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एवार्ड हेतु नॉमिनेशन के बहाने!

आज फिर से एक पुरानी ब्लॉग पोस्ट की बारी है –



कभी कभी कुछ अलग लिखने का मन करता है, आज इसके लिए मुझे बहाना भी मिल गया क्योंकि ब्लॉग लेखन संबंधी एक एवार्ड के लिए मेरा नॉमिनेशन हो गया।

मैंने, सेवानिवृत्ति से पूर्व, 22 वर्ष तक सार्वजनिक क्षेत्र की एक महानवरत्न कंपनी में काम किया, बहुत सी बार अपने ब्लॉग्स में कंपनी का नाम लिखा है, आज नहीं लिखूंगा। इस कंपनी में रहते हुए मैंने अनेक आयोजन किए, जिनमें राष्ट्रीय स्तर के कवि-कलाकार शामिल हुए।

बहुत से आयोजनों में बहुत सारे लोगों को पुरस्कार मिले, कंपनी को भी बहुत से एवार्ड मिले, जिनको स्वीकार करने के संबंध में, बहुत से विनम्रतापूर्वक पुरस्कार स्वीकार करने संबंधी व्याख्यान भी मैंने लिखे, पुरस्कार पाने वाले लोगों की प्रशंसा भी की। लेकिन एक हसरत मन में रह गई कि कभी मैं भी पुरस्कार प्राप्त करूं। ऐसा कभी नहीं हुआ यद्यपि कंपनी के बड़े से बड़े अधिकारियों और राजनैतिक अतिथियों ने भी मेरे कुशल कार्यक्रम संचालन की प्रशंसा की।

मैं कंपनी में राजभाषा कार्यान्वयन के क्षेत्र में कार्य कर रहा था। जब कंपनी में राजभाषा संबंधी गतिविधियों के संबंध में एक पुरस्कार प्रारंभ किया गया, तब गलती से पहला पुरस्कार हमारी परियोजना को मिल गया, क्योंकि उसके मानकों में पत्राचार के आंकडों के अलावा अन्य गतिविधियों, जैसे पत्रिका प्रकाशन, कवि सम्मेलन के आयोजन आदि के संबंध में भी काफी अंक थे।

जब यह गलती हो गई, उसके बाद हमारे केंद्रीय कार्यालय में बैठे राजभाषा के धुरंधर ने मानकों में ऐसा सुधार किया कि अब पुरस्कार केवल और केवल पत्राचार संबंधी झूठी रिपोर्ट के आधार पर ही प्राप्त किया जा सकता था और मैंने इस बारे में सोचना ही छोड़ दिया था।


वैसे पुरानी कहावत है कि सूरज निकलता है तो देर-सवेर सभी उसको स्वीकार करते हैं, सम्मान देते हैं। मुझे लगता है कि आज के समय यह आपकी विज्ञापन क्षमता, प्रेज़ेंटेशन आदि ही हैं, जो आपको मान्यता और सम्मान दिलाते हैं।

असल में एक ब्लॉगर साथी ने- एक एवार्ड के लिए मेरा नॉमिनेशन किया तो सुखद आश्चर्य हुआ, क्योंकि मुझे लगता है कि कुछ लोग इनको प्राप्त करने के लिए नहीं बने होते और कुछ लोग लगातार एवार्ड प्राप्त करने के लिए अभिशप्त होते हैं।

मैं पुनः, मुझे एवार्ड हेतु नॉमिनेट करने वाले मित्र के प्रति आभार व्यक्त करता हूँ, जो अपने ब्लॉग्स में योग के बारे में बहुत अच्छी जानकारी देते हैं और सुंदर कविताएं भी लिखते हैं। (क्योंकि यह पुराना प्रसंग है इसलिए अब उनका नाम नहीं दे रहा हूँ|)


मेरे प्रिय गायक मुकेश जी का ये गाना याद आ गया, क्योंकि इसमें भी ईनाम का ज़िक्र है, ईनाम, पुरस्कार, एवार्ड ! गीत फिल्म-देवर का है, आनंद बख्शी जी ने लिखा है और संगीतकार हैं- रोशन जी, बर्दाश्त कर लीजिए-


बहारों ने मेरा चमन लूटकर
खिज़ां को ये इल्ज़ाम क्यों दे दिया|
किसीने चलो दुश्मनी की मगर
इसे दोस्ती नाम क्यों दे दिया|


मैं समझा नहीं ऐ मेरे हमनशीं
सज़ा ये मिली है मुझे किस लिये,
के साक़ी ने लब से मेरे छीन कर
किसी और को जाम क्यों दे दिया|


मुझे क्या पता था कभी इश्क़ में
रक़ीबों को कासिद बनाते नहीं|
खता हो गई मुझसे कासिद मेरे
तेरे हाथ पैगाम क्यों दे दिया|


इलाही यहाँ तेरे इन्साफ़ के
बहुत मैंने चर्चे सुने हैं मगर
सज़ा की जगह एक खतावार को
भला तूने ईनाम क्यों दे दिया
|

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।




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ये मुझसे तगड़े हैं- रमेश रंजक

हिन्दी के चर्चित नवगीतकार स्वर्गीय रमेश रंजक जी का एक गीत आज शेयर कर रहा हूँ, इस गीत में रंजक जी ने कितनी खूबसूरती से यह अभिव्यक्त किया है कि दुख घर से जाने का नाम ही नहीं ले रहे हैं|


लीजिए प्रस्तुत है यह गीत-



जिस दिन से आए
उस दिन से
घर में यहीं पड़े हैं,
दुख कितने लंगड़े हैं ?

पैसे,
ऐसे अलमारी से,
फूल चुरा ले जायें बच्चे
जैसे फुलवारी से|

दंड नहीं दे पाता
यद्यपि-
रँगे हाथ पकड़े हैं ।

नाम नहीं लेते जाने का,
घर की लिपी-पुती बैठक से
काम ले रहे तहख़ाने का,
धक्के मार निकालूँ कैसे ?

ये मुझसे तगड़े हैं ।



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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कृष्णकली – रवीन्द्रनाथ ठाकुर

आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य संकलन- ‘PoemHunter.com’ से लेता हूँ। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘Krishnakali’ का भावानुवाद-


गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता



कृष्णकली



गाँव में सब उसे साँवली लड़की कहते हैं,
परंतु मेरे लिए वह कृष्णकली का पुष्प है,
एक मेघाच्छादित दिन में, खेत में
मैंने देखीं, साँवली लड़की की गहरी, हिरनी जैसी आँखें|
उसका सिर ढका नहीं था,
उसके खुले केश उसकी पीठ पर झूल रहे थे|

साँवली? वह जितनी भी साँवली हो,
मैंने उसकी गहरी, हिरनी जैसी आँखें देखी हैं|

दो काली गायें रँभा रही थीं,
क्योंकि घने बादलों के कारण अंधेरा हो गया था|
इसीलिए चिंतित, त्वरित कदमों से,
साँवली लड़की अपनी झौंपड़ी से निकली|
उसने आकाश की ओर आँखें तरेर कर देखा,
एक क्षण उसने बादलों की गड़गड़ाहट को सुना|

साँवली? वह जितनी भी साँवली हो,
मैंने उसकी गहरी, हिरनी जैसी आँखें देखी हैं|

पुरवा के एक झौंके ने
चावलों के खेत को लहरा दिया|
मैं मेड़ के पास खड़ा था,
अकेला खेत में|
उसने मेरी तरफ देखा या नहीं
यह हम दोनों को ही मालूम है|

साँवली? वह जितनी भी साँवली हो,
मैंने उसकी गहरी, हिरनी जैसी आँखें देखी हैं|

ऐसे ही होता है जब जेठ के महीने में
उत्तर-पूर्व में काजल जैसे काले बादल छा जाते हैं;
कोमल गहन छाया
तमाल कुंजों पर पसर जाती है, आषाढ़ माह में;
और अचानक आनंद से हृदय भर जाता है,
श्रावण माह की रात में|

साँवली? वह जितनी भी साँवली हो,
मैंने उसकी गहरी, हिरनी जैसी आँखें देखी हैं|

मेरे लिए तो वह कृष्णकली का पुष्प है,
बाकी लोग उसे जिस भी नाम से पुकारते हों|
मयनापारा के गाँव में,
मैंने देखीं उस साँवली लड़की की हिरनी जैसी आँखें|
उसका सिर नहीं ढका था,
और उसके पास शर्मिंदा महसूस करने का समय ही नहीं था|

साँवली? वह जितनी भी साँवली हो,
मैंने उसकी गहरी, हिरनी जैसी आँखें देखी हैं|





-रवींद्रनाथ ठाकुर



और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार पर मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-


Krishnakali


In the village they call her the dark girl
but to me she is the flower Krishnakali
On a cloudy day in a field
I saw the dark girl’s dark gazelle-eyes.
She had no covering on her head,
her loose hair had fallen on her back.

Dark? However dark she be,
I have seen her dark gazelleeyes.

Two black cows were lowing,
as it grew dark under the heavy clouds.
So with anxious, hurried steps,
the dark girl came from her hut.
Raising her eyebrows toward the sky,
she listened a moment to the clouds’ rumble.

Dark? However dark she be,
I have seen her dark gazelle-eyes.

A gust of the east wind
rippled the rice plants.
I was standing by a ridge,
alone in the field.
Whether or not she looked at me
Is known only to us two.

Dark? However dark she be,
I have seen her dark gazelle-eyes.

This how the Kohldark cloud
rises in the northeast in Jaistha;
the soft dark shadow
descends on the Tamal grove in Asharh;
and sudden delight floods the heart
in the night of Sravan.

Dark? However dark she be,
I have seen her dark gazelle-eyes.

To me she is the flower Krishnakali,
whatever she may be called by others.
In a field in Maynapara village
I saw the dark girl’s dark gazelle-eyes.
She did not cover her head,
not having the time to feel embarrassed.

Dark? However dark she be,
I have seen her dark gazelle-eyes.




-Rabindranath Tagore


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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दुःख की छाया, सुख की रेखा!

हिन्दी काव्य मंचों के एक प्रमुख हस्ताक्षर थे स्वर्गीय बलबीर सिंह ‘रंग’, जो अपनी बेबाकी और फक्कड़पन के लिए जाने जाते थे| उनकी कुछ प्रसिद्ध पंक्तियाँ, जिनका मैं अक्सर स्मरण करता हूँ, वे हैं-


आब-ओ-दाना रहे, रहे न रहे,
ये ज़माना रहे, रहे ना रहे,
तेरी महफिल रहे सलामत यार,
आना-जाना रहे, रहे ना रहे|


आज मैं उनका एक गीत शेयर कर रहा हूँ, जिसमें वे लिखते हैं की कवि गीत क्यों लिखता है| भावुक लोगों की पीड़ाएँ अलग तरह की होती हैं और कवियों की संपत्ति उनकी भावुकता ही तो है|


लीजिए प्रस्तुत है यह ‘रंग’ जी का यह गीत-


कवि क्यों गीत लिखा करता है?
कवि ने गीतों में क्या देखा,
दुःख की छाया, सुख की रेखा;
वरदानों की झोली ले,
वह क्यों अभिशाप लिया करता है?

याद उसे क्यों गाकर रोना,
ज्ञात उसे क्यों पाकर खोना;
मस्ती में अमृत ठुकरा कर,
क्यों विष जान पिया करता है?


जग कवि के गीतों में डूबा,
कवि जग आघातों से ऊबा;
ढाल लगाकर गीतों की वह,
जग आघात सहा करता है।

जब जग कवि में संशय पाता,
तब वह अंतस चीर दिखाता;
फिर वह गीत सूत्र से अपने,
उर के घाव सिया करता है।

गीतों में कुछ दुख चुक जाता,
वेग वेदना का रुक जाता;
वरना वह पीड़ा के तम से,
दिन की रात किया करता है।


माना मन के मीत न कवि के;
किन्तु निरर्थक गीत न कवि के;
गीतों को वह मीत बनाकर,
युग-युग तलक जिया करता है।
कवि क्यों गीत लिखा करता है?


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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अगर तू पास आ जाए तो हर गम दूर हो जाए!

आज मैं फिल्मी दुनिया के बहुत सृजनशील गीतकार स्वर्गीय आनंद बख्शी जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| बख्शी जी ने बहुत सारे हल्के-फुल्के गीत भी लिखे हैं लेकिन कुछ गीत बहुत सुंदर लिखे हैं|


आज का उनका यह गीत फिल्म- खिलौना में फिल्माया गया था, इसको लता मंगेशकर जी ने लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल जी के संगीत निर्देशन में बड़े खूबसूरत अंदाज़ में गाया था| इस फिल्म में संजीव कुमार जी, मुमताज़ जी, जितेंद्र जी आदि ने यादगार अभिनय किया था|


लीजिए प्रस्तुत है यह हृदयस्पर्शी गीत-


अगर दिलबर की रुसवाई हमें मंजूर हो जाए,
सनम तू बेवफा के नाम से मशहूर हो जाए|

हमें फुरसत नहीं मिलती कभी आँसू बहाने से,
कई गम पास आ बैठे तेरे एक दूर जाने से,
अगर तू पास आ जाए तो हर गम दूर हो जाए|

वफ़ा का वास्ता देकर मोहब्बत आज रोती है,
ना ऐसे खेल इस दिल से, ये नाज़ुक चीज़ होती है,
ज़रा सी ठेस लग जाए तो शीशा चूर हो जाए|

तेरे रंगीन होठों को कंवल कहने से डरते हैं,
तेरी इस बेरूख़ी पे हम ग़ज़ल कहने से डरते हैं,
कहीं ऐसा ना हो तू और भी मग़रूर हो जाए|



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|



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शकुंतला देवी के बहाने!

ग्रेट मेथमेटिकल जीनियस, गणित के कठिन से कठिन सवाल मिनटों में हल कर देने वाली शकुंतला देवी के जीवन पर बनी फिल्म देख ली, उनके बारे में अनेक जानकारियाँ प्राप्त करके अच्छा लगा|


मुझे आशा है कि इस फिल्म के लिए अच्छी शोध की गई होगी और शकुंतला देवी के किरदार को पर्दे पर विद्या बालन जी के रूप में देखना अच्छी बात है क्योंकि विद्या जी अपनी प्रत्येक भूमिका के लिए पूरी मेहनत करती हैं और निर्देशक अनु मेनन भी इस अच्छी फिल्म के लिए बधाई के पात्र हैं|


शकुंतला देवी का गणित ज्ञान अत्यंत चमत्कारी था यह तो हमने सुना ही था, लेकिन यह मालूम नहीं था कि उनको औपचारिक स्कूली शिक्षा प्राप्त करने का अवसर ही प्राप्त नहीं हो पाया था| जैसा फिल्म में दिखाया गया है, गाँव-देहात में रहने वाली इस बालिका के चमत्कार को देखते हुए उनके पिता उनको जगह-जगह स्कूलों, क्लबों आदि में उनका चमत्कार दिखाकर कमाई करने के लिए ले जाते रहते थे| उनको इस बालिका की आवश्यकताओं का बिलकुल खयाल नहीं रहता था, उसके ‘शो’ कराने का अलावा वो बस बैठकर अखबार पढ़ते थे|


इस प्रकार शकुंतला देवी को एक सामान्य बालिका की तरह खेलने-कूदने का अवसर नहीं मिला, बचपन पूरी तरह छिन गया| पिता से तो शकुंतला देवी कोई उम्मीद रखती नहीं परंतु उनको अपनी माँ से शिकायत रहती है कि वो कुछ नहीं बोलती, लेकिन माँ एक सामान्य गृहिणी है जो शांत ही रहती है| बचपन का सिलसिला जवानी तक जारी रहता है और वह पाती है कि उसका प्रेमी भी उसका शोषण करना चाहता था| अंततः ऐसी परिस्थिति बनती है कि वह भारत छोड़कर लंदन चली जाती है, अपने गणित के चमत्कारों के बल पर कमाने के लिए, जबकि उनको अँग्रेजी का भी पर्याप्त ज्ञान नहीं है|


किसी तरह संघर्ष करके वह अपना स्थान बनाती है, इतना ही नहीं, वह अथाह ख्याति और धन अर्जित करती है| वह कलकत्ता के एक अधिकारी से शादी भी करती है| लेकिन उसने चुना था कि वह अपनी माँ जैसी नहीं बनेगी, माँ एकदम बोलती नहीं थी और वह किसी को बोलने नहीं देती| उसकी एक पुत्री होती है और उसके बाद वह अपने शो करने के लिए विदेश भ्रमण पर चली जाती है| कुछ समय बाद वह अपने पति से झगड़कर अपनी बेटी को भी साथ ले जाती है और उसको गणित के चमत्कार सिखाने की कोशिश करती है| लेकिन बेटी महसूस करती है कि प्यार तो उसको अपने पिता से ही मिलता था|


शकुंतला देवी को बचपन नहीं मिल पाया था उनके पिता के लालच के कारण लेकिन वे अपनी बच्ची के बचपन के बारे में, उसकी आकांक्षाओं के बारे में सोच ही नहीं पातीं, क्योंकि वह उनके साथ दुनिया घूम रही है, बड़े-बड़े लोगों से मिल रही है, अपनी ख्याति की चकाचौंध में यह सोच ही नहीं पातीं कि बच्ची की कुछ और भी अभिलाषाएँ होंगी| परिणाम यह कि उनकी बेटी भी उनसे वैसे ही नफरत करती है, जैसे वो अपनी माँ से करती थीं|


कुल मिलाकर यह कि इस फिल्म से हमने शकुंतला देवी के चमत्कारिक जीवन, उनकी उपलब्धियों की झलक तो देखी ही, उसके अलावा मनोवैज्ञानिक स्तर पर संबंधों की प्रस्तुति और उसका विश्लेषण भी बहुत सुंदर किया गया है|


ये कुछ बातें हैं जो ‘शकुंतला देवी’ फिल्म देखने के बाद मेरे मन में आईं, सो मैंने आपसे शेयर कर लीं|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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लूटकेस की यात्रा!

आज बात कर लेते हैं हॉटस्टार पर रिलीज़ हुई फिल्म- ‘लूटकेस’ को देखने के अनुभव के बारे में| क्षमा करें मैं अपने आप को क्रिटिक की भूमिका में रखकर देखने की हिम्मत नहीं कर सकता, बस इस फिल्म को देखने के अनुभव के बारे में बात कर लेता हूँ|


हाँ तो इस फिल्म का नायक कुणाल खेमू एक आम आदमी है, जो एक प्रेस में काम करता है, प्रेस का मालिक उसको ईमानदार मानता है और उसको इसके लिए एक बार ईनाम भी दिया जाता है| हाँ तो जिस प्रकार किसी आम ईमानदार इंसान के दिन बीतते हैं, वैसे ही फिल्म के नायक नंदन कुमार (कुणाल खेमू) के भी दिन बीतते हैं| जब वह किसी मामले में पैसे नहीं दे पाता तो पत्नी पूछती है कि ‘कुछ पैसे अपनी बहन को दे दिए क्या?’ और हाँ दिन वैसे ही बीत रहे होते हैं, जैसे किसी आम ईमानदार व्यक्ति के बीतते हैं!


ऐसे में नायक को अचानक दो हजार के नोटों की गड्डियों से भरा एक विशाल सूटकेस मिलता है| शुरू में अपनी ईमानदारी और भय से लड़ने के बाद वह उस सूटकेस को उठाकर किसी तरह अपने घर तक पहुँच जाता है| इन नोटों को लेकर अपने घर तक पहुँचने और फिर उनको अपनी अति ईमानदार पत्नी से छिपाकर रखने का संघर्ष भी देखने लायक होता है|


इन नोटों का, इस विशाल धनराशि का इस्तेमाल कर पाना भी उस छोटे-छोटे सपनों वाले आम आदमी के लिए लगभग असंभव है| हाँ इतना अवश्य है कि अब उसकी पत्नी और बेटे को अपनी मनवांछित सुविधाएं बड़े आराम से मिल जाती हैं और पत्नी को यह नहीं कहना पड़ता कि ‘अपनी बहन को पैसे दे दिए क्या?’ लेकिन नायक की सबसे बड़ी समस्या यह है कि वह पैसे को संभालकर कहाँ रखे और कैसे उनका उपयोग करे| एक तरीका है बस कि मकान खरीद लिया जाए लेकिन यह काम भी नकद पैसे से करना संभव नहीं है|


उधर इस पैसे के जो असली मालिक थे, राजनीति और अपराध की दुनिया के चरित्र- एक तो विधायक जी- गजराज राव और दूसरे गैंगस्टर – विजय राज, दोनों ही मंजे हुए कलाकार हैं| इन लोगों के लिए इतनी बड़ी रकम का व्यवहार करना कोई बड़ी बात नहीं है और हाँ उन लोगों के संघर्ष के बीच ही यह सूटकेस सड़क पर छूट गया था, जहां से यह नायक, इस सामान्य नागरिक के हाथ लग गया और वह इसको संभालने में ही परेशान है और उसके व्यवहार में भी उसका यह असमंजस झलकने लगा और शायद उसी के बल पर नेताजी का पाला हुआ पुलिस वाला उस तक पहुँच जाता है|


इस पुलिस वाले को पैसे के साथ रखी फाइल के माध्यम से नेताजी के काले कारनामों का पता चलता है और वह भी खुद इस पैसे को रख लेना चाहता है| लेकिन वहाँ नेताजी, गैंगस्टर और पुलिस वाला, सब एक-दूसरे का पीछा करते हैं और अंत में सब निपट जाते हैं| एक बार फिर से लूट का वह बैग नायक के सामने होता है, अब वह क्या करेगा!कुल मिलाकर इस फिल्म को देखने में भरपूर आनंद आया|


आज के लिए इतना ही|
नमस्कार|


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Adventure and Misadventures!

Yes, we are talking about adventure. Naturally adventure involves doing something we don’t normally do. It normally needs boldness, taking risk and foresightedness. Mostly we refer to this term while people go for some physical adventure like- mountaineering, river rafting, travelling far away say on cycle or motorcycle. So mostly we refer to physical risk taking when we talk about adventure. But adventures can be of various types, including mental also and risk taking is normally a factor involved in it.

I am suddenly remembering an incident that happened with a friend of mine in Delhi long back. We were a group of young friends who wrote poems, participated in poetic symposia etc. in Delhi. This friend of mine also believed in appearing like a typical poet, he wore kurta-pyjama and had grown beard and mush also.

Anyhow before telling the incident that I want to mention, let me repeat that with his attire and appearance, he didn’t at all appear attractive in worldly terms, he might be considering himself whatever in his mind. Anyway the incident so happened that he went to Khadi gramodyog shop in Connaught place, which was near Regal cinema, now Regal is not there, I am not sure whether Khadi Gramodyog shop is still there or not.


Anyway, my friend went to that store, he saw a beautiful girl there and he thought of complimenting the girl for her beauty. So, my friend suddenly kissed that girl in the shop and in turn received a nice beating from the people around. On being asked why he did so, he said I felt that the girl is very beautiful and should be kissed! I think this was also a kind of adventure for which my friend had to pay heavily.


Anyhow, adventure always involves challenging our limits and taking risk, whether physical or any other type. For physical adventure people go for mountaineering, river rafting, scuba diving and so many such activities. Normally people who don’t want to take risk in life, look for a regular job with good salary. Those who want to take risk often go for business. Those who are ready to take further risk become entrepreneurs. Taking risk in any field is adventure I feel.


As I gave the example of my friend, in India many people go for misadventure rather than a positive adventure. Like going for police or military service involves adventure, which is positive one. But now a days there are many people who don’t follow the right path, one reason for that is also lack of opportunities. When ATMs were introduced in India, I wondered whether these would function properly, since there is lot of money stored in them. We found that there are several people who have mastered withdrawing money from other peoples account by bad use of technology. Further there are some who just take away the ATM machine. The dacoit gangs are also an example of misadventure.

For me the adventure that suits me is travelling to new places, I enjoy visiting places and wish to keep on doing that, but in this wicked Corona period, moving out is completely impossible. I can take the normal risks associated with travelling far-off places, but moving there in Corona period is simply not advisable.


This is my humble submission on the #IndiSpire prompt- Adventure is not taking risk, adventure is doing what we have not done so far. Coming out of our boundary. What is adventure in your view? and what have you done recently? or planning to do? #adventureboundaryfear

Thanks for reading.



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प्यासे पंछी नील गगन में गीत मिलन के गाएँ

आज फिर से मुझे मेरे प्रिय गायक स्वर्गीय मुकेश जी का एक गीत याद आ रहा है| जिस प्रकार हमारे मन में अनेक भावनाएँ आती हैं, तब कभी हम उनको सीधे अपने शब्दों में व्यक्त कर देते हैं और कभी कुछ उपमाओं, उपमानों आदि का सहारा लेते हैं अपनी बात कहने के लिए और यह काम कविता में अधिक होता है|

आज मुकेश जी का एक ऐसा ही गीत याद आ रहा है, जिसमें आकाश में उड़ते पक्षियों के माध्यम से कवि ने प्रेमियों के मन की बात कही है| यह गीत 1961 में रिलीज़ हुई फिल्म- ‘प्यासे पंछी’ से है और इसे महमूद जी पर फिल्माया गया है| इस गीत के लेखक हैं- कमर जलालाबादी जी और इसका संगीत दिया है कल्याणजी आनंदजी ने|

लीजिए प्रस्तुत है ये मधुर गीत-

प्यासे पंछी नील गगन में, गीत मिलन के गाएँ,
ये अलबेला दिल है अकेला, साथी किसे बनाएँ,
गीत मिलन के गाएँ|
प्यासे पंछी नील गगन में…

ओ मतवाले राही तुझको मंज़िल तेरी बुलाए,
किसको ख़बर है इन राहों में कौन कहाँ मिल जाए|
जैसे सागर की दो लहरें चुपके से मिल जाएँ,
गीत मिलन के गाएँ|
प्यासे पंछी नील गगन में…

छुपी हैं आहें किस प्रेमी की, बादल की आहों में,
बिखरी हुई है ख़ुश्बू कैसी, अलबेली राहों में|
किसकी ज़ुल्फ़ें छू कर आईं, महकी हुई हवाएँ,
गीत मिलन के गाएँ|
प्यासे पंछी नील गगन में गीत मिलन के गाएँ,

ये अलबेला दिल है अकेला, साथी किसे बनाएँ|

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार|

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छोड़ दो ये – रवीन्द्रनाथ ठाकुर

आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य संकलन- ‘PoemHunter.com’ से लेता हूँ। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘Leave This’ का भावानुवाद-


गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता

छोड़ दो ये



छोड़ दो ये भजन गाना, मंत्र जपना और माला फेरना!
किसकी पूजा करते हो तुम, मंदिर के एकांत अंधेरे कोने में, जबकि सभी दरवाजे बंद हैं?
अपनी आँखें खोलो और देखो, तुम्हारा ईश्वर तुम्हारे सामने नहीं है!

वह है वहां, जहां हलवाहा किसान कठोर जमीन जोत रहा है
और जहां पथ निर्माता पत्थर तोड़ रहा है|
वह उनके साथ है, धूप में और बारिश में,
और उसके कपड़ों पर धूल जमी है|
अपना आवरण उतारो और उसकी ही तरह धूल भरी मिट्टी में आ जाओ!

मुक्ति?
मुक्ति कहाँ मिल सकेगी?
हमारे स्वामी ने स्वयं ही सहर्ष सृजन के सभी बंधन स्वीकार किए हैं;
वह हमेशा के लिए हमारे साथ संबंध में बंधा है|

अपनी ध्यान मुद्रा से बाहर आओ, अपने पुष्पों और सुगंधियों को रहने दो!
क्या फर्क पड़ता है यदि तुम्हारे कपड़े जीर्ण और दागदार हो जाएँ?
उससे वहाँ मिलो और साथ खड़े रहो, अपने माथे पर पसीने के साथ|


-रवींद्रनाथ ठाकुर



और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार पर मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-

Leave This


Leave this chanting and singing and telling of beads!
Whom dost thou worship in this lonely dark corner of a temple with doors all shut?
Open thine eyes and see thy God is not before thee!

He is there where the tiller is tilling the hard ground
and where the pathmaker is breaking stones.
He is with them in sun and in shower,
and his garment is covered with dust.
Put off thy holy mantle and even like him come down on the dusty soil!

Deliverance?
Where is this deliverance to be found?
Our master himself has joyfully taken upon him the bonds of creation;
he is bound with us all for ever.

Come out of thy meditations and leave aside thy flowers and incense!
What harm is there if thy clothes become tattered and stained?
Meet him and stand by him in toil and in sweat of thy brow.


-Rabindranath Tagore


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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