9. झूमती चली हवा

लगातार सीधी राह पर चलते जाने से भी काफी थकान हो जाती है, अतः थोड़ा इधर-उधर टहल लेते हैं।

मैं यह भी बता दूं कि यहाँ अपनी निजी ज़िंदगी का विवरण देना मेरा उद्देश्य नहीं है। पात्र यदि कहीं आए हैं तो वे या तो पृष्ठभूमि के तौर पर आए हैं, या ऐसे पात्र आए हैं जो अब मेरे जीवन में नहीं हैं। कहानी की नायक परिस्थितियां ही हैं।

आज अपने मुहल्ले से आगे बढ़कर, अपने क्षेत्र- शाहदरा की कुछ बात कर लेते हैं। इस शहर में क्या प्रमुख तौर पर  था? एक तो मेरे दोनों स्कूल ही थे- गौशाला वाली सनातन धर्म प्राथमिक पाठशाला और बाबूराम आदर्श उच्चतर माध्यमिक विद्यालय, जो उस समय तक तो ‘आदर्श’ था जब तक मैंने वहाँ पढ़ाई की।

हायर सैकेंडरी परीक्षा पास करने तक, शाहदरा की सीमाओं तक ही मेरी गतिविधियां सीमित थीं, उसके बाद दो वर्ष तक गाज़ियाबाद आना-जाना भी शामिल हो गया था और उसके बाद आया दिल्ली, मतलब यमुना के इस पार नियमित यात्रा का सिलसिला।

शाहदरा या कहें कि यमुना पार का इलाका अनेक मामलों में उस समय तक बहुत पिछड़ा हुआ था, अब भी शायद काफी हद तक हो। उस समय तक यमुना पर एक ही पुराना पुल था, जो रेल और सड़क यातायात दोनों के काम आता था।

विकास को भी पहुंचने के लिए प्रभावी संपर्क/यातायात साधनों की ज़रूरत होती है। मुझे याद है कि पुराने यमुना ब्रिज होकर बस से दिल्ली ( मेरे लिए या सभी यमुना पार वासियों के लिए, यमुना के इस पार का इलाका ही दिल्ली है) पहुंचने के लिए अक्सर ब्रिज पार करने में ही एक घंटा लग जाता था। अब सड़क के कई रास्ते खुल चुके हैं, मैट्रो भी जीवन में काफी गति ला चुकी है, लेकिन आज भी जब ट्रेन से शाहदरा और दिल्ली के बीच यात्रा करें, तो कितना समय ब्रिज पर लगेगा, कह नहीं सकते।  

खैर कुछ इलाके जो शाहदरा के नाम से याद आते हैं, वे हैं- छोटा बाज़ार, बड़ा बाज़ार, फर्श बाज़ार, राधू सिनेमा, कृष्णा नगर आदि।

उस समय वहाँ कच्चे मैदान काफी होते थे, सड़क के दोनों तरफ भी काफी दूर तक कच्ची ज़मीन होती थी, जब आंधी आती थी, तब धूल-मिट्टी सप्लाई करने में इन कच्चे मैदानों का भरपूर योगदान होता था। धीरे-धीरे निर्माण होते गए, नगर निगम के माध्यम सड़क किनारे पक्की पटरियों का निर्माण होता गया और हाँ इस बहाने पार्षद भी  कुछ अमीर होते गए। लेकिन धूल-मिट्टी का संकट अब पहले जैसा नहीं रह गया।

शाहदरा को जब याद करता हूँ, तब वहाँ की एक गतिविधि जो काफी याद आती है, वह है रामलीला। वहाँ पर दो रामलीला होती थीं, छोटी और बड़ी रामलीला। छोटी रामलीला हमारे घर से पास पड़ती थी। वहाँ बड़े बाजार में कुछ कपड़े का व्यवसाय करने वाले सेठ थे, जो इन दोनों रामलीलाओं के कर्ता-धर्ता होते थे। लीला तो खैर 10-11 दिन तक दोनों मैदानों में होती ही थीं, सबसे बड़ा आकर्षण होती थीं आखिर के दिनों में निकलने वाली झांकियां, जिनमें प्रशंसा बटोरने के लिए दोनों रामलीला कमेटियां जी-जान लगा देती थीं। पूरी रात झांकियां निकलती थीं, वैसे भी जिस कमेटी का नंबर पहले आ जाए, वह अपनी झंकियों को आगे बढ़ाते ही नहीं थे, ताकि दूसरी कमेटी का नंबर जल्दी न आए।

झांकियों में प्रसंग पुराने ज़माने के होते थे और गाने आधुनिक बजते रहते थे, जिनसे मिलकर कई बार अजीब प्रभाव पड़ता था। एक रामलीला के मुख्य संचालक थे चुन्नीलाल जी। दूसरी रामलीला वालों ने चीर-हरण की एक झांकी बनाई और उसका नाम रखा-‘चुन्नी चोर’।  

अब अपनी प्रिय एक बात।  राज कपूर और मुकेश मेरी यात्रा में हर कदम मेरे साथ हैं। मुझे मुकेश जी का गया यह गीत भी बहुत पसंद है-

झूमती चली हवा, याद आ गया कोई

खो गई हैं मंज़िलें, मिट गए हैं रास्ते,

गर्दिशें ही गर्दिशें अब हैं मेरे वास्ते

और गर्दिशों में आज फिर बुला गया कोई।  

मेरे एक कवि मित्र को भी मुकेश बहुत पसंद हैं। उन्होंने ऊपर उल्लिखित गीत के बारे में अपना संस्मरण सुनाया, कि वे बचपन में घर के बाहर चारपाई पर लेटे थे, जब म्युंसिपैलिटी वाले गली के उनके प्रिय कुत्ते को उठाकर ले गए, और उस समय रेडियो पर गीत की ये पंक्तियां आ रही थीं-

चुप हैं चांद-चांदनी, चुप ये आसमान है,

मीठी-मीठी नींद में सो रहा जहान है,

और ऐसे में मुझे फिर रुला गया कोई।

अब यहीं समाप्त करते हैं, हमेशा सीरियस होना ही ज़रूरी तो नहीं है।

अगली बार से नौकरी शुरु करेंगे।

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