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98. आंखों में नमी, हंसी लबों पर!

बहुत सी बार ऐसा होता है कि कोई कविता शुरू करते हैं, कुछ लाइन लिखकर रुक जाते हैं। फिर आगे नहीं बढ़ पाते, लेकिन वो लाइनें भी दिमाग से नहीं मिट पातीं।

अभी दिवाली आकर गई है, दीपावली, दिवाली कहने से ‘दिवाला’ याद आता है, हालांकि वो भी बड़े रईसों की चीज़ है, सामान्य आदमी का तो अघोषित ही दिवाला होता है।

हाँ तो कविता की ये पंक्तियां, कभी दीपावली के आसपास ही लिखी थीं। बहुत साल पहले, कब, ये याद नहीं है। पंक्तियां इस तरह हैं-

हम भी अंबर तक, कंदील कुछ उड़ाते

पर अपने जीवन में रंग कब घुले।

हमको तो आकर हर भोर किरण

दिन का संधान दे गई,

अनभीगे रहे और बारिश

एक तापमान दे गई।

आकाशी सतहों पर लोट-लोट जाते,

पर अपने सपनों को पंख कब मिले॥

आज, अचानक ये अधूरा गीत याद आया, तो सोचा कि इसको भी यहाँ, अपनी डिजिटल स्मृतियों में स्थापित कर दूं।

अब अपना ये पुराना, अधूरा गीत साझा करने के बाद, जगजीत सिंह जी की गाई, कैफी साहब की लिखी एक लोकप्रिय गज़ल के एक दो शेर याद आ रहे हैं, वो भी शेयर कर लेता हूँ-

तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो,

क्या गम है जिसको छिपा रहे हो।

आंखों में नमी, हंसी लबों पर,

क्या हाल है, क्या दिखा रहे हो।

बन जाएंगे ज़हर पीते-पीते

ये अश्क़ जो पीते जा रहे हो।

शायद ज़िंदगी में ऐसा तो चलता ही रहता है, कोई कैफी साहब जैसा शायर उसको इतनी खूबसूरती से बयां कर देता है।

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार।

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97. विकास प्राधिकरण!

आज लखनऊ का एक सरकारी विभाग याद आ गया, जिससे काफी वर्षों पहले वास्ता पड़ा था, 2002 के आसपास, और इस विभाग की याद ऐसी तेजी से आई कि मैं जो अभी एक अनुवाद के काम में लगा हूँ, उसको बीच में छोड़कर ही इस अनुभव को शेयर कर रहा हूँ, उसके बाद अनुवाद आगे करूंगा।

हाँ तो जैसा मैं बता चुका हूँ, लखनऊ छोड़े मुझको काफी साल हो गए, और अभी मैं गोआ में हूँ, शायद इसीलिए यह लिखने का साहस कर पा रहा हूँ, वरना लालची सरकारी गुंडों से निपटने का साहस मुझमें नहीं है।

कुल मिलाकर बात इतनी है कि वर्ष 2001 में, मैं स्थानांतरित होकर लखनऊ आया और फिर ये विचार आया कि अपना मकान हो तो अच्छा है, जिसमें अपना घर वास कर सके। शायद 2002 के आसपास हमने गोमती नगर के विकास खंड में एक छोटा और सुंदर घर खरीद लिया, कंपनी से ऋण लेकर, अपनी हैसियत के अनुसार।

1250 वर्गफुट (110 वर्गमीटर)  का यह मकान था, एक सज्जन जो पुलिस विभाग में, शायद सिविल इंजीनियर थे, वे छोटे-छोटे मकान बनवाकर बेचते थे, उनमें से ही यह एक मकान हमें पसंद आ गया था। अब एक मध्यम वर्गीय परिवार का एक व्यक्ति जब छोटी-मोटी संपत्ति हासिल कर लेता है तो वह उसको सीने से लगाकर रखना चाहता है, सोचता है इसमें कहीं कोई कमी न रह जाए, जिसके कारण कल कोई परेशानी हो। इसी प्रसंग में मैंने मकान के नक्शे को देखा जिसमें एल.डी.ए. की ओर से निर्माण की अनुमति प्रदान करते हुए लिखा गया था कि बाद में ‘कम्प्लीशन सर्टिफिकेट’ प्राप्त किया जाए।

मैंने सोचा कि यह औपचारिकता भी पूरी कर ली जाए, जिससे बाद में कोई परेशानी न हो। मैंने इस विचार से एक आवेदन लिखा और  इस महान विभाग में गया, जिसे ‘लखनऊ विकास प्राधिकरण’ कहा जाता और बाद में मुझे मालूम हुआ कि इस विभाग को उत्तर प्रदेश सरकार का भ्रष्टतम विभाग होने की ख्याति प्राप्त है। आज उसकी स्थिति क्या है, मैं नहीं जानता, मेरे विचार में यह महान विभाग आज भी उसी स्थिति में होगा।

खैर मुझे अपनी छोटी सी संपत्ति से यह टिप्पणी हटवानी थी, ‘कम्प्लीशन सर्टिफिकेट’ संबंधी, जिससे भविष्य में कोई परेशानी न हो, अतः मैं इस संबंध में अपना आवेदन लेकर इस महान विभाग में पहुंच गया, वहाँ मुझे एक इंजीनियर महोदय के पास भेजा गया।

उन सज्जन ने जो कहा, वह आज भी मुझे अच्छी तरह याद है। वे बोले- ‘आपने दो गलतियां कर दीं, एक तो ये कि आपने लखनऊ में मकान खरीद लिया और दूसरी यह कि आपने हमारे पास ‘कम्प्लीशन सर्टिफिकेट’ के लिए आवेदन कर दिया। अब तो यही होगा कि हम आएंगे और कहेंगे कि यह तोड़ दो, आप उसको तोड़ दोगे फिर हम आएंगे और कहेंगे कि ये भी तोड़ दो और इस तरह आखिर में कुछ भी नहीं बचेगा!’

मैं पूरे डर के साथ उनकी महानता से अभिभूत हो गया, बाद में मैंने ‘प्राधिकरण’ की नियम पुस्तिका को पढ़ा, जिसमें लिखा था कि इस आकार के और इससे काफी बड़े आकार तक, शायद 400 वर्गमीटर तक के मकानों के लिए ‘कम्प्लीशन सर्टिफिकेट’ की आवश्यकता नहीं है। इसके बाद मैंने उस महान हस्ती के दर्शन नहीं किए, हाँ एकाध बार जब घर के अंदर कुछ छोटा-मोटा निर्माण हो रहा था, तब उनमें से एक-दो सज्जन गली में मंडराने लगे और हिजड़ों की तरह अपना नज़राना लेकर ही गए।

आज जबकि मैं दूर हूँ उनकी रेंज से, निरापद हूँ, तब अचानक इस महान विभाग को श्रद्धांजलि देने का मन हुआ, सो दे दी!

नमस्कार।

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96. उसके होठों पे कुछ कांपता रह गया!

आज वसीम बरेलवी साहब की एक गज़ल याद आ रही है, बस उसके शेर एक-एक करके शेयर कर लेता हूँ। बड़ी सादगी के साथ बड़ी सुंदर बातें की हैं, वसीम साहब ने इस गज़ल में। पहला शेर तो वैसा ही है, जैसा हम कहते हैं, कोई बहुत सुंदर हो तो उसको देखकर-

आपको देख कर देखता रह गया
क्या कहूँ और कहने को क्या रह गया।

ये बात तो  उनकी हुई, कि उन्होंने अपनी झलक से जैसे मंत्रमुग्ध कर दिया हो, अब आपके पास क्या है मियां? आपकी बातें, आपके जज़्बात, आपका अंदाज-ए-बयां। उसके दम पर ही आपको तो अपनी छाप छोड़नी होगी न! आपने अपनी सारी प्रतिभा, सारी ईमानदारी, सब कुछ लगा दिया उसको प्रभावित करने में, लेकिन आखिर में हुआ तो बस इतना-

आते-आते मेरा नाम-सा रह गया
उस के होंठों पे कुछ काँपता रह गया। 

अब ये सब कैसे समझाया जाए कि जहाँ पर तबीयत जम जाए, ऐसा लगता है कि  वो तो बस सामने ही रहे और हम उसको देखते रहें, लेकिन ऐसे में अचानक ऐसा होता है, और हम फिर से देखते ही रह जाते हैं-
वो मेरे सामने ही गया और मैं
रास्ते की तरह देखता रह गया। 

होता यह भी है आज के समय में कि जब आप अपनी खूबियों से, जो आपके अंदर हैं, उनसे लोगों को प्रभावित करने का प्रयास करते हैं, वहीं आज का समय ऐसा है, ऐसे लोग आज उभरकर सामने आते हैं कि उनके भीतर भले ही कुछ न हो, वे स्वयं को शाहरुख खान की तरह, मतलब कि जहाँ जैसी जरूरत है, जैसी डिमांड है, उस रूप में प्रस्तुत कर देंगे। गज़लों में अक्सर आशिक़-माशूक़ के रूप में बातें रखी जाती हैं, लेकिन वास्तविक ज़िंदगी में वह कोई भी हो सकता है, आपका बॉस भी हो सकता है! जिसे आप अपनी भीतरी खूबसूरती से, अपनी प्रतिभा से, अपनी सच्चाई से प्रभावित करना चाहते हैं, और दूसरे लोग उसको अपने प्रेज़ेंटेशन से प्रभावित कर लेते हैं, और ऐसा बार-बार होता है, क्योंकि आपको तो अपनी सच्चाई पर ही भरोसा है-

झूठ वाले कहीं से कहीं बढ़ गये
और मैं था कि सच बोलता रह गया। 

अब आखिर में अचानक, मुझे डॉ. धर्मवीर भारती की लिखी एक कहानी याद आ रही है- ‘गुलकी बन्नो’, वैसे मुझको इसका ताना-बाना कुछ याद नहीं है, बस इतना है कि एक कन्या, जो बहू बनकर आई थी मुहल्ले के एक गरीब परिवार में, उस पर इतनी मुसीबतें आती हैं, इतनी बार वह टूटती है, मुसीबतें झेलती है, कुछ बार बहुत दिन तक नहीं दिखती, लेखक सोचता है कि मर-खप गई है, फिर अचानक दिखाई दे जाती है, शरीर कंकाल हो चुका है, लेकिन वही मुस्कान, दांत निपोरती हुई पहले की तरह्।

सच्चे लोगों की परीक्षा ज़िंदगी कुछ ज्यादा ही लेती है, और आखिरी शेर इस गज़ल का प्रस्तुत है-

आँधियों के इरादे तो अच्छे न थे
ये दिया कैसे जलता हुआ रह गया। 

आज वसीम बरेलवी साहब की इस गज़ल के बहाने आपसे कुछ बातें हो गईं।

नमस्कार।

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95. तव मूरति विधु उर बसहि, सोई स्यामता आभास।

आज फिर से  प्रस्तुत है, एक और पुरानी ब्लॉग पोस्ट-

 आज गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित श्रीरामचरितमानस का एक अत्यंत प्रेरक प्रसंग याद कर लेते हैं। आजकल नियोजक अपने कर्मचारियों का चयन करते समय तथा बाद में अनेक अवसरों पर उनका मनोवैज्ञानिक परीक्षण करते हैं।

श्रीराम जी को लंका पर चढ़ाई करनी थी और उससे पहले एक प्रकार से उन्होंने अपने साथियों की मनोवैज्ञानिक परीक्षा ली। इससे यह मालूम होता है कि कौन श्रीराम जी के प्रति, किस हद तक समर्पित था।

 चंद्रमा को देखकर श्रीराम जी ने पूछा कि चंद्रमा में जो यह कालापन दिखाई देता है, ये किसलिए है ( कह प्रभु ससि महुं मेचकताई) –  

प्रभु के इस प्रश्न के उत्तर में सभी लोग, अपनी मानसिक स्थिति, अपनी कुंठाओं आदि का प्रदर्शन करने लगे-

सुग्रीव ने कहा कि चंद्रमा में पृथ्वी की छाया दिखाई दे रही है। इसमें उसकी यह कुंठा दिखती है कि उसका उत्तराधिकारी बाली का पुत्र अंगद होगा, उसका अपना पुत्र नहीं।

किसी ने कहा कि यह चंद्रमा के कर्मों का फल है, राहू ने चंद्रमा को एक बार ऐसा चांटा मारा था, जिसकी छाप आज तक दिखाई देती है और चंद्रमा को हमेशा उसके दुष्कर्म की याद दिलाता रहेगा। तभी कोई बोला कि चंद्रमा को अपनी सुंदरता पर बहुत घमंड था, उसका घमंड दूर करने के लिए, उसके हृदय में छेद करके, उसकी कुछ सुंदरता कामदेव की पत्नी, रति को दे दी गई। इसीलिए तो कहते हैं कि घमंड नहीं करना चाहिए!

कोऊ कह जब विधि रति मुख कीन्हा,

सार भाग ससि कर हर लीन्हा।

छिद्र सो प्रकट इंदु उर माहीं।

तेहि मह देखिअ नभ परछाहीं।

सामान्यतः लोगों का यह स्वभाव होता है कि वे अपनी ही न्यूनताओं, कुंठाओं से घिरे रहते हैं और दूसरे लोगों से अक्सर बिना कारण द्वेष और नफरत करते हैं।

लोगों के विचारों की इस रौ में श्रीराम जी अपना मत भी जोड़ देते हैं- वे कहते हैं कि विष, चंद्रमा का प्रिय भाई है, (क्योंकि दोनों की उत्पत्ति समुद्र मंथन से मानी जाती है), और चंद्रमा ने अपने प्रिय भाई को अपने हृदय में स्थान दिया हुआ है, और श्रीराम जी कहते हैं कि चंद्रमा अपनी विषयुक्त किरणें फैलाकर मुझ जैसे विरही नर-नारियों को जलाता रहता है।

सभी ने अपने विचार रखे, बल्कि ऐसा होता है कि अपने नकारात्मक विचार रखने के लिए लोग तत्पर रहते हैं, हनुमान जी कुछ नहीं बोले, प्रभु को हनुमान जी से पूछना पड़ा कि आप भी तो अपनी राय बताइये। इस पर हनुमान जी ने कहा-

कहि मारुतसुत सुनहु प्रभु, ससि तुम्हार प्रिय दास,

तव मूरति विधु उर बसहि, सोई स्यामता आभास।

हनुमान जी प्रभु से कहते हैं कि चंद्रमा आपका प्रिय दास है और आपकी छवि  चंद्रमा के हृदय में बसी है, उसी का श्याम आभास होता है। हनुमान जी प्रभु के प्रति समर्पित हैं और उनको दूसरे लोग भी अपने जैसे ही लगते हैं।

प्रभु यह उत्तर सुनकर बहुत प्रसन्न हुए। हम कह सकते हैं कि हनुमान जी के हृदय में सिर्फ प्रेम था, किसी से नफरत नहीं, क्योंकि उनके हृदय में प्रभु राम बसे थे। वे तो धरती पर ही प्रभु के काम के लिए आए थे।

इसे प्रभु द्वारा किया गया मनोवैज्ञानिक परीक्षण कह सकते हैं और इसमें परम सफल तो हनुमान जी ही हैं।

नमस्कार।

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94. वो कौन था, वो कहाँ का था क्या हुआ था उसे!

आज शहरयार जी की एक गज़ल के बहाने आज के हालात पर चर्चा कर लेते हैं। इससे पहले दुश्यंत जी के एक शेर को एक बार फिर याद कर लेता हूँ-

इस शहर में वो कोई बारात हो या वारदात

अब किसी भी बात पर खुलती नहीं हैं खिड़कियां।

आज की ज़िंदगी इतनी आपाधापी से भरी हो गई है कि किसी के पास, किसी के लिए बिल्कुल टाइम नहीं है। खास तौर जीवित या जीवन से जूझ रहे व्यक्ति के लिए तो बिल्कुल नहीं है। ये बात बड़े शहरों पर तो विशेष रूप से लागू होती है।

बहुत बार देखा है कि कोई व्यक्ति दुर्घटना का शिकार हो गया हो और जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहा हो, तब लगभग सभी लोग उसकी तरफ एक बार देखकर आगे बढ़ जाते हैं। इतना ही नहीं लोगों के सामने कोई किसी को चाकू मार दे तब भी कोई उसको बचाने के लिए आगे नहीं बढ़ता, और उसके बाद उसे चिकित्सा सुविधा दिलाने के लिए भी नहीं। ऐसे में लोगों को अपने अर्जेंट काम याद आ जाते हैं या ड्यूटी के लिए देर होने लगती है। जो लोग ऐसे में सहायता के लिए आगे बढ़ते हैं, वे वास्तव में सराहना के पात्र हैं और आज के समय में इंसानियत के जीवित होने की मिसाल हैं।

इसके विपरीत जब कोई लाश दिखाई दे जाती है, तब लोग घंटों वहाँ खड़े रहते हैं, पता करते रहते हैं, कौन था, कहाँ का था, क्या हुआ था । ऐसे में लोगों को कोई काम याद नहीं आता, कोई जल्दी नहीं होती।

खास तौर पर नेताओं को ऐसी लाशों की तलाश रहती है, जिनको झंडे की तरह इस्तेमाल किया जा सके। जिनको लेकर किसी पर इल्ज़ाम लगाए जा सकें। भुखमरी, कानून व्यवस्था की बदहाली, किसी भी मामले को जोरदार ढंग से उठाया जा सके। ऐसे मामले भी सामने आए हैं, जब लोगों ने किसी को आत्महत्या करने के लिए मानसिक रूप से तैयार किया, जिससे बाद में उस पर राजनीति की जा सके।

शायद यही कारण है कि, औद्योगिक अशांति की स्थिति में भी मैंने देखा है कि जब लोग कोई लाश बीच में रखकर आंदोलन करना चाहते हैं, तब पुलिस वालों का प्रयास यह होता है कि सबसे पहले किसी तरह समझा-बुझाकर, लाश को वहाँ से हटाया जाए वरना आंदोलन लंबा चल सकता है।

खैर इन सब बातों पर ज्यादा चर्चा किए बिना, शहरयार जी की वह गज़ल यहाँ दे रहा हूँ, जिसे हरिहरन जी ने गाया है, ‘गमन’ फिल्म के लिए। मैंने जितना कुछ ऊपर लिखा है, उससे कहीं ज्यादा बात ये गज़ल अपने आप में कह देती है-

अजीब सानेहा मुझ पर गुज़र गया यारो

मैं अपने साये से कल रात डर गया यारो।

हर एक नक़्श तमन्ना का हो गया धुंधला,

हर एक ज़ख्म मेरे दिल का भर गया यारो।

भटक रही थी जो कश्ती वो गर्क-ए-आब हुई

चढ़ा हुआ था जो दरिया उतर गया यारो।

वो कौन था, वो कहाँ का था, क्या हुआ था उसे,

सुना है आज कोई शख्स मर गया यारो। 

 

नमस्कार।

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93. मेरी बेबाक तबीयत का तकाज़ा है कुछ और!

मुकेश जी का गाया एक प्रायवेट गाना याद आ रहा है-

मेरे महबूब, मेरे दोस्त, नहीं ये भी नहीं

मेरी बेबाक तबीयत का तकाज़ा है कुछ और।

हाँ मैं दीवाना हूँ चाहूँ तो मचल सकता हूँ,

खिलवत-ए-हुस्न के कानून बदल सकता हूँ,

खार तो खार हैं, अंगारों पे चल सकता हूँ,

मेरे महबूब, मेरे दोस्त, नहीं ये भी नहीं

मेरी बेबाक तबीयत का तकाज़ा है कुछ और।

इस गीत में आगे भी कुछ अच्छी पंक्तियां हैं, लेकिन इतना ही शेयर करूंगा क्योंकि इतना हिस्सा सभी को आसानी से समझ में आ सकता है। कुल मिलाकर हर कोई यह बताना चाहता है कि मेरी कुछ अलग फिलॉसफी है ज़िंदगी की, अलग सिद्धांत हैं और खुद्दारी है, जो मेरी पहचान है, लेकिन अपने सिद्धांतों के लिए मैं कुछ भी कर सकता हूँ। 

अपनी बात कहने के लिए, कोई माकूल माध्यम और बहाना चाहिए। राजकपूर जी को फिल्म का माध्यम अच्छा लगता था, खानदानी दखल भी था उस माध्यम में, क्योंकि पिता पृथ्वीराज कपूर प्रसिद्ध रंगकर्मी और सिने कलाकार थे, सो राजकपूर जी ने फिल्म का माध्यम अपनाया, लेकिन कही वही अपनी बात, अपनी पसंदीदा फिलॉसफी को पर्दे पर अभिव्यक्त किया, यहाँ तक कि जेबकतरे का काम कर रहे नायक से भी यही कहलवाया-

मैं हूँ गरीबों का शहज़ादा, जो चाहूं वो ले लूं,

शहज़ादे तलवार से खेले, मैं अश्कों से खेलूं।

लेकिन इससे भी पहले वो कहते हैं-

देखो लोगों जरा तो सोचो, बनी कहानी कैसे,

तुमने मेरी रोटी छीनी, मैंने छीने पैसे,

सीख़ा तुमसे काम, हो गया मैं बदनाम,

हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई सबको मेरा सलाम,

छलिया मेरा नाम। 

मेरा ब्लॉग, मेरा प्लेटफॉर्म है, मेरी फिल्म है, मेरा नाटक है। मैं अपनी बात इसी तरह कहूंगा, कभी आज की बात का ज़िक्र करके, कभी अतीत की किसी घटना, किसी धरोहर को याद करके।

जाते-जाते एक और गीत याद आ रहा है-

जब गम-ए-इश्क़ सताता है तो हंस लेता हूँ,

हादसा याद जब आता है तो हंस लेता हूँ।

मेरी उजड़ी हुई दुनिया में तमन्ना का चिराग

जब कोई आ के जलाता है तो हंस लेता हूँ।

कोई दावा नहीं, फरियाद नहीं, तंज़ नहीं,

रहम जब अपने पे आता है तो हंस लेता हूँ।

बी हैप्पी, जस्ट चिल!

नमस्कार।

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92. फिर से मेरा ख्वाब-ए-जवानी थोड़ा सा दोहराए तो!

अतीत में रहना अक्सर लोगों को अच्छा लगता है, मेरी उम्र के लोगों को और भी ज्यादा। कुछ लोग तो जब मौका मिलता है अतीत में जाकर दुबक जाते हैं, या ऐसा कहते रहते हैं, हमारे समय में तो ऐसा होता है। वैसे मेरा तो यही प्रयास है कि हर समय, मेरा समय रहे, लेकिन अनुभव को मन में दोहराने के लिए कभी-कभार अतीत में डुबकी लगा लेना तो अच्छी बात है।

आज एक दृश्य याद आ रहा है, आकाशवाणी जयपुर में सेवा के समय का, वहाँ मैं 1980 से 1983 तक रहा था। मैं अपने पुराने ब्लॉग्स में उस अवधि के बारे में बता चुका हूँ। हाँ तो एक दृश्य याद आ रहा है, रिकॉर्डिंग स्टूडियो का, एक लाइन का संवाद, लेकिन उससे पहले लंबी-चौड़ी भूमिका तो बांध सकता हूँ, कैरेक्टर्स के बारे में बताने के बहाने।

हाँ तो आकाशवाणी में मैं प्रशासन शाखा में था, हिंदी अनुवादक होने के नाते, रिकॉर्डिंग स्टूडियो से मेरा सीधे तौर पर कोई नाता नहीं था, लेकिन मैं अक्सर रिकॉर्डिंग स्टूडियो में रहता था कभी किसी कवि-गोष्ठी में, कभी कविता रिकॉर्ड कराने के लिए और कभी अपनी आवाज़ में कोई कहानी रिकॉर्ड कराने के लिए।

मेरी मित्रता भी प्रशासन शाखा से बाहर, प्रोग्राम विभाग के लोगों से अधिक थी, जबकि प्रशासन शाखा के बहुत से लोग प्रोग्राम विभाग के लोगों से ईर्ष्या करते थे, क्योंकि उनको पैसा और ख्याति, दोनों अधिक मिलते हैं।

हाँ तो कार्यक्रम विभाग में एक थे- श्री राजेंद्र वोहरा, कार्यक्रम निष्पादक, बहुत ही सृजनशील व्यक्ति थे, बाद में वे केंद्र निदेशक के स्तर तक पहुंचे थे। एक थे मेरे मित्र- बैजनाथ गौतम, कृषि विभाग में कार्यक्रम सहायक थे। ईसुरी के लोकगीत बड़े सुरीले अंदाज में गाते थे। और एक थे श्री एस.एस.धमौरा, वे बहुत अच्छे कलाकार थे, पगड़ी बांधकर, पूरी तरह राजस्थानी परिधान में रहते थे। इस दृश्य में ये तीन व्यक्ति ही प्रमुख रूप से थे, वैसे आकाशवाणी में अनेक कलाकार मेरे मित्र थे, जिनमें बहुत जाने-माने तबला वादक ज़नाब दायम अली क़ादरी भी शामिल थे।

हाँ तो एक लाइन के संवाद वाले इस दृश्य के बारे में बात करते हैं। मैं किसी रिकॉर्डिंग के मामले में स्टूडियो गया था और इस दृश्य में मेरी कोई भूमिका नहीं थी।

दरअसल कृषकों के लिए चौपाल की रिकॉर्डिंग होनी थी, धमौरा जी ने कहा- ‘राम राम बैजनाथ भाई, क्या हाल है, आज की चौपाल में चर्चा शुरू की जाए? इस पर श्री बैजनाथ गौतम बोले- ‘हाँ धमौरा भाई मैं तो मजे में हूँ, चर्चा शुरू करते हैं, बस थोड़ा ‘वोहरा साहब’ आ जाएं।‘

इतना बोलना था, कि धमौरा जी, जो रुतबे में गौतम जी से बहुत छोटे थे, लेकिन अनुभवी कलाकार थे, उन्होंने रिकॉर्डिंग बंद करा दी और चिल्लाए- ‘ये वोहरा साहब क्या होता है? यहाँ प्रोग्राम में कोई किसी का साहब नहीं है!

बस यही अचानक याद आया, हर जगह का अलग संस्कार होता है, दफ्तर में अगर नाम के साथ साहब न लगाएं तो वह अशिष्टता है और चौपाल में अगर किसी के नाम के साथ साहब लगाएं तो वह गलत है।

आज के लिए यही एक बहाना था, अतीत में झांकने का, और उन पलों को दोहराने का, जगजीत जी की गाई गज़ल के शेर याद आ रहे हैं-

झूठ है सब तारीख हमेशा अपने को दोहराती है,

फिर से मेरा ख्वाब-ए-जवानी थोड़ा सा दोहराए तो।

शफक़, धनुख, महताब, घटाएं, तारे, नगमे, बिजली, फूल,

उस दामन में क्या-क्या कुछ है, वो दामन हाथ में आए तो।  

नमस्कार।

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91. हाथ खाली हैं मगर व्यापार करता हूँ!

बचपन में चंदामामा पत्रिका में विक्रम और वैताल की कहानियां पढ़ा करता था, जिनकी शुरुआत इस प्रकार होती थी- ‘विक्रमादित्य ने जिद नहीं छोड़ी’ और फिर अपनी ज़िद के कारण जब वह वैताल को लादकर चलता है, तब वैताल उसे कहानी सुनाता है और बीच में टोकने पर वह फिर वापस उड़कर चला जाता है।

कुछ इस तरह ही मुझे याद है, और मुझे लगता है कि ब्लॉग लिखना एक बार शुरू किया तो फिर इसको बार-बार लिखने की ज़िद भी कुछ ऐसी ही है, यहाँ कहानी सुनाने वाले भी खुद और सुनने वाले भी खुद ही। हाँ ये देखकर अच्छा लगता है कि मेरी साइट पर जाकर बहुत सारे अजनबी लोग, पुराने ब्लॉग्स को खोज-खोजकर पढ़ते हैं।

हाँ तो मैंने अपने एनटीपीसी के सेवाकाल के संबंध में काफी लिखा है। वहाँ पर मुझे क्रय-समितियों में बहुत बार दौरों पर जाना पड़ा है। सच बात तो ये है कि मैं कभी खुद अपने लिए भी खरीदारी नहीं करता। क्रय समितियों में जो औपचारिकताएं हैं, चयन से संबंधित, वे सब वित्त और सामग्री विभाग के लोग पूरा करते थे, मैं मानव संसाधन विभाग का प्रतिनिधि होने के नाते, केवल मौन मध्यस्थ की भूमिका में उनके साथ रहता था। क्रय समिति में जाने का आकर्षण मेरे लिए मात्र दूसरे शहर में घूमना ही होता था।

हाँ कभी-कभी मेरी भूमिका आती थी, जैसा कि मैंने एक ब्लॉग में लिखा था, चरित्र की शिक्षा देने वाले एक विद्यालय के शिक्षक जब, स्कूल से संबंधित खरीदारी के लिए साथ गए थे, और कमीशन खाने के चक्कर में एक खास पार्टी की वकालत करने लगे थे, तब हमने वहाँ से न खरीदने का फैसला लिया और कोटेशन लेकर वापस आ गए थे।

आज अचानक शुरू-शुरू का एक क्रय-समिति में जाने का अनुभव याद आ गया। विंध्यनगर, मध्य प्रदेश में मैं कार्यरत था, कार्यपालक के रूप में और वहाँ पास के ही बाज़ार से कुछ पुरस्कार आदि खरीदने थे। हमारी क्रय समिति में, अन्य लोगों के साथ ही साथ, मेरे अपने विभाग के एक पर्यवेक्षक थे, जो संभवतः काफी आदर करने वाले थे और मुझसे बात करते समय, उनके हर वाक्य में दो बार ‘सर’ आता था।

आज यह घटना अचानक क्यों याद आ गई, उसका कारण यही है कि वह दुकान, जहाँ से हमने सामान खरीदा वहाँ पर ही मैंने इस तरफ ध्यान दिया कि मेरा यह साथी जो हर वाक्य में दो बार ‘सर’ बोलता था, दुकान पर एक घंटा चर्चा करने के दौरान उसके मुंह से एक बार भी ‘सर’ नहीं निकला और इसके अलावा यदि ध्यान से दुकानदार से बातचीत के अंदाज को देखा जाए तो यही लगेगा कि वह साथी ही मेरे बॉस थे।

खैर अचानक मेरा यह ऑब्ज़र्वेशन मुझे आज याद आ गया, इस बदले अंदाज़ से यदि मेरे उस साथी को कोई लाभ हुआ तो वही जानता होगा, वैसे मैं बाद में सामान्यतः दूसरे विभागों के अपने समकक्ष या अपने से वरिष्ठ अधिकारियों के साथ ही गया और विक्रेता को अपनी स्थिति के बारे में ‘इम्प्रेस’ करने में मेरी कभी कोई रुचि नहीं रही, मुझे तो यही जल्दी रहती थी कि यह झमेला खत्म हो तो मैं कुछ समय शहर में घूम लूं।

खरीदारी की विशेषज्ञता तो मैं चाहता हूँ कि मेरी ऐसी ही बनी रहे-

हूँ बहुत नादान, करता हूँ ये नादानी

बेचकर खुशियां खरीदूं आंख का पानी,

हाथ खाली हैं मगर व्यापार करता हूँ।

आदमी हूँ आदमी से प्यार करता हूँ॥

 

नमस्कार।

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90. मेरे नाम से खत लिखती है तुमको मेरी तन्हाई!

पिछला ब्लॉग लिखने का जब खयाल आया था, तब मन में एक छवि थी, बाद में लिखता गया और वह मूल छवि जिससे लिखने का सोचा था भूल ही गया, तन्हाई का यही तो  मूल भाव है कि लोग अचानक भूल जाते हैं। वह बात अब कर लेता हूँ।

कुछ समय पहले प्रसिद्ध अभिनेता विनोद खन्ना का देहांत हो गया। बहुत से कलाकार हैं जो कुदरत ने हमसे छीन लिए हैं, जाना तो सभी को होता है, लेकिन एक बात कुछ अलग हुई थी विनोद खन्ना जी के मामले में। जैसा हम जानते हैं विनोद खन्ना जी ने फिल्म जगत में जिन ऊंचाइयों को प्राप्त किया था, वहाँ तक बहुत कम अभिनेता पहुंच पाते हैं। वे अमिताभ बच्चन जी के समकक्ष माने जाते थे। एक अत्यंत सफल फिल्मी हीरो थे और बाद में राजनीति में भी उन्होंने सक्रिय भूमिका निभाई।

कुछ दिन तक विनोद खन्ना जी खबरों से बाहर रहे और फिर एक दिन अचानक सोशल मीडिया में एक फोटो आई, उनकी मृत्यु से शायद एक-दो महीने पहले, एक कृशकाय व्यक्ति और यह सवाल किया गया कि क्या यह  विनोद खन्ना हैं। देखकर विश्वास ही नहीं हुआ, ऐसा लगा कि जिस तरह सोशल मीडिया पर बेसिर-पैर की बातें फैलाई जाती हैं, वैसा ही कुछ है। लेकिन फिर यह स्पष्ट हो गया कि वास्तव में विनोद खन्ना जी को कैंसर हुआ था और कुछ समय बाद उनकी मृत्यु भी हो गई।

उस समय सचमुच वो शेर याद आया था-

दश्त-ए-तन्हाई-ए-हिजरां में खड़ा सोचता हूँ

हाय क्या लोग मेरा साथ निभाने निकले।

लगभग 25-30 साल पहले दिल्ली में, साहित्य अकादमी में एक शायर से उनके कुछ शेर सुने थे ‘तन्हाई’ पर, शायद पाकिस्तानी शायर थे, दो शेर आज तक याद हैं (शायर कौन थे, मैं नहीं कह सकता),  शेर इस तरह हैं-

मैं तो खयालों की दुनिया में खुद को बहला लेता हूँ,

मेरे नाम से खत लिखती है, तुमको मेरी तन्हाई।

घर में मुकफ्फल करके उसको, मैं तो सफर पे निकला था,

रेल चली तो बैठी हुई थी, मेरे बराबर तन्हाई।

तन्हाई नाम का यह शत्रु, कोई छोटा-मोटा शत्रु नहीं है। इस शत्रु का सामना करने के लिए, जहाँ तक संभव हो, हम दिल से एक साथ हो जाएं तो इस शत्रु का अस्तित्व ही नहीं रहेगा, लेकिन इस बात को कहना आसान है, करना नहीं।

शायद तन्हाई से बचने का ही लोगों को सबसे अच्छा रास्ता यह लगता है कि वे एक पार्टी का झंडा थाम लेते हैं और दूसरी पार्टी को गालियां देने में अपनी पूरी प्रतिभा का इस्तेमाल करते हैं।

इस ब्लॉग के मामले में मैंने यह विकल्प नहीं चुना है। वैसे भी जो लोग यह सोचते हैं कि एक पार्टी दूध की धुली है और दूसरी को वे कौरव सेना मानते हैं उनको शायद कल्पना लोक में रहना ज्यादा अच्छा लगता है।

इस ब्लॉग के माध्यम से मैं उन ही नर्म-नाज़ुक दिलों का दरवाज़ा खटखटाना चाहता हूँ, जो मानवीय संवेदनाओं के लिए खुले हैं, बाकी निश्चिंत रहें उनको डिस्टर्ब करने का मेरा कोई इरादा नहीं है।

नमस्कार।

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89. हाय क्या लोग मेरा साथ निभाने निकले!

जीवन के जो अनुभव सिद्ध सिद्धांत हैं, वही अक्सर कविता अथवा शायरी में भी आते हैं, लेकिन ऐसा भी होता है कि कवि-शायर अक्सर खुश-फहमी में, बेखुदी में भी रहते हैं और शायद यही कारण है कि दिल टूटने का ज़िक्र शायरी में आता है या यह कहा जाता है-

मुझे तुमसे कुछ भी न चाहिए, मुझे मेरे हाल पे छोड़ दो!

अब हर समय व्यावहारिक बना रहे तो कवि-शायर क्या हुआ, सामान्य जीवन में, सभी लोग वैसे भी कहीं न कहीं धोखा खाते ही हैं और कुछ लोग जो ज्यादा भरोसा करने वाले होते हैं, वो खाते ही रहते हैं।

इसीलिए शायद कविवर रवींद्र नाथ ठाकुर ने लिखा था-

जदि तोर डाक सुनि केऊ ना आशे, तबे एकला चलो रे!

इसी बात को एक हिंदी फिल्मी गीत में बड़ी खूबसूरती से दोहराया गया है-

चल अकेला, चल अकेला, चल अकेला

तेरा मेला पीछे छूटा राही, चल अकेला’

हजारों मील लंबे रास्ते तुझको बुलाते

यहाँ दुखड़े सहने के वास्ते तुझको बुलाते,

यहाँ पूरा खेल अभी जीवन का, तूने कहाँ है खेला।

 

जगजीत सिंह जी की गाई एक गज़ल है, शायर शायद बहुत मशहूर नहीं हैं- अमजद इस्लाम ‘अमजद’, इस गज़ल में कुछ बहुत अच्छे शेर हैं जिनको जगजीत जी ने बड़े  खूबसूरत अंदाज़ में प्रस्तुत किया है-

चांद के साथ कई दर्द पुराने निकले

कितने गम थे जो तेरे गम के बहाने निकले,

फस्ल-ए-गुल आई है फिर आज असीराने वफा

अपने ही खून के दरिया में नहाने निकले,

दिल ने इक ईंट से तामीर किया ताजमहल

तूने इक बात कही, लाख फसाने निकले,

दश्त-ए-तन्हाई-ए-हिजरा में खड़ा सोचता हूँ

हाय क्या लोग मेरा साथ निभाने निकले।

आज यही भाव मन पर अचानक छा गया, बड़ा सुंदर कहा गया है इस गज़ल में, खास तौर पर आखिरी शेर में- अकेलेपन के जंगल में खड़ा हुआ मैं सोचता हूँ कि कैसे लोग थे जो मेरा साथ निभाने चले थे!

जीवन में जो बहुत से रंग-बिरंगे भावानुभव होते हैं, उनमें से यह भी एक है और यह काफी बार सामने आने वाला भाव है। और यह ऐसा भाव है जिसे मीना कुमारी जैसी महान कलाकार को भी भरपूर झेलना पड़ा है। उनके ही शब्दों मे आइए पढ़ते हैं-

चांद तनहा है आस्मां, तन्हा

दिल मिला है कहाँ कहाँ तन्हा।

बुझ गई आस, छुप गया तारा,

थरथराता रहा धुआं तन्हा।

                                                            ज़िंदगी क्या इसी को कहते हैं,

जिस्म तन्हा है और जां तन्हा।

हमसफर कोई गर मिले भी कहीं

दोनों चलते रहे कहाँ तन्हा।

                                                         जलती-बुझती सी रोशनी के परे,

सिमटा-सिमटा सा एक मकां तन्हा।

राह देखा करेगा सदियों तक,

छोड़ जाएंगे ये जहाँ तन्हा।

तन्हाई, अकेलापन, बेरुखी- ये तो सबको झेलने पड़ते हैं, लेकिन मीना कुमारी जी जैसा कोई महान कलाकार ही यह दावा कर सकता है कि ‘छोड़ जाएंगे ये जहाँ तन्हा’ ।

 

नमस्कार।

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