किसान- मैथिलीशरण गुप्त

आज मैं स्वर्गीय मैथिलीशरण ‘गुप्त’ जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| ‘गुप्त’ जी को राष्ट्रकवि की भी उपाधि प्रदान की गई थी, उन्होंने हमारे धार्मिक, सांस्कृतिक आख्यानों पर आधारित बहुत से मूल्यवान काव्य लिखे हैं, जिनमें रामायण और महाभारत के कुछ महत्वपूर्ण पात्रों पर आधारित काव्य भी शामिल हैं|
लीजिए आज प्रस्तुत है, स्वर्गीय मैथिलीशरण ‘गुप्त’ जी की हमारे अन्नदाता किसानों की जीवन-स्थितियों से संबंधित एक कविता –

हेमन्त में बहुधा घनों से पूर्ण रहता व्योम है,
पावस निशाओं में तथा हँसता शरद का सोम है|

हो जाये अच्छी भी फसल, पर लाभ कृषकों को कहाँ,
खाते, खवाई, बीज ऋण से हैं रंगे रक्खे जहाँ|

आता महाजन के यहाँ वह अन्न सारा अंत में,
अधपेट खाकर फिर उन्हें है काँपना हेमंत में|

बरसा रहा है रवि अनल, भूतल तवा सा जल रहा,
है चल रहा सन सन पवन, तन से पसीना बह रहा|

देखो कृषक शोषित, सुखाकर हल तथापि चला रहे,
किस लोभ से इस आँच में, वे निज शरीर जला रहे|

घनघोर वर्षा हो रही, है गगन गर्जन कर रहा,
घर से निकलने को गरज कर, वज्र वर्जन कर रहा|

तो भी कृषक मैदान में करते निरंतर काम हैं,
किस लोभ से वे आज भी, लेते नहीं विश्राम हैं|

बाहर निकलना मौत है, आधी अँधेरी रात है,
है शीत कैसा पड़ रहा, औ’ थरथराता गात है|

तो भी कृषक ईंधन जलाकर, खेत पर हैं जागते,
यह लाभ कैसा है, न जिसका मोह अब भी त्यागते|

सम्प्रति कहाँ क्या हो रहा है, कुछ न उनको ज्ञान है,
है वायु कैसी चल रही, इसका न कुछ भी ध्यान है|

मानो भुवन से भिन्न उनका, दूसरा ही लोक है,
शशि सूर्य हैं फिर भी कहीं, उनमें नहीं आलोक है|

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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दिल ने तड़पना छोड़ दिया!

जब दिल ने तड़पना छोड़ दिया,
जलवों ने मचलना छोड़ दिया|

बेकल उत्साही

नींद भी मेरे नयन की!

एक बार फिर मैं हिन्दी के सुरीले गीतकार, जिनको हम गीतों के राजकुंवर भी कहते हैं और जिन्होंने हिन्दी काव्य मंचों, काव्य साहित्य और हिन्दी फिल्मों में अपनी अमिट छाप छोड़ी है, ऐसे स्वर्गीय गोपाल दास ‘नीरज’ जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| यह गीत भी उन गीतों में शामिल है जिनको शायद नीरज जी ने काव्य मंचों से कभी नहीं गाया|

लीजिए आज प्रस्तुत है, स्वर्गीय नीरज जी का यह गीत –

प्राण ! पहले तो हृदय तुमने चुराया
छीन ली अब नींद भी मेरे नयन की

बीत जाती रात हो जाता सबेरा,
पर नयन-पक्षी नहीं लेते बसेरा,
बन्द पंखों में किये आकाश-धरती
खोजते फिरते अँधेरे का उजेरा,
पंख थकते, प्राण थकते, रात थकती
खोजने की चाह पर थकती न मन की।

छीन ली अब नींद भी मेरे नयन की।

स्वप्न सोते स्वर्ग तक आंचल पसारे,
डाल कर गल-बाँह भू, नभ के किनारे
किस तरह सोऊँ मगर मैं पास आकर
बैठ जाते हैं उतर नभ से सितारे,
और हैं मुझको सुनाते वह कहानी,
है लगा देती झड़ी जो अश्रु-घन की।


सिर्फ क्षण भर तुम बने मेहमान घर में,
पर सदा को बस गये बन याद उर में,
रूप का जादू किया वह डाल मुझ पर
आज मैं अनजान अपने ही नगर में,
किन्तु फिर भी मन तुम्हें ही प्यार करता
क्या करूँ आदत पड़ी है बालपन की।

छीन ली अब नींद भी मेरे नयन की।

पर न अब मुझको रुलाओ और ज़्यादा,
पर न अब मुझको मिटाओ और ज़्यादा,
हूँ बहुत मैं सह चुका उपहास जग का
अब न मुझ पर मुस्कराओ और ज़्यादा,
धैर्य का भी तो कहीं पर अन्त है प्रिय !
और सीमा भी कहीं पर है सहन की।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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नहीं कोई मकाँ मेरा!

मैं जब लौटा तो कोई और ही आबाद था “बेकल”,
मैं इक रमता हुआ जोगी, नहीं कोई मकाँ मेरा|

बेकल उत्साही

यही जन्नत निशाँ मेरा!

कहीं बारूद फूलों में, कहीं शोले शिगूफ़ों में,
ख़ुदा महफ़ूज़ रक्खे, है यही जन्नत निशाँ मेरा|

बेकल उत्साही