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निर्बीज क्यों हो चले हम!

आज मैं एक बार फिर हिन्दी के श्रेष्ठ कवि और गीतकार श्री सोम ठाकुर जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| सोम ठाकुर जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं|

लीजिए आज प्रस्तुत है श्री सोम ठाकुर जी का यह गीत–


इस तरह निर्बीज -से
क्यों हो चले हम आज
हरियल घास पर बैठे हुए

कहाँ हैं अंकुर हमारे
तने – शाखें
ध्वंस बोलो पर सहमकर
टिकी आँखें
तृप्ति का कैसा समंदर हम तरेंगे
मरुथलों की प्यास पर बैठे हुए|

शोक मुद्राएँ
सुबह को दी किसी ने
शाम को दुर्दांत हलचल दी
गाल पर मलने चले थे
रंग -लाल गुलाल
लेकिन राख मल दी
किस लहू की कंदरा में चल पड़े
अरदास पर बैठे हुए
हरियल घास पर बैठे हुए|


(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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एक पुराना दुख!

आज एक पुरानी ब्लॉग पोस्ट शेयर कर रहा हूँ|

इस शहर में वो कोई बारात हो या वारदात
अब किसी भी बात पर खुलती नहीं हैं खिड़कियां । (दुष्यंत कुमार)

लेकिन ये ब्लॉग लिखने का उद्देश्य तो खिड़कियों को खोलने का प्रयास करना ही है।
एक पुराना अनुभव साझा कर रहा हूँ, उससे पहले ये पंक्तियां याद आ रही हैं-


एक पुराने दुख ने पूछा क्या तुम अभी वहीं रहते हो
उत्तर दिया चले मत आना, मैंने वो घर बदल लिया है। (शिशुपाल सिन्ह ‘निर्धन’)


अब वह घटना-

कभी-कभी इंसान को यह सनक लगती है कि मैं खिड़कियां खोलूंगा। ऐसा मेरे साथ हुआ था 90 के दशक में, यह मन में बहुत बार आया कि अखबार में नियमित कॉलम लिखकर स्थितियों पर अपनी भड़ास निकाली जाए, प्रतिक्रिया के रास्ते अपनी भूमिका का निर्वाह किया जाए। लेकिन इसके लिए पत्रकारिता की पृष्ठभूमि और उससे भी अधिक किसी अखबार के दफ्तर में प्रभावी संपर्क की ज़रूरत है। प्रभावी इसलिए कि पत्रकार दोस्त तो कुछ थे, लेकिन वे ऐसा निर्णय लेने की स्थिति में नहीं थे।

मैंने विचार मंथन करके 3 महत्वपूर्ण विषयों पर लेख लिखे और अपने इन लेखों पर मैं स्वयं काफी मुग्ध या संतुष्ट तो था ही। इन लेखों के बारे में यहाँ संक्षेप में बता दूं। पहला लेख था-
________________________________________
• भारतीय रेल
इस लेख में मैंने अपने उस समय के अनुभवों के आधार पर ट्रेन के कंडक्टरों और कुलियों की अनैतिक गतिविधियों के बारे में विस्तार से लिखा था । एक गतिविधि, शायद वो अब भी होती हो, यह थी कि जनरल बोगी पर कुली पूरी तरह कब्ज़ा कर लेते हैं, उस पर मिलिट्री या कुछ और लिखकर और फिर पैसे लेकर, सिविलियन को मिलिट्री मैन बनाते हैं। इसमें एक दृश्य मैंने लिखा था कि यार्ड से गाड़ी आती है, तब जनरल बोगी में सभी जगह कुली नीचे की दोनों बर्थ पर पर रखकर खड़े हो जाते हैं, और सीट एलॉटमेंट की इस महान प्रक्रिया को अंजाम देते हैं। यह देखकर बरबस यह गाना याद आ जाता है-
‘कितने बाज़ू, कितने सर, सुन ले दुश्मन ध्यान से ….’
इस लेख की अंतिम लाइन थी- कहते हैं कि इस देश को भगवान ही चला रहा है, तो फिर रेल कौन चला रहा है?

2. दूसरा लेख भारतीय प्रशासनिक तंत्र के बारे में था, इसमें मैंने इस पर बल दिया था कि हमारा लोकतांत्रिक प्रशासन तंत्र भारत के जन साधारण की सेवा के लिए है, लेकिन सच्चाई यह है कि आम नागरिक इन विशाल सरकारी भवनों के पास जाने में भी डरता है, थाने की तो बात ही क्या! जबकि अपराधी, स्मगलर आदि उच्च पदों पर बैठे हुए अधिकारियों और जन-प्रतिनिधियों से इस तरह परिचित होते हैं कि वे उनको रिसीव करने सचिवालय के गेट पर आ जाते हैं या किसी को भेज देते हैं।
शायद अब थोड़ा बहुत फर्क पड़ा हो, लेकिन बहुत कुछ बदलना ज़रूरी है।

3. तीसरा लेख था सतर्कता का तर्क, इस लेख में मैंने अपने अनुभव के आधार पर यह लिखा था कि सरकारी कार्यालयों में जो विजिलेंस विभाग कार्य करते हैं, उनसे गलत काम करने वाले अधिकारी नहीं डरते क्योंकि वो तो अतिरिक्त रूप से सतर्क रहते हैं, ईमानदारी से काम करने वाले लोग ज्यादा डरते हैं। क्योंकि एक मामले में मैंने देखा कि फर्नीचर की खरीद में कहीं कारीगर ने कहीं भी, ज्यादा रंदा चला दिया तो वह किसी अधिकारी की किस्मत छील गया।
इतना सब आपने पढ़ लिया है, मैं आपके धैर्य की प्रशंसा करता हूँ।

आप सोच रहे होंगे कि मैंने 90 के दशक में कुछ लिखा, तो आज आपको क्यों बता रहा हूँ?
असल मेरे एक नज़दीकी मित्र सुशील कुमार सिंह, जो मेरे लिए शीलू हैं, वरिष्ठ पत्रकार हैं, उस समय वो जनसत्ता में थे, उनके माध्यम से मैंने ये तीनों लेख, जनसत्ता में उस सज्जन को भिजवाए जो लेखों का प्रकाशन देखते थे, काफी नाम था उनका, पहले दिनमान में भी रह चुके थे- जवाहर लाल कौल, वैसे मैं उनसे व्यक्तिगत रूप से आज तक नहीं मिला हूँ। सुशील ने बताया कि लेख उन्होने रख लिए हैं और कहा है कि और भी लेख भिजवाएं।

मैं उस समय एनटीपीसी विंध्याचल, मध्य प्रदेश में तैनात था, दिल्ली कम ही आना होता था, अगली बार दिल्ली आने पर पता किया तो कौल जी ने कहलवाया कि वो लेख तो खो गए हैं, और भिजवा दें। इस पर मुझे कुछ संदेह हुआ।

मैंने उसके बाद दिल्ली पब्लिक लायब्रेरी में जनसत्ता के पुराने अंक खंगाले तो मुझे ‘भारतीय रेल’ लेख तो श्रीमान जवाहर लाल कौल जी के नाम से छपा हुआ मिल गया, स्वाभाविक है कि बाकी दो लेखों के साथ भी ऐसा ही हुआ होगा।

शायद इसे ही कहते हैं- लाखों में बिकने लगे, दो कौड़ी के लोग! यह बात बहुत समय से दिमाग में अटकी थी सो आज कह दी, कहीं तक तो पहुंचेगी।

अंत में मेरे प्रिय गायक मुकेश जी के गीत की पंक्तियां याद आ रही हैं-

आसमां पे है खुदा और जमीं पे हम
आजकल वो इस तरफ देखता है कम।
किसको भेजे वो यहाँ खाक छानने
इस तमाम भीड़ का हाल जानने,
आदमी हैं अनगिनत, देवता हैं कम॥


अपनी जीवन यात्रा पर क्रमवार आपको ले चलूंगा, मुझे पूरी उम्मीद है, आपको आनंद आएगा।

श्रीकृष्ण शर्मा

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ये चराग़ तू ही बुझा न दे!

मेरे दाग़-ए-दिल से है रौशनी इसी रौशनी से है ज़िंदगी,
मुझे डर है ऐ मिरे चारा-गर ये चराग़ तू ही बुझा न दे|

शकील बदायूनी

मुझे ज़िंदगी की दुआ न दे!

मेरे हम-नफ़स मेरे हम-नवा मुझे दोस्त बन के दग़ा न दे,
मैं हूँ दर्द-ए-इश्क़ से जाँ-ब-लब मुझे ज़िंदगी की दुआ न दे|

शकील बदायूनी

तमसो मा ज्योतिर्गमय!

हिन्दी नवगीत के शलाका पुरुष स्वर्गीय शंभुनाथ सिंह जी का एक नवगीत मैं आज शेयर कर रहा हूँ| नवगीत के मामले में शंभुनाथ सिंह जी किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं, उनकी कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय शंभुनाथ सिंह जी का यह नवगीत –


बुझी न दीप की शिखा अनन्त में समा गई।
अमंद ज्योति प्राण-प्राण बीच जगमगा गई!
अथाह स्नेह के प्रवाह में पली,
अमर्त्य वर्त्तिका नहीं गई छली,
असंख्य दीप एक दीप बन गया
कि खिल उठी प्रकाश की कली-कली
घनांधकार जल गया स्वयं नहीं हिली शिखा,
प्रकाश-धार में तमस भरी धरा नहा गई!

अकम्प ज्योति-स्तम्भ वह पुरूष बना,
कि जड़ प्रकृति बनी विकास-चेतना,
न सत्य-बीज मृत्तिका छिपा सकी
उगी, बढ़ी, फली अरूप कल्पना,
न बंध सका असत्‌-प्रमाद-पाश में प्रकाश-तन
विमुक्त सत्‌-प्रभा दिगन्त बीच मुस्कुरा गई!

मरा न कामरूप कवि बना अमर,
कि कोटि-कोटि कण्ठ में हुआ मुखर
मिटा न, काल का प्रवाह बन घिरा
असीम अन्तरिक्ष में अनन्त स्वर,
न मंत्र-स्वर-अमृत संभाल मृण्मयी धरा सकी,
त्रिकाल-रागिनी अनन्त सृष्टि बीच छा गई!


(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|

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कितने दिन इतराओगे!

‘फ़ैज़’ दिलों के भाग में है घर भरना भी लुट जाना भी,
तुम इस हुस्न के लुत्फ़-ओ-करम पर कितने दिन इतराओगे|

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

उनको क्या जतलाओगे!

किसने वस्ल का सूरज देखा किस पर हिज्र की रात ढली,
गेसुओं वाले कौन थे क्या थे उनको क्या जतलाओगे|

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

हमसे क्या मनवाओगे!

अहद-ए-वफ़ा या तर्क-ए-मोहब्बत जो चाहो सो आप करो,
अपने बस की बात ही क्या है हमसे क्या मनवाओगे|

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

कब बरखा बरसाओगे!

बीता दीद उम्मीद का मौसम ख़ाक उड़ती है आँखों में,
कब भेजोगे दर्द का बादल कब बरखा बरसाओगे|

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

कब तक याद न आओगे!

कब तक दिल की ख़ैर मनाएँ कब तक रह दिखलाओगे,
कब तक चैन की मोहलत दोगे कब तक याद न आओगे|

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

दिल में सितारे उतरने लगते हैं!

दर-ए-क़फ़स पे अँधेरे की मोहर लगती है,
तो ‘फ़ैज़’ दिल में सितारे उतरने लगते हैं|

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़