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85. ये दिल्ली है बाबू!

दिल्ली में मेरा जन्म हुआ, 30 वर्ष की आयु तक मैं दिल्ली में ही रहा, शुरू की 2-3 नौकरियां भी वहीं कीं और सेवानिवृत्ति के बाद भी लगभग 7 वर्ष तक, दिल्ली के पास गुड़गांव में रहा। इसलिए कह सकता हूँ कि दिल्ली को काफी हद तक जानता हूँ, और मैंने दिल्ली के अपने अनुभव शुरू के ब्लॉग्स में लिखे भी हैं।

दिल्ली देश की राजधानी है, राजनीति का केंद्र है, हर जगह के लोग दिल्ली में आपको मिल जाएंगे। बड़ी संख्या में ऐसे लोग वहाँ हैं जो अध्ययन के लिए या सेवा के लिए दिल्ली अथवा राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में रहते हैं, क्योंकि उन सबको बसाने और नियोजित करने के लिए, दिल्ली का मूल क्षेत्र अब बहुत छोटा पड़ गया है। यह भी कि दिल्ली में जितने सड़क के पुल और फ्लाई-ओवर बन रहे हैं, उतना ही ट्रैफिक जाम बढ़ता जाता है।

एक बात और कि अक्सर किसी स्थान की अपनी पहचान, अपनी संस्कृति होती है, लेकिन दिल्ली एक संस्कृति विहीन नगर है। वहाँ पर जहाँ अनेक संस्थानों के राष्ट्रीय कार्यालय अथवा केंद्र हैं, बहुत से अंतर्राष्ट्रीय केंद्र भी हैं, वहीं लूट के बहुत से अंतर्राष्ट्रीय स्तर के केंद्र भी हैं, वहाँ रहते हुए बहुत सी बार ऐसा महसूस किया, आज सोचा कि इस बारे में लिख भी दूं, कुछ फर्क पड़ेगा कि नहीं, पता नहीं, लेकिन आज मन हो रहा है कि इस विषय में लिखूं। वैसे ये बात अगर बहुत से लोगों के माध्यम से सही जगह तक पहुंचे तो सुधार हो भी सकता है।

एक उदाहरण मैंने अपने शुरू के ब्लॉग्स में दिया था, दिल्ली में कटरा नील के पास एक अहाता या छत्ता थ, ‘मोहम्मद दीन’ नाम से, जहाँ मैं उस समय पीतांबर बुक डिपो में पहली नौकरी करता था। हमारे बगल में ही एक कपड़े की दुकान थी जहाँ लंबा टीका लगाकर एजेंट लोग ग्राहक फंसाते थे, लगते थे जैसे शिष्टाचार की मूर्ति हैं, बोलते थे कि आज ही कपड़ा आया है, विदेश भेजने वाले थे, लेकिन कुछ पीस यहाँ के लिए रखे हैं, ए-वन माल है। खैर जैसे भी हो वे ग्राहक को पटाकर माल ठिकाने लगा देते थे। अगर इत्तफाक़ से ग्राहक ‘लोकल’ हुआ तो यह तय था कि कपड़ा बेकार निकलेगा और वह वापस आएगा, इस बार उनका स्वरूप एकदम अलग होता था, वे उसको पहचानते भी नहीं थे और ये साबित कर देते थे कि सभ्यता और शिष्टाचार उनके पास से भी होकर नहीं गुज़रे हैं।

खैर यह एक दुकान की बात मैंने की, क्योंकि उसको निकट से देखा था, मैं समझता हूँ कि उस इलाके में हजारों दुकानें ऐसी होंगी और अन्य बाज़ारों में भी होंगी।

अब एक उदाहरण देता हूँ, जब मैं सेवाकाल में दिल्ली से बाहर रहने लगा था। एक बार हम बाहर से नई दिल्ली स्टेशन आए, हमें एक दिन दिल्ली में रुककर कहीं जाना था। नई दिल्ली स्टेशन के बाहर ही पहाड़ गंज की तरफ एक दुकान थी, टूरिस्ट सेंटर शायद नाम रहा होगा, बताया कि सरकारी है। हम सुबह 9 बजे करीब पहुंचे थे, हमने बताया कि एक दिन के लिए होटल चाहिए, अगले दिन हमें बाहर जाना है, उसने हमारी पर्ची काट दी पैसे लेकर और बताया कि करोल बाग के इस होटल में आपके कल तक रुकने की व्यवस्था हो गई है। हम करीब 10 बजे होटल पहुंचे, नहाकर तैयार हुए और 12 बजे के बाद भोजन के लिए बोला, तब होटल वालों ने बताया कि आपका एक दिन पूरा हो चुका है, अब अगले दिन का किराया दीजिए, तब आप और रुक पाएंगे। इसके बाद क्या कुछ हुआ, वह महत्वपूर्ण नहीं है, बस इन लोगों के घटियापन की तरफ मैं इशारा कर रहा था।

इतना ही नहीं रेलवे स्टेशन के पास अथवा कश्मीरी गेट बस अड्डे पर लोग खाने की दुकानों पर किस तरह ठगते हैं, यह कल्पना से परे है, आईएसबीटी की एक घटना याद आ रही है, मैंने दाम पूछकर छोले भटूरे लिए, उसने साथ में कुछ दही मिला पानी, उसने उसको रायता बताया और कहा यह लीजिए, प्याज को सलाद बताकर दिया और बाद में- रायता, सलाद, अचार वगैरह के अलग से दाम जोड़कर, मूल दाम के दो-गुने से भी ज्यादा की वसूली कर ली, क्योंकि असभ्यता में उसका मुकाबला करने की मेरी हिम्मत नहीं थी।

ऐसे उदाहरण अनेक मिल जाएंगे, मुंबई में चौपाटी पर भी बहुत से लोग, जैसे बंदूक से गुब्बारे फुड़वाने वाले, पहले बताएंगे 5 रुपये प्रति राउंड, आपसे कहेंगे कि राउंड तो पूरा कर लो और फिर 100 रुपये का हिसाब बना देंगे।

मैंने जो घटनाएं बताईं वे बहुत पुरानी हैं, क्योंकि बाद में तो मैं इतना समझ गया था कि कहाँ और कौन लोग ऐसा जाल बिछाते हैं। लेकिन मैं समझता हूँ कि हमारी यह ज़िम्मेदारी  है कि ऐसा माहौल बनाएं कि नए, भोले-भाले लोग, ऐसे लोगों के जाल में न फंस पाएं।

समय के साथ इतना तो हुआ है कि लोग बात उठाते हैं, प्राधिकारियों के सामने, पोर्टल पर, इंटरनेट के माध्यम से, तो फर्क पड़ता है। बस यही मन हुआ कि शहर में आने वाले लोगों के साथ धोखा बंद हो, इसके लिए आज मैंने बात उठाई, जिन लोगों की जानकारी में ऐसी घटनाएं आएं वे उनको सही जगह पर उठाएं जिससे दिल्ली का यह संस्कृतिविहीन नगर, संस्कारविहीन भी सिद्ध न हो।    

नमस्कार।

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84. जैसे सूरज की गर्मी से जलते हुए तन को मिल जाए तरुवर की छाया

एनटीपीसी में अपनी सेवा के दौरान बहुत से सांस्कृतिक कार्यक्रमों के आयोजन से जुड़ा रहा और इस सिलसिले में अनेक जाने-माने कवियों, कलाकारों से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ, बहुत से श्रेष्ठ कवियों से तो मित्रता हो गई थी, बहुतों की कविताओं/गीतों को मैंने अपने ब्लॉग में उद्धृत भी किया है।

कुछ अलग किस्म के कलाकार रहे, जैसे पण्डवानी, कठपुतली आदि का प्रदर्शन करने वाले। गायन के कार्यक्रमों में जहाँ- नितिन मुकेश, जगजीत सिंह, अनूप जलोटा आदि के कार्यक्रम हुए, वहीं आज जिस कलाकार समूह अथवा परिवार का बरबस खयाल आ रहा है, वह अपनी तरह का एक अलग कलाकार परिवार है, जिसकी अलग पहचान बनी है, ये हैं- शर्मा बंधु।

पहले जब इन कार्यक्रमों का आयोजन शुरू किया था, आठवें दशक में, उस समय मोबाइल फोन और इंटरनेट के माध्यम से संपर्क की आज जैसी सुविधाएं नहीं थीं, अतः व्यक्तिगत रूप से मिलने और कार्यक्रम निश्चित करने के लिए जाना पड़ता था, ईवेंट मैनेजर्स पर, मैंने जब तक संभव हुआ निर्भर होना स्वीकार नहीं किया।

तो शर्मा बंधु का काफी नाम उस समय था, अब तो मैं इन गतिविधियों से काफी दूर गोआ में सेवा निवृत्ति का जीवन बिता रहा हूँ, पता ही नहीं है कि आयोजनों की मार्केट में कौन चल रहा है। हाँ तो यह विचार किया गया कि शर्मा बंधुओं का कार्यक्रम रखा जाए, यह शायद 1990 के आसपास की बात है। शर्मा बंधुओं के गाए कुछ भजन उस समय काफी लोकप्रिय थे, इनमें से एक और शायद सबसे अधिक लोकप्रिय था-

जैसे सूरज की गर्मी से जलते हुए तन को

मिल जाए तरुवर की छाया

ऐसा ही सुख मेरे मन को मिला है

मैं जबसे शरण तेरी आया, मेरे राम।

शर्मा बंधुओं की कौन सी पीढ़ी उस समय थी और कौन सी अब चल रही है, आजकल वे कार्यक्रम दे भी रहे हैं या नहीं, मुझे मालूम नहीं है। लेकिन मैंने और शायद उस कार्यक्रम का आनंद लेने वाले अधिकांश लोगों ने महसूस किया कि जिस प्रकार संगीत के लिए समर्पित घराने लोगों के मन पर छाप छोड़ते हैं, उसी प्रकार भक्ति संगीत के लिए समर्पित इस परिवार ने भी अपनी अलग पहचान बनाई है।

मुज़फ्फरनगर में इनके घर पर जब मैं संपर्क करने गया, तब मालूम हुआ कि वहाँ भी आश्रम जैसा माहौल था, एक बड़ा सा आंगन था और जहाँ तक मुझे याद है उसमें कुआं भी था। पीढ़ी दर पीढ़ी भक्ति के प्रति समर्पित इस संगीतमय संकल्प को आज प्रणाम करने का मन हुआ, जिसमें आस्था ही जीवन में आगे बढ़ने का संबल बनती है-

भटका हुआ मेरा मन था कोई

मिल ना रहा था सहारा

लहरों से लड़ती हुई नाव को जैसे

मिल ना रहा हो किनारा,

इस लड़खड़ाती नाव को ज्यों

किसी ने किनारा दिखाया,

ऐसा ही सुख मेरे मन को मिला है

मैं जब से शरण तेरी आया, मेरे राम।  

कुल  मिलाकर उस आयोजन के बाद जैसा अनुभव हुआ कि शर्मा बंधु पूरे मन से तल्लीन होकर अपने भजन और उनकी व्याख्या प्रस्तुत करते हैं, जैसे वे शिव जी के बारे में एक भजन गाते हुए कहते हैं कि वे-‘राम नाम का नशा किए हैं’, जबकि ऐसा दिखाया जाता है कि शिव जी भांग-धतूरे आदि का नशा करते हैं।

मुझे याद है कि उन्होंने इसकी भी बड़ी सुंदर व्यख्या की थी-

भवानी शंकरौ वंदे, श्रद्धा विश्वास रूपिणो

उन्होंने बताया था कि भवानी श्रद्धा की प्रतीक हैं और शंकर जी के मन में विश्वास अटूट है, भवानी का विश्वास श्रीराम जी को वन में भटकते देखकर डिग गया था और उन्होंने अपने पूर्व स्वरूप में, श्रीराम जी की परीक्षा लेने का प्रयास किया था, जिसका परिणाम उनको भोगना पड़ा था।

कुल मिलाकर आज अचानक भक्ति संगीत की परंपरा में अपनी अलग पहचान बनाने वाले इस परिवार की याद आई, मैं इनके प्रति सद्भाव एवं सम्मान व्यक्त करता हूँ।

नमस्कार।

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83. काम नए नित गीत बनाना

काफी अरसा बीत गया यह ब्लॉग लिखते-लिखते, जैसा बाबा तुलसीदास जी ने कहा- स्वांतः सुखाय। सोशल मीडिया के ये मंच, जो विद्वानों से भरे पड़े हैं, वहाँ सोचा कि अनुभूतियों की बात ज्यादा से ज्यादा करूं। ऐसे ही एक दिन खयाल आया कि ब्लॉग लिखना शुरू किया जाए। इस बहाने अपनी कुछ कविताएं भी, जो सिर्फ ज़ेहन में सुरक्षित थीं उनको डिजिटल रूप में रक्षित कर लिया। कोशिश की है कि जहाँ तक संभव हो, दलगत राजनीति पर चर्चा न करूं।

शुरू में एक लक्ष्य था कि अपने बचपन से लेकर सेवाकाल के अंत तक के अनुभवों को इसमें संजो लूं। वह हो  गया, अब यदा-कदा जो मन में आएगा, वह लिखता रहूंगा। मेरे लिए प्रेरणा के सबसे बड़े स्रोत कवि-कलाकार हैं, फिल्मकार राजकपूर हैं, मुकेश, शैलेंद्र और उनकी सारी टीम है, अपनी पसंद की बड़े कवियों की रचनाएं भी मैंने जब मन हुआ है, इसमें शेयर की हैं।

सोशल मीडिया पर जुड़े लोगों के पास सामान्यतः इतना समय नहीं होता कि वे लिंक को खोलकर ब्लॉग पढ़ें। सच्चाई है कि मैंने भी कभी किसी के ब्लॉग नहीं पढ़े हैं, लेकिन जब ब्लॉग वाले मूल पृष्ठ पर से यह सूचना मिलती है कि कोई नया पाठक/ब्लॉगर मेरा ब्लॉग पढ़ना प्रारंभ कर रहा है तो और आगे लिखने की प्रेरणा मिलती है। ये प्रेरणा अपने नियमित संपर्कों के मुकाबले अजनबियों से ज्यादा मिलती है।  

मुझे ‘जिस देश में गंगा बहती है’ का राजू याद आता है, जो कहता है-

काम नए नित गीत बनाना,

गीत बना के, जहाँ को सुनाना,

कोई न मिले तो अकेले में गाना,

कविराज कहे, न ये ताज रहे,

न ये राज रहे, न ये राजघराना,

प्रेम और प्रीत का गीत रहे,

कोई लूट सका न कभी ये खजाना,

मेरा नाम राजू, घराना अनाम,

बहती है गंगा, जहाँ मेरा धाम।

मैं सामान्यतः मुकेश जी के गीत उद्धृत करता हूँ, वैसे मैंने जगजीत सिंह जी और गुलाम अली जी की गाई गज़लें भी शेयर की हैं, आज किसी और के गाये फिल्मी गीत की कुछ पंक्तियां याद आ रही हैं-

दिल की गिरह खोल दो, चुप न बैठो, कोई गीत गाओ,

महफिल में अब कौन है अजनबी, तुम मेरे पास आओ।

अंत में इतना ही-

चलता ही रहूं, हर मंज़िल तक, अंजाम से बेगाना,

दिवाना मुझको लोग कहें, मैं समझूं जग है दिवाना।

नमस्कार।

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82. कल और आएंगे, नगमों की खिलती कलियां चुनने वाले!

अज्ञेय जी की एक कविता है-‘नए कवि से’, काफी लंबी कविता है, उसका कुछ हिस्सा यहाँ उद्धृत कर रहा हूँ- 

, तू आ, हाँ, आ,
मेरे पैरों की छाप-छाप पर रखता पैर,
मिटाता उसे, मुझे मुँह भर-भर गाली देता-
आ, तू आ।

तेरा कहना है ठीक: जिधर मैं चला
नहीं वह पथ था:
मेरा आग्रह भी नहीं रहा मैं चलूँ उसी पर
सदा जिसे पथ कहा गया, जो

इतने-इतने पैरों द्वारा रौंदा जाता रहा कि उस पर
कोई छाप नहीं पहचानी जा सकती थी।
मेरी खोज नहीं थी उस मिट्टी की
जिस को जब चाहूँ मैं रौंदूँ: मेरी आँखें

उलझी थीं उस तेजोमय प्रभा-पुंज से
जिस से झरता कण-कण उस मिट्टी को
कर देता था कभी स्वर्ण तो कभी शस्य,
कभी जीव तो कभी जीव्य,

अनुक्षण नव-नव अंकुर-स्फोटित, नव-रूपायित।
मैं कभी न बन सका करुण, सदा
करुणा के उस अजस्र सोते की ओर दौड़ता रहा जहाँ से
सब कुछ होता जाता था प्रतिपल——

कविता का इतना ही भाग यहाँ दूंगा अन्यथा बहुत ज्यादा हो जाएगा। अज्ञेय जी कवि थे, महान रचनाकार थे, सो वे अपने बाद के रचनाकारों को संबोधित कर रहे थे। कह रहे थे कि सृजन के इस पथ पर, नई राहों के अंवेषी के रूप में, उनसे जो बन पड़ा उन्होंने किया, अब नए रचनाकार की बारी है कि वह अपने झंडे गाड़े, अपनी रचनाधर्मिता का लोहा मनवाए।

साहित्य का क्षेत्र हो, पत्रकारिता का या कोई भी क्रिएटिव फील्ड हो, हर क्षेत्र में कितने महारथी आए, उन्होंने अपने कृतित्व से लोगों को चमत्कृत किया और फिर पताका नए लोगों के हाथों में सौंपकर आगे बढ़ गए। आज खयाल आया कि रचनाधर्मिता की इस अनंत यात्रा को सलाम करूं, क्योंकि जो ऊंचाई एक तारीख में एक मिसाल होती है वही कभी बहुत छोटी लगने लगती है, ऐसे में कुछ लोग हैं जो हमेशा नए लोगों के लिए चुनौती और प्रेरणा बने रहते हैं।

हालांकि एक क्षेत्र ऐसा भी है- राजनीति का, जहाँ बहुत से लोग पूरी तरह अपनी चमक खो देते हैं-

जो आज रौनक-ए-महफिल दिखाई देता है,

नए लिबास में क़ातिल दिखाई देता है।

खैर आज की चर्चा का विषय यह नहीं है। आज तो इस चर्चा का समापन साहिर लुधियानवी जी की इन पंक्तियों से करना सर्वथा उपयुक्त होगा-

कल और आएंगे नगमों की खिलती कलियां चुनने वाले,

मुझसे बेहतर कहने वाले, तुमसे बेहतर सुनने वाले,

कल कोई मुझको याद करे, क्यों कोई मुझको याद करे,  

मसरूफ ज़माना मेरे लिए, क्यों वक्त अपना बर्बाद करे।

मैं पल दो पल का शायर हूँ——

कुल मिलाकर शायरों, कलाकारों की यह परंपरा, जिसमें भले ही कोई किसी समय विशेष कालखंड में ही सृजनरत रहा हो, लेकिन यह निरंतर चलने वाली परंपरा हमारी महान धरोहर है।

इस परंपरा को प्रणाम करते हुए आज यहीं समापन करते हैं।

नमस्कार।

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81. सरेआम अमानवीयता

फेसबुक पर एक वीडिओ देखा जिसमें एक युवक को कई लोग मिलकर लाठियों से पीट रहे हैं और तमाशबीनों की भारी भीड़ चारों तरफ खड़ी इस दृश्य को देख रही है। बड़ा ही हृदय विदारक दृश्य था, ऐसा लगता ही नहीं था कि उस युवक को पीटने वाले इंसान थे, और चारों तरफ से घेरकर तमाशा देखने वाली तमाशबीनों की भीड़ उसे क्या कहा जाए, वे भी या तो अन्याय कर रहे लोगों की तरह हत्यारे थे, या हिजड़े थे।

अब इस घटना पर लोगों का तब्सिरा देख लेते हैं। एक सज्जन ने इस वीडिओ को शेयर करते हुए बताया कि यह मध्य प्रदेश में सिंगरौली जिले की घटना है और इसके लिए प्रदेश की बीजेपी सरकार जिम्मेदार है। एक और सज्जन ने इसे बिहार की घटना बताया और इस संबंध में अखबार की कटिंग भी साथ में लगाई है। इसी वीडिओ पर एक सज्जन ने टिप्पणी की है कि यह बंगाल की घटना है और आरएसएस के कार्यकर्ता इस घटना को अंजाम दे रहे हैं।

कुल मिलाकर बात ये है कि केवल राहुल गांधी जैसे असफल नेता ही मौतों पर सियासत नहीं करते, लाशों पर रोटियां नहीं सेकते, छुटपुट कार्यकर्ता किस्म के लोग भी इस तरह के घृणित कारनामों को अपना इच्छित राजनैतिक रंग देने में संकोच नहीं करते।

हत्या और लूटपाट जैसे हिंसक कार्य दुनिया के हर कोने में होते हैं, अमरीका और आस्ट्रेलिया आदि में भी ऐसी घटनाएं होती रहती हैं, लेकिन ऐसा शायद भारत में ही होता है कि कुछ गुंडे एक निहत्थे नवयुवक को बेरहमी से पीटते-पीटते मार डालें और चारों तरह खड़ी कायरों की भीड़ इस घटना को चुपचाप देखती रहे, और यह भी कि बाद में लोग इस घटना को अपना पसंदीदा राजनैतिक रंग चढ़ाकर प्रस्तुत करें।

शायद भारत में बाकी दुनिया से ज्यादा, इस बात पर लोग विश्वास करते हैं कि कोई सुपरमैन, कोई अवतार आएगा और जो कुछ भी गलत है, उसको सुधार देगा। वैसे तो बाकी दुनिया भी स्पाइडरमैन आदि की कहानियां देखती है, भारत में शायद लोग यही मानकर बैठे रहते हैं कि ऐसे हालात को सुधारना सुपरमैन का ही काम है, भले ही वो पर्दे के अमिताभ बच्चन या अजय देवगन के रूप में हो या प्रभु आ जाएं अवतार लेकर, हम लोग कुछ नहीं करेंगे और जनता से ज्यादा पुलिस का इसमें विश्वास है कि कार्रवाई करना उसका नहीं सुपरमैन का ही काम है। 

मैं ऐसा मानता हूँ कि इस प्रकार की कोई घटना यदि कोई होती है तो उसे संबंधित राज्य के मुख्यमंत्री और केंद्रीय गृह मंत्री के फेसबुक पृष्ठ, ट्विटर हैंडल पर डालकर, या किसी भी तरह से उनके संज्ञान में लाया जाना चाहिए, और उनको यह मालूम हो कि जनता इस बात को जान गई है, इसका विवरण प्रमुख पत्रकारों के पृष्ठ पर भी डाला जा सकता है, जिससे उस पर आवश्यक कार्रवाई हो। अगर राजनैतिक रोटियां सेकना ही उद्देश्य हो, तब बात अलग है। न्यायपालिका पर भी इस बात का दबाव डाला जाना चाहिए कि ऐसे मामलों में कठोर दंड दिया जाए और समय पर दिया जाए। अभी तो ऐसा लगता है कि न्यायपालिका पर अपराधियों की अधिक आस्था है, साधारण नागरिकों के मुकाबले।

नमस्कार।

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80. एक सपने का अंत

डॉ. कुंवर बेचैन की लिखी  पंक्तियां हैं-

विरहिन की मांग सितारे नहीं संजो  सकते

प्रेम के सूत्र नज़ारे नहीं पिरो सकते,

मेरी कुटिया से ये माना कि महल ऊंचे हैं

मेरे सपनों से मगर ऊंचे नहीं हो सकते।

डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम जी ने भी ऊंचे सपने देखने का महत्व बताया है, लेकिन सच्चाई है कि दुनिया छोटी सोच वालों से भरी पड़ी है,  वे अगर आपको बड़ी सोच वाला कोई काम करते हुए भी देखेंगे तो अचंभा करेंगे, सावधान करेंगे और चेतावनी भी दे सकते हैं।

यह सब अचानक याद आया जब सुना कि ‘आरके स्टूडिओ’ पूरी तरह जलकर खाक हो गया है और उसके साथ ही राजकपूर के सपनों की ताबीर पूरी तरह समाप्त हो गई है, किस तरह राज कपूर ने, जो एक बड़े कलाकार बाप के बेटे थे, अच्छे अभिनेता थे, अपनी होम प्रोडक्शन यूनिट प्रारंभ की और उसमें एक-एक कड़ी जोड़ते गए।

हर फिल्म कामयाब तो नहीं होती, बीच-बीच में कंगाली की नौबत भी आई, खास तौर पर जब एक बहुत बड़ा सपना देखा था राजकपूर ने, जिसका नाम था-‘मेरा नाम जोकर’, इस फिल्म की असफलता भी उतनी ही बड़ी थी, और फिर राजकपूर ने बताया कि वो जनता की नब्ज़ जानते हैं और उंन्होंने ‘बॉबी’ बनाई और कहा कि इसको ‘फेल’ करके दिखाओ, जैसा कि हम जानते हैं इस फिल्म ने रिकॉर्ड तोड़ सफलता प्राप्त की थी। बड़े सपनों कडी‌ में संगम भी सेल्युलॉइड पर एक बहुत सुंदर कविता थी। इस फिल्म के एक गीत की कुछ पंक्तियां याद आ रही हैं-

सुनते हैं प्यार की दुनिया में, दो दिल मुश्किल से समाते हैं

क्या गैर यहाँ अपनों तक के, साये भी न आने पाते हैं,

हमने आखिर क्या देख लिया, क्या बात है क्यों हैरान हैं हम,

इक दिल के दो अरमान हैं हम।

ऐ मेरे सनम, ऐ मेरे सनम।

बड़े सपनों के नाम से मुझे भारतीय फिल्म जगत का सबसे बड़ा शो-मैन राजकपूर ही याद आता है, जिसके सपनों की एक महान धरोहर- आरके स्टूडियो अब जलकर नष्ट हो गया है।

एक घटना और याद आ रही है, जो पढ़ी थी। ‘सत्यम शिवम सुंदरम’ की शूटिंग जिस सेट पर हो रही थी, नदी का स्थल था, वहाँ अचानक बाढ़ आ गई, पूरा सेट तहस-नहस हो रहा था, राजकपूर ने एक क्षण के लिए तो माथा पकड़ लिया, फिर कहा- ‘शूट’ और फिर वह सीन उसी रूप में फिल्म में आया, इसी को कहते हैं – ‘बाधाओं के ऊपर पैर रखकर आगे बढ़ जाना’ (मेक हर्डल्स योर स्टेपिंग स्टोंस).

आरके स्टूडिओ के नष्ट होने पर, बड़े सपनों के उस चितेरे और उसके शहीद हो चुके इस सपने को विनम्र श्रद्धांजलि।

नमस्कार।

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79. मत्स्य कन्या

अपने मित्र के दादाजी का सुनाया हुआ एक और किस्सा आपसे शेयर कर रहा हूँ, जैसा मैंने वादा किया था। इस किस्से में भी एक ऐसे जीव का उल्लेख है, जिसके बारे में हम सुनते तो हैं लेकिन हमने उसको देखा नहीं होता। यह घटना भी लगभग 100 वर्ष पुरानी है- मैं इसको घटना ही कहूँगा, आप चाहें तो कहानी मान सकते हैं। घटना का स्थान वही मुल्तान, जहाँ मेरे मित्र के दादाजी उस समय रहते थे।

हाँ तो मेरे मित्र के दादाजी को ये घटना उनके एक सरदार मित्र ने सुनाई थी। उस समय मेरे मित्र के दादाजी जवान थे और उनके ये सरदार मित्र भी जवान थे। इसके अलावा जैसा मैंने अपने मित्र से जाना, ये सरदार जी बहुत आकर्षक व्यक्तित्व के धनी थे। कुल मिलाकर घटना छोटी सी है, मैं बिना बात इसमें मसाला डाल रहा हूँ।

ये सरदार जी एक ‘शिप’ या कहें कि बड़ी नाव पर यात्रा कर रहे थे, डेक पर खड़े हुए समुद्र का, नज़ारा देख रहे थे। इतने में इनकी निगाह एक मत्स्य कन्या पर पड़ी,  वह लगातार इनके शिप के पीछे तैरकर आ रही थी और सरदार जी की तरफ देखे जा रही थी। वह बीच-बीच में कुछ आवाज़ भी निकालती जा रही थी। जैसा मैंने कहा सरदार जी बहुत सुंदर थे और मत्स्य कन्या तो जैसा उसके बारे में सुना जाता है, वैसी ही थी। वह मत्स्य कन्या, सरदार जी की तरफ देखते हुए लगातार शिप के पीछे तेजी से तैरती आ रही थी, सरदार जी भी उसकी तरफ बहुत आकर्षित हो रहे थे, उन्होंने देखा कि शिप की गति के साथ मिलान करने में मत्स्य कन्या बहुत थक रही थी, वह तेज आवाज़ें भी निकाल रही थी, आखिर में जब सरदार जी ने देखा कि समुद्र का किनारा इतनी दूर है कि तैरकर पहुंचा जा सकता है, तब उन्होंने शायद अपने साथियों को अपने सामान का खयाल रखने को कहा और समुद्र में छलांग लगा दी।

सरदार जी और मत्स्य कन्या तैरकर पास के किनारे पर पहुंच गए, जो एक निर्जन स्थान था, बहुत समय तक वे आपस में प्यार करते रहे, शायद अगला दिन हो गया, सरदार जी को भूख लगी और उन्होंने एक मछली पकड़ी और वे उसको भूनकर खाने लगे, यह देखकर मत्स्य कन्या ने नफरत भरी मुद्रा में आवाज निकाली और वहाँ से दूर चली गई। इसके बाद सरदार जी किसी तरह अपने स्थान पर पहुंचे।

ये है किस्सा नंबर-2, विश्वास करना न करना आपकी श्रद्धा पर निर्भर है, मैं तो अपने मित्र की बात, जो उन्होंने अपने दादाजी के हवाले से बताई, उस पर पूरी तरह विश्वास करता हूँ।

नमस्कार।

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78. इच्छाधारी सर्प

आज एक वृतांत सुना रहा हूँ जो मैंने दिल्ली में अपने एक मित्र और सहकर्मी से सुना था, मेरे ये मित्र मूलतः मुल्तान के रहने वाले थे, मुझसे कुछ पहले ही रिटायर हो चुके हैं और अभी दिल्ली में रह रहे हैं। दो किस्से हैं, सच्ची घटनाएं जो उनको, उनके दादाजी ने सुनाई थीं। उस समय की घटनाएं हैं जब वे (दादाजी) मुल्तान में रहते थे, देश की आज़ादी से काफी पहले की घटनाएं हैं।  

मेरा अपने मित्र पर पूरा विश्वास है, जैसा उनका अपने दादाजी पर था, इसलिए मैं इनको सच्ची घटना के रूप में सुना रहा हूँ, आप चाहें तो इनको किस्से के रूप में सुन लीजिए।

तो पहली घटना, जो दादाजी के मित्र के सामने हुई और उसने उनको बताई, वह मित्र जंगल के बीच से जा रहा था जहाँ मार्ग के दोनों तरफ मिट्टी के ऊंचे-ऊंचे दीवारनुमा टीले थे और उन टीलों में काफी ऊंचाई तक सूराख बने हुए थे, सर्प के बिल जैसे। उस व्यक्ति ने देखा कि एक तरफ के टीले के सूराख में से एक पतला सा सर्प, हरे रंग का निकला और दूसरी तरफ के टीले के सूराख मे घुस गया। इतना में उधर दो साधु वेशधारी व्यक्ति आए, उन्होंने उससे पूछा कि क्या उन्होंने देखा है कि सर्प कौन से सूराख में घुसा है, उस व्यक्ति ने उनको बता दिया।

उन लोगों ने बताया कि वह इच्छाधारी सर्प है, उनके पास एक तसले में गोबर भरा हुआ था वे गोबर को उस सूराख पर डालने लगे जिसमें वह सर्प घुसा था। जैसे ही वे गोबर डालते वह जल जाता, वे पुनः गोबर डालते, इस प्रकार काफी देर तक चलता रहा, अंत में गोबर जलना बंद हो गया, इसके बाद उनमें से एक साधु ने उस बिल (सूराख) के अंदर हाथ डाला और उस पतले से हरे रंग के सर्प को बाहर निकाल लिया।

उनके पास एक दूसरा साफ तसला भी था और उनमें से एक ने उस सर्प को सीधा उस तसले के ऊपर लटका लिया और सीधा उसको दबाकर  ऊपर से नीचे तक अपना हाथ ले आए, जिससे उसका सारा रक्त उस तसले में आ गया। उनमें से एक ने वह रक्त पिया और वह अदृश्य हो गया, उसके बाद दूसरे ने उस तसले में बाकी बचे रक्त को चाट लिया और वह भी अदृश्य हो गया। इसके बाद उन सज्जन ने केवल उनके जाते समय, उनके धन्यवाद का स्वर सुना।

मुझे यह किस्सा सुने 40 वर्ष से ऊपर हो गए, उस समय की बात है जब मैं दिल्ली में नौकरी करता था और दिल्ली मैंने 1980 में छोड़ दी थी। मेरे मित्र के दादाजी ने कब ये किस्सा सुनाया होगा पता नहीं और घटना तो लगता है लगभग 100 वर्ष पुरानी होगी!

आज अचानक याद आया तो शेयर कर लिया, आप चाहें इसे जिस भी रूप में लें। दूसरा किस्सा भी काफी रोचक है यद्यपि उसमें किसी के गायब होने की बात नहीं है, अब अगला झटका थोड़ा रुककर देते हैं न!  

नमस्कार।

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Recreate: Going deep through music

Ever listened to a musician

a Sitar maestro may be

in complete silence,

the imaginations he has in his mind

he recreates through the strings

which he touches with his creative alertness

he goes deep in the waves he creates

and the audience awakens after going deep there

everybody finding something

he or she had kept deep in the mind

or soul.

The music recreates a world within us

and we are not there, where we were

for quite some time.

Our mind and souls get

what they had been thirsty for.

via Daily Prompt: Recreate

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77. शैतान की फसल

एक समस्या जिससे हमारा देश बहुत लंबे समय से जूझ रहा है और आज वह विश्वव्यापी समस्या बन गई है, वह है आतंकवाद की समस्या।

आज पूरी दुनिया के देश तरक्की करने के रास्ते खोज रहे हैं, एक स्वस्थ प्रतियोगिता हो रही है दुनिया के देशों के बीच में, वहाँ की शासन व्यवस्था चाहे किसी भी प्रकार की हो। संयुक्त राष्ट्र संघ और अनेक अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर राष्ट्राध्यक्ष मिलकर इस बारे में विचार करते हैं कि किस प्रकार आपसी सहयोग के साथ प्रगति की नई ऊंचाइयों को छुआ जाए। लेकिन यह शैतान, सभी योजनाओं में पलीता लगा देता है। 

कुछ देशों के बीच सीमा-विवाद रहता है, हमारे देश को भी दुर्भाग्य से ऐसे पड़ौसी मिले हैं कि हमेशा कोई न कोई विवाद बना रहता है और जो राशि हमें देश की प्रगति पर खर्च करनी चाहिए, उसका एक बड़ा हिस्सा रक्षा तैयारियों पर करना हमारी मजबूरी बन गई है।

इतना ही नहीं, लंबे समय से हम आतंकवाद के, एक ऐसे शत्रु से लड़ाई लड़ रहे हैं, जिसका पता नहीं होता कि वह कहाँ छिपा बैठा है और कब, कहाँ हमला करेगा। यह शत्रु नैतिकता के किसी प्रकार के नियमों का भी पालन नहीं करता, निहत्थे नागरिकों की हत्या करने में, ट्रेन में या बाजार में ब्लास्ट करने में भी इसको कोई संकोच नहीं होता।

इस प्रकार की परिस्थितियों का हम लंबे समय से सामना करते रहे हैं, आज अमरीका, ब्रिटेन आदि बड़े देशों को भी इसका सामना करना पड़ रहा है। अभी कल ही ब्रिटेन में अंडरग्राउंड ट्रेन में बड़ा हादसा हुआ है।

जो लोग ऐसा काम करते हैं, वे इंसान कहलाने के लायक तो नहीं हैं, मैं नहीं समझ पाता कि ऐसा कौन से दर्शन है जो इन नीच लोगों को ऐसे काम करने के लिए प्रेरित करता है।

समय की मांग है कि दुनिया की सभी ताकतें मिलकर आतंकवाद के इस राक्षस का जड़ से सफाया करने के लिए सम्मिलित प्रयास करें और हमारी यह दुनिया- हर देश, प्रदेश, धर्म और जाति के लोगों के खुशहाली के साथ आगे बढ़ने के लिए जानी जाए।

आतंकवाद का यह दुश्मन छिपा हुआ है, इसलिए और अधिक जागरूकता के साथ दुनिया के सभी प्रगतिशील देशों को, इस बुराई को जड़ से समाप्त करने के लिए भरसक प्रयास करना होगा।

हमारी शुभकामना है आतंकवाद की समाप्ति में हम सफल हों और जल्द ही ऐसा दिन आए कि हम इस बुराई से पूरी तरह मुक्त हो जाएं।  

आज के लिए इतना ही।

नमस्कार।

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