्वहीन होती जा रही है| मेरा खयाल है कि भाजपा ने हर जगह अपनी स्थिति में सुधार किया है| सबसे ज्यादा सुधार तो बंगाल में ही हुआ है, जहां भाजपा पिछली विधान सभा में 3 सीटों से बढ़कर 77 पर आ गई है| ये कितने प्रतिशत बढ़ोतरी है जी|

हाँ उन्होंने सपने कुछ ज्यादा ही ऊंचे देखे थे, तो सपने तो ऊंचे ही देखने चाहिएं ना! और इसके लिए मेहनत भी बहुत की गई, शायद इसीलिए वे इतना आगे भी बढ़ पाए| लेकिन ये महान पत्रकार और राजनेता इस बारे में तो बात ही नहीं करते कि बंगाल में कम्युनिस्टों और कांग्रेसियों का क्या हुआ? कहाँ है अब उनकी दुकान?


भाजपा के हिंदुत्ववादी कट्टर समर्थकों की भाषा मुझे बिलकुल पसंद नहीं है, लेकिन शायद यह उनकी रणनीति है उनके विरुद्ध, जिनका पूरा चुनावी गणित इस बात पर निर्भर है कि एक समुदाय विशेष के वोट कहीं बंट न जाएँ, और वास्तव में यदि बंगाल में ओवैसी और कम्युनिस्ट-कांग्रेस कुछ वोट ले पाते तो शायद परिणाम वैसा ही होता, जैसा भाजपा वाले सपना देख रहे थे|


मैं ऐसा नहीं मान पाता कि जो भी सत्ता में है वो खराब है और जो सत्ता से बाहर हो गया, वो स्वतः पवित्र हो गया| मैं मानता हूँ कि सरकारों के निष्पादन का विश्लेषण, हर मामले में, गुण-दोष के आधार पर किया जाना चाहिए और इस दृष्टि से मैं मानता हूँ कि मोदी सरकार का निष्पादन पहले की सरकार के मुक़ाबले काफी अच्छा है|

एक बात और बहुत स्पष्ट है कि जहां दिल्ली में आए परिणामों के लिए कांग्रेस द्वारा की गई आत्महत्या की बहुत बड़ी भूमिका थी, वहीं बंगाल में कांग्रेस और कम्युनिस्ट दोनों पार्टियों ने आत्महत्या करके इस परिणाम को संभव बनाया| यदि ये पार्टियाँ ऐसा ही करते रहने वाली हैं, तो भविष्य की राजनीति के निर्माण में इनकी इस शहादत की महान भूमिका होगी|


ऐसे ही मन हुआ कि हाल ही के चुनाव परिणामों पर अपनी प्रतिक्रिया दे दूँ, बाकी तो जनता मालिक है|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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सोच समझवालों को थोड़ी नादानी दे मौला!

आज फिर से मैं अपने एक अत्यंत प्रिय शायर रहे स्वर्गीय निदा फ़ाज़ली साहब की एक रचना शेयर कर रहा हूँ| निदा साहब ने गीत, ग़ज़ल, दोहे- हर विधा में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया है और उनमें जो कबीर साहब जैसी साफ़गोई और फक्कड़पन दिखाई देता है, वह आज के समय में दुर्लभ है|


इस ग़ज़ल में भी उन्होंने सादगी के साथ कितनी गहरी बात कही है, वह महसूस करने लायक है| लीजिए आज प्रस्तुत है निदा फ़ाज़ली साहब की यह रचना, जिसे जगजीत सिंह जी ने अनूठे अंदाज़ में गाया है-

गरज बरस प्यासी धरती पर फिर पानी दे मौला,
चिड़ियों को दाने, बच्चों को गुड़धानी दे मौला|

दो और दो का जोड़ हमेशा चार कहाँ होता है,
सोच समझवालों को थोड़ी नादानी दे मौला|

फिर रोशन कर ज़हर का प्याला चमका नई सलीबें,
झूठों की दुनिया में सच को ताबानी दे मौला|

फिर मूरत से बाहर आकर चारों ओर बिखर जा,
फिर मंदिर को कोई मीरा दीवानी दे मौला|


तेरे होते कोई किसी की जान का दुश्मन क्यों हो,
जीने वालों को मरने की आसानी दे मौला |


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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Film Song

तेरी मेहंदी लेकर दिन उगा!

नीरज जी हिन्दी साहित्यिक मंचों के अत्यंत सुरीले और सृजनशील गीतकार थे, जिन्होंने फिल्म जगत में भी अपना विशेष स्थान बनाया था|

आज नीरज जी का लिखा एक मस्ती भरा फिल्मी गीत शेयर कर रहा हूँ, जिसे 1971 में रिलीज़ हुई फिल्म- शर्मीली के लिए सचिन देव बर्मन जी के संगीत निर्देशन में किशोर कुमार जी ने अपने मस्ती भरे अंदाज़ में गाया था|


लीजिए आज प्रस्तुत है नीरज जी का लिखा ये मस्ती भरा गीत-

ओ मेरी, ओ मेरी, ओ मेरी शर्मीली,
आओ ना, तड़पाओ ना|

तेरा काजल लेकर रात बनी, रात बनी
तेरी मेंहदी लेकर दिन उगा, दिन उगा,
तेरी बोली सुनकर सुर जगे, सुर जगे
तेरी खुशबू लेकर फूल खिला, फूल खिला|
जान-ए-मन तू है कहाँ
ओ मेरी शर्मीली…


तेरी राहों से गुज़रे जब से हम, जब से हम
मुझे मेरी डगर तक याद नहीं, याद नहीं,
तुझे देखा जब से दिलरुबा, दिलरुबा
मुझे मेरा घर तक याद नहीं, याद नहीं|
जान-ए-मन तू है कहाँ
ओ मेरी शर्मीली…


ओ नीरज नयना आ ज़रा, आ ज़रा
तेरी लाज का घूँघट खोल दूं, खोल दूं
तेरे आँचल पर कोई गीत लिखूँ, गीत लिखूँ
तेरे होंठों में अमृत घोल दूँ, घोल दूँ
जान-ए-मन तू है कहाँ
ओ मेरी शर्मीली…


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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यूं ही ना तोड़ अभी बीन रे सपेरे!

आज फिर से पुरानी पोस्ट का दिन है, लीजिए मैं अपनी एक पुरानी पोस्ट शेयर कर रहा हूँ|

अपनी शुरू की ब्लॉग पोस्ट्स में, मैंने अपनी जीवन यात्रा के महत्वपूर्ण पड़ावों का ज़िक्र किया था, आज उनमें से ही एक पोस्ट को दोहरा रहा हूँ, क्योंकि इसमें आदरणीय बुद्धिनाथ मिश्र जी का एक प्यारा सा गीत शामिल है और प्रसंग भी मुझे आशा है कि आपको पसंद आएगा|
जयपुर में रहते हुए ही मैंने हिंदुस्तान कॉपर लिमिटेड की एक वैकेंसी देखी, हिंदी अनुवादक के लिए, यह कार्यपालक श्रेणी का पद था, जबकि आकाशवाणी में, मैं पर्यवेक्षकीय स्तर पर था, हालांकि पदनाम वही था। इसके अलावा वेतन में काफी अंतर था। मैंने आवेदन किया और चयन परीक्षा एवं साक्षात्कार के लिए मुझे बुलावा भी आ गया।

इस बीच मेरे दूसरे पुत्र का जन्म जयपुर में हो चुका था। और आगे की यात्रा पर जाने वाले हम चार लोग थे।


मुझे जाना था बिहार के संथाल परगना क्षेत्र में, जो अब झारखंड में आता है। टाटानगर से लगभग 40 कि.मी. दूर है यह इलाका। जाने से पहले ही मैंने अखबार में यह खबर पढ़ी कि वहाँ गैर आदिवासी लोगों को 10 इंच छोटा करने (गर्दन काटने) की घटनाएं हो रही थीं। परम आदरणीय शिबू सोरेन जी का इलाका है वह।


खैर मैं वहाँ पहली बार जा रहा था और इत्तफाक से मुझे कोई सही मार्गदर्शन करने वाला भी नहीं मिला, बल्कि एक सज्जन ने अधूरे ज्ञान के आधार पर मुझे जो बताया वह मुझे बहुत महंगा पड़ सकता था। मैंने वहाँ जाने के लिए टाटानगर एक्सप्रेस पकड़ी, जो बताया गया था कि सुबह 6 बजे पहुंचेगी, लेकिन वह 9 बजे के बाद पहुंची। वहाँ से मुझे हिंदुस्तान कॉपर लिमिटेड के कार्यालय, मऊभंडार जाना था, जहाँ जाने के लिए केवल टेम्पो मिलते हैं, जो सवारियां ठूंसकर भरने पर चलते हैं, और 40 किलोमीटर का वह जंगली रास्ता भी माशाअल्ला था।


खैर रोते-धोते मैं 11 बजे के बाद वहाँ पहुंचा, जबकि उम्मीदवारों की लिखित परीक्षा वहाँ 10 बजे से प्रारंभ होकर पूरी हो चुकी थी और अब साक्षात्कार होना था। मैंने अपनी परिस्थितियां बताईं और मुझे अनुमति दे दी गई, जबकि अन्य लोगों का साक्षात्कार शुरु हो रहा था, मुझे टेस्ट देने के लिए बिठा दिया गया और अंत में मेरा साक्षात्कार हो गया।

जैसा मैंने बताया था कि केंद्रीय अनुवाद ब्यूरो के प्रशिक्षण के उपरांत मुझे मिला मेडल मेरे काफी काम आया बाकी चयन परीक्षा का निष्पादन तो होगा ही।
बाद में जब मैं गेस्ट हाउस में रुका तो मुझे मालूम हुआ कि प्रत्याशियों में एक ऐसे सज्जन भी शामिल थे, जो केंद्रीय मंत्री रहीं श्रीमती राम दुलारी सिन्हा के पर्सनल स्टॉफ में शामिल रहे थे और वे यह मान रहे थे कि उनका चयन तो कोई रोक नहीं सकता। बाद में मुझे बताया गया कि वहाँ के उप महाप्रबंधक (का. एवं प्रशा.)- श्री राज सिंह निर्वाण ने वहाँ के वरि. प्रबंधक (राजभाषा)- डॉ. राम सेवक गुप्त से कहा था कि वह मिनिस्टर का आदमी है अतः उसका चयन कर लें वरना दिक्कत हो जाएगी। इस पर गुप्ता जी ने कहा था कि आप कर लीजिए, मैं तो उसी को चुनूंगा, जो मुझे ठीक लग रहा है। खैर निर्वाण जी भी गलत काम करना नहीं चाहते थे।


काफी समय बाद जब मैं वहाँ से आ रहा था, तब मुझे वहाँ के सतर्कता प्रभारी ने मुझे वे पत्र दिखाए, जो दो केंद्रीय मंत्रियों- श्री वसंत साठे और श्री एन.के.पी. साल्वे ने मेरी नियुक्ति के विरुद्ध लिखे थे। इन दोनो मंत्रियों ने श्रीमती सिन्हा के स्टाफ में रहे उस व्यक्ति की शिकायत को अग्रेषित किया था। उन सज्जन को भी एक पाइंट यह मिल गया था कि मैं देर से पहुंचा था। खैर इसका मेरे मैडल और निष्पादन का हवाला देते हुए, समुचित उत्तर दे दिया गया था।


हिंदुस्तान कॉपर लिमिटेड की इस इकाई का नाम इंडियन कॉपर कॉम्प्लेक्स था, जो पहले अंग्रेजो द्वारा चलाई जाती थी और उस समय उसका नाम था- इंडियन कॉपर कार्पोरेशन था। वहाँ की माइंस थीं मुसाबनी माइंस, जो देश की सबसे गहरी ऑपरेशनल खदानें थीं। किसी जमाने में, अंग्रेजों ने यहाँ से तांबे के अलावा बड़ी मात्रा में सोना, चांदी भी निकाले थे। खदानों के मामले में यह लागू होता है कि खदान जितनी गहरी होती जाएगी, खनन की लागत उतनी ही बढ़ती जाएगी। जबकि खदान में तांबे की मात्रा बहुत कम हो गई थी और खनन लागत बढ़ती जा रही थी। कई बार ऐसा लगता था कि स्टाफ को यदि घर बिठाकर पैसा दिया जाए तो घाटा कम होगा, खनन करने पर ज्यादा। खैर कई उपाय अपनाए जा रहे थे वहाँ पर खनन लागत को कम करने के लिए। वैसे अब स्थिति यह है कि, ये खदानें कई वर्ष पहले बंद की जा चुकी हैं।


अंग्रेजों के समय से ही वहाँ की टाउनशिप बनी थी, और उसे लोगों को बांटने की अंग्रेजों की नीति के अनुसार ही बसाया गया था। ऑफिस के कर्मचारियों को अलग बसाया गया था, उसका नाम था स्टाफ कालोनी, अंग्रेज काफी बड़ी संख्या में नेपालियों को भी मज़दूर के रूप में काम करने के लिए ले आए थे और उनके लिए नेपाली कालोनी बना दी थी, उनके बच्चों का अब कोई भविष्य नहीं था, वे पूरा दिन जुआ खेलते थे। अंग्रेजों ने कर्मचारियों को बांटकर रखा, उनको अच्छी सुविधाएं दीं लेकिन शिक्षा के लिए कोई व्यवस्था नहीं की थी।


हिंदुस्तान कॉपर में आने के बाद यहाँ शिक्षा की सुविधाएं विकसित करने का प्रयास किया गया। हिंदुस्तान कॉपर लिमिटेड के कलकत्ता स्थित मुख्यालय में श्रेष्ठ कवि डॉ. बुद्धिनाथ मिश्र कार्यरत थे, उनके एक आशावादी गीत के साथ यह ब्लॉग समाप्त करते हैं, वहाँ के बारे में बाकी बातें बाद में करेंगे-


एक बार और जाल फेंक रे मछेरे
जाने किस मछली में बंधन की चाह हो।
सपनों की ओस गूंथती कुस की नोंक है,
हर दर्पण में उभरा एक दिवालोक है,
रेत के घरौंदों में सीप के बसेरे,
इस अंधेर में कैसे प्रीत का निबाह हो।
एक बार और जाल फेंक रे मछेरे….


उनका मन आज हो गया पुरइन पात है,
भिगो नहीं पाती यह पूरी बरसात है,
चंदा के इर्द-गिर्द मेघों के घेरे,
ऐसे में क्यों न कोई मौसमी गुनाह हो।
एक बार और जाल फेंक रे मछेरे….


गूंजती गुफाओं में कल की सौगंध है,
हर चारे में कोई चुंबकीय गंध है,
कैसे दे हंस झील के अनंत फेरे,
पग-पग पर लहरें जब बांध रही छांव हो।
एक बार और जाल फेंक रे मछेरे…
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कुमकुम सी निखरी कुछ भोरहरी लाज है,
बंसी की डोर बहुत कांप रही आज है,
यूं ही ना तोड़ अभी बीन रे सपेरे,
जाने किस नागिन में प्रीति का उछाह हो।
एक बार और जाल फेंक रे मछेरे
जाने किस मछली में, बंधन की चाह हो॥

( पुरइन पात- कमल का पत्ता)


डा. बुद्धिनाथ मिश्र
फिलहाल इतना ही,
नमस्कार।

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अपने शहर का रास्ता!

आज फिर से अपने एक पुराने कवि-मित्र को याद कर रहा हूँ| उनके बारे में एक बात यह भी कि मैथिली शरण गुप्त जी शायद उनके नाना थे, या शायद दादा रहे हों, यह ठीक से याद नहीं, वैसे यह रिश्ता महत्वपूर्ण भी नहीं है, ऐसे ही याद आ गया|

हाँ तो मेरे यह मित्र थे स्वर्गीय नवीन सागर जी, कविताओं के अलावा बहुत अच्छी कहानियाँ भी लिखते थे और उनकी कहानियाँ उस समय धर्मयुग, सारिका आदि पत्रिकाओं में प्रकाशित होती थीं|


नवीन जी से शुरू की मुलाकातें तो अन्य मित्रों की तरह दिल्ली में ही हुईं, जब वे संघर्ष कर रहे थे, एक दो छोटी-मोटी पत्र-पत्रिकाओं में उन्होंने दिल्ली में काम किया, बाद में वे मध्य प्रदेश हिन्दी ग्रंथ अकादमी में अच्छे पद पर तैनात हो गए| मेरे कुछ संबंधी भी उस समय भोपाल में थे और उसके बाद मेरा यह प्रयास रहता था कि जब भी भोपाल जाता था, उनसे अवश्य मिलता था|

नवीन सागर जी का बहुत पहले, वर्ष 2000 में लगभग 52 वर्ष की आयु में ही दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया था, उस समय बहुत झटका लगा था| आज जब एक-एक करके कई वरिष्ठ साथी विदा हो रहे हैं, अचानक नवीन जी का खयाल आया|

अब और कुछ न कहते हुए, नवीन जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ, जो शहर की संवेदनहीनता को रेखांकित करती है-

आधी रात के वक़्त अपने शहर का रास्‍ता
पराए शहर में भूला|


बड़ा भारी शहर और भारी सन्‍नाटा
कोई वहाँ परिचित नहीं,
परिचित सिर्फ़ आसमान
जिसमें तारे नहीं ज़रा-सा चॉंद,
परिचित सिर्फ़ पेड़
चिड़ियों की नींद में ऊँघते हुए,
परिचित सिर्फ़ हवा
रुकी हुई दीवारों के बीच उदासीन|


परिचित सिर्फ़ भिखारी
आसमान से गिरे हुए चीथड़ों से,
जहाँ-तहाँ पड़े हुए
परिचित सिर्फ़ अस्‍पताल क़त्‍लगाह हमारे,
परिचित सिर्फ़ स्‍टेशन
आती-जाती गाड़ियों के मेले में अकेला
छूटा हुआ रोशन|


परिचित सिर्फ़ परछाइयाँ:
चीज़ों के अँधेरे का रंग,
परिचित सिर्फ़ दरवाज़े बंद और मज़बूत।


इनमें से किसी से पूछता रास्‍ता
कि अकस्‍मात एक चीख़
बहुत परिचित जहाँ जिस तरफ़ से
उस तरफ़ को दिखा रास्‍ता|


कि तभी
मज़बूत टायरों वाला ट्रक मिला
जो रास्‍ते पर था,
ट्रक ड्राइवर गाता हुआ चला रहा था
मैं ऊँघता हुआ अपने शहर पहुँचा।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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मैं तेरी ही रुबाई हूँ!

आज ही समाचार मिला कि कवि सम्मेलनों को अपनी सृजनशील और सुरीली प्रस्तुतियों से गरिमा प्रदान करने वाले डॉक्टर कुँवर बेचैन नहीं रहे| मैं उनको श्रद्धांजलि स्वरूप, अपनी पुरानी ब्लॉग पोस्ट्स से उनकी दो रचनाएँ पुनः प्रस्तुत कर रहा हूँ|

डॉ कुँवर बेचैन जी मेरे अग्रजों में रहे हैं, उनके दो गीत आज शेयर कर रहा हूँ| बेचैन जी उस महानन्द मिशन कॉलेज, गाजियाबाद में प्रोफेसर रहे हैं जहां मैंने कुछ समय अध्ययन किया, यद्यपि मेरे विषय अलग थे|
दिल्ली में रहते हुए गोष्ठियों आदि में उनको सुनने का अवसर मिल जाता था, बाद में जब मैं अपनी नियोजक संस्था के लिए आयोजन करता तब उनको वहाँ आमंत्रित करने का अवसर भी मिला|


बेचैन जी कविता के लिए समर्पित व्यक्ति थे और एक से एक मधुर और प्रभावशाली गीत उन्होंने लिखे हैं| यह रचनाएँ भी अपने आप में अलग तरह की हैं|

लीजिए प्रस्तुत है बेचैन जी की यह रचना –

प्यासे होंठों से जब कोई झील न बोली बाबू जी,
हमने अपने ही आँसू से आँख भिगो ली बाबू जी|


भोर नहीं काला सपना था पलकों के दरवाज़े पर,
हमने यों ही डर के मारे आँख न खोली बाबू जी|


दिल के अंदर ज़ख्म बहुत हैं इनका भी उपचार करो,
जिसने हम पर तीर चलाए मारो गोली बाबू जी|


हम पर कोई वार न करना हैं कहार हम शब्द नहीं,
अपने ही कंधों पर है कविता की डोली बाबू जी|


यह मत पूछो हमको क्या-क्या दुनिया ने त्यौहार दिए,
मिली हमें अंधी दीवाली, गूँगी होली बाबू जी|


सुबह सवेरे जिन हाथों को मेहनत के घर भेजा था,
वही शाम को लेकर लौटे खाली झोली बाबू जी|


एक और गीत, जो बिलकुल अलग तरह का है-


नदी बोली समन्दर से, मैं तेरे पास आई हूँ।
मुझे भी गा मेरे शायर, मैं तेरी ही रुबाई हूँ।।


मुझे ऊँचाइयों का वो अकेलापन नहीं भाया;
लहर होते हुए भी तो मेरा मन न लहराया;
मुझे बाँधे रही ठंडे बरफ की रेशमी काया।
बड़ी मुश्किल से बन निर्झर, उतर पाई मैं धरती पर;
छुपा कर रख मुझे सागर, पसीने की कमाई हूँ।।


मुझे पत्थर कभी घाटियों के प्यार ने रोका;
कभी कलियों कभी फूलों भरे त्यौहार ने रोका;
मुझे कर्तव्य से ज़्यादा किसी अधिकार ने रोका।
मगर मैं रुक नहीं पाई, मैं तेरे घर चली आई;
मैं धड़कन हूँ मैं अँगड़ाई, तेरे दिल में समाई हूँ।।


पहन कर चाँद की नथनी, सितारों से भरा आँचल;
नये जल की नई बूँदें, नये घुँघरू नई पायल;
नया झूमर नई टिकुली, नई बिंदिया नया काजल।
पहन आई मैं हर गहना, कि तेरे साथ ही रहना;
लहर की चूड़ियाँ पहना, मैं पानी की कलाई हूँ।|


एक बार फिर से मैं इस सुरीले कवि और महान इंसान को अपनी भाव-भीनी श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ| ईश्वर उनको अपने चरणों में स्थान दें|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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गति,अगति, सद्गति!

आज का समय मानव जाति के लिए बड़ा कठिन है, खास तौर पर कोरोना की यह दूसरी लहर भारतवर्ष के लिए बड़े कष्ट लेकर आई है| पहली लहर के समय हम कहते थे कि बाहर से लोगों को क्यों आने दे रहे हैं! आज दूसरे अनेक देश भारत से लोगों का वहाँ जाना प्रतिबंधित कर रहे हैं| इस महामारी का हम सबको मिलकर मुक़ाबला करना है, मैं तो कम से कम उन लोगों में से नहीं हूँ जो इस स्थिति के लिए भी किसी एक व्यक्ति को दोष देकर मुक्त हो जाएँ|

जिस गति से आज कोरोना फैल रहा है, उस पर शीघ्र नियंत्रण किया जाना आवश्यक और मुझे उम्मीद है कि एक संकल्प-बद्ध राष्ट्र के रूप में हम ऐसा करने में सफल होंगे|


असल में, मैं स्वयं को इतना कुशल नहीं मानता कि कोरोना के बारे में कोई उपयोगी सलाह दे सकूँ, वैसे हमारे यहाँ हर घर में ऐसे लोग मिल जाएंगे जो कोरोना को दूर भगाने के कारगर घरेलू नुस्खे बता सकते हैं, परंतु जब उनके किसी अपने को यह रोग लग जाता है, तब वे शांत हो जाते हैं|


खैर आज मैं गति को लेकर कुछ बात करना चाह रहा था| गोवा में हम जिस सोसायटी में रहते हैं, उसमें सभी 6 मंजिला इमारतें हैं, गोवा में शायद सामान्यतः इतनी मंज़िलें बनाने की अनुमति है| और हम छठी मंज़िल पर रहते हैं| अपनी लिफ्ट का इस्तेमाल करते समय अक्सर मुझे ऐसा लगता है कि अपनी यह लिफ्ट दिल्ली मैट्रो की तरह चलती है| जी हाँ, जितने समय में दिल्ली मैट्रो एक स्टेशन से दूसरे स्टेशन तक पहुँचती है, उतने समय में अपनी यह लिफ्ट, एक फ्लोर से दूसरे फ्लोर पर पहुँचती है| मैं यही सोचता हूँ कि अगर अपनी बिल्डिंग 20-25 या इससे अधिक फ्लोर वाली होती तो हमें दिल्ली कि एक मैट्रो लाइन- ग्रीन, ब्लू या किसी पर भी पूरी यात्रा का आनंद मिल जाता| अब थोड़ी-बहुत अतिशयोक्ति की तो आप मुझे अनुमति देंगे ही न!

आज कोरोना के इस माहौल में बंबई (मुंबई) की हालत सबसे ज्यादा खराब है, और पूरे देश से वहाँ श्रमिक अपनी ज़िंदगी बनाने के लिए जाते हैं| ऐसे में एक पुराना गाना, नए संदर्भ में याद आता है-

ऐ दिल, मुश्किल-जीना यहाँ,

जरा हटके, जरा बचके, ये है बंबई मेरी जान|


वैसे भी कोरोना ने हमारी ज़िंदगी की गति की ऐसी की तैसी कर रखी है, ऐसे ही मन हुआ कि अपनी इस लिफ्ट के बहाने किसी ओर तरफ ध्यान दिया जाए, वैसे जो चुनौती आज हम सबके सामने है, उससे तो हमको मिलकर निपटना ही है|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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टूटा नहीं दिल ये अभी!

आज मैं फिर से अपने प्रिय गायक मुकेश जी का एक खूबसूरत गीत शेयर कर रहा हूँ| फिल्म-दूल्हा-दुल्हन के लिए यह गीत राज कपूर जी पर फिल्माया गया था, गीत के लेखक थे- इंदीवर और संगीतकार थे – कल्याणजी-आनंदजी|
वैसे भी मुकेश जी उदासी भरे नग़मों के शहंशाह माने जाते हैं, हालांकि उन्होंने मस्ती भरे गीत भी बहुत गाये हैं|
लीजिए आज प्रस्तुत है मुकेश जी का उदासी भरा, दिल टूटने की स्थितियों का यह गीत, जीवन की कुछ स्थितियों को चित्रित करने के लिए ऐसे गीत भी बहुत ज़रूरी हैं-


तुम सितम और करो
टूटा नहीं दिल ये अभी,
हम भी क्या याद करेंगे
तुम्हें चाहा था कभी|
तुम सितम और करो
टूटा नहीं दिल ये अभी|


ये वही होठ हैं
जो गीत मेरे गाते थे,
ये वही गेसू हैं
जो मुझपे बिखर जाते थे|
आज क्या हो गया
क्यों हो गए बेगाने सभी|
तुम सितम और करो
टूटा नहीं दिल ये अभी|


अपने ख्वाबों का जहाँ
मुझ में कभी ढूँढा था,
तुम वही हो कि कभी
तुमने मुझे पूजा था|
देखते हो हमें ऐसे कि
न देखा हो कभी|
तुम सितम और करो
टूटा नहीं दिल ये अभी|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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