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161. नए परिंदों को उड़ने में वक़्त तो लगता है!

आज जगजीत सिंह जी की गाई एक बहुत सुंदर गज़ल शेयर कर रहा हूँ, जिसके लेखक हैं- हस्ती जी।
वैसे देखा जाए तो यह गज़ल आज की नहीं लगती, दुनिया बड़ी तेजी से बदल रही है, कौन ख़त लिखता है आज की तारीख में! जब तलाक भी एसएमएस पर हो जाते हैं।
खैर यहाँ ख़त का मतलब, ख़त ही न समझा जाए, कुछ भी इज़हार करने में जो दिक्कत होती है, नए-नए प्रेमी को, अब मैं इस विषय का विशेषज्ञ भी नहीं हूँ, और कैसे काल्पनिक रास्तों पर जाने की बात की गई है इस गज़ल में- जिस्म की बात नहीं है उनके दिल तक जाना था, लंबी दूरी तय करने में वक़्त तो लगता है।
खैर कविता में तर्क नहीं चलता जी, आप गज़ल का आनंद लीजिए-

प्यार का पहला ख़त लिखने में वक़्त तो लगता है
नए परिंदों को उड़ने में वक़्त तो लगता है।

जिस्म की बात नहीं थी उनके दिल तक जाना था,
लंबी दूरी तय करने में वक़्त तो लगता है।

गाँठ अगर पड़ जाए तो फिर रिश्ते हों या डोरी,
लाख करें कोशिश खुलने में वक़्त तो लगता है।

हमने इलाज-ए-ज़ख़्म-ए-दिल तो ढूँढ़ लिया है,
गहरे ज़ख़्मों को भरने में वक़्त तो लगता है।

आज के लिए इतना ही।
नमस्कार।
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2 replies on “161. नए परिंदों को उड़ने में वक़्त तो लगता है!”

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