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151. नाज़ था जिस पे, मेरे सीने में वो दिल ही नहीं!

 

आज मुकेश जी का गाया एक बहुत प्यारा गीत याद आ रहा है। यह गीत लिखा है- जावेद अनवर जी और असद भोपाली जी ने, संगीतकार हैं- उषा खन्ना जी और गायक हैं मेरे प्रिय मुकेश जी।

ऐसे गीत कुछ मौकों पर बहुत सहारा देते हैं, कुछ अंदर की  भाप निकालने के लिए, जब लगता कि जिस दीवार या स्तंभ को हम अपना बहुत बड़ा सहारा मान रहे थे, वो तो रेत का टीला मात्र था। गीत हर मूड के लिखे गए हैं और सभी का अपना महत्व है। आज प्रस्तुत है यह गीत-

नाज़ था जिस पे मेरे सीने में वो दिल ही नहीं, 

अब ये शीशा किसी तस्वीर के क़ाबिल ही नहीं, 

मैं कहाँ जाऊं कि मेरी कोई मंज़िल ही नहीं। 

फेर ली मुझसे नज़र अपनों ने बेगानों ने, 

मेरा घर लूट लिया घर के ही मेहमानों ने, 

जो मुझे प्यार करे ऐसा कोई दिल ही नहीं। 

दिल बहल जाए, खयालात का रुख मोड़ सकूं, 

मैं जहाँ बैठ के हर अहद-ए-वफा तोड़ सकूं, 

मेरी तक़दीर में ऐसी कोई महफिल ही नहीं। 

दो जहाँ शौक में हैं, आज फिज़ा भी चुप है, 

किस से फरियाद करूं अब तो ख़ुदा भी चुप है, 

ये वो अफसाना है जो सुनने के क़ाबिल ही नहीं। 

नाज़ था जिस पे मेरे सीने में वो दिल ही नहीं। 

आज के लिए इतना ही, नमस्कार।

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3. चल अकेला

आज फिर बेधड़क, अपना शुरू का एक ब्लॉग शेयर कर रहा हूँ।

हज़ारों मील लंबे रास्ते तुझको बुलाते,

यहाँ दुखड़े सहने के वास्ते तुझको बुलाते

है कौन सा वो इंसान यहाँ पर जिसने दुख ना झेला।

चल अकेला, चल अकेला, चल अकेला ।

मुकेश जी के गाये इस गीत ने जीवन में बहुत बार हिम्मत दी है। वैसे कुछ मामलों में इंसान को बड़ी जल्दी सबक मिलता है।

यह मेरा तीसरा ब्लॉग है। जब शुरू किया तब उत्साह का स्तर कुछ और ही था। बहुत जल्दी ये समझ में आया कि बाबा तुलसीदास जी ने ऐसे ही स्वांतः सुखाय की बात नहीं की थी। सचमुच हमारे सुख या संतोष को दूसरों की मुखर स्वीकृति पर निर्भर नहीं होना चाहिए। बहरहाल सबक तो ज़िंदगी में मिलते ही रहते हैं और मिलने भी चाहिएं।

सोचा था कि जीवन के प्रारंभ से अनुभव यात्रा को साझा करूंगा, फिलहाल बीच के एक पड़ाव की बात कर रहा हूँ।  मैंने 30 सितंबर,1980 की रात में दिल्ली छोड़ी क्योंकि 1अक्तूबर,1980 को मुझे आकाशवाणी, जयपुर में कार्यग्रहण करना था, हिंदी अनुवादक के रूप में।

इत्तफाक से 2 अक्तूबर,1980 को ही वहाँ, राम निवास बाग में, प्रगतिशील लेखक सम्मेलन था, शायद प्रेमचंद की स्मृतियों को समर्पित था यह सम्मेलंन। यह आयोजन काफी चर्चित हुआ था क्योंकि महादेवी जी इस आयोजन की मुख्य अतिथि थीं और अपने संबोधन में उनका कहना था कि हम जंगली जानवरों के लिए अभयारण्य बना रहे हैं, परंतु मनुष्यों के लिए भय का परिवेश बन रहा है।

महादेवी जी के वक्तव्य पर वहाँ मौज़ूद राजस्थान के तत्कालीन मुख्यमंत्री- जगन्नाथ पहाड़िया नाराज़ हो गए, वो बोले कि महादेवी जी की कवितायें तो कभी भी मेरी समझ में नही आईं, मैं यहाँ साहित्यकारों के लिए कुछ अनुदान की घोषणा करने आया था, अब नहीं करूंगा। सत्ता के नशे में चूर पहाड़िया ये समझ ही नहीं पाए कि महादेवी होने का मतलब क्या है! बाद में काफी दिनों तक इस पर बहस चली और बाद में जगन्नाथ पहाड़िया को माफी मांगनी पड़ी थी।

खैर मुझे यह आयोजन किसी और कारण से भी याद है। इस तरह की संस्थाओं पर, विशेष रूप से जिनके साथ प्रगतिशीलशब्द जुड़ा हो, उन पर सभी जगह कम्युनिस्टों का कब्ज़ा रहा है। उनके लिए किसी का कवि या कहानीकार होना उतना आवश्यक नहीं है, जितना कम्युनिस्ट होना। वैसे मुझे सामान्यतः इस पर कोई खास आपत्ति नही रही है। वहाँ जाने से पहले मैं काफी समय से कवितायें, गीत आदि लिख रहा था और विनम्रतापूर्वक बताना चाहूंगा कि अनेक श्रेष्ठ साहित्यकारों से मुझे प्रशंसा भी प्राप्त हो चुकी थी।

जयपुर जाते ही क्योंकि इस आयोजन में जाने का अवसर मिल गया तो मुझे लगा कि यह अच्छा अवसर है कि यहाँ कविता पाठ करके, स्थानीय साहित्यकारों के साथ परिचय प्राप्त कर लिया जाए। रात में जब कवि गोष्ठी हुई तो मैंने भी अपनी एक ऐसी रचना का पाठ कर दिया, जिसके लिए मैं दिल्ली में भरपूर प्रशंसा प्राप्त कर चुका था। यह घटना भुलाना काफी समय तक मेरे लिए बहुत कठिन रहा। कोई रचना पाठ करता है तब रचना बहुत अच्छी न हो तब भी प्रोत्साहन के लिए ताली बजा देते हैं। लेकिन वहाँ मुझे लगा कि किसी ने मेरी कविता जैसे सुनी ही नहीं थी। ऐसा सन्नाटा मैंने वहाँ देखा। शायद उन महान आयोजकों को इस बात का अफसोस था कि एक अनजान व्यक्ति ने कविता-पाठ कर कैसे दिया।  

खैर वहाँ एक-दो रचनाकारों को सुन, जिनसे बाद में घनिष्ठ परिचय बना, उनमें से एक हैं कृष्ण कल्पित, जो अभी शायद आकाशवाणी महानिदेशालय में कार्यरत हैं। उनके एक प्रसिद्ध गीत की कुछ पंक्तियां इस प्रकार हैं-

राजा-रानी प्रजा मंतरी, बेटा इकलौता

मां से कथा सुनी थी, जिसका अंत नहीं होता।

बिना कहे महलों में कैसे आई पुरवाई,

राजा ने दस-बीस जनों को फांसी लगवाई।

राम-राम रटता रहता था, राजा का तोता।

मां से कथा सुनी थी जिसका अंत नहीं होता॥

आकाशवाणी, जयपुर में 3 साल रहा, बहुत अच्छे कलाकारों और कवियों से वहाँ मुलाकात हुई। एक थे लाज़वाब तबला वादक ज़नाब दायम अली क़ादरी, बहुत घनिष्ठ संबंध हो गए थे हमारे। मेरे बच्चे का जन्मदिन आया तो वो स्वयं घर पर आए और घंटों तक गज़लें प्रस्तुत कीं। आकाशवाणी में वे तबला वादक थे, परंतु वे गायन के कार्यक्रम प्रस्तुत करते थे।ए  वो बोलते भी थे कि सरकार को हाथ बेचे हैं , गला नहीं। इसके बाद जब तक हम वहाँ रहे, ऐसे अवसरों पर वे आकर कर्यक्रम करते रहे। एक बार हमारे मकान मालिक के बच्चे का जन्मदिन था, उनसे कहा तो बोले, शर्माजी आप तो हमारे घर के आदमी हैं, अगर हम हर किसी के यहाँ ऐसे ही गायेंगे,तो क्या ये ठीक होगा?

वहाँ रहते हुए आकाशवाणी की कई कवि गोष्ठियों में भाग लिया। स्वाधीनता दिवस के अवसर पर रिकॉर्ड की जा रही एक कवि गोष्ठी याद आ रही है, उसमें केंद्र निदेशक श्री गिरीश चंद्र चतुर्वेदी भी स्टूडियो में बैठे थे। राजस्थान के एक प्रसिद्ध गीतकार का नंबर आया तो वे बोले, यह गीत मैंने अपने जन्मदिन पर लिखा था, प्रस्तुत कर रहा हूँ-

काले कपड़े पहने हुए सुबह देखी,

देखी हमने अपनी सालगिरह देखी।

इस पर केंद्र निदेशक तुरंत उछल पड़े, नहीं ये गीत नहीं चलेगा, कोई और पढ़िए। वास्तव में वह गीत स्वतंत्रता दिवस से ही जोड़कर देखा जाता।

एक और गीत की पंक्तियां आज ताक याद हैं-

फ्यूज़ बल्बों के अद्भुद समारोह में

रोशनी को शहर से निकाला गया।

आकाशवाणी में मेरी भूमिका हिंदी अनुवादक की थी, इस प्रकार मैं प्रशासन विंग में था, लेकिन मेरी मित्रता वहाँ प्रोग्राम विंग के क्रिएटिव लोगों के साथ अधिक थी। एक पूरा आलेख आकाशवाणी के कार्यकाल पर लिखा जा सकता है, लेकिन फिलहाल इतना ही।

अंत में जयपुर के एक और अनन्य शायर मित्र को याद करूंगा- श्री मिलाप चंद राही। बहुत अच्छे इंसान और बहुत प्यारे शायर थे। जयपुर में रहते हुए ही एक दिन यह खबर आई कि दिल का दौरा पड़ने से उनका निधन हो गया। उनकी इन पंक्तियों के साथ उनको याद कर रहा हूँ-

रवां-दवां थी, सियासत में रंग भरते हुए,

लरज़ गई है ज़ुबां, दिल की बात करते हुए।

ये वाकया है तेरे शहर से गुज़रते हुए,

हरे हुए हैं कई ज़ख्म दिल के भरते हुए।

मुझे पता है किसे इंतज़ार कहते हैं,

कि मैंने देखा है लम्हात को ठहरते हुए।

खुदा करे कि तू बाम-ए-उरूज़ पर जाकर

किसी को देख सके सीढ़ियां उतरते हुए॥

नजर-नवाज़ वो अठखेलियां कहाँ राही,

चले है बाद-ए-सबा अब तो गुल कतरते हुए।

 

 

आज के लिए इतना ही, नमस्कार।

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150. तूने जिस फूल को पाला वो पराया होगा।

कुछ दिन से नई पोस्ट नहीं लिख रहा था, बेटे की शादी थी, सोचा कि इस बीच पुरानी पोस्ट ही शेयर कर लेता हूँ, जो जीवन के विभिन्न पड़ावों से जुड़ी हैं और मेरे दिल के बहुत क़रीब हैं। आगे भी इनको शेयर करूंगा, फिलहाल मेरा 150 वां ब्लॉग पोस्ट, जो कुछ दिन से स्थगित था, आज कैफ भोपाली साहब की एक खूबसूरत गज़ल, बिना किसी भूमिका के शेयर कर रहा हूँ-

कौन आएगा यहाँ कोई न आया होगा

मेरा दरवाज़ा हवाओं ने हिलाया होगा।

दिल-ए-नादाँ न धड़क ऐ दिल-ए-नादाँ न धड़क

कोई ख़त ले के पड़ोसी के घर आया होगा।

इस गुलिस्ताँ की यही रीत है ऐ शाख़-ए-गुल

तू ने जिस फूल को पाला वो पराया होगा।

दिल की क़िस्मत ही में लिक्खा था अंधेरा शायद

वर्ना मस्जिद का दिया किस ने बुझाया होगा।

गुल से लिपटी हुई तितली को गिरा कर देखो

आँधियो तुम ने दरख़्तों को गिराया होगा।

खेलने के लिए बच्चे निकल आए होंगे

चाँद अब उस की गली में उतर आया होगा।

‘कैफ़’ परदेस में मत याद करो अपना मकाँ

अब के बारिश ने उसे तोड़ गिराया होगा। 

नमस्कार।

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11. हम शंटिंग ट्रेन हो गए

(पुराने ब्लॉग्स को दोहराने के क्रम में आज दिल्ली में प्रारंभिक नौकरी, दैनिक रेल-यात्रा आदि के कुछ अनुभव! )

पीताम्बर बुक डिपो में कुल मिलाकर मैं एक साल तक रहा, उसके बाद मैंने फैसला कर लिया कि अब यहाँ अधिक समय तक नहीं रहूंगा। अब तक इतना आत्मविश्वास आ गया था कि मैं इससे बेहतर काम खोज सकता हूँ। और हुआ भी ऐसा, यह काम छोड़ने के बाद एक महीने के अंदर ही दिल्ली प्रेस, झंडेवालान में मुझे काम मिल गया, वेतन 100 रु. से बढ़कर हुआ 150 रुपये।

दिल्ली प्रेस में काम था सर्कुलेशन विभाग में, लाला विश्वनाथ की इस कंपनी में सरिता, मुक्ता, कैरेवान (अंग्रेजी में), चंपक आदि पत्रिकाएं छपती थीं। हमारा काम था ग्राहकों के ऑर्डर में कमी और वृद्धि का रिकॉर्ड रखना और उसी हिसाब से पत्रिकाएं भिजवाने की व्यवस्था करना।

दिल्ली प्रेस में, मैं लगभग 3 साल रहा और यहाँ पर मेरी प्रगति रु. 150/- प्रतिमाह के वेतन से 240/- प्रतिमाह तक हुई। यहाँ पर मेरा एक भामाशाह भी था, जिसकी मुझे अक्सर ज़रूरत रही है शुरू के दिनों में, राजेंद्र नाम था उसका, दफ्तर में चपरासी था लेकिन घर से उसकी आर्थिक स्थिति अच्छी थी अतः मैं समय-समय पर उससे सहायता एवं अनुदान प्राप्त करता रहता था।

दिल्ली प्रेस के सर्कुलेशन विभाग में प्रबंधक थे श्रीमान पी.सी.गुप्ता, जो प्रसन्न कम ही रहते थे, शायद कुछ बीमारी उनको थी, कभी पूछा नहीं उनसे, क्योंकि वहाँ बहुत से कर्मचारी थे, मैं एक कनिष्ठ कर्मचारी था और उनसे कोई घनिष्ठता नहीं थी।

खैर एक-दो दिन गुप्ता जी ऑफिस नहीं आए और फिर खबर मिली कि उनकी मृत्यु हो गई है। उनका घर पहाड़ गंज में था, जो ऑफिस से पास ही था, सो ऑफिस की शोक-मंडली उनके घर गई। मुझे तो आज तक ऐसे में शोक प्रकट करने की कला नहीं आती, मैं चुपचाप बैठने के अलावा कुछ नहीं कर पाता। खैर हमारी मंडली के पास एक अनुभवी बुज़ुर्ग थे, सो संवाद की पूरी ज़िम्मेदारी उन्होंने ले ली थी, उधर गुप्ताजी के पिताजी थे जो अपने बेटे के शोक में आए लोगों से मिल रहे थे।

गुप्ताजी के घर पर हमारी मंडली के बुज़ुर्ग नायक उनके पिता से पूछते जा रहे थे कि क्या हुआ, कैसे हुआ और गुप्ताजी के पिता यंत्रवत ज़वाब देते जा रहे थे। इतने में उनके पड़ौसी आए और उन्होंने पूछा- गुप्ताजी क्या हो गया?’ अब देखा जाए तो यह कोई सवाल था? सब जानते थे कि उनके बेटे की मौत हो गई है और इसी संबंध में पूछताछ वहाँ चल रही थी। लेकिन उस पड़ौसी के पूछे इस छोटे से सवाल में कुछ ऐसा था कि अब तक यंत्रवत ज़वाब देते जा रहे बड़े गुप्ताजी फूट-फूटकर रो पड़े। देखा जाए तो बोले जा रहे शब्दों में ऐसा कुछ नहीं होता, असली संवेदना तो हमारे संबंध में होती है, जिसमें कुछ कहे बिना भी सब कुछ कहा जा सकता है।

खैर हुआ इस तरह कि, दिल्ली प्रेस में सेवा के दौरान शाहदरा से झंडेवालान तक यह यात्रा 3 वर्षों तक चली। सुबह आते समय मैं दिल्ली जं. से झण्डेवालान तक अधिकतर पैदल आता था और शाम को नई दिल्ली से ही ट्रेन पकड़ लेता था। बाद में कई बार सोचा कि सुबह वाली यह नियमित यात्रा काफी लंबी हुआ करती थी।

दिल्ली प्रेस एक ऐसा स्थान है, जहाँ से बहुत से बड़े साहित्यकार निकले, प्रारंभ में, संघर्ष के दिन उन्होंने यहाँ बिताए थे, वैसे मैं तो था ही सर्कुलेशन विभाग में,साहित्य से जुड़ा होने का कोई भ्रम भी मन में नहीं था। दिल्ली प्रेस का वैसे बिक्री के लिए अलग ही एजेंडा है, जहाँ महिलाओं की पत्रिकाएं सिलाई-बुनाई-कढ़ाई पर केंद्रित थीं, वहीं साहित्य से जुड़ी होने का दावा करने वाली पत्रिकाएं हिंदू धर्म के छद्म विरोध को अपना हथियार बनाती थीं। वहाँ इस प्रकार के लेख अक्सर छपते थे- हिंदू समाज के पथभ्रष्टक तुलसीदास

इस सेवा के दौरान ट्रेन में दैनिक यात्रा के अनुभव भी बहुत रोचक हैं, जिन्हें बाद में शेयर करूंगा।

खैर साम्यवाद में ऐसी अवधारणा है कि मेहनतकश मिलकर शोषण के विरुद्ध सामूहिक लड़ाई लड़ते हैं, लेकिन मैं देखता हूँ कि दिल्ली प्रेसजैसी संस्थाएं तो शोषण के ही महाकेंद्र हैं, महानगरों में ऐसे संस्थानों की भीड़ है, और कर्मचारीगण सुबह से ही बस,ट्रेन और अब मैट्रो भी, की लाइनों में लग जाते हैं, जीवन-यापन की व्यक्तिगत लड़ाई लड़ने के लिए।

उन दिनों लिखा एक गीत शेयर कर रहा हूँ, जो काफी लोकप्रिय हुआ था-

 

महानगर का गीत

नींदों में जाग-जागकर, कर्ज़ सी चुका रहे उमर,

सड़कों पर भाग-भागकर, लड़ते हैं व्यक्तिगत समर।

छूटी जब हाथ से किताब, सारे संदर्भ खो गए,

सीमाएं बांध दी गईं, हम शंटिंग ट्रेन हो गए,

सूरज तो उगा ही नहीं, लाइन में लग गया शहर,

लड़ने को व्यक्तिगत समर।

 

व्यापारिक-साहित्यिक बोल, मिले-जुले कहवाघर में,

एक फुसफुसाहट धीमी, एक बहस ऊंचे स्वर में,

हाथों में थामकर गिलास, कानों से पी रहे ज़हर।

कर्ज़ सी चुका रहे उमर।   

 

मीलों फैले उजाड़ में, हम पीली दूब से पले,

उतने ही दले गए हम, जितने भी काफिले चले,

बरसों के अंतराल से गूंजे कुछ अपने से स्वर,

क्रांति चेतना गई बिखर।    

(श्रीकृष्ण शर्मा)

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8. कालेज के दिन

(पुराने ब्लॉग्स को दोहराने के क्रम में आज प्रस्तुत है कालेज जीवन के कुछ अनुभव, यह आलेख थोड़ा लंबा और गहन है! )

बाबूराम स्कूल में 6 साल रहा और अच्छा खासा जुड़ाव रहा स्कूल से, इसलिए स्कूल के बारे में, वहाँ के शिक्षकों के बारे में भी मैंने कुछ बात की। यहाँ स्पष्ट कह दूं कि कालेज से मेरा कोई जुड़ाव नहीं हो पाया और वहाँ से मैंने कुछ हासिल भी नहीं किया, इसलिए कालेज की नहीं, कालेज के दिनों की बात करूंगा।

जैसा मैंने बताया था, हायर सैकेंडरी परीक्षा मैंने जैसे-तैसे सैकिंड डिवीज़न में पास की थी, शायद यही कारण था कि 12 वीं कक्षा के लिए मैंने गाजियाबाद के महानंद मिशन इंटर कालेज में प्रवेश लिया और वहाँ से इंटर परीक्षा जैसे-तैसे पास की। (उस समय दिल्ली बोर्ड की हायर सैकेंडरी 11 वीं कक्षा तक होती थी अतः यूपी से बीएससी करने के लिए पहले इंटर पास करना ज़रूरी था, क्योंकि वहाँ बीए कोर्स 2 वर्ष का था जबकि दिल्ली में 3 वर्ष का था)।

यहाँ एक विशेष कारण, जो इससे पहले की एक-दो कक्षाओं में भी पूरी तरह लागू था, वह बताना उचित होगा। मेरी आंखें काफी कमज़ोर हो गई थीं और मैं आदतन अंतिम सीट पर बैठता था, वैसे आगे की सीट पर बैठकर भी मैं बोर्ड पर जो कुछ लिखा जा रहा था, वह नहीं पढ़ पाता था, इस प्रकार कक्षा में मुझे सिर्फ ऑडियो ही मिल पाता था, जो पढ़ाई में बराबर चलने के लिए काफी नहीं था। और मैंने घर पर कभी इस बारे में बताया भी नहीं।

इंटर की पढ़ाई की दौरान मुझे टॉयफाइड बुखार हुआ, मैं 2-3 दिन अस्पताल में रहा और वहाँ पर ही नेत्र परीक्षण करके मुझे चश्मा लगाने की सलाह दी गई, और इसके बाद, कई वर्षों के अंतराल के बाद, मैं कक्षा में पूरी तरह उपस्थित रहता था।

खैर इंटर कालेज अलग था, जहाँ से मैंने जैसे-तैसे इंटर परीक्षा पास की और अब मुख्य कालेज में आ गया था, दो वर्ष का बीएससी कोर्स करने के लिए।

लेकिन यह भी बता दूं कि पिताश्री, जिनके कानों में बहुत समय से समस्या थी, अब उनको बहुत कम सुनाई देने लगा था। अब सेल्स के काम में यह तो एकदम नहीं चल सकता कि आप बोलते जाओ और दूसरे की बात ही न सुनो। सो कमाई एकदम बंद हो गई थी, और घर में क्योंकि मैं ही उनके सबसे नज़दीक था, अतः मुझसे कहा जाता था कि अपने बाप से पैसे मांग’!

कभी यह भरोसा नहीं होता था कि मेरी अगले महीने की फीस जमा होगी या नहीं। एक घटना सुना दूं, जो भुलाए नहीं भूलती। मेरे पिता ने बहुत से बड़े व्यापारियों के साथ काम किया था, उनमें से किसी से उन्होंने मेरी फीस के बारे में बात की, उसने कहा कि वह खुद आकर मेरी फीस जमा करेगा। मेरे पिताश्री ने कालेज में इंतज़ार करने के लिए कहा और वो उस व्यापारी को साथ लेकर आ रहे थे। बहुत देर हो गई उनको गाज़ियबाद आने में, कालेज की छुट्टी हो गई और मैं घर वापस आ गया। वह पहला अवसर था जब घर लौटकर मेरे पिता ने मुझे बुरी तरह डांटा था।

खैर मेरे पिता ने हिम्मत नहीं हारी और वे मुझे पहाड़ गंज में किसी व्यापारी के घर ले गए। वह भी कीमत वसूलने में एक्सपर्ट था, उसकी दो बेटियां शायद दसवीं कक्षा में पढ़ती थीं। उसने उस दिन उनको पढ़ाने के लिए कहा और मेरे पिता को फीस के पैसे दे दिए। जब मैं शरमाता हुआ उन लड़कियों को पढ़ा रहा था, तब वे दोनों मेज़ के नीचे मेरे पैर पर पैर मार रही थीं।

उस व्यापारी ने पैसा देते हुए यह शर्त रखी थी कि मैं हर रोज़ पढ़ाने के लिए आऊंगा। मैं यह सोच रहा था कि हर रोज़, शाहदरा से पहाड़ गंज पढ़ाने के लिए कैसे आऊंगा। घर पहुंचकर पिताश्री ने कहा कि कोई ज़रूरत नहीं है वहाँ जाने की, मैं बहुत बिज़नस उसको दे चुका हूँ। अब इस मामले में मैं तो खैर मज़बूर था, इससे पहले कभी मैं अकेला पहाड़गंज गया भी नहीं था।

अब एक वाकया और याद आ गया। इससे पहले पिताश्री ने मुझे शाहदरा में ही, सर्कुलर रोड पर ट्यूशन दिलवाई थी, दो लड़कों को मैं वहाँ पढ़ाता थ, शायद 7-8 कक्षा के थे। ट्यूशन दिलाते समय पिताश्री ने मुझसे कहा था कि मैं उन बच्चों के पिता से ठीक से बात करूं, वकील है वह, कभी काम आ सकता है। खैर इस ट्यूशन के दौरान ही उन सज्जन ने मुझसे कहा- मास्टर जी, कभी हमको भी पढ़ा दीजिए। मैंने कहा क्या बात करते हैं, आप तो वकील हैं! वो बोले आपको गलतफहमी हो गई है जी, मेरा नाम वकील है, मैं तो अंगूठा छाप हूँ। यह गलतफहमी भी पिताश्री को कम सुनाई देने के कारण ही हुई थी।

खैर दो वर्षीय बीएससी पाठ्यक्रम का पहला वर्ष मैंने पूरा कर लिया, काम जैसा भी चल रहा हो, पिताश्री दौरे पर जाते ही रहते थे और यह निश्चित नहीं रहता था कि कब लौटकर आएंगे।

वैसे वो यह भी बताते थे कि वो जैन मुनियों के गुरु बन सकते हैं, इसकी पूरी शिक्षा उन्हें प्राप्त हैं और लोग उनको बुलाते भी रहते हैं।

इस बार जब पिताश्री दौरे पर गए, तो फिर इंतज़ार का समय समाप्त ही नहीं हुआ और धीरे-धीरे उनके लौटने की आशा भी समाप्त हो गई। मुझे विश्वास है कि इसके बाद की उनकी जीवन अवधि अपेक्षाकृत सुखपूर्ण रही होगी।

मैंने बीएससी प्रथम वर्ष की परीक्षा पास की थी और पिताश्री के जाने के बाद आगे पढ़ना संभव नहीं था। मैंने नौकरी शुरू की और फिर बाद में 8 वर्षों के अंतराल के बाद निजी परीक्षार्थी के रूप में बी.ए. और फिर एम.ए. परीक्षाएं पास कीं।   

एक मामले में सामने वाले, मुल्तानी बाबा की ज्योतिष विद्या भी फेल हो गई, उनका कहना था कि मेरे पिता  मुझसे एक बार अवश्य मिलेंगे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

आलेख कुछ लंबा हो गया न! खैर इसके बाद भी मैं अपनी एक कविता अवश्य शेयर करूंगा-

 

पिता के नाम

हे पिता

यदि हो कहीं, तो क्या लिखूं तुमको

बस यही, जो जिस तरह था

उस तरह ही है।

पत्र है अभिवादनों की शृंखला केवल

हम अभी जीवित बचे हैं, यह बताने को,

और आश्वासन इसी अनुरूप पाने को,

मैं न मानूं किंतु प्रचलन

इस तरह ही है।

हाल अपना क्या सुनाऊं, ठीक सा ही है,

गो कि अदना क्लर्क–  

कल का महद आकांक्षी,

ओस में सतरंगदर्शी बावला पंछी

हो गया है, मुदित सपना, आपके मन का

जी रहा है, और जीवन

उस तरह ही है।

साथ हैं अब कुछ वही एहसास सपनीले-

वह फिसलने फर्श पर मेरा रपट जाना,

और चिंता से तुम्हारा आंख भर लाना,

बीच सड़कों, धुएं, ट्रैफिक के गिरा हूँ मैं

और यह ध्यानस्थ दुनिया-

उस तरह ही है।

                                                                                                                                                                 –श्रीकृष्णशर्मा

                ———————-

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अमर रहे गणतंत्र हमारा

आज हमारे महान गणतंत्र की वर्षगांठ के अवसर मैं अपने सभी देशवासियों को परम श्रद्धेय अटल बिहारी वाजपेयी जी की इन गीत पंक्तियों के साथ शुभकामनाएं देता हूँ

तेरा गौरव अमर रहे मां

 हम दिन चार रहें न रहें।

पुनः अनंत शुभकामनाएं।

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7. बाबूराम स्कूल

(पुराने ब्लॉग्स को दोहराने के क्रम में भी मैं अनुक्रम का पालन नहीं कर पा रहा हूँ, आज प्रस्तुत है स्कूल के कुछ अनुभव!)

अब स्कूल के बारे में बात कर लें। कक्षा 1 से 5 तक गौशाला वाले सनातन धर्म स्कूल के बारे में तो बताने को कुछ नहीं है। बाबूराम स्कूल के बारे में ही बात करूंगा जहाँ मेंने कक्षा 6 से 11 तक की पढ़ाई की थी।

कुछ चित्र जो मस्तिष्क में आते हैं, वे धीरे-धीरे शेयर करना चाहूंगा।

काफी लंबे-चौड़े क्षेत्र में फैला था हमारा स्कूल, उस समय तक सिंगल स्टोरी ही था, काफी बाद में देखा कि दो-तीन मंजिला भवन बन गया है। कक्षाओं के लिए इस्तेमाल होने वाले क्षेत्र के पीछे, उससे 2-3 गुना बड़ा मैदान था, जहाँ खेलकूद के अलावा सुबह की प्रार्थना आदि होती थीं। कक्षाओं के पीछे एक छोटा सा मंच था, जहाँ सेमैदान में होने वाली सुबह की प्रार्थना सभा और अन्य सांस्कृतिक गतिविधियों का संचालन भी होता था।

मुझे कभी उस स्कूल के प्रिंसिपल का नाम याद नहीं रहा, लेकिन हिंदी के एक अध्यापक थे- मनोहर लाल जी, कुर्ता-पैजामा और नेहरू जैकेट पहनते थे, टोपी लगा लें तो काफी हद तक नेहरू जी जैसे ही लगें। गुलाब का फूल भी वो अक्सर लगा लेते थे। स्कूल का वह मंच, उनके बिना अधूरा लगता था।

स्कूल में राष्ट्रीय दिवसों आदि के अवसर पर मनोहर लाल जी की विशेष भूमिका होती थी और देशभक्ति के जिस प्रकार के गीत वहाँ बजते थे, वे अलग वातावरण तैयार करते थे। मुझे याद है चीन से हुए युद्ध के बाद मैं उस स्कूल में रहते हुए एकमात्र बार मंच पर चढ़ा था और मैंने यह कविता मंच से पढ़ी थी, जो उस समय अखबार में छपी थी, मुझे नहीं मालूम कि किसकी लिखी हुई थी-

घबरा जाना नहीं दोस्तों, छोटी-मोटी हारों से

राष्ट्र हमारा जूझ रहा है, तलवारों की धारों से।

टिड्डी दल ने कहो आज तक, कभी सूर्य को ढांपा है

तिनके पर बैठे चींटे ने, क्या समुद्र को मापा है।

दाल गलेगी नहीं तुम्हारी, कह दो यह गद्दारों से

राष्ट्र हमारा ………

बस सबसे बड़ी उपलब्धि यही थी कि मैं यह छोटी सी कविता, जोश के साथ पूरी पढ़कर, सही-सलामत मंच से नीचे उतर आया था।

स्कूल की शुरु की कक्षाओं के समय की ही एक घटना है, मैं स्कूल में बिना जूते पहने, नंगे पैर ही चला जाता था। इसमें कुछ हद तक घर की आर्थिक स्थिति का भी हाथ था और जो भी कारण रहे हों, मेरी शायद आदत भी बन गई थी। मेरे एक शिक्षक ने जब कक्षा के छात्रों से कहा कि वे मेरे लिए पुराने जूते लेकर आएं तब मेरा स्वाभिमान जाग गया और मैंने यह मैनेज कर लिया कि आगे से जूते पहनकर ही स्कूल जाऊं।

एक ड्राइंग के शिक्षक थे गुप्ता जी, उन्हें यह मालूम हो गया कि मैं मुकेश जी के गाने गाता हूँ और ठीक-ठाक गा लेता हूँ। वो अक्सर जब भी मौका मिलता मुझे कक्षा के सामने गाने के लिए बोलते थे। वैसे मेरी कमज़ोरी और दुबले-पतले शरीर के कारण कुछ लड़के मुझे विनोबा भावे कहकर चिढ़ाते भी थे।

अंग्रेजी के एक शिक्षक थे ओ.पी.शर्मा, वो कहते थे कि देवानंद उनके भतीजे हैं। काफी मोटे थे वो, कहते थे इफ आई गिव यू माई पैंट, इट वुड सर्व यू एज़ ए टेंट। एक बार ओ.पी.शर्मा जी हमारी क्लास में, अरेंजमेंट क्लास में आए थे, क्योंकि संबंधित शिक्षक उपलब्ध नहीं थे। उस क्लास में शर्मा जी ने हमसे कहा कि सब इफ आई वर ए मालीविषय पर निबंध लिखें। सबके लिखे निबंधों को उन्होंने सुना,और मेरी बहुत तारीफ की, कहा यू आर ए फ्रीलांसर। अगले दिन उन्होंने मुझसे पूछा कि वो जो निबंध आपने लिखा था वो कहाँ है, तो मैंने बताया कि वो तो मैंने रफ कॉपी में लिखा था फाड़कर फेंक दिया।

बाद में अंग्रेजी के एक शिक्षक आए जो सरदार जी थे, अच्छे शिक्षक थे, परंतु शुरू में कुछ अलग सा लगा क्योंकि उस समय तक मैंने इस प्रोफेशन में और वो भी अंग्रेजी शिक्षक के रूप में, किसी सरदार जी को नहीं देखा था। फिर एक अंग्रेजी शिक्षक आए हरिश्चंद्र गोस्वामी जी, जिनके बारे में बाद में मालूम हुआ था कि एक नकल वीर ने, नकल से रोकने पर उनकी हत्या कर दी थी।   

फिज़िक्स के एक शिक्षक थे कन्हैया लाल जी, वे दूरदर्शन पर प्रसारित होने वाली फिज़िक्स कक्षाओं में भी आते थे और हमारी स्कूल की क्लास में भी। आते ही सीधे विषय पर बोलना शुरु कर देते थे, बहुत सी बार लगता था हम टीवी पर ही उनकी क्लास देख रहे हैं।    

परीक्षाओं में मैंने कभी कोई महान उपलब्धि प्राप्त नहीं की, ले-देकर सैकिंड डिवीज़न में बोर्ड परीक्षा पास की थी, लेकिन इतना था कि स्कूल के बाद भी कुछ शिक्षक जब मिलते थे तो गले से लगा लेते थे।    

अंत में निदा फाज़ली साहब की ये पंक्तियां दोहरा लेते हैं-

बच्चों के छोटे हाथों को, चांद सितारे छूने दो

चार किताबें पढ़कर ये भी, हम जैसे हो जाएंगे।

किन राहों से दूर है मंज़िल, कौन सा रस्ता आसां है

हम जब थककर बैठेंगे तब औरों को समझाएंगे।

नमस्कार। 

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10. रोज़गार दफ्तर की फाइलें भरें

शुरु के ब्लॉग्स को दोहराने के क्रम में प्रस्तुत है ये मेरा दसवां ब्लॉग।

मैं 4-5 दिन तक बाहर रहा, मेरे छोटे बेटे के विवाह के सिलसिले में, सोचा था वहाँ पर रहते हुए भी, पुराने ब्लॉग्स तो दोहरा ही सकता हूँ, लेकिन यह संभव नहीं हो पाया, इस बीच में कोई ब्लॉग पढ़ भी नहीं पाया। 

खैर प्रस्तुत है, मेरी ज़िंदगी का एक पुराना पन्ना! 

 ऐसा हुआ कि आगे पढ़ाई जारी रखने की तो गुंजाइश नहीं बची थी और तुरंत कोई काम तलाशने की भी ज़रूरत थी। उन दिनों हमारे पड़ौस में ही एक सज्जन रहते थे, जो व्यवसायी थे और उनके कुछ संपर्क थे, सो उन्होंने एक संदर्भ दिया और उनकी सलाह पर मैंने चांदनी चौक में जाकर संपर्क किया, और मुझे काम मिल गया, अब उसे रोज़गार कहें या अर्द्ध रोज़गार, कुछ इस प्रकार था-

नियोजक- पीताम्बर बुक डिपोतेजराम पीताम्बर लाल का अंकगणित मशहूर रहा है, सभी स्कूलों में उनकी ही गणित की किताब लगती थी, शायद अभी भी लगती हो। उनके ही बेटों ने स्कूली पुस्तकों का व्यवसाय आगे बढ़ाया। चांदनी चौक में कटरा नील के पास ही कोई अहाता था शायद, पतली सी गली से अंदर जाकर, चौकोर से अहाते में शायद 7-8 दुकानें थीं। इनमें से दो पीताम्बर बुक डिपो के पास थीं। 

मेरा काम था किताबों की खुदरा बिक्री के मामले में बिल आदि बनाना। तनख्वाह थी 100 रु. महीना। ओवरटाइम आदि मिलाकर महीने में करीब 125 हो जाते थे। ओवरटाइम के लिए अक्सर रविवार को लाला के पूसा रोड स्थित मकान पर जाना होता था।

उस समय शाहदरा से दिल्ली आने के लिए 6 रुपये में रेल यात्रा का मासिक पास बनता था। इस प्रकार ये पहला रोज़गार या अर्द्ध रोज़गार प्रारंभ हुआ।

उसी अहाते में, हमारे एकदम बगल में कपड़े की दुकान थी, जहाँ काफी गतिविधि रहती थी। उनके एजेंट बाहर सड़क से ग्राहकों को तैयार करके लाते थे और फिर बड़े शिष्टतापूर्ण अंदाज़ में उन्हें बताया जाता था कि अभी-अभी ताज़ा माल आया है और ये कि हम तो एक्स्पोर्ट करते हैं,बहुत बढ़िया क्वालिटी का कपड़ा है, कहीं और नहीं मिलेगा। खैर अगर ग्राहक कपड़ा ले गया और वह लोकल है, तो यह निश्चित होता था कि वो दुबारा शिकायत लेकर आएगा, और उस समय ये सुसभ्य और शिष्ट विक्रेता बंधु दूसरी भूमिका में तैयार रहते थे, और सीधे यह बोल देते थे कि आप हमारे यहाँ से कपड़ा नहीं लेकर गए हैं।

खैर शाहदरा के सीमित दायरे से बाहर निकलकर आए, तो जीवन के बहुत से रंग देखने को मिले। पीताम्बर बुक डिपो की ही बात करें तो उनका अधिकतम व्यवसाय, एक प्रकाशक के रूप में थोक बिक्री का था। इसके लिए उन्होंने कुछ सेल्स रिप्रेजेंटेटिव रखे हुए थे, जो दौरा करते रहते थे और वहाँ दूसरे शहर में जाकर, उन्होंने क्या किया उसकी दैनिक रिपोर्ट डाक से भेजते थे।

एक बार ऐसा हुआ कि एक विक्रय प्रतिनिधि की सात दैनिक रिपोर्टें एक साथ आ गईं। उनमें से 3 रिपोर्टें तो उन दिनों की थी जो बीत चुके थे, एक रिपोर्ट जो दिन चल रहा था उसकी थी और तीन रिपोर्टें आने वाले दिनों की थीं। असल में उन महोदय ने किसी को आने वाले सात दिनों की वे रिपोर्टें लिखकर दीं और उससे कहा था कि नंबर से हर रोज़, एक-एक रिपोर्ट डाक में डालते जाना, लेकिन वह मूर्ख, उनकी क्रिएटिविटी को नहीं समझ पाया और उसने सभी रिपोर्टें एक साथ डाक में डाल दीं।

एक और घटना याद आ रही है। सरकारी स्कूलों में वैसे तो सभी किताबें सरकार द्वारा निर्धारित होती हैं, बस कुछ मामलों में शिक्षकों को छूट होती है। एक ऐसा ही मामला था। स्कूल में आठवीं कक्षा में व्याकरण की पुस्तक शिक्षक अपनी इच्छा से चुन सकते थे। एक स्कूल था जिसमें आठवीं कक्षा के चार सेक्शन थे, प्रत्येक सेक्शन में 50 बच्चे। एक शिक्षक ने हमारे यहाँ बताया कि वे हमारी व्याकरण की पुस्तक अपने यहाँ लगवा देंगे। 200 बच्चों के लिए किताब लगवाने पर, 25% कमीशन के रूप में 50 पुस्तकों का मूल्य वे एडवांस में हमसे ले गए। लेकिन स्कूल की आठवीं कक्षा के चार सेक्शंस में चार शिक्षक थे। एक-एक शिक्षक ने अलग-अलग प्रकाशक को चारों सेक्शंस में पुस्तक लगवाने की बात कहकर 50 पुस्तकों की कीमत कमीशन के रूप में प्राप्त कर ली। इसके बाद प्रत्येक सेक्शन में अलग-अलग प्रकाशक की पुस्तक लग गई, प्रत्येक शिक्षक ने 50 पुस्तकों का मूल्य कमीशन के रूप में प्राप्त कर लिया और उन चारों प्रकाशकों ने मुफ्त में अपनी 50-50 पुस्तकें स्कूल में प्रदान कर दीं। इस तरह मालूम होता है कि हमारे यहाँ शिक्षक भी कितने महान हैं। अगर सभी पुस्तकें चुनने के अधिकार उन्हें मिल जाए तो फिर भगवान ही मालिक है।

अब कमीशनखोरी के इस प्रसंग के बाद आज आगे कुछ नहीं कहूंगा।

खैर अपने इस अर्द्ध रोज़गार की अवधि में लिखी गई एक कविता शेयर कर रहा हूँ-

 

गीत

इंद्रधनुष सपनों को, पथरीले अनुभव की

ताक पर धरें,

आओ हम तुम मिलकर, रोज़गार दफ्तर की

फाइलें भरें।

गर्मी में सड़कों का ताप बांट लें,

सर्दी में पेड़ों के साथ कांप लें,

बूंद-बूंद रिसकर आकाश से झरें।

रोज़गार दफ्तर की फाइलें भरें॥

ढांपती दिशाओं को, हीन ग्रंथियां,

फूटतीं ऋचाओं सी मंद सिसकियां।

खुद सुलगे पिंड हम, आग से डरें।

रोज़गार दफ्तर की

फाइलें भरें।

                                                                                                 (हीन ग्रंथि- इंफीरिओरिटी कॉम्प्लेक्स)

नमस्कार।

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9. झूमती चली हवा

अपने शुरु के ब्लॉग्स में से एक और आज दोहरा रहा हूँ, वैसे यह नौवां ब्लॉग था, और शायद शाहदरा में मेरी प्रवास अवधि के संबंध में अंतिम पड़ाव जैसा था।
लगातार सीधी राह पर चलते जाने से भी काफी थकान हो जाती है, अतः थोड़ा इधर-उधर टहल लेते हैं।
मैं यह भी बता दूं कि यहाँ अपनी निजी ज़िंदगी का विवरण देना मेरा उद्देश्य नहीं है। पात्र यदि कहीं आए हैं तो वे या तो पृष्ठभूमि के तौर पर आए हैं, या ऐसे पात्र आए हैं जो अब मेरे जीवन में नहीं हैं। कहानी की नायक परिस्थितियां ही हैं।
आज अपने मुहल्ले से आगे बढ़कर, अपने क्षेत्र- शाहदरा की कुछ बात कर लेते हैं। इस शहर में क्या प्रमुख तौर पर था? एक तो मेरे दोनों स्कूल ही थे- गौशाला वाली सनातन धर्म प्राथमिक पाठशाला और बाबूराम आदर्श उच्चतर माध्यमिक विद्यालय, जो उस समय तक तो ‘आदर्श’ था जब तक मैंने वहाँ पढ़ाई की।
हायर सैकेंडरी परीक्षा पास करने तक, शाहदरा की सीमाओं तक ही मेरी गतिविधियां सीमित थीं, उसके बाद दो वर्ष तक गाज़ियाबाद आना-जाना भी शामिल हो गया था और उसके बाद आया दिल्ली, मतलब यमुना के इस पार नियमित यात्रा का सिलसिला।
शाहदरा या कहें कि यमुना पार का इलाका अनेक मामलों में उस समय तक बहुत पिछड़ा हुआ था, अब भी शायद काफी हद तक हो। उस समय तक यमुना पर एक ही पुराना पुल था, जो रेल और सड़क यातायात दोनों के काम आता था।
विकास को भी पहुंचने के लिए प्रभावी संपर्क/यातायात साधनों की ज़रूरत होती है। मुझे याद है कि पुराने यमुना ब्रिज होकर बस से दिल्ली ( मेरे लिए या सभी यमुना पार वासियों के लिए, यमुना के इस पार का इलाका ही दिल्ली है) पहुंचने के लिए अक्सर ब्रिज पार करने में ही एक घंटा लग जाता था। अब सड़क के कई रास्ते खुल चुके हैं, मैट्रो भी जीवन में काफी गति ला चुकी है, लेकिन आज भी जब ट्रेन से शाहदरा और दिल्ली के बीच यात्रा करें, तो कितना समय पुराने ब्रिज पर लगेगा, कह नहीं सकते।
खैर कुछ इलाके जो शाहदरा के नाम से याद आते हैं, वे हैं- छोटा बाज़ार, बड़ा बाज़ार, फर्श बाज़ार, राधू सिनेमा, कृष्णा नगर आदि।
उस समय वहाँ कच्चे मैदान काफी होते थे, सड़क के दोनों तरफ भी काफी दूर तक कच्ची ज़मीन होती थी, जब आंधी आती थी, तब धूल-मिट्टी सप्लाई करने में इन कच्चे मैदानों का भरपूर योगदान होता था। धीरे-धीरे निर्माण होते गए, नगर निगम के माध्यम सड़क किनारे पक्की पटरियों का निर्माण होता गया और हाँ इस बहाने पार्षद भी कुछ अमीर होते गए। लेकिन धूल-मिट्टी का संकट अब पहले जैसा नहीं रह गया।
शाहदरा को जब याद करता हूँ, तब वहाँ की एक गतिविधि जो काफी याद आती है, वह है रामलीला। वहाँ पर दो रामलीला होती थीं, छोटी और बड़ी रामलीला। छोटी रामलीला हमारे घर से पास पड़ती थी। वहाँ बड़े बाजार में कुछ कपड़े का व्यवसाय करने वाले सेठ थे, जो इन दोनों रामलीलाओं के कर्ता-धर्ता होते थे। लीला तो खैर 10-11 दिन तक दोनों मैदानों में होती ही थीं, सबसे बड़ा आकर्षण होती थीं आखिर के दिनों में निकलने वाली झांकियां, जिनमें प्रशंसा बटोरने के लिए दोनों रामलीला कमेटियां जी-जान लगा देती थीं। पूरी रात झांकियां निकलती थीं, वैसे भी जिस कमेटी का नंबर पहले आ जाए, वह अपनी झंकियों को आगे बढ़ाते ही नहीं थे, ताकि दूसरी कमेटी का नंबर जल्दी न आए।
झांकियों में प्रसंग पुराने ज़माने के होते थे और गाने आधुनिक बजते रहते थे, जिनसे मिलकर कई बार अजीब प्रभाव पड़ता था। एक रामलीला के मुख्य संचालक थे चुन्नीलाल जी। दूसरी रामलीला वालों ने चीर-हरण की एक झांकी बनाई और उसका नाम रखा- ‘चुन्नी चोर’।
अब अपनी प्रिय एक बात। राज कपूर और मुकेश मेरी यात्रा में हर कदम मेरे साथ हैं। मुझे मुकेश जी का गया यह गीत भी बहुत पसंद है-
झूमती चली हवा, याद आ गया कोई
खो गई हैं मंज़िलें, मिट गए हैं रास्ते,
गर्दिशें ही गर्दिशें अब हैं मेरे वास्ते
और गर्दिशों में आज फिर बुला गया कोई।
मेरे एक कवि मित्र को भी मुकेश बहुत पसंद हैं। उन्होंने ऊपर उल्लिखित गीत के बारे में अपना संस्मरण सुनाया, कि वे बचपन में घर के बाहर चारपाई पर लेटे थे, जब म्युंसिपैलिटी वाले गली के उनके प्रिय कुत्ते को उठाकर ले गए, और उस समय रेडियो पर गीत की ये पंक्तियां आ रही थीं-
चुप हैं चांद-चांदनी, चुप ये आसमान है,
मीठी-मीठी नींद में सो रहा जहान है,
और ऐसे में मुझे फिर रुला गया कोई।
अब यहीं समाप्त करते हैं, हमेशा सीरियस होना ही ज़रूरी तो नहीं है।
अगली बार से नौकरी शुरु करेंगे।
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4. इब्तदा कुछ इस तरह

अपने शुरु के ब्लॉग्स में से एक को आज दोहरा रहा हूँ, वैसे यह चौथा ब्लॉग था, लेकिन इससे मैंने क्रमशः अपनी कहानी सुनाना शुरू किया था।

किसी ने फिर न सुना, दर्द के फसाने को

मेरे न होने से राहत हुई ज़माने को। 

खैर दर्द का फसाना सुनाने का मेरा कोई इरादा नहीं है। ज़िंदगी के साथ, इस राह में मिले कुछ विशेष पात्रों, विशेष परिस्थितियों के साथ हुए ऐसे अंतर्संवाद, जिनमें मुझे ऐसा लगता है कि अन्य लोगों की रुचि हो सकती है, उनको ही यहाँ प्रस्तुत करने का प्रयास करूंगा।

अब तक जो कुछ कहा, उसको ऐसा समझ लीजिए कि जैसे मदारी गली में आकर, डुगडुगी या बांसुरी बजाकर लोगों को आकर्षित करने का प्रयास करता है, वैसा ही है। आजकल जिसे कर्टेन रेज़रभी कहा जाता है, हालांकि वे मेरी इस कथा का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं और मैं चाहूँगा कि मेरे मित्र उनको भी अवश्य पढ़ लें। वे ऐसे प्रसंग थे, जो लाइन तोड़कर पहले ही उपस्थित हो गए। अब जिन प्रसंगों को शेयर करने जा रहा हूँ, उनमें बड़ी दुविधा है कि क्या कहूं और क्या न कहूं।  

कोई कथा या धार्मिक आयोजन होता है तो प्रारंभ में देवता स्थापित किए जाते हैं। एक होते हैं, स्थान देवता- यह बताने का मेरा कर्तव्य है कि मैं कहाँ स्थापित या विस्थापित था उस समय, जब ये घटनाएं हुईं।

संक्षेप में बता दूं कि मेरा जन्म दरियागंज में हुआ था, वर्ष 1950 में, दरियागंज थाने के सामने, कोई कटरा है, वहाँ। मैं शायद 5 वर्ष का था जब यहाँ से हम शाहदरा चले गए थे। दरियागंज की कोई याद बताने लायक नहीं है।

एक याद है कि नेहरू जी सामने से निकले, खुली जीप में हाथ हिलाते हुए, नहीं मालूम कि अवसर कौन सा था। एक छवि मन में है कि पुतला साइकिल चला रहा था, जो बिजली की सजावट में, बाद में बहुत समय बाद देखा, पहली बार बचपन में जो देखा शायद वह प्रदर्शनी मैदान में रहा होगा।

शाहदरा में जहाँ हम जाकर बसे, वह स्थान है भोलानाथ नगर, सनातन धर्म पाठशाला और गौशाला के पीछे, एक मुख्यमार्ग जो राधू सिनेमा से बाबूराम आदर्श उच्चतर माध्यमिक विद्यालय तक जाता है, उसी की बगल में था हमारा घर, संते की डेयरी के पीछे। उस डेयरी में उस समय 15-20 भैंसे और कुछ गाय भी थीं। इस समय उसके स्थान पर मदर डेयरी है, जिसमें लोहे की एक भैंस है, जो शायद उन सभी भैंसों से ज्यादा दूध देती है।

पिताश्री सेल्स रिप्रेज़ेंटेटिव का काम करते थे, जब तक दरियागंज में थे, तब तक अच्छा काम चल रहा था, शाहदरा जाने के बाद, जिस कंपनी में वो काम करते थे वह छोड़ दी और उसके बाद, जब तक मैंने उन्हें देखा, वे नौकरियां बदलते रहे। अक्सर वो बाहर रहते थे। जब जाते थे तब किसी और फर्म का प्रतिनिधित्व कर रहे होते थे और लौटते थे किसी और फर्म के प्रतिनिधि के रूप में। एक लाल रंग का अंगोछा हमेशा उनके पास रहता था। जब वो लौटकर आते थे, उनके अंगोछे में से दो चीज़ों की मिली-जुली गंध आती थी, एक तो कलाकंद जो वो हमेशा लेकर आते थे और एक भांग, जो वो हमेशा खाते थे।

जिन फर्मों के लिए वो काम करते थे उनके ऑफिस सामान्यतः चांदनी चौक, दिल्ली में या उसके आस-पास होते थे। मुझे याद है कि एक बार उनके साथ चांदनी-चौक गया, मिठाई की दुकान पर वे मुझे क्या-क्या खिलाने की कोशिश करते रहे। धंधे की हालत लगातार बिगड़ती जा रही थी। उस समय शाहदरा से पुरानी दिल्ली का रेल या बस का किराया बहुत अधिक नहीं रहा होगा, लेकिन एक-दो बार मैंने यह भी देखा कि भांग की एक गोली निगलकर वो पैदल ही दिल्ली के लिए निकल लिए। मैंने काफी समय बाद कोशिश की पैदल शाहदरा से चांदनी चौक आने की, 6 किलोमीटर से ज्यादा ही पड़ता है, आसान नहीं है।

मैं आंतरिक रूप से जैसा बना, उसमें शायद सबसे अधिक मेरे पिता के संघर्ष का ही हाथ है, आगे भी उसके बारे में बात करूंगा, फिलहाल कुछ और बात कर लेते हैं।

कक्षा 1 से 5 तक की पढ़ाई मैंने सनातन धर्म पाठशाला में की, जिसे गौशाला वाला स्कूल कहते थे, क्योंकि स्कूल के बगल में ही गौशाला थी और अहाते में ही एक मंदिर भी था। उसके बाद कक्षा 6 से 12 तक की पढ़ाई बाबूराम स्कूल में की, जिसके पूरे नाम में उस समय आदर्शभी शामिल था और जब तक मैंने वहाँ पढ़ाई की शामिल रहा। बाद में मालूम हुआ कि किसी नकल-वीर ने, नकल से रोकने पर, एक शिक्षक की हत्या कर दी और स्कूल आदर्शका अतिरिक्त बोझ ढ़ोने के लायक नहीं रह गया। बहुत अच्छे अंग्रेजी शिक्षक थे वो, हरीश चंद्र गोस्वामी, आज भी उनकी छवि याद है।

बाबूराम स्कूल, कक्षा 6 से 12 की पढ़ाई की अवधि, इसमें तो ऐसी कुछ बातें अवश्य होंगी जो सुधीजनों के साथ शेयर की जा सकें। ये बातें अगले ब्लॉग में करेंगे। 

 बीमार बाग जैसी, है ये हमारी दुनिया,

          इस प्राणवान तरु की, मृतप्राय हम टहनियां,

     एक कांपती उदासी, हर शाख पर लदी है।

                              ये बीसवीं सदी है।                                      (डा. कुंवर बेचैन)

नमस्कार।

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