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132. मुबारक़ हो नया साल!

कुछ दिन से अपनी पुरानी कुछ कविताएं शेयर कर रहा हूँ, ऐसी कविताएं जिन्हें पहले कहीं सुनाया, दिखाया या छपवाया नहीं। ये स्टॉक अभी खत्म नहीं हुआ, आगे भी जारी रहेगा, लेकिन इस बीच ये नया साल भी तो आ गया न!

तो आज साबिर दत्त जी की ये रचना, जिसे जगजीत सिंह जी ने गाया है, इसको शेयर करते हुए सभी को नए साल की शुभकामनाएं देता हूँ। आशा है कि इसमें जो बातें व्यंग्य के लहज़े में कही गई हैं, वे मेरे देश और दुनिया में, वास्तविक रूप में घटित होंगी-

इक बिरहमन ने कहा है कि ये साल अच्छा है।

ज़ुल्म की रात बहुत जल्द टलेगी अब तो

आग चूल्हों में हर इक रोज़ जलेगी अब तो,

भूख के मारे कोई बच्चा नहीं रोएगा

चैन की नींद हर एक शख़्स यहाँ सोएगा,

आँधी नफ़रत की चलेगी न कहीं अब के बरस

प्यार की फ़स्ल उगाएगी ज़मीं अब के बरस

है यक़ीं अब न कोई शोर-शराबा होगा

ज़ुल्म होगा न कहीं ख़ून-ख़राबा होगा

ओस और धूप के सदमे न सहेगा कोई

अब मेरे देश में बेघर न रहेगा कोई

नए वादों का जो डाला है वो जाल अच्छा है

रहनुमाओं ने कहा है कि ये साल अच्छा है

दिल के ख़ुश रखने को ग़ालिब ये ख़याल अच्छा है!

पुनः आप सभी को नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं।

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131. जवां रहो!

अब जब पुरानी कविताएं शेयर करने का सिलसिला चल निकला है तो लीजिए, मेरी एक और पुरानी कविता प्रस्तुत है-

सपनों के झूले में

झूलने का नाम है- बचपन,

तब तक-जब तक कि

इन सपनों की पैमाइश

जमीन के टुकड़ों,

इमारत की लागत

और बैंक खाते की सेहत से न आंकी जाए।

जवान होने का मतलब है

दोस्तों के बीच होना

ठहाकों की तपिश से

माहौल को गरमाना,

और भविष्य के प्रति

अक्सर लापरवाह होना।

बूढ़ा होने का मतलब है-

अकेले होना,

जब तक कोई, दोस्तों की

चहकती-चिलकती धूप में है,

तब तक वह बूढ़ा कैसे हो सकता है।

काश यह हर किसी के हाथ में होता

कि वह-

जब चाहे बच्चा, जब चाहे जवान बना रहता,

और बूढ़ा होना, मन से-

यह तो विकल्पों में

शामिल ही नहीं है।

                                               (श्रीकृष्ण शर्मा)  

नमस्कार।

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130. बचपन

मेरी कुछ पुरानी कविताओं को शेयर करने के क्रम में, प्रस्तुत है आज की कविता-

बचपन

बचपन के बारे में,

आपके मन में भी कुछ सपनीले खयालात होंगे,

है भी ठीक, अपने आदर्श रूप में- बचपन

एक सुनहरा सपना है,

जो बीत जाने के बाद, बार-बार याद आता है।

कोशिश रहती है हमारी, कि हमारे बच्चे-

हक़ीकत को जानें अवश्य,

पर उसके कड़ुए दंश से घायल न हों।

वे ये तो जानें कि जमीन पथरीली है,

पर उससे उनके नाज़ुक पैर न छिलें,

कोशिश तो यहाँ तक होती है कि उनके पांव

जहाँ तक संभव हो-

पथरीली जमीन को छुएं भी नहीं।

खिलौनों, बादलों, खुले आसमान

और परीलोक को ही वे, अपनी दुनिया मानते रहें।

सचमुच कितने भाग्यशाली हैं ये बच्चे-

यह खयाल तब आता है, जब-

कोई दुधमुहा बच्चा, चाय की दुकान में

कप-प्लेट साफ करता है।

दुकान में चाय-नाश्ता बांटते समय

जब कुछ टूट जाता है उससे, तब

ग्राहक या दुकानदार, पूरी ताकत से

उसके गाल पर, अपनी घृणा के हस्ताक्षर करता है।

सपनों की दुनिया से अनजान ये बच्चे,

जब कहीं काम या भीख मांगते दिखते हैं,

तब आता है खयाल मन में-

कि ये बच्चे, देश का भविष्य हैं!

अपनी पूरी ताकत से कोई छोटा बच्चा

जब रिक्शा के पैडल मारता है,

तब कितनी करुणा से देखते हैं उसको आप!

हम बंटे रहें-

जातियों, संप्रदायों, देशों और प्रदेशों में,

पर क्या कोई ऐसी सूरत नहीं कि

बच्चों को हम, बच्चों की तरह देखें।

कोशिश करें कि ये नौनिहाल-

स्वप्न देखने की अवधि, तालीम की उम्र

ठीक से गुज़ारें

और उसके बाद, ज़िंदगी की लड़ाई में

अपने बलबूते पर, प्रतिभा के दम पर

शामिल हों।

क्या हम सब रच सकते हैं

इस निहायत ज़रूरी सपने को-

अपने परिवेश में!

                                                            (श्रीकृष्ण शर्मा)  

 

नमस्कार।

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129. मन के सुर राग में बंधें!

पुरानी कविताएं, जिनको मैंने उस समय फाइनल नहीं माना यानी ‘पास्ट इंपर्फेक्ट’ कविताओं में से,

एक कविता आज प्रस्तुत है-

मुझमें तुम गीत बन रहो

मुझमें तुम गीत बन रहो,

मन के सुर राग में बंधें।

वासंती सारे सपने

पर यथार्थ तेज धूप है,

मन की ऊंची उड़ान है

नियति किंतु अति कुरूप है,

साथ-साथ तुम अगर चलो,

घुंघरू से पांव में बंधें।

मरुथल-मरुथल भटक रही

प्यासों की तृप्ति कामना,

नियमों के जाल में बंधी

मन की उन्मुक्त भावना,

स्वाति बूंद सदृश तुम बनो

चातक मन पाश में बंधे।

जीवन के ओर-छोर तक

सजी हुई सांप-सीढ़ियां,

डगमग हैं अपने तो पांव

सहज चलीं नई पीढ़ियां।

पीढ़ी की सीढ़ी उतरें,

नूतन अनुराग में बंधें।

यौवन उद्दाम ले चलें,

मन का बूढ़ापन त्यागें,

गीतों का संबल लेकर

एक नए युग में जागें।

तुम यदि संजीवनी बनो

गीत नव-सुहाग में बंधें।

                                      (श्रीकृष्ण शर्मा) 

नमस्कार।

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128. पेड़!

किसी ज़माने में कविताएं लिखने का बहुत चाव था। उस समय जो कविताएं किसी हद तक ‘परफेक्ट’ लगती थीं उनको मित्रों के बीच, गोष्ठियों में पढ़ देता था। बहुत सी पांडुलिपियां ऐसी होती थीं जिनको लेकर तसल्ली नहीं होती थी।

ऐसी ही कुछ कागज़ पर सुरक्षित कविताएं, जिनको मैंने उस समय फाइनल नहीं माना और बाद में उनको फाइनल रूप देने का समय नहीं मिला, आज की तारीख में सोचता हूँ कि उनको ‘जैसी हैं, जहाँ हैं, वैसी शेयर कर लेता हूँ।

एक कविता आज प्रस्तुत है-

पेड़

पेड़ हमारी आस्थाओं का प्रतिफलन है,

पेड़ बनने के लिए ज़रूरी है

कि पहले हम ऐसा बीज हों-

जिसे धरती स्वीकार करे,

फिर धरती में रचे-बसे

रसों-स्वादों, मूल रसायनों से भी

हमारा तालमेल हो,

तभी हम धरती का सीना चीरकर

अपना नाज़ुक सिर, शान से उठा सकेंगे।

फिर यहाँ की  आब-ओ-हवा, गर्द-ओ-गुबार

धूप और बरसात, जब सहन करेंगे

और दूसरों की इनसे रक्षा करेंगे,

तभी कहला सकेंगे- पेड़,

यह सब यदि संभव नहीं-

तो फिर शान से इंसान बने रहो,

जी भरकर नफरत करो दूसरों से,

और करो ऐसे काम, कि वे भी

आपसे नफरत करें।

कुदरत, सभ्यता, शिष्टता, नागरिकता के

जितने भी मापदंड हैं, नियम हैं

उन्हें शान से तोड़ो,

क्योंकि इंसान होने के लिए

सिर्फ इंसान जैसा दिखना ज़रूरी है।

उसके बाद तो इंसान सबसे ऊपर है,

अपनी पहचान रोज़ तोड़ता है-

फिर भी इंसान ही कहलाता है।

क्या ही अच्छा होता अगर

इंसान का भी, धरती से

ऐसा ही रिश्ता होता-

जैसा पेड़ का होता है।

तब यह दुनिया, बाहर से भी हरी-भरी होती

और भीतर से भी!

नमस्कार।

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127. बुझी हुई बाती सुलगाएं!

अब हम फिर से एक वर्ष के आखिरी मुहाने पर हैं, जैसे कोई किसी किताब के पन्ने पलटता है, लगभग 300-350 शब्द हो जाने के बाद, वैसे ही 365 दिन के बाद, हमारे जीवन की किताब में एक और पन्ना पलट जाता है, सफर में एक और स्टेशन पीछे छूट जाता है।

अभी क्रिसमस का त्यौहार आया, जिसे दुनिया भर में मनाया जाता है और उसी दिन हमारे पूर्व प्रधान मंत्री- श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी का जन्मदिन भी। ईश्वर उनको लंबी उम्र दे, उनकी कुछ काव्य-पंक्तियां यहाँ दे रहा हूँ-

आओ फिर से दिया जलाएं

भरी दुपहरी में अंधियारा, सूरज परछाई से हारा,

अंतरतम का नेह निचोड़ें, बुझी हुई बाती सुलगाएं।

आओ फिर से दिया जलाएं।

उनकी एक और कविता की कुछ पंक्तियां हैं, जो आज की परिस्थितियों का बहुत सुंदर वर्णन करती हैं-

हर पंचायत में पांचाली अपमानित है,

कौरव कौन, कौन पांडव, टेढ़ा सवाल है,

दोनो ओर शकुनि का फैला कूटजाल है,

धर्मराज ने छोड़ी नहीं जुए की लत है,

हर पंचायत में पांचाली अपमानित है।

बिना कृष्ण के आज महाभारत होना है,

कोई राजा बने, रंक को तो रोना है।

अटल जी की इन सुंदर पंक्तियों के बाद, फिर से इसी बात पर आते हैं, कि ज़िंदगी के सफर में मील का एक और पत्थर पार होने को है। कुछ दिनों तक समाचारों में बीत रहे वर्ष की प्रमुख घटनाएं, उपलब्धियां आदि छाई रहेंगी।

ओम प्रभाकर जी का एक बड़ा सुंदर गीत है, जो यात्रा के इस पड़ाव पर याद आ रहा है-

यात्रा के बाद भी, पथ साथ रहते हैं।

हमारे साथ रहते हैं।

खेत, खंबे, तार

सहसा टूट जाते हैं,

हमारे साथ के सब लोग

हमसे छूट जाते हैं।

मगर फिर भी

हमारी पीठ, गर्दन, बांह को छूते

गरम दो हाथ रहते हैं।

यात्रा के बाद भी, पथ साथ रहते हैं।।

घर पहुंचकर भी न होतीं

खत्म यात्राएं,

गूंजती हैं सीटियां

अब हम कहाँ जाएं,

जहाँ जाएं, वहीं

सूखे, झुके मुख-माथ रहते हैं।

यात्रा के बाद भी, पथ साथ रहते हैं।

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार।

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126. कहती टूटी दीवट, सुन री उखड़ी देहरी!

आज एक खबर कहीं पढ़ी कि उत्तराखंड के किसी गांव में केवल बूढ़े लोग रह गए हैं, विशेष रूप से महिलाएं, जवान लोग रोज़गार के लिए शहरों को पलायन कर गए हैं।

वैसे यह खबर नहीं, प्रक्रिया है, जो न जाने कब से चल रही है, गांव से शहरों की ओर तथा नगरों, महानगरों से विदेशों की तरफ! जहाँ गांव में बूढ़े लोग हैं, लेकिन जैसा भी हो, उनका समाज है वहाँ पर, शहरों में बहुत से बूढ़े लोग फ्लैट्स में अकेले पड़े हैं, जिनका कोई सामाजिक ताना-बाना भी नहीं है, ऐसे में कृत्रिम ताना-बाना भी बनाया जाता है, जैसे ‘ओल्ड एज होम’, लॉफिंग क्लब आदि, ये जहाँ काम दें, अच्छा ही है। वरना बहुत सी बार कोई मर जाता है, तब पता चलता कि वह अकेला रह रहा था।

मेरे एक वरिष्ठ मित्र थे- श्री रमेश शर्मा जी, जिन्होंने ग्रामीण परिवेश पर कुछ बहुत सुंदर गीत लिखे हैं। उनकी दो पंक्तियां याद आ रही हैं-

ना वे रथवान रहे, ना वे बूढ़े प्रहरी,

कहती टूटी दीवट, सुन री उखड़ी देहरी।

मैंने भी बहुत पहले, निर्जन होते जा रहे गांवों को लेकर एक कविता लिखी थी-

गांव के घर से

बेखौफ चले आइए

यहाँ अभी भी कुछ लोग हैं।  

घर की दीवारों पर जो स्वास्तिक चिह्न बने हैं,

इन्हीं पर कई बार टूटी हैं चूड़ियां,

टकराए हैं माथे।

कभी यह एक जीवंत गांव था,

लेकिन आज, हर जीवित गंध- एक स्मारक है,

जमीन का हर टुकड़ा, लोगों की गर्दन पर गंडासा है।

धुएं का आकाश रचती चिमनियां, और यंत्र संगीत,

न जाने कहाँ उड़ा ले गया- उन गंध पूरित लोगों को।

 एक, शहर में- सही गलत का वकील है,

पड़ौस को उससे बड़ी उम्मीदें हैं।

                        (श्रीकृष्ण शर्मा)  

वीरान होते गांवों को लेकर अपनी यह पुरानी कविता मुझे याद आई, कहीं लिखकर नहीं रखी है और यहाँ प्रस्तुत करते समय, कहीं-कहीं से रिपेयर करनी पड़ी।

आखिर में पंकज उदास का गाया एक गीत याद आ रहा है, कमाई के लिए घर से दूर, विदेशों में अकेले रहने वालों को लेकर यह बहुत सुंदर गीत है, इसकी कुछ पंक्तियां ही यहाँ शेयर करूंगा-

चिट्ठी आई है, आई है चिट्ठी आई है।

बहुत दिनों के बाद, हम बे-वतनों को याद,

वतन की मिट्टी आई है।

वैसे तो इस गीत का हर शब्द मार्मिक है, मैं केवल अंतिम छंद यहाँ दे रहा हूँ-

पहले जब तू ख़त लिखता था, कागज़ में चेहरा दिखता था,

बंद हुआ ये मेल भी अब तो, खत्म हुआ ये खेल भी अब तो,

डोली में जब बैठी बहना, रस्ता देख रहे थे नैना,

मैं तो बाप हूँ मेरा क्या है, तेरी मां का हाल बुरा है,

तेरी बीवी करती है सेवा, सूरत से लगती है बेवा,

तूने पैसा बहुत कमाया, इस पैसे ने देश छुड़ाया,

पंछी पिंजरा तोड़ के आजा, देश पराया छोड़ के आजा,

आजा उमर बहुत है छोटी, अपने घर में भी है रोटी।

चिट्ठी आई है, आई है चिट्ठी आई है।

ये गीत उन लोगों के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, जो जैसे-तैसे काम-धंधे के लिए चले तो जाते हैं, लेकिन जब चाहें तब घर मिलने के लिए नहीं आ सकते।

अब इसके बाद क्या कहूं!

नमस्कार।

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125. जैसी अब है तेरी महफ़िल कभी ऐसी तो न थी!

आज बहादुर शाह ज़फर जी की एक गज़ल शेयर करने का मन हो रहा है।

अभिव्यक्ति की दुनिया में हम सब एक-दूसरे से जुड़े हैं। कुछ लोग सामान्य जीवन में ही स्वयं को पर्याप्त रूप से अभिव्यक्त करते रहते हैं। कुछ उसके अलावा कला के विभिन्न उपादानों का सहारा लेकर- कविता, पेंटिंग, अभिनय, नाटक-फिल्म आदि के माध्यम से खुद को अभिव्यक्त करते हैं।

आज सोशल मीडिया भी अभिव्यक्ति का एक बड़ा साधन बन गया है, जिसमें अभिव्यक्ति का ऐसा अवसर मिला है कि बड़ी संख्या में लोग जानते ही नहीं कि इस साधन का क्या करें! वास्तव में इन साधनों का जितना सदुपयोग होता है, शायद उतना ही आज दुरुपयोग होता है।

खैर, इन सब बातों को छोड़ते हुए, ज़फर साहब की इस गज़ल पर ध्यान देते हैं, जिसमें यह बताया गया है, कि जब इंसान, कहीं भी जब खुद को ठीक से अभिव्यक्त नहीं कर पाता, तब उसकी पीड़ा कैसी होती है। एक-दो शेर जो ज्यादा कठिन थे, वो मैंने छोड़ दिए हैं।

प्रस्तुत है बहादुर शाह ज़फर साहब की ये गज़ल-

बात करनी मुझे मुश्किल कभी ऐसी तो थी

जैसी अब है तेरी महफ़िल कभी ऐसी तो न थी।

ले गया छीन के कौन आज तेरा सब्र ओ क़रार

बे-क़रारी तुझे ऐ दिल कभी ऐसी तो न थी ।

उसकी आँखों ने ख़ुदा जाने किया क्या जादू

कि तबीयत मेरी माइल कभी ऐसी तो न थी।

अब की जो राह-ए-मोहब्बत में उठाई तकलीफ़

सख़्त होती हमें मंज़िल कभी ऐसी तो थी।

निगह-ए-यार को अब क्यूँ है तग़ाफ़ुल दिल

वो तेरे हाल से ग़ाफ़िल कभी ऐसी तो थी

चश्म-ए-क़ातिल मेरी दुश्मन थी हमेशा लेकिन

जैसी अब हो गई क़ातिल कभी ऐसी तो न थी।

क्या सबब तू जो बिगड़ता है ‘ज़फ़र’ से हर बार

ख़ू तिरी हूर-शमाइल कभी ऐसी तो न थी।

नमस्कार।

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124. जीते जी तरना चाहे तो, पी ले गंगाजल के बदले!

आस्था के बारे में एक प्रसंग याद आ रहा है, जो कहीं सुना था।

ये माना जाता है कि यदि आप सच्चे मन से किसी बात को मानते हैं, इस प्रसंग में यदि आप ईश्वर को पूरे मन से मानते हैं, तो वह आपको अवश्य मिल जाएगा।

इस बीच कवि सोम ठाकुर जी के गीत ‘प्रेम का प्याला’ से कुछ पंक्तियां याद आ रही हैं-

जीते जी तरना चाहे तो, पी ले गंगाजल के बदले,

मीरा ने टेरे श्याम पिया तो अर्थ हलाहल के बदले,

मरघट में पी खामोशी से, महफिल में शोर मचाकर पी।

ये प्याला प्रेम का प्याला है, तू नाचके और नचाकर पी,

खुल खेलके पी, झुक झूमके पी, मत गैर से नज़र बचाकर पी।

ये प्याला प्रेम का प्याला है।

बहुत ही सुंदर गीत है ये, जितना अचानक याद आया, मैंने शेयर कर लिया। असल में यह आस्था और विश्वास का ही मामला है। बच्चे का विश्वास! वो जो मानता है, पूरी तरह मानता है, कोई ढोंग नहीं करता।

तो प्रसंग यह है कि एक पंडित जी रोज सुबह नदी में स्नान करने जाते, वे नदी किनारे अपने वस्त्र आदि रखकर नदी में स्नान करते। अक्सर एक बच्चा, जो गाय चराने आता था, उससे वे अपने सामान का ध्यान रखने को कहते थे और वो ऐसा करता भी था।

वह बच्चा उनको स्नान के दौरान प्रार्थना करते देखता, जिसमें वे अपने कंठ को अपनी उंगलियों के बीच हल्का सा दबा लेते थे। एक बार जब वे इसी प्रकार बच्चे से निगरानी के लिए बोलकर, नदी में जा रहे थे तब बच्चे ने पूछा पहले ये बताओ कि आप ये कंठ को क्यों दबाते हो। पंडित जी ने बोला हम भगवान की प्रार्थना करते हैं, दर्शन देने के लिए कहते हैं।

बच्चे ने पूछा कि क्या आपको भगवान दिखाई देते हैं, पंडित जी ने टालने के लिए बोल दिया कि ‘हां’।

इसके बाद बच्चा एक बार नदी में नहाने के लिए गया और उसने अपना कंठ दबाकर प्रभु से प्रार्थना की कि वे उसको दर्शन दें। कुछ देर तक दर्शन न होने पर वो बोला ‘आप जानते नहीं मैं कितना ज़िद्दी हूँ, मुझे दर्शन दो, नहीं तो मैं कंठ से हाथ नहीं हटाऊंगा!’

प्रभु ने सोचा यह पागल तो मर जाएगा, सो उन्होंने नदी किनारे भगवान श्रीकृष्ण के रूप में, प्रकट होकर कहा अब तो हाथ हटाओ देखो मैं आ गया, बच्चे ने कहा वहीं रुको, फिर पूछा, ‘आप कौन हो’ , उन्होंने कहा मैं वही ईश्वर हूँ, जिसको तुम बुला रहे थे।‘ बच्चा बोला, मैं नहीं मानता, उसने उनको रस्सी से पेड़ के साथ बांधकर कहा- ‘रुको, मैं अभी आता हू‘, वह भागकर पंडित जी को बुलाकर लाया, शुरू में तो पंडित जी को कुछ दिखाई नहीं दिया, लेकिन बाद में बच्चे की ज़िद के कारण, भगवान ने ढोंगी पंडित जी को भी दर्शन दिए, तब जाकर भगवान बंधन मुक्त हो पाए।

बस यही बात है आज की, प्रेम में ढोंग नहीं, पागलपन ज्यादा काम आता है।

नमस्कार।

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123. सुनते थे वो आएंगे, सुनते थे सहर होगी!

एक बार और दिल की बात कर लेते हैं, ऐसे ही कुछ बातें और आ रही हैं दिमाग में, आप इसे दिल पर मत लेना।

कितनी तरह के दिल लिए घूमते हैं दुनिया में लोग, एक गीत में किसी ने बताया था- ‘कोई सोने के दिल वाला, कोई चांदी के दिल वाला, शीशे का है मतवाले तेरा दिल’।

वैसे हमारा दिल, हमें चैन से रखने के लिए क्या कुछ कोशिशें नहीं करता-

दिल ढूंढता है, फिर वही फुर्सत के रात दिन,

बैठे रहें तसव्वुर-ए-जाना किए हुए!

जिगर मुरादाबादी साहब का शेर है-

आदमी, आदमी से मिलता है,

दिल मगर कम किसी से मिलता है।

एक शेर बशीर बद्र साहब का याद आ रहा है-

अभी राह में कई मोड़ हैं, कोई आएगा कोई जाएगा,

तुम्हें जिसने दिल से भुला दिया, उसे भूलने की दुआ करो।

एक और शेर किसी का याद आ रहा है-

एक इश्क़ का गम आफत, और उस पे ये दिल आफत,

या गम न दिया होता, या दिल न दिया होता।

एक शेर फैज़ अहमद फैज़ साहब का है-

कब ठहरेगा दर्द-ए-दिल, कब रात बसर होगी,

सुनते थे वो आएंगे, सुनते थे सहर होगी।

और बहादुर शाह ज़फर साहब का ये शेर तो बहुत प्रसिद्ध है-

कह दो इन हसरतों से कहीं और जा बसें,

इतनी जगह कहाँ है दिल-ए-दागदार में।

और अब दाग देहलवी साहब का एक शेर याद कर लेते हैं, क्योंकि वैसे तो यह अनंत कथा है-

तुम्हारा दिल, मेरे दिल के बराबर हो नहीं सकता,

वो शीशा हो नहीं सकता, ये पत्थर हो नहीं सकता।

चलिए अब एक फिल्मी गीत का मुखड़ा और जोड़ देते हैं-

दिल लगाकर हम ये समझे, ज़िंदगी क्या चीज है,

इश्क़ कहते हैं किसे और आशिक़ी क्या चीज है।

ये विषय ऐसा ही कि जब बंद करने की सोचते हैं, तभी कुछ और याद आ जाता है। फिल्मी गीतों के दो मुखड़े और याद आ रहे हैं, उसके बाद बंद कर दूंगा, सच्ची!

ये दिल न होता बेचारा, कदम न होते आवारा

जो खूबसूरत कोई अपना हमसफर होता।

और दूसरा-

चल मेरे दिल, लहराके चल, मौसम भी है, वादा भी है,

उसकी गली का फासला, थोड़ा भी है, ज्यादा भी है,

चल मेरे दिल।

अब चलते रहिए।

नमस्कार।

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