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143. मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता

आज एक बार फिर से निदा फाज़ली साहब की एक गज़ल शेयर करने का मन हो रहा है।
गज़ल में अपनी बात कहने का सलीका, और जिस बारीकी से फीलिंग्स को कविता में उकेरा जाता है, यह उनकी पहचान रही है।

हम सभी इस दुनिया में जी रहे हैं, किसी के पास पैसा है, रुतबा है, साधन हैं सब तरह के, लेकिन पता ही नहीं चलता कि वह कौन सी चीज़ है जिससे ज़िंदगी में आराम आएगा, तसल्ली मिलेगी! बेशक प्रेम तो इसमें शामिल है ही, लेकिन वह किस तरफ से मिलने वाला, किस तरह का प्रेम है, जो नहीं होने से हमारी ज़िंदगी में एक बड़ा अधूरापन पैदा कर देगा।

अब बिना किसी भूमिका के, निदा फाज़ली साहब की यह गज़ल शेयर करूं, इससे पहले एक बात और- जब कविता या शायरी को हम लिखित रूप में देखते हैं, तो हम उसके एक-एक शब्द को सिक्के की तरह उछालकर देख सकते हैं। शायद सुनते समय हम ऐसा नहीं कर पाते। प्रस्तुत है ये गज़ल-

कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता

कहीं ज़मीन कहीं आसमाँ नहीं मिलता।

तमाम शहर में, ऐसा नहीं ख़ुलूस न हो

जहाँ उमीद हो इसकी, वहाँ नहीं मिलता ।

कहाँ चराग़ जलाएँ, कहाँ गुलाब रखें

छतें तो मिलती हैं लेकिन मकाँ नहीं मिलता।

ये क्या अज़ाब है सब अपने आप में गुम हैं

ज़बाँ मिली है मगर हम-ज़बाँ नहीं मिलता।

चराग़ जलते हैं बीनाई बुझने लगती है

ख़ुद अपने घर में ही घर का निशाँ नहीं मिलता।

नमस्कार।
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