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29. एक बूंद पानी में एक वचन डूब गया!

जीवन यात्रा का एक और पड़ाव, लीजिए प्रस्तुत है एक और पुराना ब्लॉग! बीच के एक-दो ब्लॉग्स में कुछ छोटे लोगों का ज़िक्र हो गया था, मैं उनको दोहराकर उन लोगों को ज्यादा महत्व नहीं देना चाहता।

अब विंध्याचल परियोजना के क्लबों का ज़िक्र कर लेते हैं। दो क्लब थे वहाँ पर, वीवा क्लब (विंध्याचल कर्मचारी कल्याण क्लब) और विंध्य क्लब। वहाँ समय-समय पर होने वाली सांस्कृतिक गतिविधियों के अलावा, हिंदी अनुभाग की ओर से कभी-कभी कवि गोष्ठियों का आयोजन भी हम वहाँ करते थे। अधिक प्रतिभागिता वाले कार्यक्रम तो रूसी प्रेक्षागृह में किए जाते थे।

मुझे याद है कि एक बार कविताओं पर आधारित अंत्याक्षरी प्रतियोगिता वीवा क्लब में हमने की थी, जिसमें अनेक टीमों ने भाग लिया था, काफी दिन तक यह प्रतियोगिता चली थी और प्रतिभागियों ने आगे बढ़ने के लिए बहुत से काव्य संकलन भी खरीदे थे।

खैर अभी जो मुझे क्लबों की याद आई उसका एक कारण है। हमारे बच्चे लोग क्लबों में खेलने के लिए जाते थे, एक रोज़ शाम को मेरा बड़ा बेटा क्लब से घबराया हुआ घर आया, आते ही उसने अपनी मां से पूछा- ‘मां, पापाजी कहाँ हैं’ और उसको यह जानकर तसल्ली हुई कि मैं घर पर ही था और ठीक-ठाक था।

असल में उसने क्लब में सुना था कि किसी- एस.के.शर्मा ने आत्महत्या कर ली है। यह एक बड़ी दुखद घटना थी, जो वहाँ देखने को मिली। इस घटना की पृष्ठभूमि के संबंध में, बाद में ‘मनोहर कहानियां’ मे “डर्टी कल्चर” नाम से लंबी स्टोरी छपी थी। खैर उसके संबंध में चर्चा करने का मेरा कोई इरादा नहीं है।

ये बड़ी  अजीब बात है कि जो वांछनीय नहीं है, वही इन पत्रिकाओं के लिए – ‘मनोहर कहानी’ होता है, ‘मधुर कथा’ या ‘सरस कथा’ होता है। ये पत्रिकाएं अपराधों के संबंध में रस ले-लेकर कहानी सुनाती हैं और मेरा पूरा विश्वास है कि इससे अपराध को बढ़ावा मिलता है। आजकल टीवी पर भी इस प्रकार के कार्यक्रम आते हैं। इनको बढ़ावा नहीं दिया जाना चाहिए।

अब कवियों और कवि सम्मेलनों के संबंध में बात कर लेते हैं। विंध्याचल परियोजना में जाने के बाद, शुरु के ही एक आयोजन में ऐसा हुआ था कि हमने नीरज जी को भी आमंत्रित किया था और सुरेंद्र शर्मा को भी बुला रहे थे। उस समय हमारे विभागध्यक्ष थे श्री आर.एन. रामजी। सुरेंद्र शर्मा ने जो राशि मांगी थी वह नीरज जी से तीन गुना थी, यह अनुपात तो शायद आज भी कायम होगा, शायद और बढ़ गया हो, लेकिन श्री रामजी ने कहा, इस कवि को कभी मत बुलाना, मैं इस बात पर हमेशा कायम रहा। अगर हमें भारी रकम देकर चुटकुले ही सुनने हैं, तो कपिल शर्मा जैसे किसी व्यक्ति को बुलाएंगे, कविता के नाम से चुटकुले क्यों सुनेंगे।

एक और आयोजन में हमारे यहाँ श्री सूंड फैज़ाबादी आए थे, वे बोले कि शुरू में लोग हमको मंच पर नहीं चढ़ने देते थे, कहते थे हास्य वाला है। फिर वो बोले कि अब हम फैसला करते हैं कि मंच पर कौन चढ़ेगा। मैंने खैर खयाल रखा कि हमारे आयोजनों में ऐसा न हो पाए। हमने हास्य के ओम प्रकाश आदित्य, प्रदीप चौबे, जैमिनी हरियाणवी, माणिक वर्मा जैसे ख्याति प्राप्त कवियों को बुलाया, लेकिन मंच पर विशेष दर्जा हमेशा साहित्यिक कवियों को दिया।

हमारे आयोजन में श्री शैल चतुर्वेदी एक बार ही आए थे, मुझे याद है उस समय रीवा जिले के युवा एसएसपी- श्री राजेंद्र कुमार भी आए थे और वे शैल जी के साथ काफी फोटो खिंचवाकर गए थे। शैल जी से आयोजन के बाद बहुत देर तक बात होती रही। वे मेरे संचालन से बहुत खुश थे, बोले आप इतना धाराप्रवाह बोलते हो बहुत अच्छा लगा। उन्होंने बताया कि शंकर दयाल शर्मा जी (उस समय के राष्ट्रपति) हर साल राष्ट्रपति भवन में कवि गोष्ठी करते हैं,जिसमें वह जाते थे और उनका कहना था कि अगले साल वो राष्ट्रपति भवन में मुझे बुलाएंगे और मुझे आना होगा। खैर उसके बाद शैल जी ज्यादा समय जीवित भी नहीं रहे थे।

कुछ कवि सम्मेलन तो ऐसे यादगार रहे कि आनंद के उन पलों को आज भी याद करके बहुत अच्छा लगता है। श्री सोम ठाकुर जी का श्रेष्ठ संचालन और उसमें अन्य अनेक ख्यातिप्राप्त कवियों के साथ-साथ श्री किशन सरोज का गीत पाठ –

छोटी से बड़ी हुई तरुओं की छायाएं,

धुंधलाई सूरज के माथे की रेखाएं,

मत बांधो आंचल में फूल चलो लौट चलें,

वह देखो, कोहरे में चंदन वन डूब गया।

 

माना सहमी गलियों में न रहा जाएगा,

सांसों का भारीपन भी न सहा जाएगा,

किंतु विवशता है जब अपनों की बात चली,

कांपेंगे अधर और कुछ न कहा जाएगा।

 

सोने से दिन, चांदी जैसी हर रात गई,

काहे का रोना जो बीती सो बात गई,

मत लाओ नैनों में नीर कौन समझेगा,

एक बूंद पानी में एक वचन डूब गया।

 

दाह छुपाने को अब हर पल गाना होगा,

हंसने वालों में रहकर मुसकाना होगा,

घूंघट की ओट किसे होगा संदेह कभी,

रतनारे नयनों में एक सपन डूब गया। 

मन हो रहा था कि पूरा ही गीत यहाँ उतार दूं, लेकिन स्थान की दिक्कत है, यह एक ऐसा गीत है जैसे कोई डॉक्युमेंट्री फिल्म चल रही हो, ऐसी फिल्म जिसमें मन के भीतर की छवियां बड़ी कुशलता के साथ उकेरी गई हैं। कुछ पंक्तियां किशन सरोज जी के एक और प्रसिद्ध गीत की, इस प्रकार हैं-

धर गए मेहंदी रचे, दो हाथ जल में दीप

जन्म-जन्मों ताल सा हिलता रहा मन।

तुम गए क्या जग हुआ अंधा कुआं

रेल छूटी रह गया केवल धुआं,

हम भटकते ही फिरे बेहाल,

हाथ के रूमाल सा, हिलता रहा मन।

 

बांचते हम रह गए अंतर्कथा,

स्वर्णकेशा गीत वधुओं की व्यथा,

ले गया चुनकर कंवल, कोई हठी युवराज,

देर तक शैवाल सा हिलता रहा मन।

आज के लिए इतना ही।    

नमस्कार।

                                                                     ============  

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25. अखबारों में, सेमीनारों में, जीता है आम आदमी!

जीवन यात्रा का एक और पड़ाव, लीजिए प्रस्तुत है एक और पुराना ब्लॉग!

जैसा कि मैंने बताया, अब बारी थी मेरे सेवाकाल के अंतिम नियोजक, एनटीपीसी लिमिटेड के साथ जुड़ने की, जहाँ मेरी सेवा भी सबसे लंबी रही। 21 मार्च, 1988 को मैंने एनटीपीसी की विंध्याचल परियोजना में कार्यग्रहण किया, यहाँ मुझे सांस्कृतिक गतिविधियों के आयोजन और संचालन का भरपूर अवसर मिला, प्रेम करने वाले ढ़ेर सारे लोग मिले लेकिन कुछ नफरत करने वाले ऊंचे पदों पर बैठे छोटे लोग भी मिले, जिनमें कुछ तो दुश्मनी करते-करते ऊपर भी पहुंच चुके हैं। यहाँ की कहानी सुनाने में कुछ धर्मसंकट भी है, कोशिश करूंगा उसका सामना करने की।

खैर, जैसा होता है रिक्ति सूचना प्रकाशित हुई थी एनटीपीसी की, मैंने आवेदन दिया, उस समय नेहरू प्लेस कार्यालय में लिखित परीक्षा एवं साक्षात्कार हुआ। साक्षात्कार में कुछ विद्वान लोग एवं उच्च अधिकारी थे, जैसा मुझे स्मरण है कि श्री मैनेजर पांडेय भी उसमें थे, उन्होंने पूछा कि यहाँ आने पर क्या विशेष आपको लगता है कि होगा? मैंने कहा था कि यहाँ मुझे स्वतंत्र रूप से कार्य करने का अवसर मिलेगा। इस पर एक धोती, कुर्ता एवं नेहरू जैकेट धारी सज्जन ने कहा था कि स्वतंत्र तो कोई नहीं है, प्रधान मंत्री के ऊपर भी राष्ट्र्पति होते हैं।

ये सज्जन थे – केंद्रीय कार्यालय में तैनात हिंदी प्रभारी- डॉ. राजेंद्र प्रसाद मिश्र, इस संक्षिप्त दर्शन एवं संवाद से इतनी झलक मिल गई थी कि ये सज्जन ढोंगी हैं और हीन भावना से ग्रस्त हैं, इन्हें यह डर बना रहता है कि कहीं इनके वर्चस्व में कमी न आ जाए। बाद में इनके बारे में और बातें होंगी। शुरू में इतना ज़रूर कहना चाहूंगा कि राजभाषा संबंधी रिपोर्टों में थोड़ा बहुत झूठ तो सब जगह बोला जाता है, यहाँ मालूम हुआ कि इनके नेतृत्व में शुद्ध रूप से झूठ बोलना ही चलता है।

विंध्याचल में पहला ठिकाना था हमारा- फील्ड हॉस्टल, जिसका नाम था यमुना भवन और इस प्रकार एनटीपीसी से मेरे 22 वर्ष के घटनापूर्ण साथ का शुभारंभ हुआ, जिसमें से 12 वर्ष तो मैंने विंध्याचल परियोजना में ही बिताए थे। यहाँ मैं बताना चाहूंगा कि तीन-चार लोगों ने एक ही समय में वहाँ कार्यग्रहण किया था, एक से किसी ने पूछा कि कैसा है वहाँ पर तो उसने बताया कि दिल्ली के वसंत विहार जैसा समझ लीजिए, चौड़ी और साफ सड़कें और रात में भी रोशनी इतनी कि सड़क पर पड़ा हुआ पिन उठा सकते हैं।

जब मैंने कार्यग्रहण किया उस समय महाप्रबंधक थे श्री वेंकटरमण, जो मेरे कार्यग्रहण के बाद कुछ समय ही रहे, बहुत प्रभावी और रौबीले अधिकारी थे। उसके बाद श्री एस.एस.एस.दुआ ने महाप्रबंधक के रूप में पदभार ग्रहण किया, बहुत अच्छे अधिकारी थे, बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे तथा सभी प्रकार की गतिविधियों में उनकी सक्रिय रुचि थी। उनके समय में मैंने बहुत अच्छे कवि सम्मेलनों का आयोजन किया तथा ‘विंध्य वीणा’ नाम से हिंदी अनुभाग की वार्षिक पत्रिका का भी प्रकाशन प्रारंभ किया।

कार्मिक एवं प्रशासन विभाग में हमारे मुख्य कार्मिक प्रबंधक थे श्री आर.एन.रामजी, जो बहुत सिद्धांतवादी व्यक्ति थे, पहले केंद्रीय कार्यालय में रह चुके थे और कंपनी के नियमों के निर्माण में उनकी प्रमुख भूमिका थी। सिद्धांतवादी होने का यह परिणाम भी हुआ कि उन्होंने सी.बी.आई. से आए हुए सतर्कता अधिकारी को उसकी पात्रता से ऊंचा आवास नहीं दिया और बाद में सी.बी.आई. की जांच का सामना उनको करना पड़ा।

यहाँ मैं राजभाषा के अलावा जनसंपर्क, स्कूल समन्वय,कल्याण आदि कार्य भी देख रहा था, अक्सर ऐसा होता था कि मैं कोई सांस्कृतिक कार्यक्रम संचालित करता था और उसके बाद अपने घर चला जाता था, अगले दिन सुबह महाप्रबंधक कार्यालय से हमारे यहाँ फोन आता था, मुझे ढ़ूंढ़कर भेजा जाता, मैं घबराता कि क्या हो गया, तब  मालूम होता कि महाप्रबंधक महोदय ने मुझे पिछले दिन के आयोजन के सफल संचालन हेतु बधाई देने के लिए बुलाया है।

श्री दुआ ने अपने कार्यकाल में वहाँ लायंस क्लब की गतिविधियों को भी भरपूर बढ़ावा दिया और इस बहाने काफी दूर-दूर से लोग यहाँ आते थे और क्लब के कार्यक्रमों के संचालन से भी मुझे लोगों का काफी प्रेम मिला।

नौकरी के दौरान, प्रोजेक्ट लाइफ में क्या हुआ, यह बात तो करते रहेंगे, अभी एक घटना दिल्ली की बता दूं, दिल्ली-शाहदरा, जहाँ मेरी मां अभी तक रहती थीं, पहले हम सभी एक बड़ा सा कमरा और रसोई लेकर 16 रुपया महीना पर रहते थे, अभी मेरी मां एक छोटी सी कोठरी में रहती थीं,जिसमें मुश्किल से एक छोटा सा खटोला आता था, इसका किराया था 100 रुपया। समय काफी बदल चुका था।

खैर मैं वहाँ गया, मां ने बड़े चाव से खाना बनाकर खिलाया, चलते समय मैंने मां को चार नोट दिए, मां बोली बेटा एक और दे देता तो ठीक रहता, दो महीने का किराया 200/- देना है, सौदे के 100/- बाकी हैं,100/- का अभी आ जाएगा, 100/- आगे के लिए बच जाते तो ठीक रहता।

यह सब बताने का उद्देश्य मात्र इतना है कि मैंने जो 500/- के नोट दिए थे उनको मेरी मां 100 के नोट समझ रही थे, और उसकी अपेक्षाएं कितनी कम थीं। सही बात बताने पर मां ने भरपूर आशीर्वाद दिए।

खैर यह अफसोस तो सदा रहा कि मां हमारे साथ रहकर अधिक सुख न भोग सकी।

अपनी लिखी कुछ पंक्तियां याद आ रही हैं-

मंदिर के पापों ने कर दिया,

नगरी का आचरण सियाह,

होता है रोज आत्मदाह।

मौलिक प्रतिभाओं पर फतवों का

बोझ लादती अकादमी,

अखबारों में सेमीनारों में

जीता है आम आदमी,

सेहरों से होड़ करें कविताएं

कवि का ईमान वाह-वाह।

होता है रोज आत्मदाह।।  

 

जीने की गूंगी लाचारी ने,

आह-अहा कुछ नहीं कहा,

निरानंद जीवन के नाम पर,

एक दीर्घ श्वास भर लिया,

और प्रतिष्ठान ने दिखा दिया

पंथ ताकि हो सके निबाह।

होता है रोज आत्मदाह।।  

हर अनिष्टसूचक सपना मां का,

बेटे की सुधि से जुड़ जाता है,

और वो कहीं पसरा बेखबर

सुविधा के एल्बम सजाता है।

ये युग कैसा जीवन जीता है,

उबल रहा तेल का कड़ाह।

होता है रोज आत्मदाह।।

                                (श्रीकृष्ण शर्मा)

नमस्कार।

                                                                    ============

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24. और चुकने के लिए हैं, ऋण बहुत सारे!

जीवन यात्रा का एक और पड़ाव, लीजिए प्रस्तुत है एक और पुराना ब्लॉग!

अब बारी थी, हिंदुस्तान कॉपर लिमिटेड की ही एक इकाई, खेतड़ी कॉपर कॉम्प्लेक्स में कुछ समय प्रवास की, जयपुर के बाद एक बार फिर से राजस्थान में रहने का अवसर मिला था। राजस्थान के लोग बहुत प्रेम करने वाले हैं। लेकिन यह इकाई क्योंकि दिल्ली और जयपुर, दोनों के बहुत नज़दीक है इसलिए यहाँ राजनीति बहुत जमकर होती है, कम से कम उस समय तो ऐसा ही था। सात-आठ श्रमिक यूनियन थीं उस समय वहाँ, सबके बीच वर्चस्व की लड़ाई, एक बार तो सभी अधिकारियों को पूरी रात ऑफिस में बंद रखा था उन्होंने, अब मुद्दों का क्या है, वे तो मिल ही जाते हैं।

वैसे यूनियनों का एक अलग पक्ष है, वे भी सक्रिय थीं, लेकिन सांस्कृतिक रूप से भी यह क्षेत्र काफी सक्रिय था। यहाँ हिंदी के प्रभारी, जो बाद में पूरी तरह जन संपर्क विभाग को अपना समय देने लगे थे- श्री इंद्रजीत चोपड़ा, उन्होंने मुझे काफी प्रोत्साहन दिया और अपने हिसाब से नई पहल करने की प्रेरणा प्रदान की। यहाँ कई रचनाकार भी थे और एक सज्जन साहित्यिक पत्रिका भी निकालते थे, वैसे वे अस्पताल में डेंटिस्ट थे। यहाँ कई बड़े आयोजन होते थे और मुझे कई आयोजन समितियों में सक्रिय रूप से काम करने का अवसर मिला।

कुल डेढ़ वर्ष के खेतड़ी प्रवास के दौरान मुझे दो तरह के हॉस्टलों में रहने का अवसर मिला, जिनमें से एक था- फ्रेंच हॉस्टल, शायद प्रारंभ में वहाँ फ्रांसीसी एक्सपर्ट रहे होंगे। जब तक रैगुलर आवास में रहने का अवसर आता, तब तक मैंने उस स्थान को भी छोड़ दिया।

खैर मैं आपको खेतड़ी रियासत के ऐतिहासिक महत्व की भी जानकारी दे दूं। मुझे खेतड़ी के राजा का महल देखने का भी अवसर प्राप्त हुआ। मैं यह बता दूं कि वे खेतड़ी के राजा ही थे, जिन्होंने स्वामी विवेकानंद के अमरीका जाने का खर्च वहन किया था। वहाँ महल में एक घटना का विवरण लिखा गया है।

यह घटना ऐसे हुई कि स्वामी विवेकानंद एक बार जब खेतड़ी के महाराजा से मिलने आए, उस समय वहाँ एक गणिका नृत्य कर रही थी। स्वामी जी उसकी आवाज़ सुनकर बाहर ही रुक गए, गणिका स्वामी जी के संकोच को समझ गई और उसने नाचते-नाचते यह भजन गाना प्रारंभ कर दिया-

प्रभु जी मेरे अवगुण चित न धरो।

एक लोहा पूजा में राखत, एक घर वधिक परो,

यह दुविधा पारस नहीं माने, कंचन करत खरो॥

स्वामी जी ने ये पंक्तियां सुनीं तो वे भीतर जाकर उस गणिका के चरणों गिर पड़े और बोले- “ मां, मुझे क्षमा करना, मुझे यह भेद नहीं करना चाहिए था।“

खेतड़ी में लगभग डेढ़ वर्ष के प्रवास के दौरान कई श्रेष्ठ आयोजनों को करने, उनमें भागीदारी का अवसर मिला। इनमें से एक था- श्री राजेंद्र यादव का विशेष व्याख्यान। हिंदी दिवस के अवसर आयोजित इस व्याख्यान में जहाँ श्री यादव ने काफी अच्छी बातें की वहीं शायद अपने तब तक विकसित हो चुके स्वभाव के कारण कुछ विवादास्पद टिप्पणियां भी कर दीं।

जैसे कि श्री यादव ने कहा कि “गीता में श्रीकृष्ण के उपदेशों को मैं एक चालाक वकील के तर्कों से अधिक कुछ नहीं मानता।”

जैसा कि मैंने कहा वहाँ यूनियनों की निरंतर प्रतियोगिता के कारण औद्योगिक  वातावरण कोई बहुत अच्छा नहीं था। जैसे कि हमारे हिंदी अनुभाग में एक चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी थे, जो शायद फौज में काम कर चुके थे, सब उसको फौजी कहते थे। उसकी अधिकारियों के बारे में राय यही थी कि वे सर्प होते हैं, छोटा हो या बड़ा, सबमें विष समान होता है। खैर यही फौजी महोदय थे, जो मेरे कंपनी छोड़ने पर मुझे अपने गांव ले गए और बैंड-बाजे के साथ मेरी विदाई की थी।

कुल डेढ़ वर्ष के प्रवास में ही वहाँ के लोगों से बहुत घनिष्ठ संबंध हो गया था, लेकिन क्या करें एक और नौकरी मिल गई थी, जो ज्यादा आकर्षक थी, सो यहाँ से भी बिस्तर बांधना पड़ गया।

ज़िंदगी की इस भागदौड़ में हर बात का अर्थ बदल जाता है। डॉ. कुंवर बेचैन की कुछ पंक्तियां याद आ रही हैं-

ज़िंदगी का अर्थ मरना हो गया है

और जीने के लिए हैं, दिन बहुत सारे।

इस समय की मेज पर रखी हुई

ज़िंदगी है पिन-कुशन जैसी,

दोस्ती का अर्थ चुभना हो गया है,

और चुभने के लिए हैं, पिन बहुत सारे।

एक मध्यम वर्ग के परिवार की

अल्प मासिक आय सी है ज़िंदगी,

वेतनों का अर्थ चुकना हो गया है,

और चुकने के लिए हैं, ऋण बहुत सारे।

                         –डॉ. कुंवर बेचैन

अब इसके बाद आएगा, नौकरी में मेरा अंतिम पड़ाव- एनटीपीसी।  

                                                                     ============

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23. चांद पागल है अंधेरे में निकल पड़ता है!

जीवन यात्रा का एक और पड़ाव और, एक और पुराना ब्लॉग!
मुसाबनी प्रवास के दौरान मेरे 2-3 पड़ौसियों की बात कर लेते हैं, एक पांडे जी थे, बनारस के और सिविल विभाग में काम करते थे, उनके साथ मिलकर मैं खैनी खाया करता था। एक और पांडे जी थे, वो रांची के थे, दाढ़ी रखते थे और खदान में काम करते थे। एक मिश्रा जी थे, उड़ीसा के थे। मिश्रा जी बड़े सॉफिस्टिकेटिड थे। अपने स्कूटर को बहुत संभालकर रखते थे। अगर कोई उनको बता दे कि स्कूटर की आवाज़ कुछ अलग सी आ रही है तो वे तुरंत स्कूटर को 10-12 कि.मी. दूर सर्विसिंग के लिए ले जाने को तैयार हो जाते थे,क्योंकि आसपास तो कोई सर्विस सेंटर था ही नहीं।
मिश्रा जी का नाम मुझे एक विशेष कारण से याद आ रहा है, एक बार उन्होंने मेरे बारे में एक रोचक टिप्पणी की थी। यह तो मैंने बताया ही है कि वहाँ नेपाली काफी संख्या में थे। मिश्रा जी ने किसी से मेरे बारे में कहा कि उनका खयाल था कि मैं क्योंकि हिंदी अधिकारी हूँ, मुझे विद्वान और कल्चर्ड होना चाहिए लेकिन उन्होंने पाया कि ‘आय एम नो बेटर देन ए नेपाली’। ‘कैसे’? पूछने पर उन्होंने कहा कि देखो कैसे हा-हा करके हंसता है। तब से उनके सॉफिस्टिकेशन के प्रति मेरा ‘सम्मान’ और अधिक बढ़ गया।
खदान में कई बार दुर्घटना भी हो जाती थी, एक बार दाढ़ी वाले पांडे जी ( हम ऐसे ही याद रखते थे उनको) खदान में फंस गए थे और उनकी मृत्यु की खबर भी फैल गई थी लेकिन भगवान की दया से वे सुरक्षित निकल आए थे। खदान में दुर्घटना का खतरा तो कई बार पैदा हो जाता था, कभी-कभी ऐसा टार्गेट से आगे बढ़कर निष्पादन करने के अति उत्साह में भी होता था। एक बार तो ऐसा भी हुआ कि एक खनिक को घायल अवस्था में खदान से निकाला गया, वह अस्पताल में था तभी छत का कुछ हिस्सा गिर गया, उसने किसी तरह बिस्तर से लुढ़क कर अपनी जान बचाई।
मुसाबनी माइन्स में रहते हुए ही मैंने पहली बार ‘हिंदी शिक्षण योजना’ के अंतर्गत कर्मचारियों को प्रबोध, प्रवीण एवं प्राज्ञ परीक्षाओं के लिए प्रशिक्षित करना प्रारंभ किया। जैसा मैंने बताया, वहाँ सभी इलाकों के लोग थे परंतु बंगाल और उड़ीसा के अधिक ही थे। इस योजना का लाभ बड़े स्तर के अधिकारी भी उठाना चाहते थे, बड़ी संख्या में वहाँ से परीक्षाओं में भाग लेते थे और मैं जो कि एक कनिष्ठतम स्तर का अधिकारी था, उन सभी उच्च अधिकारियों का गुरुजी बन गया था।
एक बात और, मेरे तीन पुत्र हैं, पहला दिल्ली में हुआ था, दूसरा जयपुर में और तीसरे के जन्म-राज्य का मामला विवादास्पद है, क्योंकि उस समय यह बिहार था और अब झारखंड है।
खैर यह भी बता दूं कि धोखाधड़ी करने वाले हर काल में अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन करते रहे हैं। इसका एक उदाहरण याद आ रहा है। हम एक बार वहाँ से टाटानगर गए, वहाँ हम एक दुकान में घुसे तो एक नवयुवक ने हमारा स्वागत किया और अगवानी करके दुकान के अंदर ले गया। हम वस्तुएं पसंद करते गए और वह अन्य लोगों से वह सामान निकालकर देने के लिए कहता रहा। शायद हमने 4-5 हजार का सामान खरीदा था, अंत मे उसने बिल लाकर हमसे पैसे मांगे, जो हमने उसको दे दिए। इसके बाद जब हम सामान के साथ दरवाजे से बाहर निकलने लगे, तब बगल में काउंटर पर बैठे दुकान मालिक ने कहा कि पैसे तो दीजिए।
तब मालूम हुआ कि उस युवक को हम दुकानदार का आदमी मान रहे थे और वे लोग मान रहे थे कि वह हमारे साथ है तथा वह पैसा लेकर गायब हो चुका। अब आगे जो भी हुआ हो, किस्सा तो मजेदार है न, कम से कम आज की तारीख में तो है, उस समय जैसा भी रहा हो।
उड़ीसा में समुद्रतट का इलाका है दीघा, वहाँ से पास पड़ता था और वहाँ जाना एक अनूठा अनुभव था। वहाँ क्योंकि मुंबई जैसी भीड़ नहीं रहती। रात में काफी देर तक हम समुद्र तट पर रहे, बनारस वाले पांडे जी का और हमारा परिवार साथ था। संभव है कि पूर्णिमा का समय रहा हो, लेकिन पानी की जैसी ऊंची दिव्य दीवार मैंने वहाँ बनते देखी, वैसी फिर कभी देखने को नहीं मिली।
अब मेरा क्या है, मैं तो सुनाता जाऊंगा, पढ़ने का कष्ट तो दूसरों को करना है ना!
खैर मैंने शुरू में गुप्ता जी की तारीफ की थे, वास्तव अगर वे न अड़े होते तो वह मिनिस्टर का कैंडिडेट चुन लिया गया होता। लेकिन अब ऐसा हुआ कि मेरे कारण गुप्ताजी को डांट खानी पड़ गई।
असल में कंपनी के खेतड़ी कॉपर कॉम्प्लेक्स में हिंदी अधिकारी की रिक्ति हुई और क्योंकि मेरी मां दिल्ली में थीं और खेतड़ी राजस्थान में, दिल्ली से काफी पास है, अतः मैंने वहाँ जाने के लिए आवेदन किया। जगाती जी  ने मेरा आवेदन आगे बढ़ा दिया और यह उप महाप्रबंधक के पास होते हुए, गुप्ताजी के पास, उनकी टिप्पणी के लिए गया। गुप्ताजी भी दिल्ली के पास, शायद आगरा के रहने वाले थे और इधर आने का मन उनका भी था, इसलिए वे मेरे आवेदन को दबाकर बैठ गए।
श्री जगाती को जब यह पता चला तो उन्होंने गुप्ताजी को फोन पर डांटते हुए कहा कि अगर आप शर्मा को अभी नहीं जाने दोगे तो मैं गारंटी देता हूँ कि मैं ज़िंदगी भर आपको यहाँ से नहीं जाने दूंगा। घबराकर गुप्ताजी ने तुरंत मेरा आवेदन आगे बढ़ा दिया। इस प्रकार मेरे खेतड़ी, राजस्थान जाने की तैयारी हुई।
अब ऐसे ही राहत इंदौरी जी का एक शेर याद आ रहा है-

रोज तारों की नुमाइश में खलल पड़ता है,
चांद पागल है, अंधेरे में निकल पड़ता है।

नमस्कार ।

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162. ठेले पर हिमालय

डॉ. धर्मवीर भारती की रचना का शीर्षक याद आ गया, जो उन्होंने इलाहाबाद में ठेले पर अमरूद का ऊंचा पहाड़ बनाकार बेचने वालों को ध्यान में रखकर लिखा था।
दरअसल मैं मुहल्लों को याद कर रहा था, पुराने ज़माने के, जब हमारा बचपन था! सुबह-सुबह मुहल्ले में कुछ आवाजें आनी शुरू हो जाती थीं। कोई सामान बेचने वाला, खिलौने वाला, गुब्बारे वाला, चीनी गर्म करके, एक गोले को घुमाते हुए ‘बुढ़िया के गुलाबी बाल’ बेचने वाला, जिनका मुलायम गोला खाने में बहुत स्वादिष्ट लगता था।
उन दिनों तमाशा दिखाने वाला तो हर दिन कोई न कोई आता ही रहता था। वो बंदर का तमाशा हो, भालू का हो या फिर जादू का हो। यह भी बता दूं कि मैंने गलियों में जादू के कुछ ऐसे करतब देखे हैं जो आज अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर दिखाए जाते हैं।
खैर जैसा मैंने कहा, वो तो शायद किसी और जमाने की बातें थीं। यह भी हो सकता है कि कुछ पुराने किस्म के मुहल्लों में वह सब आज भी जीवित हो। आधुनिक नगरों, सोसायटियों में तो उस ‘साउंड पोल्यूशन’ पर पूरी तरह काबू पा लिया गया। वर्चुअल मुहल्लों में कुछ लोग प्रतिदिन अथवा अक्सर अपना खोमचा लगाकर बैठ जाते हैं, जैसा कि अभी मैं कर रहा हूँ। यहाँ जिसका मन होता है वह इस तमाशे को देखता है, जिसका मन हो वह यह बता भी देता है कि मैंने देखा और जैसा भी लगा हो। वैसे यहाँ भी अगर अचार-मुरब्बे बनाने जैसी उपयोगी जानकारी दी जाए तो लोगों को ज्यादा अच्छा लगता है या कोई सनसनीखेज जानकारी दी जाए, जो भले ही बाद में गलत साबित हो जाए, तब लोगों में कुछ रोमांच होता है।
ये सोशल मीडिया ही आज का जीवंत मुहल्ला है। पहले जब लोग स्वयं को अभिव्यक्त करना चाहते थे तब कविता, कहानी वगैरा लिखते थे, फिर उसको प्रकाशित अथवा प्रसारित करने के लिए पापड़ बेलने पड़ते थे। आज के इस मुहल्ले में प्रवेश करना तो बहुत आसान हो गया है, लेकिन कोई आपकी तरफ देखे या न देखे, यह तो उसकी इच्छा पर निर्भर है। अपने प्रोडक्ट की मार्केटिंग तो आपको करनी ही पड़ेगी। मुझे याद है इस विषय पर गुरुदत्त जी की फिल्म ‘प्यासा’ में भी लेखक की वेदना व्यक्त की गई थी, जब लोग उसकी रचनाओं को नहीं पढ़ते, सराहते तो वह लिखता है- ‘हटा लो इसे, फूंक डालो ये दुनिया’! इस पर किसी समीक्षक ने लिखा था कि आपने कुछ ऊल-जलूल लिख दिया तो क्या यह लोगों की ज़िम्मेदारी है कि वे उसको पढ़ें और सराहें ताकि आपको रॉयल्टी मिल सके। खैर हमें तो ऐसी कुछ उम्मीद नहीं है, मन हो तो पढ़ लीजिए, इच्छा हो तो कुछ कमेंट कर दीजिए, क्योंकि यह लिखने की बस आदत बन जाती है न-

फाक़िर सनमकदे में न आता मैं लौटकर
एक ज़ख्म भर गया था, इधर ले के आ गया।

नमस्कार।

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161. नए परिंदों को उड़ने में वक़्त तो लगता है!

आज जगजीत सिंह जी की गाई एक बहुत सुंदर गज़ल शेयर कर रहा हूँ, जिसके लेखक हैं- हस्ती जी।
वैसे देखा जाए तो यह गज़ल आज की नहीं लगती, दुनिया बड़ी तेजी से बदल रही है, कौन ख़त लिखता है आज की तारीख में! जब तलाक भी एसएमएस पर हो जाते हैं।
खैर यहाँ ख़त का मतलब, ख़त ही न समझा जाए, कुछ भी इज़हार करने में जो दिक्कत होती है, नए-नए प्रेमी को, अब मैं इस विषय का विशेषज्ञ भी नहीं हूँ, और कैसे काल्पनिक रास्तों पर जाने की बात की गई है इस गज़ल में- जिस्म की बात नहीं है उनके दिल तक जाना था, लंबी दूरी तय करने में वक़्त तो लगता है।
खैर कविता में तर्क नहीं चलता जी, आप गज़ल का आनंद लीजिए-

प्यार का पहला ख़त लिखने में वक़्त तो लगता है
नए परिंदों को उड़ने में वक़्त तो लगता है।

जिस्म की बात नहीं थी उनके दिल तक जाना था,
लंबी दूरी तय करने में वक़्त तो लगता है।

गाँठ अगर पड़ जाए तो फिर रिश्ते हों या डोरी,
लाख करें कोशिश खुलने में वक़्त तो लगता है।

हमने इलाज-ए-ज़ख़्म-ए-दिल तो ढूँढ़ लिया है,
गहरे ज़ख़्मों को भरने में वक़्त तो लगता है।

आज के लिए इतना ही।
नमस्कार।
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160. हरापन नहीं टूटेगा

आज  स्व. रमेश रंजक जी का एक नवगीत शेयर करने का मन हो रहा है, रंजक  जी नवगीत आंदोलन के एक महत्वपूर्ण रचनाकार थे। जो रचना शेयर कर रहा हूँ, इसी शीर्षक से उनका एक प्रारंभिक संकलन भी प्रकाशित हुआ था। इस गीत में उन्होंने आशावाद  और जुझारूपन की भावनाओं को अभिव्यक्त किया है।

प्रस्तुत है यह  नवगीत-

टूट जायेंगे
हरापन नहीं टूटेगा। 

कुछ गए दिन
शोर को कमज़ोर करने में
कुछ बिताए
चाँदनी को भोर करने में
रोशनी पुरज़ोर करने में

चाट जाये धूल की दीमक भले ही तन
मगर हरापन नहीं टूटेगा।

लिख रही हैं वे शिकन
जो भाल के भीतर पड़ी हैं
वेदनाएँ जो हमारे
वक्ष के ऊपर गढ़ी हैं

बन्धु! जब-तक
दर्द का यह स्रोत-सावन नहीं टूटेगा।

हरापन नहीं टूटेगा।। 

नमस्कार।

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22. बैरी अंधियारे से कॉपी जंचवानी थी!

जीवन यात्रा का एक और पड़ाव और, एक और पुराना ब्लॉग!

हिंदुस्तान कॉपर लिमिटेड का मऊभंडार में कारखाना था, जहाँ मेरा साक्षात्कार एवं चयन हुआ था, बड़े अधिकारी यहाँ बैठते थे। हमारे वरिष्ठ प्रबंधक- राजभाषा श्री गुप्ता जी भी यहाँ बैठते थे, वैसे वो अपना उपनाम ‘गुप्त’ ही लिखते थे और कहते थे कि गुप्ता का अर्थ कुछ गलत होता है। उनके अलावा एक हिंदी अधिकारी भी थे- श्री हरिनंदन प्रसाद ‘प्रभात’।  वे हिंदी अधिकारी के अलावा वैद्य भी थे।

मेरी पोस्टिंग मुसाबनी माइन्स में हुई थी, जो कारखाने से 8 कि.मी. दूर थी। यहाँ पर मेरे बॉस थे- मुख्य कार्मिक प्रबंधक- श्री किरण कुमार जगाती, इनका इलाहाबाद में ‘जगाती होटल’ भी था किसी समय। श्री जगाती उत्तराखंड से थे, उस समय तक पता नहीं उत्तराखंड बना था या नहीं, परंतु जब भी श्री के.सी.पंत या श्री नारायण दत्त तिवारी कोई पद ग्रहण करते तब वे उनको बधाई संदेश अवश्य भेजते थे, मुझे मालूम है क्योंकि पत्र का मसौदा मैं ही तैयार करता था। बहुत अच्छे इंसान थे जगाती जी लेकिन अक्सर टेंशन में रहते थे। दफ्तर में आते समय यदि सफाई कर्मी अपने डब्बे के साथ सामने पड़ गया तो उसकी खैर नहीं होती थी।

अब थोड़ी बात स्थान की कर लें। मऊभंडार घाटशिला स्टेशन से लगभग 2 कि.मी. दूर था। घाटशिला बंगला के ख्यातिप्राप्त रचनाकार- श्री विभूति भूषण बंद्योपाध्याय की कर्मस्थली है, जो रांची से कोलकाता की यात्रा में मध्य बिंदु है। विभूति दा के किसी भी उपन्यास में भूमिका के बाद, नीचे लिखा मिलेगा- घाटशिला और तारीख। विभूति दा के उपन्यासों पर सत्यजीत राय ने पथेर पांचाली तथा अन्य अनेक फिल्में बनाई हैं। हिंदी फिल्म ‘सत्यकाम’ भी उनके उपन्यास पर आधारित है और इसकी शूटिंग भी वहीं पर हुई थी।

विभूति दा के जन्मदिन समारोह में वहाँ प्रतिवर्ष बिहार, बंगाल और उड़ीसा के मुख्यमंत्री अथवा वरिष्ठ मंत्री आते थे, अब तो एक और राज्य बढ़ गया है क्योंकि अब यह इलाका ‘झारखंड’ में आता है।

खैर अब दफ्तर पर आते हैं, जैसा मैंने कहा घाटशिला स्टेशन से 2 कि.मी. दूर है मऊभंडार कारखाना, जहाँ खदानों से प्राप्त ताम्र अयस्क को प्रोसेस करके उससे तांबा बनाया जाता है। फिर मऊभंडार कारखाने से 8 कि.मी. और आगे जाना होता है, तब मुसाबनी माइन्स आती हैं। जैसा मैंने बताया मेरी पोस्टिंग माइन्स में थी, माइन्स और कारखाने के बीच अधिकारियों के आने-जाने के लिए शटल बस चलती थी। इत्तफाक से मेरी अनुवाद क्षमता से उच्च अधिकारी कुछ ऐसा प्रभावित हुए थे कि मुझे बार-बार कारखाने जाना पड़ता था, क्योंकि वहाँ ई.डी. बैठते थे अतः उसे ई.डी. ऑफिस कहा जाता था और मुझे वहाँ के काम के लिए ही बुलाया जाता था। अक्सर ऐसा होता था कि वहाँ के वरि. प्रबंधक (जन संपर्क)- श्री राजेंद्र कुमार ‘राज’ मुझे गेस्ट हाउस में बिठा देते थे, बोलते थे जो खाना-पीना हो, खाते-पीते रहो और अनुवाद या प्रचार सामग्री लिखने का काम करते रहो।

शुरू में तो बड़ी दिक्कत हुई, एक अनुवाद जो प्रभात जी (हिंदी अधिकारी) कर चुके थे, वह मुझे सुधारने के लिए उच्च अधिकारियों ने दे दिया, किसी महत्वपूर्ण व्यक्ति द्वारा लिखा गया लेख था। वैसे बहुत भ्रष्ट अनुवाद था और मुझे मालूम भी नहीं था कि किसने किया है। जब मैंने सुधार कर दिया तब प्रभातजी ने मुझसे कहा- आपकी हिम्मत कैसे हुई मेरे अनुवाद में सुधार करने की। खैर अधिक विवरण देकर आपको ‘बोर’ नहीं करूंगा।

कुल साढ़े तीन साल बिताए मैंने वहाँ प्रकृति की गोद में, एकदम जंगल में मंगल का माहौल होता है परियोजना की टाउनशिप में, देश के हर कोने के लोग थे वहाँ, वैसे बंगाल और उड़ीसा के लोग कुछ ज्यादा थे, जितने वहाँ अधिकारी थे, लगभग उतने ही ‘अधिकारी’ उपनाम वाले लोग थे।

एक अधिकारी थे वहाँ सिंह साहब, वो घर से बड़ी सी गाड़ी में निकलते थे, कुछ दूर निकलने पर ही उसका पेट्रोल खत्म हो जाता था, बाकी रास्ता वह धक्के से ही पूरा करती थी। कुछ समय में लोग यह बात समझ गए थे और जब वे गाड़ी लेकर निकलते तो लोग उस रास्ते से दूर रहने में ही अपनी भलाई समझते थे।

वहाँ के अधिकांश कर्मचारी ऐसे थे कि यदि किसी अधिकारी ने बुलाया है तो वे जूते बाहर उतारकर आते थे। उनसे  बैठने को कहो तो वे नीचे बैठ जाएंगे, कुर्सी पर नहीं बैठेंगे।

वहाँ एक कॉपर क्लब था जिसमें हर सप्ताह प्रसिद्ध विदेशी फिल्में दिखाई जाती थीं। विशेष बात ये कि वे सेंसर्ड नहीं होती थीं। जैसे एक बार मैं वहाँ गया और मैंने पूछा कि फिल्म चालू हो गई क्या तो जवाब मिला कि जल्दी जाओ, दो-तीन सीन निकल चुके हैं।

खैर अपने बॉस श्री जगाती की बात कर लेता हूँ, ऊपर वाले की दया से वे मुझे बहुत पसंद करते थे। उनके पास एक डॉगी भी था, मतलब कुक्कुर! उन डॉगी महोदय को पॉटी वॉक कराने के लिए हमारे यहाँ के दो-तीन कार्मिक अधिकारियों में तगड़ा कम्पिटीशन रहता था।

आगे कुछ और बातें करेंगे, अभी अपना एक गीत शेयर कर लेता हूँ-

एक्लव्य हम

मौसम के फूहड़ आचरणों पर व्यंग्य बाण,

साधे पूरे दम से, खुद को करके कमान,

छूछी प्रतिमाओं को दक्षिणा चढ़ानी थी,

यह हमसे कब हुआ।

 

कूटनीति के हमने, पहने ही नहीं वस्त्र,

बालक सी निष्ठा से लिख दिए विरोध-पत्र,

बैरी अंधियारे से कॉपी जंचवानी थी,

यह हमसे कब हुआ।

 

सुविधा की होड़ और विद्रोही मुद्राएं,

खुद से कतराने की रेशमी विवशताएं,

खुले हाथ-पांवों में बेड़ियां जतानी थीं,

यह हमसे कब हुआ।

                                                         –श्रीकृष्ण शर्मा

नमस्कार।

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159. मुझको बना दिया है गुनाहों का देवता!

आजकल नीरव मोदी का नाम बहुत गूंज रहा है और इस पर राजनेता भी खूब गला फाड़ रहे हैं, वे भी जिनके शासन काल में ये और ऐसे अनेक घोटाले हुए। इसे ही कहते है ‘ऑफेंस इज़ द बेस्ट डिफेंस’।
खैर मुझे फिलहाल राजनेताओं के बारे में कुछ नहीं कहना है!

नीरव मोदी से जुड़े घोटाले में अनेक बैंक कर्मियों और उच्च अधिकारियों के नाम सामने आ रहे हैं, एक दो बहादुरों के फोटो तो अखबारों में भी देखने को मिल रहे हैं। भले ही इनके पीछे राजनैतिक बॉस भी रहे हों, परंतु यह सत्य है कि यदि ये बैंक कर्मी लालची न होते तो यह घोटाला न हुआ होता!

मैं यही सोच रहा था कि इन बहादुरों के बच्चे जब स्कूल में जाते होंगे तो उनको कैसा महसूस होता होगा?

हमारे देश को उच्च नैतिक मूल्यों वाला माना जाता है, हम पूरी दुनिया को मानवता का, नैतिकता का पाठ पढ़ाते हैं। ये लालच वीर देश को कहाँ ले जाएंगे?

मेरा यही मानना है कि, भले इस प्रकार छुपकर किए जाने वाले आर्थिक अपराध हों, या किसी परदे की आड़ में, जैसे करणी सेना, बजरंग दल, शिव सेना आदि के माध्यम से की जाने वाली तोड़-फोड़, मारपीट आदि हों, जिनको सैद्धांतिक जामा पहनाने की कोशिश जाती है, वे मेरे देश को बहुत पीछे ले जा रहे हैं। ऐसे लोगों के विरुद्ध सामाजिक स्तर पर कार्रवाई की जाए तो कैसा रहे, क्योंकि न्याय व्यवस्था तो सचमुच नाकारा है!

खैर, मुकेश जी का गाया एक गीत प्रस्तुत है, फिल्म- गुनाहों का देवता, गीतकार शैलेंद्र और संगीतकार – शंकर जयकिशन।

चाहा था बनूं प्यार की राहों का देवता,
मुझको बना दिया है गुनाहों का देवता।

ये ज़िंदगी तो ख्वाब है, जीना भी है नशा,
दो घूंट मैंने पी लिया तो क्या बुरा किया,
रहने दो जाम सामने, सब कुछ यही तो है,
हर गम ज़दा के आंसुओं, आहों का देवता।

किस्मत तो हमसे चल रही है चाल हर कदम,
एक चाल हम जो चल दिए तो हो गया सितम,
अब तो चलेंगे चाल हम किस्मत के साथ भी,
पैसा बना संसार की राहों का देवता।

होगा कहीं जो रूप तो पूजा ही जाएगा,
चाहे कहीं हो फूल वो मन को लुभाएगा,
होकर रहेगा ज़िंदगी में प्यार एक बार,
बस कर रहेगा दिल में निगाहों का देवता।

नमस्कार।
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158. चमकते चाँद को टूटा हुआ तारा बना डाला

आज गुलाम अली जी का गाया हुआ एक गीत याद आ रहा है, जिसे आनंद बक्षी जी ने लिखा है और इसका संगीत अनु मलिक जी ने तैयार किया है।

यह गीत वैसे ही सुंदर लिखा गया है और गुलाम अली जी की गायकी ने इसको अमर बना दिया है। मूल बात जो इसमें है, वो यह कि इंसान का आचरण, उसका किरदार उसको कहीं से कहीं ले जाता है, ऊंचाइयों पर भी और बर्बादी के रास्ते पर भी! लेकिन इसमें तक़दीर का, परिस्थितियों का भी बहुत बड़ा हाथ होता है।

लीजिए इस गीत का आनंद लीजिए और गुलाम अली साहब की अदायगी को याद कीजिए-

चमकते चाँद को टूटा हुआ तारा बना डाला
मेरी आवारगी ने मुझको आवारा बना डाला

बड़ा दिलकश, बड़ा रँगीन, है ये शहर कहते हैं
यहाँ पर हैं हज़ारों घर, घरों में लोग रहते हैं
मुझे इस शहर की गलियों का बंजारा बना डाला
चमकते चाँद को टूटा…

मैं इस दुनिया को अक्सर देखकर हैरान होता हूँ
न मुझसे बन सका छोटा सा घर, दिन रात रोता हूँ
खुदाया तूने कैसे ये जहां सारा बना डाला
चमकते चाँद को टूटा…

मेरे मालिक, मेरा दिल क्यूँ तड़पता है, सुलगता है
तेरी मर्ज़ी, तेरी मर्ज़ी पे किसका ज़ोर चलता है
किसी को गुल, किसी को तूने अंगारा बना डाला
चमकते चाँद को टूटा…

यही आग़ाज़ था मेरा, यही अंजाम होना था
मुझे बरबाद होना था, मुझे नाकाम होना था
मेरी तक़दीर ने मुझको, तक़दीर का मारा बना डाला
चमकते चाँद को टूटा…

आज के लिए इतना ही, नमस्कार।
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