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107. ये बाज़ी हमने हारी है, सितारो तुम तो सो जाओ!

आज क़तील शिफाई जी की एक गज़ल याद आ रही है, क्या निराला अंदाज़ है बात कहने का! शायर महोदय, जिनकी नींद उड़ गई है परेशानियों के कारण, वो रात भर जागते हैं, आसमान की तरफ देखते रहते हैं और उनको लगता है कि सितारे भी उनके दुख में आज जाग रहे हैं, रोज तो सो जाते थे, दिखाई नहीं देते थे (सोने के बाद)।

लीजिए पहले इस गज़ल के शेर ही शेयर कर लेता हूँ-

परेशां रात सारी है, सितारो तुम तो सो जाओ,

सुकूत-ए-मर्ग ता’री है, सितारो तुम तो सो जाओ।

हमें भी नींद आ जाएगी, हम भी सो ही जाएंगे,

अभी कुछ बेक़रारी है, सितारो तुम तो सो जाओ।

हमें तो आज की शब पौ फटे तक जागना होगा,

यही क़िस्मत हमारी है, सितारो तुम तो सो जाओ।

तुम्हें क्या हम अगर लूटे गए राह-ए-मुहब्बत में,

ये बाज़ी हमने हारी है, सितारो तुम तो सो जाओ।

कहे जाते हो रो-रोकर हमारा हाल दुनिया से,

ये कैसी राज़दारी है, सितारो तुम तो सो जाओ।

अज्ञेय जी ने अपने उपन्यास ‘शेखर एक जीवनी’ में लिखा है, उसमें जो मुख्य पात्र है, क़ैदी है वह जेल की दीवारों पर कुछ बातें लिखता है, उनमें से ही एक है-

‘वेदना में शक्ति है, जो दृष्टि देती है, जो प्रेम करता है, वह स्वयं भले ही मुक्त न हो, यह प्रयास करता है कि जिससे वह प्रेम करता है, उसको मुक्त रखे’ (शब्द कुछ अलग होंगे, जैसा मुझे याद है, वैसा लिख दिया)।

श्री रमेश रंजक जी की गीत पंक्ति हैं, शायद पहले भी मैंने इनका उल्लेख किया हो-

दिन हमें जो तोड़ जाते हैं,

वो इकहरे आदमी से जोड़ जाते हैं।

पेट की पगडंडियों के जाल से आगे,

टूट जाते हैं जहाँ पर ग्लोब के धागे,

मनुजता की उस सतह पर छोड़ जाते हैं।

हम स्वयं संसार होकर, हम नहीं होते,

फूटते हैं रोशनी के इस क़दर सोते,

हर जगह से देह-पर्बत फोड़ जाते हैं।

इस गज़ल के बहाने फिर से दर्द की बात आ गई, ये ससुरी बिना बताए आ ही जाती है।

एक रूसी कहानीकार की कहानी याद आ रही है, शायद इसका भी उल्लेख मैंने पहले किया हो। एक तांगाचालक था, जिसका बेटा मर गया था। उसके बाद वह तांगा चलाता है, किसी न किसी बहाने से वह सवारियों को बेटे की मौत के बारे में बताना चाहता है। कोई नहीं सुनता, अंत में वह पूरी कहानी अपने घोड़े को सुनाता है और पूछता है, ‘तूने सुन ली न!’ और घोड़ा सिर हिलाता है।

आज की दर्द कथा, यहीं विश्राम लेती है!

नमस्कार

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106. मेरे क़ातिल ने कहीं जाम उछाले होंगे!

अभिव्यक्ति, कविता, शेर-ओ-शायरी, ये सब ऐसे काम नहीं है कि जब चाहा लिख लिया और उसमें गुणवत्ता भी बनी रहे।

दो शेर याद आ रहे हैं इस संदर्भ में-

हम पे दुखों के पर्बत टूटे, तब हमने दो-चार कहे,

उसपे भला क्या बीती होगी, जिसने शेर हजार कहे।

              (डॉ. बालस्वरूप राही)

एक अच्छा शेर कहके, मुझको ये महसूस हुआ,

बहुत दिनों के लिए फिर से मर गया हूँ मैं।

                    (डॉ. सूर्यभानु गुप्त)

सचमुच जब कोई रचनाकार कोई अच्छी रचना लिखता है, शेर तो उसकी सबसे छोटी, लेकिन अपने आप में मुकम्मल इकाई है, तो उसके बाद यह चुनौती उसके सामने होती है कि इससे ज्यादा अच्छी रचना अपने पाठकों/श्रोताओं के सामने रखे।

बहुत अधिक कष्ट और चुनौतियां होती हैं ईमानदारी से प्रभावी अभिव्यक्ति को अंजाम देने के लिए। असल में एक अच्छा सृजनशील रचनाकार, दिल से एक अच्छा प्रेमी होता है, जो अक्सर पूरी दुनिया से प्रेम करता है।

मैं बसाना चाहता हूँ, स्वर्ग धरती पर,

आदमी जिसमें रहे बस आदमी बनकर,

उस नगर की हर गली तैयार करता हूँ।

आदमी हूँ, आदमी से प्यार करता हूँ॥

वैसे किसी एक व्यक्ति अथवा शक्ति के प्रति अनन्य प्रेम भी अद्वितीय रचनाओं का आधार बन सकता है, लेकिन ऐसे उदाहरण बहुत कम और दिव्य होते हैं, जैसे तुलसीदास और उनके ईष्ट श्रीराम, सूरदास और उनके दुलारे श्याम मनोहर।

खैर हम लौकिक सृजन के बारे में ही, हल्की-फुल्की बातें करेंगे। एक गज़ल जो गुलाम अली जी ने गाई है, लेखक हैं परवेज़ जालंधरी,बड़े सुंदर बोल हैं और बड़ी कठिन शर्तें हैं चाहत की-

जिनके होठों पे हंसी, पांव में छाले होंगे,

हाँ वही लोग तेरे चाहने वाले होंगे।

शमा ले आए हैं हम, जल्वागह-ए-जाना से

अब दो आलम में उजाले ही उजाले होंगे।

मय बरसती है, फज़ाओं में नशा तारीं है,

मेरे क़ातिल ने कहीं जाम उछाले होंगे।

हम बड़े नाज़ से आए थे तेरी महफिल में,

क्या खबर थी, लब-ए-इज़हार पे ताले होंगे।

आज के लिए इतना ही काफी है, वैसे तो कहते हैं ना- हरि अनंत, हरिकथा अनंता, साहित्य के बारे में भी ये बात लागू होती है।

नमस्कार

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105. जय पद्मावती!

अब नया मुद्दा रानी पद्मावती का मिल गया है, जिस पर देश भर के घटिया लोग एकजुट हो जाएंगे, हो गए हैं।

मैंने पहले भी लिखा है कि अगर आज मुंशी प्रेमचंद जिंदा होते तो न जाने कितने मुक़द्मे झेल रहे होते।

सबसे बड़ी बात यह है कि आज आप कोई बदतमीज़ी करो, किसी सार्वजनिक रुचि के मुद्दे को लेकर तो मीडिया पर आपको भरपूर कवरेज मिल जाती है। इन बदतमीज बहरूपियों को पब्लिसिटी चाहिए, किसी भी तरह और मीडिया को हर रोज़ कोई सनसनीखेज स्टोरी चाहिए, वे लोग ये भी नहीं सोच पाते कि मुफ्त में मिल रही इस पब्लिसिटी के चक्कर में ये लोग सार्वजनिक संपत्ति को भी नुक़सान पहुंचाते हैं।

अब मामला क्या है, रानी पद्मावती को लेकर एक फिल्म बनाई है भंसाली जी ने, फिल्म की शूटिंग के दौरान वे पिट भी चुके हैं, इन बेशर्म लोगों के हाथ, जिनमें से एक उस समय काफी आया था टीवी चैनलों पर, ऐसा लगता है टीवी पर आने के लिए ही भरपूर मेकअप करके आया था। पूरा बहरूपिया लग रहा था। मैं इन दो कौड़ी के लोगों का नाम भी याद नहीं रखना चाहता।

अब फिल्म किसी ने देखी नहीं है और भंसाली जी ये कह चुके हैं कि फिल्म में ऐसा कुछ नहीं है जैसी आशंका जताई जा रही है।

अब अगर फिल्म में कुछ गलत है तो इसका फैसला कौन करेगा? क्या इसका फैसला सड़कों पर होगा? चुनाव भी होते रहते हैं कहीं न कहीं। ऐसे में राजनेता भी इन हुड़दंगियों के कारनामों के साथ जुड़ जाते हैं और उसको अपनी स्वीकृति दे देते हैं।

मुझे तो यही खयाल आता है कि रानी पद्मावती भी आज देखती होंगी तो उनको इस बात का अफसोस होगा कि कैसे घटिया लोग उनके नाम पर, अपना नाम चमका रहे हैं।

मेरे विचार में ऐसी परंपरा सुदृढ़ की जानी चाहिए, जिसमें समुचित संस्था/प्राधिकारी, किसी मामले में सही गलत का फैसला करें, जिसे सभी के द्वारा माना जाए और जो बेशऊर लोग, ऐसे मामलों पर उपद्रव करना चाहते हैं, उनके साथ शुरुआत होते ही कड़ाई से पेश आना चाहिए, जिससे सस्ती लोकप्रियता पाने के लिए ज्यादा लोग इस उपद्रव में शामिल न हो पाएं।

पब्लिसिटी का नशा ऐसा चढ़ा कि क्षत्राणियां भी इस युद्ध में कूद चुकी हैं, कई बार ऐसे विवादों को फिल्म की पब्लिसिटी के लिए भी बढ़ावा दिया जाता है, लेकिन मुझे नहीं लगता कि इसके लिए कोई मार खाने को भी तैयार हो जाएगा।

लेकिन ये हिंदुस्तान है, यहाँ कुछ भी हो सकता है।

नमस्कार

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104. शत्रु भैया के बहाने!

शत्रु भैया, याने शत्रुघ्न सिन्हा जी के बहाने बात कर लेते हैं आज। बहुत अच्छे अभिनेता रहे हैं, किसी समय इनकी मार्केट अमिताभ जी से ज्यादा थी, लेकिन जैसा वे कहते हैं कुछ गलत निर्णय और सब कुछ हाथ से निकल गया।

मैं, पटना के कदम कुआं में, शत्रु भैया के पड़ौस में तो होकर आया हूँ एक बार। एक बहुत श्रेष्ठ कवि हैं- सत्यनारायण जी, वे शत्रु भैया के पड़ौसी और बचपन के दोस्त भी हैं। शायद शत्रु जी की किसी फिल्म में उनके लिखे गीत भी शामिल किए गए हैं।

सत्यनारायण जी श्रेष्ठ कवि होने के अलावा श्रेष्ठ संचालक भी रहे हैं। मैंने उनका संचालन हिंदुस्तान कॉपर में सेवा करते हुए देखा था और उसके बाद एक बार एनटीपीसी विंध्यनगर में और एक बार एनटीपीसी ऊंचाहार में भी उनको बुलाया था। बहुत समय से उनसे संपर्क नहीं रहा, मेरी कामना है कि वे स्वस्थ हों।

बहरहाल विंध्यनगर वाले कवि सम्मेलन में जहाँ नीरज जी भी थे और उन्होंने भी सत्यनारायण जी की तारीफ की थी, वहीं ऊंचाहार के कवि सम्मेलन तक आते-आते महसूस हुआ कि अब सत्यनारायण जी के संचालन का नहीं अपितु डॉ. कुमार विश्वास के संचालन का समय आ गया है। दोनों में फर्क देखें तो कुछ वैसा ही है, जैसे दूरदर्शन और आधुनिक चैनलों में है, जहाँ न्यूज़ को ईवेंट बना दिया जाता है।

खैर मैं आज की बातचीत ‘छेनू’ जी याने शत्रु बाबू के बहाने कर रहा था। उन्होंने ढेर सारी फिल्मों में काम किया, बहुतों को खामोश किया, ‘बिहारी बाबू’ के नाम से उनको भारी ख्याति मिली, बाद में वे राजनीति में आए और बीजेपी के लिए स्टार- प्रचारक बने, केंद्र में मंत्री भी रहे।

लंबे अंतराल के बाद जब फिर से बीजेपी की सरकार आई तब तक, राजनीति में शत्रु भैया के सितारे बदल चुके थे, शायद उम्र भी उनके पद पाने में आड़े आ गई और किसी बड़े पद के बिना, पार्टी में पूरे मन से रहना शायद शत्रु भैया को ठीक नहीं लगा। नतीज़ा कि वे आज बीजेपी में ‘खलनायक’ की भूमिका निभा रहे हैं, पार्टी में हैं, लेकिन पार्टी के खिलाफ बोलने का कोई मौका नहीं छोड़ते। मेरा स्पष्ट मत है कि अगर आपको कोई पार्टी या संगठन पसंद है तो उसके साथ रहो, पसंद नहीं है तो अलग हो जाओ, ऐसा क्या कि वे भी बैठे हैं और पार्टी ने भी अपने भीतर एक ‘शत्रु’ को आदर के साथ बिठा रखा है।

खैर यही कारण है कि मैं आज की तारीख में शत्रु जी को राजनीति में एक खलनायक मानता हूँ। लेकिन मुझे लगता है कि शायद परिस्थितियां उनको इस स्थिति में ले आई हैं।

अभी इंडिया टुडे के प्रोग्राम ‘साहित्य आज तक’ में शत्रु जी के बारे में एक बात जानकर बहुत अच्छा लगा। शायद उन्होंने कोई किताब लिखी है, उसी के प्रसंग में मालूम हुआ कि वे बहुत भावुक हैं और गायक ‘मुकेश’ जी से उनको बहुत लगाव था। इतना कि मुकेश जी के अंतिम संस्कार में जाने के लिए वे घर से निकले, लेकिन आधे रास्ते से लौट गए, क्योंकि उनको लगा कि वे वहाँ अपने आपको नहीं संभाल पाएंगे।

जो व्यक्ति इतना भावुक है और विशेष रूप से मेरे प्रिय मुकेश जी से इतना प्यार करता, उसकी सौ कमियों को नजरअंदाज़ करते हुए मैं उसको सलाम करता हूँ।

 

नमस्कार।

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103. किसी का प्यार क्या तू, बेरुखी को तरसे!

आज धर्मेंद्र जी के बारे में बात करने का मन हो रहा है। वैसे कोई किसी का नाम ‘धर्मेंद्र’ बताए तो दूसरा पूछता इसके आगे क्या है, शर्मा, गुप्ता, वर्मा, क्या? मगर अभिनेता धर्मेंद्र के लिए इतना नाम ही पर्याप्त है।

वैसे उनके बेटों के नाम के साथ जुड़ता है- देओल, लेकिन धर्मेंद्र अपने आप में संपूर्ण हैं। बेशक एक सरल, महान और मेहनती कलाकार हैं। सफल फिल्मों की एक लंबी फेहरिस्त है उनके नाम। भारतीय रजत पट की ‘स्वप्न सुंदरी’ कही जाने वाली हेमा जी से विवाह किया उन्होंने, अपनी पारंपरिक पत्नी के अलावा, जो सनी और बॉबी देओल की मां हैं।

शुरू में जब धर्मेंद्र फिल्मों में आए थे, तब वे ‘ही मैन’ के रूप में जाने जाते थे, मेहनती कलाकार शुरू से हैं, धीरे-धीरे उनकी कला निखरती गई और उनकी एक से एक अत्यंत सफल फिल्में पर्दे पर आईं। धर्मेंद्र जी की कुछ प्रमुख फिल्में हैं- बंदिनी, सत्यकाम, काजल, शोले, आए दिन बहार के, फूल और पत्थर, अनुपमा, चंदन का पलना, मेरे हमदम मेरे दोस्त, आया सावन झूम के, मेरा नाम जोकर, शराफत, गुड्डी, मेर गांव मेरा देश, राजा जानी, सीता और गीता, यादों की बारात, चुपके चुपके आदि आदि।

फिल्म सत्यकाम में उनका अभिनय बहुत जोरदार था, इसी प्रकार शोले, मेरा नाम जोकर में, कुछ फिल्मों में उन्होंने जोरदार कॉमेडी भी की है जिनमें अमिताभ के साथ उनकी फिल्म ‘चुपके चुपके’ भी शामिल है।

आज अचानक धर्मेंद्र जी का खयाल क्यों आया यह बता दूं। आजकल एक विज्ञापन आता है किसी प्रोडक्ट का, जिसमें धर्मेंद्र जी आते हैं, वे कहते हैं- ‘मेरी तरह फिट रहना है, तो —— का इस्तेमाल करें। सचमुच समय बहुत बलवान है, धर्मेंद्र जी जो वास्तव में मर्दानगी की, जवानी की एक मिसाल हुआ करते थे, इस विज्ञापन में, बुढ़ापे की पहचान बने दिखाई देते हैं, और जिस अंदाज़ में वे इस विज्ञापन में दिखाई देते हैं, उसको देखकर थोड़ा झटका लगता है।

उनकी फिल्म सत्यकाम के एक गीत की अंतिम पंक्तियां याद आ रही हैं, जो इस तरह हैं-

आदमी है बंदर.. रोटी उठा के भागे
कपड़े चुरा के भागे, कहलाये वो सिकंदर
बंदर, आदमी है बंदर..

आदमी है चरखा.. छू छू हमेशा बोले
चूं चूं हमेशा डोले, रुकते कभी ना देखा..
आदमी है चरखा..
बंदर नहीं है, चरखा नहीं है, आदमी का क्या कहना
प्यार मोहबत फितरत उसकी दोस्ती मज़हब उसका
दोस्ती है क्या बोलो दोस्ती है क्या

दोस्ती है लस्सी—-

दोस्ती है रस्सी—–

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लस्सी नहीं है, रस्सी नहीं है

दोस्ती दिल की धड़कंन,

दुश्मनी है सहरा सहरा तो

दोस्ती गुलशन-गुलशन।

एक और गीत, जो धर्मेंद्र जी के नाम से याद आता है, वो है-

मेरे दुश्मन तू मेरी दोस्ती को तरसे

मुझे गम देने वाली, तू खुशी को तरसे।

तू फूल बने पतझड़ का, तुझ पे बहार न आए कभी,

मेरी ही तरह तू तरसे, तुझको क़रार न आए कभी।

जिये तू इस तरह कि, ज़िंदगी को तरसे।

तेरे गुलशन से ज्यादा, वीरान कोई वीराना न हो,

इस दुनिया में कोई तेरा, अपना तो क्या बेगाना न हो,

किसी का प्यार क्या तू, बेरुखी को तरसे!

खैर इस विज्ञापन के बहाने ही, इस महान कलाकार और सरल हृदय इंसान की याद आई, मैं उनके स्वस्थ और दीर्घ जीवन की कामना करता हूँ।

 

नमस्कार।

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102. फिर ख़्वाब अगर हो जाओ तो क्या !

एक गज़ल है उबेदुल्लाह अलीम जी की, गुलाम अली जी ने डूबकर गाई है जो बहुत बार सुनी है, बहुत अच्छी लगती है। कुल मिलाकर धार्मिक अंदाज़ में, इसको भी जीवन की नश्वरता से जोड़ा जा सकता है, लेकिन यह कि इस ज़िंदगी को, जो वैसे भी अकेलेपन में, नीरस तरीके से गुज़र ही जानी है, अगर हम एक-दूसरे से प्रेम करें, साथ दें, तो जहाँ तक हो सके, इसे मधुर और रंगीन बना सकते हैं।

आज बस ये गज़ल शेयर कर रहा हूँ-

कुछ दिन तो बसो मेरी आँखों में

फिर ख़्वाब अगर हो जाओ तो क्या।  

कोई रंग तो दो मेरे चेहरे को

फिर ज़ख़्म अगर महकाओ तो क्या।  

जब हम ही महके फिर साहब

तुम बाद-ए-सबा कहलाओ तो क्या

इक आइना था सो टूट गया

अब ख़ुद से अगर शरमाओ तो क्या

तुम आस बंधाने वाले थे

अब तुम भी हमें ठुकराओ तो क्या

दुनिया भी वही और तुम भी वही

फिर तुम से आस लगाओ तो क्या

मैं तन्हा था मैं तन्हा हूँ

तुम आओ तो क्या आओ तो क्या

जब देखने वाला कोई नहीं

बुझ जाओ तो क्या गहनाओ तो क्या

अब वहम है ये दुनिया इस में

कुछ खोओ तो क्या और पाओ तो क्या।  

है यूँ भी ज़ियाँ और यूँ भी ज़ियाँ

जी जाओ तो क्या मर जाओ तो क्या

 

 

नमस्कार।

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101. आईना हमें देख के हैरान सा क्यों है!

एक हिंदी फिल्म आई थी गमन, जिसमें ‘शहरयार’  की एक गज़ल का बहुत खूबसूरत इस्तेमाल किया गया था। वैसे यह  गज़ल, आजकल की भागदौड़ भरी ज़िंदगी की घुटन, कुंठाओं आदि का बहुत सुंदर चित्रण करती है। इंसान को भीतर ही भीतर मारने वाली ऐसी परेशानियां, शहर जिनका प्रतीक बन गया है! शहर जहाँ हर कोई दौड़ रहा है, एक अंधी दौड़ में, बहुत सी बार यह भी नहीं पता होता कि कहाँ पहुंचना है, कहाँ  जाकर रुकना है।

अब उस गज़ल को ही शेयर कर लेता हूँ, फिर आगे बात करेंगे-

सीने में जलन, आंखों में तूफान सा क्यों है,

इस शहर में हर शख्स परेशान सा क्यों है।

दिल है तो धड़कने का बहाना कोई ढ़ूंढें,

पत्थर की तरह बेहिस-ओ-बेजान सा क्यों है।

तनहाई की ये कौन सी मंज़िल है रफीकों,

ता-हद-ए नज़र एक बियाबान सा क्यों है।

क्या कोई नई बात नज़र आती है हम में,

आईना हमें देख के हैरान सा क्यों है।

ये सब नेमतें हैं, आज के आधुनिक जीवन की, शहरी जीवन की, जिसमें हम लगातार एक दौड़ में शामिल हैं, भीड़ के बीच में हर व्यक्ति अकेला है। किसी के शेर हैं न-

ज़िंदगी की राहों में, रंज़-ओ-गम के मेले हैं,

भीड़ है क़यामत की, फिर भी हम अकेले हैं।

आइने के सौ टुकड़े करके हमने देखा है,

एक में भी तनहा थे, सौ में भी अकेले हैं।

ये हालात हैं, ये सच्चाइयां आज की ज़िंदगी की, ऐसे में कोई सहारा पाने के लिए, कोई सार्थकता तलाश करने के लिए, कितनी भारी संख्या में लोग बाबाओं के पीछे लग जाते हैं, वे इतने लीन हो जाते हैं अपने इस नए अवतार में, कि अगर आपको रेल या बस में मिल जाएं, तो उनका प्रयास रहता है कि लगे हाथ आपका भी कल्याण कर दिया जाए। वो आपको ऐसी ज्ञानवर्द्धक कहानियां सुनाने लगते हैं, कि उसके बाद भी यदि आपका उद्धार न हो, तो समझिए कि आपके पापों का बोझ ही शायद बहुत अधिक है, जो उनकी संगत में आने पर भी आपको सुधरने नहीं दे रहा है।

कुछ लोग राजनैतिक झंडा उठा लेते हैं, उनको लगता है कि उनका नेता ही इस देश में क्रांति लेकर आएगा। किसी का एक नेता में अपरंपार प्रेम होता है तो किसी के मन में किसी एक के प्रति असीम नफरत है।

कुछ लोग अपने जीवन को सार्थक बनाने के लिए धर्म की रक्षा में लग जाते हैं और वे जानते हैं कि धर्म की रक्षा के रास्ते में इंसानों की औकात क्या है, उनको तो एक इशारे पर मिटाया जा सकता है।

दिक्कत यही है कि जो लोग इन सन्मार्गों पर नहीं भटके हैं, वे परेशान रहते हैं, उनको अपने जीवन में कोई सार्थक(?) उद्देश्य नहीं मिल पाता।

मेरी संवेदना और सहानुभूति सदैव उस अकेले व्यक्ति के साथ हैं-

हजारों मील लंबे रास्ते तुझको बुलाते,

यहाँ दुखड़े सहने के वास्ते तुझको बुलाते,

है कौन सा वो इंसान यहाँ पर, जिसने दुःख न झेला।

 

नमस्कार।

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100. जीवन और उसका प्रमाण पत्र!

आज जबकि मेरे ब्लॉग लेखन का शतक बन रहा है, नवंबर का महीना चल रहा है, जबकि सेवानिवृत्त लोगों को अपना ज़िंदा होने का प्रमाण जुटाना जरूरी होता है। आप ज़िंदा हैं इतना काफी नहीं होता, किसी ने कहा है न-

जो ज़िंदा हो, तो फिर ज़िंदा नज़र आना ज़रूरी है

और नज़र भी किसको आना, ‘सिस्टम’ को, जिसको बिना मतलब के कुछ भी नज़र नहीं आता।

प्रधान मंत्री जी ने कहा था कि हर वर्ष यह जीवन प्रमाण, प्रमाणित करके भेजे जाने की परंपरा बंद कर दी गई है, स्वतः प्रमाणन से ही काम चल जाएगा, लेकिन सिस्टम बहुत चालाक है, उन्होंने ‘जीवन प्रमाण पत्र’ का नाम बदलकर ‘सर्वाइवल सर्टिफिकेट’ कर दिया, लेकिन अभी भी वही प्रमाणित कराने की आवश्यकता है।

मोबाइल में कोई सिस्टम है, सीधे प्रमाण पत्र भेजने का, लेकिन वह कौन से मोबाइल में, किस तरह से काम करता है भगवान जाने! और वैसे भी ‘सिस्टम’ की इसमें रुचि नहीं है कि लोग इस तरीके का इस्तेमाल करें। वह तो रिटायर्ड लोगों को जीवन प्रमाण पत्र भेजने के लिए लाइन में लगे ही देखना चाहता है।

अपना जीवन प्रमाणित कराते-कराते हर साल कुछ सेवा निवृत्त साथी वहाँ भी पहुंच जाते हैं, जिसके बाद किसी और प्रमाण पत्र की आवश्यकता होती है!

इसी पर याद आया कि एनटीपीसी ऊंचाहार, जहाँ मेरे सेवाकाल का अंतिम पड़ाव था, सात वर्ष का, वहाँ भयंकर हादसा हुआ, बॉयलर फटने का। शायद 32 लोगों की मृत्यु हो चुकी थी, अंतिम खबर मिलने तक और काफी बड़ी संख्या में लोग घायल हैं।

एनटीपीसी एक उत्कृष्ट निष्पादन करने वाला संस्थान है, इस दुर्घटना के पीछे अगर कोई  लापरवाही थी तो निश्चित रूप में वह जांच में सामने आएगा और संबंधित व्यक्तियों के विरुद्ध कार्रवाई होगी, लेकिन इस प्रकार के दुर्भाग्यपूर्ण हादसे निश्चित रूप से एक बार के लिए तो आत्मविश्वास को हिलाकर रख देते हैं।

ऐसे में गैर ज़िम्मेदार पत्रकारिता, आग में घी का काम करती है। आज हर कोई वहाँ टूरिज़्म के लिए जा रहा है, राजनीतिज्ञ तो खैर हैं ही, ज़िम्मेदार चैनलों के पत्रकार अपेक्षाकृत अधिक ज़िम्मेदारी के साथ रिपोर्टिंग करते हैं, लेकिन कुछ ऐसे टटपूंजिए पत्रकार हैं, कोई न जिनके चैनल को जानता है, न उनको! लेकिन क्योंकि वे इस खबर को ‘कवर’ कर रहे हैं, इसलिए लोग देखते हैं। तो ये महाशय तुरंत ‘इंक्वायरी’ करके तुरंत उसके निष्कर्ष भी प्रस्तुत कर देते हैं। ऐसे में वास्तव में लगता है कि कुछ ‘स्टैंडर्ड’ तो इन पत्रकार बंधुओं के लिए भी तैयार किए जाने चाहिएं।

आज के लिए इतना ही,

 

नमस्कार।

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99. जार्जेट के पल्ले सी, दोपहर नवंबर की!

बहुत बार लोग कविता लिखते हैं मौसम पर, कुछ कविताएं बहुत अच्छी भी लिखी जाती हैं। तुलसीदास जी ने, जब रामचंद्र जी, माता सीता की खोज में लगे थे, उस समय ऋतुओं के बदलने का बहुत सुंदर वर्णन किया है। पूरा मनोविज्ञान भरा है उस भाग में, जहाँ वे वर्षा में छोटे नदी-नालों के उफन जाने का वर्णन करते हैं- ‘थोरे में जनु खल इतराहीं’ और वर्षा के बाद ‘वर्षा गई शरद ऋतु आई। वह सब हमारी धरोहर है।

जैसा मैंने कहा, मौसम पर तो बहुत सी कविताएं लिखी गई हैं, डॉ. धर्मवीर भारती की एक कविता है, जो मौसम की कह सकते हैं, परंतु इसमें मौसम को एक महीने के बहाने से व्यक्त किया गया है। और यह महीना अभी शुरू हुआ है। वैसे यह मौसम भी भीतर का है। नवंबर का महीना, जब दोपहर की धूप अच्छी लगने लगती है, हिंदुस्तान में, खासकर उन इलाकों में, जहाँ गर्मी बहुत पड़्ती है।

यह अलग तरह की कविता है, जैसे कोई कविता किसी एक भाव से भरपूर होती है, ये मांसलता से भरपूर है, वैसे वह भी कविता का एक भाग है।

आज यही कविता शेयर करने का मन है, लीजिए प्रस्तुत है-

अपने हलके-फुलके उड़ते स्पर्शों से मुझको छू जाती है
जार्जेट के पीले पल्ले-सी यह दोपहर नवम्बर की !

आयी गयी ऋतुएँ पर वर्षों से ऐसी दोपहर नहीं आयी
जो क्वाँरेपन के कच्चे छल्ले-सी
इस मन की उँगली पर
कस जाये और फिर कसी ही रहे
नित प्रति बसी ही रहे, आँखों, बातों में, गीतों में
आलिंगन में घायल फूलों की माला-सी
वक्षों के बीच कसमसी ही रहे

भीगे केशों में उलझे होंगे थके पंख
सोने के हंसों-सी धूप यह नवम्बर की
उस आँगन में भी उतरी होगी
सीपी के ढालों पर केसर की लहरों-सी
गोरे कंधों पर फिसली होगी बन आहट
गदराहट बन-बन ढली होगी अंगों में

आज इस वेला में
दर्द ने मुझको
और दोपहर ने तुमको
तनिक और भी पका दिया
शायद यही तिल-तिल कर पकना रह जायेगा
साँझ हुए हंसों-सी दोपहर पाँखें फैला
नीले कोहरे की झीलों में उड़ जायेगी
यह है अनजान दूर गाँवों से आयी हुई
रेल के किनारे की पगडण्डी
कुछ क्षण संग दौड़-दौड़
अकस्मात् नीले खेतों में मुड़ जायेगी।

एक अलग तरह की कविता है, जिसमें भीतर के और बाहर के मौसम को, एक महीने ‘नवंबर की दोपहर’ के बहाने व्यक्त किया गया है। अब इसके बारे में अलग से तो कुछ कहने की ज़रूरत नहीं है। कविता जितना बोलती है उतना मैं कहाँ बोल पाऊंगा।

नमस्कार।

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