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178. पुरस्कार के बहाने!

कभी कभी कुछ अलग लिखने का मन करता है, आज इसके लिए मुझे बहाना भी मिल गया क्योंकि ब्लॉग लेखन संबंधी एक एवार्ड के लिए मेरा नॉमिनेशन हो गया।
मैंने, सेवानिवृत्ति से पूर्व, 22 वर्ष तक सार्वजनिक क्षेत्र की एक महानवरत्न कंपनी में काम किया, बहुत सी बार अपने ब्लॉग्स में कंपनी का नाम लिखा है, आज नहीं लिखूंगा। इस कंपनी में रहते हुए मैंने अनेक आयोजन किए, जिनमें राष्ट्रीय स्तर के कवि-कलाकार शामिल हुए।
बहुत से आयोजनों में बहुत सारे लोगों को पुरस्कार मिले, कंपनी को भी बहुत से एवार्ड मिले, जिनको स्वीकार करने के संबंध में, बहुत से विनम्रतापूर्वक पुरस्कार स्वीकार करने संबंधी व्याख्यान भी मैंने लिखे, पुरस्कार पाने वाले लोगों की प्रशंसा भी की। लेकिन एक हसरत मन में रह गई कि कभी मैं भी पुरस्कार प्राप्त करूं। ऐसा कभी नहीं हुआ यद्यपि कंपनी के बड़े से बड़े अधिकारियों और राजनैतिक अतिथियों ने भी मेरे कुशल कार्यक्रम संचालन की प्रशंसा की।
मैं कंपनी में राजभाषा कार्यान्वयन के क्षेत्र में कार्य कर रहा था। जब कंपनी में राजभाषा संबंधी गतिविधियों के संबंध में एक पुरस्कार प्रारंभ किया गया, तब गलती से पहला पुरस्कार हमारी परियोजना को मिल गया, क्योंकि उसके मानकों में पत्राचार के आंकडों के अलावा अन्य गतिविधियों, जैसे पत्रिका प्रकाशन, कवि सम्मेलन के आयोजन आदि के संबंध में भी काफी अंक थे।
जब यह गलती हो गई, उसके बाद हमारे केंद्रीय कार्यालय में बैठे राजभाषा के धुरंधर ने मानकों में ऐसा सुधार किया कि अब पुरस्कार केवल और केवल पत्राचार संबंधी झूठी रिपोर्ट के आधार पर ही प्राप्त किया जा सकता था और मैंने इस बारे में सोचना ही छोड़ दिया था।
वैसे पुरानी कहावत है कि सूरज निकलता है तो देर-सवेर सभी उसको स्वीकार करते हैं, सम्मान देते हैं। मुझे लगता है कि आज के समय यह आपकी विज्ञापन क्षमता, प्रेज़ेंटेशन आदि ही हैं, जो आपको मान्यता और सम्मान दिलाते हैं।
असल में एक ब्लॉगर साथी ने- ‘वर्सेटाइल ब्लॉगर एवार्ड’ के लिए मेरा नॉमिनेशन किया तो सुखद आश्चर्य हुआ, क्योंकि मुझे लगता है कि कुछ लोग इनको प्राप्त करने के लिए नहीं बने होते और कुछ लोग लगातार एवार्ड प्राप्त करने के लिए अभिशप्त होते हैं।
मैं पुनः, मुझे एवार्ड हेतु नॉमिनेट करने वाले श्री कृष्ण कुमार लखोटिया जी के प्रति आभार व्यक्त करता हूँ, जो अपने ब्लॉग्स में योग के बारे में बहुत अच्छी जानकारी देते हैं और सुंदर कविताएं भी लिखते हैं।

मुकेश जी का ये गाना याद आ गया, क्योंकि इसमें भी ईनाम का ज़िक्र है, ईनाम, पुरस्कार, एवार्ड ! गीत फिल्म-देवर का है, आनंद बख्शी जी ने लिखा है और संगीतकार हैं- रोशन जी,  बर्दाश्त कर लीजिए-

बहारों ने मेरा चमन लूटकर
खिज़ां को ये इल्ज़ाम क्यों दे दिया
किसीने चलो दुश्मनी की मगर
इसे दोस्ती नाम क्यों दे दिया

मैं समझा नहीं ऐ मेरे हमनशीं
सज़ा ये मिली है मुझे किस लिये
के साक़ी ने लब से मेरे छीन कर
किसी और को जाम क्यों दे दिया

मुझे क्या पता था कभी इश्क़ में
रक़ीबों को कासिद बनाते नहीं
खता हो गई मुझसे कासिद मेरे
तेरे हाथ पैगाम क्यों दे दिया

इलाही यहाँ तेरे इन्साफ़ के
बहुत मैंने चर्चे सुने हैं मगर
सज़ा की जगह एक खतावार को
भला तूने ईनाम क्यों दे दिया

नमस्कार।


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THE VERSATILE BLOGGER AWARD

THE VERSATILE BLOGGER AWARD

It was a great surprise for me when today I came to know that sh. Krishna Kumar Lakhotia Ji has nominated me for The Versatile Bloggers Award. Sh. Lakhotia’s blog is titled as “kishanlakhotia(Meditation Now or Never).” and his website is http://www.krishnalakhotia.com.
Sh. Lakhotia Ji writes very useful and enlightening blogs regarding Yoga, besides writing nice poetry. I would recommend that you follow him and get benefitted by his knowledge and creativity, experience in the field of Yoga.
I thank Sh. Lakhotia Ji from the core of my heart for the nomination.
RULES:
Thank the blogger who nominated you by posting their link.
Add an award graphic.
Write seven facts about yourself.
Nominate 15 other bloggers.
Notify them about nomination.
7 INTERESTING FACTS ABOUT ME:
1. I am Shri Krishna Sharma, a simple human being. My blog website at WordPress.com is http://www.samaysakshi.in/ .

  1. I am a translator and a poet at heart. I want to spread the message of love through poetry. .

  2. I am 68 yrs now, presently live in Goa near Panjim.

  3. I was born and brought up in Delhi, worked in various private and Govt. departments and retired in 2010 from NTPC Ltd..
  4. I am a great admirer of Late Raj Kapur Ji and his team specially Mukesh Ji, Shailendra Ji etc.
  5. Again I follow the philosophy of greatness in simplicity, specially depicted by Raj Kapur Ji, and Mukesh jI, in their songs.
  6. I like to follow the principal of ‘love all, hate none’ in life.
    MY NOMINEES ARE:
    (Some bloggers I could have nominated, have been nominated by Lakhotia Ji, so I would not repeat them).
  7. shehannemoore
  8. mistimaan
  9. lalitkishor01
  10. ananyaexpress ,Instinctive writing.
  11. Pankaz91
  12. Jyotirmoy Sarkar
  13. The Krazy Butterfly.
  14. adityamishravoice
  15. Ambardhara
  16. Mr.ch.k.sharma
  17. aquibview
  18. Anagha Yatin
  19. Shoma Abhyankar
  20. PritiC.
  21. roshanihraichura

I once again thank all of you for your encouragement.

 

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177. पेपर लीक बनाम स्किल डेवलपमेंट

दिल्ली में सीबीएसई के कुछ पेपर लीक होने की घटना बहुत खेदजनक है और ऐसा पहली बार नहीं हुआ है। यह प्रवृत्ति बढ़ती ही जा रही है। वर्तमान व्यवस्था के रहते इसमें सुधार की संभावना नजर नहीं आ रही है।

आइए विचार करें कि इस प्रकार की घटनाएं आखिर क्यों बढ़ रही हैं। युवाओं के आतंकवादी बनने, गुंडों के गैंग में शामिल होने, एटीएम से फ्रॉड करके पैसा निकालने या अगर यह कुशलता हासिल न हो एटीएम मशीन को ही उठा ले जाने की दुस्साहसिक घटनाओं को भी मैं इस एक ही प्रवृत्ति के अंतर्गत देखता हूँ।

कुल मिलाकर देखा जाए तो ऐसी व्यवस्था है कि लोग शिक्षा प्राप्त करें, कोई कुशलता विकसित करें और उसके बाद किसी समुचित नौकरी के लिए लाइन में लगें क्योंकि ऐसे लोग बहुत कम होते हैं जो अपने लिए स्वयं कोई रोज़गार सृजित कर सकें।

यह प्रक्रिया बहुत धीमी लगती है और आज के समय में ऐसे युवा भी बड़ी संख्या में मिल जाते हैं जो संपन्नता के पालने में पल रहे हैं और हर जगह अपनी इस संपन्नता का प्रदर्शन करते हैं। वे रेस्तरां हों, क्लब हों, पब हों या कोई अन्य स्थान हो जहाँ ऐसे लोगों के संपर्क में वे लोग भी आते हैं जो जीवन के धीमी गति वाले ट्रैक पर चल रहे हैं।

ऐसी स्थिति में बहुत से लोग हैं जिनको कोई भरमा लेता है या स्वयं ही उनके दिमाग में ऐसा कोई शैतानी आइडिया आ जाता है। आज के समय में यह भी सच्चाई है कि विश्व गुरू भारत, संस्कारों के मामले में कहीं नहीं ठहरता है। आज हमारा देश बुराइयों में दुनिया का नेतृत्व करने की हालत में है।

ऐसे लोग हर जगह मिल जाएंगे जो आसानी से बड़ी कमाई करने के लिए कुछ भी करने को तैयार हो जाते हैं। ऐसे में वे चाहे आतंकवादी बनें, गुंडा बने या किसी भी प्रकार का फ्रॉड करें।

ऐसे मामलों को बढ़ावा देने में हमारी सुस्त और नाकारा न्याय व्यवस्था का भी बहुत बड़ा हाथ है। अगर ऐसा काम करके पकड़े जाने पर शीघ्र और कठोरतम दंड मिले तो उससे बहुत से संभावित अपराधियों का हौसला पस्त हो सकता है। लेकिन लगता यही है कि कुछ भी करके इस देश में आप बच सकते हैं।

ऐसे में साहिर लुधियानवी जी की ये पंक्तियां याद आती हैं , जो फिल्म- ‘फिर सुबह होगी’ के लिए मुकेश जी ने गाई हैं और राज कपूर जी पर फिल्माई गई हैं –

आसमां पे है खुदा और जमीं पे हम
आज कल वो इस तरफ देखता है कम ..
आसमां पे है खुदा और जमीं पे हम

आजकल किसी को वो टोकता नहीं
चाहे कुछ भी कीजिये रोकता नहीं
हो रही है लूटमार घट रहें हैं गम
आसमां पे है खुदा और जमीं पे हम
आज कल इस तरफ देखता है कम ..

किसको भेजे वो यहाँ खाक छानने
इस तमाम भीड़ का हाल जानने
आदमी हैं अनगिनत देवता हैं कम
आसमां पे है खुदा और जमीं पे हम
आज कल इस तरफ देखता है कम ..

जो भी कुछ है ठीक है ज़िक्र क्यों करे
हम ही सब जहान की फ़िक्र क्यों करें
जब तुम्हे ही गम नहीं तो क्यों हमें हो गम
आसमां पे है खुदा और जमीं पे हम
आज कल इस तरफ देखता है कम ..

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार।

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44. रोशनी के साथ हंसिए बोलिये!

लीजिए आज फिर से प्रस्तुत है एक और पुराना ब्लॉग-

संक्रमण काल है, सामान जा चुका, अब अपने जाने की बारी है। ऐसे में भी मौका मिलने पर बात तो की जा सकती है। समय है गुड़गांव से गोआ शिफ्ट होने का, गुड़गांव के साथ 7 वर्ष तक पहचान जुड़ी रही, अब गोआ अपना ठिकाना होगा।
आज मन हो रहा है कि एक बार फिर से निगाह डाल लें, उस ठिकाने पर जहाँ कभी एकदम शुरू में मेरा बसेरा रहा। भोला नाथ नगर, जहाँ रहकर शिक्षा प्रारंभ होने से लेकर दो प्रायवेट नौकरियां और उद्योग भवन में सरकारी नौकरी भी की और वहाँ से प्रतिनियुक्ति पर संसदीय राजभाषा समिति में भी रहा।
अपने मोहल्ले में मैंने एक मुल्तानी बाबाजी का ज़िक्र किया था, जो घर के सामने ही रहते थे, ज्योतिषी भी थे, अपने कमरे में सुई धागे से लेकर सब कुछ रखते थे, बोलते थे कि वे किसी पर निर्भर नहीं हैं, उनका परिवार पीछे की तरफ रहता था, लेकिन उनकी बात अपने परिवार वालों के मुकाबले, बाहर वालों से ज्यादा होती थी। हाँ उनका नाम मुझे उस समय याद नहीं आया था, उनका नाम था- श्री ठाकुर दास जी।
दिल्ली की कुछ महत्वपूर्ण घटनाओं में, डॉ. हरिवंश राय बच्चन जी को आकाशवाणी में इंटरव्यू के लिए, अगवानी करके लाना और इंटरव्यू के समय आकाशवाणी के स्टूडियो में उनके साथ रहना, संजय गांधी की मृत्यु पर श्रीमती इंदिरा गांधी के बंगले पर जाना, क्योंकि वह संसदीय राजभाषा समिति के हमारे कार्यालय के पास ही था, और यह कि वहाँ मनोज कुमार आए और मुझको लगभग धकेलते हुए अंदर चले गए।
एक घटना और याद आ रही है, आपात्काल के संघर्ष के बाद, जब मोरारजी भाई के नेतृत्व में जनता दल की सरकार बनने वाली थी और जॉर्ज फर्नांडीज़ सरकार में शामिल होने से इंकार कर रहे थे। उस समय एक शाम की घटना है, जब दिल्ली में कांस्टीट्यूशन क्लब के निकट, सड़क पर ही भारी भीड़ ने उनको घेर लिया था, ‘जॉर्ज आपको मंत्री बनना ही होगा’ लगातार यह आग्रह करते हुए और आखिर में जॉर्ज फर्नांडीज़ को इसके लिए मना ही लिया था कि वे मंत्री बनेंगे। मैं भी उस भीड़ का हिस्सा था।
बाद में तो मंत्री बनने के बाद जॉर्ज का कार्यालय उद्योग भवन के उसी कमरे के ऊपर था, जिसमें स्थापना-3 अनुभाग में, मैं तैनात था।
जयप्रकाश जी का आंदोलन एक पवित्र आंदोलन था लेकिन कितनी अज़ीब बात है कि लालू प्रसाद यादव भी इसी आंदोलन की उपज थे। शायद यही कारण है कि इस आंदोलन के परिणाम उतने क्रांतिकारी नहीं रहे, जैसे होने चाहिए थे। हर जगह अपने कैरियर की प्लानिंग के साथ चलने वाले लोग भी शामिल होते हैं, जैसे कि अन्ना हजारे जी के आंदोलन में भी थे, बल्कि अन्ना को तो राष्ट्रीय मंच पर ही ऐसे लोग लेकर आए थे, जिनके मन में प्रारंभ से ही अपने कैरियर का रोड-मैप तैयार था, भले ही वे दिखा यही रहे हों कि वे भी अन्ना की तरह, निःस्वार्थ भाव से भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ाई लड़ रहे हैं।
खैर, यह दिल्ली की महानगरी भी अजीब है जिसमें, जिसके आसपास पहले 30 वर्ष और फिर से 7 वर्ष रहने का अवसर मिला, अब फिर से अपने सपनों की उस माया-नगरी के अपेक्षाकृत नज़दीक़ रहने का अवसर मिल रहा है, जहाँ पहले एक वर्ष और फिर एक बार 3 महीने रहा था, याने मुंबई के पास, गोआ में।
संभव है फिर से कभी इधर आना हो, आस तो नहीं खोनी चाहिए या फिर वहाँ ऐसा लगे कि इधर आने का मन ही न हो, ज़िंदगी के स्पेस की भी तो लिमिट है न!
हिंदी कवियों में एक तो भवानी दादा थे, जो बातचीत के अंदाज़ में कविता पाठ करते थे, एक और थे- डॉ. बाल स्वरूप राही, वे हमेशा मुस्कुराते रहते थे और बात करने के अंदाज़ में कविता पाठ करते थे, उनका एक गीत आज प्रस्तुत कर रहा हूँ- ‌

इस तरह तो दर्द घट सकता नहीं
इस तरह तो वक्त कट सकता नहीं
आस्तीनों से न आंसू पोंछिये
और ही तदबीर कोई सोचिये।
यह अकेलापन, अंधेरा, यह उदासी, यह घुटन
द्वार तो है बंद, भीतर किस तरह झांके किरण।
बंद दरवाजे ज़रा से खोलिये
रोशनी के साथ हंसिए बोलिये
मौन पीले–पात सा झर जाएगा
तो हृदय का घाव खुद भर जाएगा।
एक सीढ़ी हृदय में भी, महज़ घर में ही नही
सर्जना के दूत आते हैं सभी हो कर वहीं।
यह अहम की श्रृंखलाएं तोड़िये
और कुछ नाता गली से जोड़िये
जब सड़क का शोर भीतर आएगा
तब अकेलापन स्वयं मर जायगा।
आइये कुछ रोज कोलाहल भरा जीवन जियें
अँजुरी भर दूसरों के दर्द का अमृत पियें।
आइये बातून अफवाहें सुनें
फिर अनागत के नये सपने बुनें
यह सलेटी कोहरा छंट जाएगा
तो हृदय का दुख खुद घट जाएगा।

-डॉ. बालस्वरूप राही

फिर मिलेंगे, नमस्कार।
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176. ज़िंदगी काहे को है, ख्वाब है दीवाने का !

आज सोचा कि ज़िंदगी के बारे में बात करके, ज़िंदगी को उपकृत कर दें।
शुरू में डॉ. कुंवर बेचैन जी की पंक्तियां याद आ रही हैं, डॉ. बेचैन मेरे लिए गुरू तुल्य रहे हैं और उनकी गीत पंक्तियां अक्सर याद आ जाती हैं-

ज़िंदगी का अर्थ मरना हो गया है,
और जीने के लिए हैं दिन बहुत सारे।

जब सोचते हैं कि बहुत दिनों के लिए जीना है तो क्या किया जाए, तब यह याद आता है-

जीवन चलने का नाम, चलते रहो सुबह-ओ-शाम,
ये रस्ता कट जाएगा मितरा, ये बादल छंट जाएगा मितरा।

लेकिन फिर कोई यह कहता मिल जाता है-

ये करें और वो करें, ऐसा करें, वैसा करें।
ज़िंदगी दो दिन की है, दो दिन में हम क्या-क्या करें।

अब वैसे तो ये कवि-शायर लोग कन्फ्यूज़ करते ही रहते हैं, पर ज़िंदगी के बारे में इन्होंने कुछ ज्यादा ही कन्फ्यूज़ किया है-

ज़िंदगी कैसी है पहेली ये हाय
कभी तो हंसाये, कभी ये रुलाए।

और जब ज़िंदगी में परेशानियां ज्यादा होती हैं, तब फैज़ अहमद फैज़ कहते हैं-

ज़िंदगी क्या किसी मुफलिस की क़बा है जिसमें,
हर घड़ी दर्द के पैबंद लगे जाते हैं।

और कहीं कोई मोहब्बत का मारा, ये कहता हुआ भी मिल जाता है-

हम तुझ से मोहब्बत करके सनम, हंसते भी रहे, रोते भी रहे,

हंस हंस के सहे उल्फत में सितम, मरते भी रहे, जीते भी रहे।

जब जीवन में कोई पवित्र उद्देश्य मिल जाता है, तब ये खयाल ही नहीं आता कि ज़िंदगी छोटी है या बड़ी, तब इंसान इस तरह  की बात करता है-

हम जिएंगे और मरेंगे ऐ वतन तेरे लिए, 

दिल दिया है, जां भी देंगे, ऐ वतन तेरे लिए। 

एक बात और, स्वामी विवेकानंद और इस तरह के कुछ महापुरुष जब कम समय में बहुत बड़ी उपलब्धियां कर लेते हैं और कम उम्र में ही उनको जीवन-त्याग करना पड़ जाता है, उनके लिए सोम ठाकुर जी ने बड़ी सुंदर पंक्तियां लिखी हैं-

कोई दीवाना जब होंठों तक अमृत घट ले आया, 

काल बली बोला मैंने, तुझ से बहुतेरे देखे हैं। 

और आज के लिए आखिरी बात, ये फानी बदायुनी जी का शेर-

एक मुअम्मा है, समझने का न समझाने का,
ज़िंदगी काहे को है, ख्वाब है दीवाने का।

मेरे खयाल में ज़िंदगी के नाम पर, आज के लिए  इतना कंफ्यूज़न ही काफी है।

नमस्कार।

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175. लाख यहाँ झोली फैला ले …

आज किशोर दा का गाया एक गीत शेयर कर रहा हूँ, फिल्म-फंटूश से, इसे लिखा है साहिर लुधियानवी जी ने और संगीतकार हैं- सचिन देव बर्मन जी।

यही दुनिया है जिसमें हमें रहना होता है, और कहाँ जाएंगे, लेकिन एक तो कुछ लोगों के जीवन में परिस्थितियां ऐसी बन जाती हैं, और फिर जब इस दुनिया से मन उचट जाता है, तब कुछ अच्छा नहीं लगता। और ये फीलिंग्स ऐसा हैं कि भगवान की दया से, हमें इन परिस्थितियों का सामना न करना पड़ रहा हो, तब भी इनको महसूस सभी कर पाते हैं।

किशोर दा ने बडे खुबसूरत अंदाज में गाया है यह गीत-

दुखी मन मेरे सुन मेरा कहना
जहाँ नहीं चैना वहाँ नहीं रहना
दुखी मन…

दर्द हमारा कोई न जाने
अपनी गरज के सब हैं दीवाने
किसके आगे रोना रोएं
देस पराया लोग बेगाने
दुखी मन…

लाख यहाँ झोली फैला ले
कुछ नहीं देंगे ये जग वाले
पत्थर के दिल मोम न होंगे
चाहे जितना नीर बहाले
दुखी मन…

अपने लिये कब हैं ये मेले
हम हैं हर इक मेले में अकेले
क्या पाएगा उसमें रहकर
जो दुनिया जीवन से खेले
दुखी मन…

इसके साथ ही आज का यह ब्लॉग संपन्न होता है, नमस्कार।

-========-

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43. रात लगी कहने सो जाओ देखो कोई सपना!

आज फिर नया कुछ लिखने का मन नहीं है, ऐसे में सर्वश्रेष्ठ विकल्प यही है, जब तक पुराना माल बाकी हो, कि कोई पुरानी आइटम निकालो और झाड़-पोंछकर प्रस्तुत कर दो। आज भी वही कर रहा हूँ।
प्रस्तुत है एक और पुराना ब्लॉग-
मैंने पिछले 42 दिनों में, अपने बचपन से लेकर वर्ष 2010 तक, जबकि मेरे सेवाकाल का समापन एनटीपीसी ऊंचाहार में हुआ, तब तक अपने आसपास घटित घटनाओं को साक्षी भाव से देखने का प्रयास किया, जैसे चचा गालिब ने कहा था-

बाज़ार से गुज़रा हूँ, खरीदार नहीं हूँ।

मैंने ज़िक्र किया था कि एक बार हमारे अंग्रेजी शिक्षक ने स्पेयर पीरियड में हमसे एक निबंध लिखने को कहा था-‘इफ आइ वर ए माली’, मैंने रफ कॉपी में वह निबंध लिखा था और सब छात्रों की तरह उनको सुना दिया था। बाद में उन शिक्षक ने मुझसे वो निबंध मांगा था, क्योंकि उनको लगा होगा कि उसमें कुछ ऐसे पॉइंट्स थे जो वे शिक्षण हेतु अपने ड्राफ्ट में शामिल कर सकते थे। लेकिन मैं उनको वह नहीं दे पाया था, क्योंकि मैंने उसे रफ कॉपी में लिखा था और फाड़ दिया था।
मेरे ये ब्लॉग, आज की तारीख में लिखे गए नए ड्राफ्ट हैं, लेकिन ये रफ कॉपी में नहीं लिखे गए हैं। संभव है कि भविष्य मेरे कोई गुरू इनकी मांग करें तो मैं संजोकर इनको दे सकता हूँ अथवा संभव है कि किसी प्रकार पुस्तक रूप में प्रकाशन की सनक भी चढ़ जाए तो इनका सदुपयोग किया जा सकता है। मेरी कुछ कविताएं भी इस बहाने सुरक्षित हो जाएंगी। इसलिए इसका ज्यादा महत्व नहीं है कि कितने लोग इसको पढ़ते हैं।
अतीत में झांकना इंसान को अच्छा लगता है, क्योंकि जो घटनाएं अपने समय पर अत्यंत पीड़ादायक रही हों, वे भी आज की तारीख में सुरक्षित अनुभव और मार्गदर्शक बन जाती हैं।
लेकिन फिर भी, कब तक अतीत में रहा जाए, जंप लगाकर वर्तमान में आना अच्छा रहेगा?
चलिए ऐसा ही करते हैं।
सेवानिवृत्त होने के बाद 1 मई, 2010 से कुछ महीने तक हम लखनऊ के अपने घर में रहे, जिसे बड़ी मेहनत से अर्जित और विकसित किया था, लेकिन जल्दी ही एहसास हुआ कि हमें दिल्ली, ग़ुड़गांव आना होगा बच्चों के पास। मकान को अर्जित करने के लिए पत्नी और बच्चों ने अधिक मेहनत की थी, निपटाने के लिए मैंने ज्यादा की, क्योंकि उसके लिए दिल्ली/गुड़गांव से कई बार लखनऊ आना पड़ा।
कुछ समय दिल्ली में मालवीय नगर के पास और उसके बाद गुड़गांव में 2-3 जगहों पर 5-6 साल तक रहे और अभी 6 महीने पहले ही एक हाई राइज़ टॉवर्स वाली सोसायटी में शिफ्ट हुए, बड़ी खूबसूरत सोसायटी है, पत्नी और बेटों ने लगभग 6 महीने तक भटककर यह आवास चुना, 9वें फ्लोर पर रहते हैं, मैं एकदम वर्तमान में आ गया हूँ।
सोसायटी में जैसा आप जानते हैं, प्रवेश करने पर आगंतुकों को जिसके यहाँ जा रहे हैं उससे संपर्क करना होता है, तब प्रवेश मिलता है। बाहर निकलते समय यदि आप कार में हैं, तो कोई तलाशी नहीं होती, आप यहाँ से कुछ लेकर भी जा सकते हैं। अगर आप पैदल बाहर जा रहे हैं और पूरे फॉर्मल कपड़े पहने हैं तो गेट पर आपकी पूरी तलाशी होगी।
अगर आप बंडी और निक्कर में हैं, तो गार्ड समझ जाएगा कि बंदा यहीं रहता है और सोसायटी में फ्लैट खरीदने या किराये पर लेने में, बेचारा लुट-पिट चुका है, इसकी क्या तलाशी लेनी, और वह आपको ऐसे ही जाने देगा।
खैर,ये तो मज़ाक था, मैं आपको एकदम वर्तमान में ले आया और अब भविष्य की बता दूं। मैंने शुरू में भी काल देवता और स्थान देवता की बात की थी।
बताना यह है कि अब स्थान देवता बदलने वाले हैं। यह संक्रमण काल है, पैकिंग चल रही है। 8-10 दिन में ही अपना शहर गुड़गांव से बदलकर गोआ होने वाला है। बच्चे तो कई बार गोआ घूमकर आए हैं, लेकिन हम पति-पत्नी पहली बार जाएंगे, और अब वहीं रहेंगे।
इसलिए सूचना यह है कि अब शायद अगले ब्लॉग गोआ से ही लिखे जाएंगे, जहाँ तक पूर्वानुमान है वे वर्तमान को लेकर ही होंगे और उनके केंद्र में, मैं स्वयं नहीं रहूंगा। वैसे अतीत का एरिया तो अपनी ही प्रॉपर्टी है, जब कभी मन हो, वहाँ जा सकते हैं।
चलिए अब श्री रमानाथ अवस्थी जी का एक गीत पढ़ लेते हैं-

सो न सका कल याद तुम्हारी आई सारी रात
और पास ही बजी कहीं शहनाई सारी रात
मेरे बहुत चाहने पर भी नींद न मुझ तक आई
ज़हर भरी जादूगरनी-सी मुझको लगी जुन्हाई
मेरा मस्तक सहला कर बोली मुझसे पुरवाई
दूर कहीं दो आँखें भर-भर आईं सारी रात
और पास ही बजी कहीं शहनाई सारी रात
गगन बीच रुक तनिक चन्द्रमा लगा मुझे समझाने
मनचाहा मन पा लेना है खेल नहीं दीवाने
और उसी क्षण टूटा नभ से एक नखत अनजाने
देख जिसे तबियत मेरी घबराई सारी रात
और पास ही बजी कहीं शहनाई सारी रात
रात लगी कहने सो जाओ देखो कोई सपना
जग ने देखा है बहुतों का रोना और तड़पना
यहाँ तुम्हारा क्या, कोई भी नहीं किसी का अपना
समझ अकेला मौत मुझे ललचाई सारी रात
और पास ही बजी कहीं शहनाई सारी रात
मुझे सुलाने की कोशिश में जागे अनगिन तारे
लेकिन बाज़ी जीत गया मैं वे सबके सब हारे
जाते-जाते चाँद कह गया मुझसे बड़े सकारे
एक कली मुरझाने को मुसकाई सारी रात
और पास ही बजी कहीं शहनाई सारी रात

जल्दी ही फिर मिलेंगे, नमस्कार।
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174. जैसे बहते हुए पानी पे हो ‘पानी’ लिखना

डॉ. कुंवर बेचैन जी की गीत पंक्तियां याद आ रही हैं-

दिल पे मुश्किल है बहुत, दिल की कहानी लिखना
जैसे बहते हुए पानी पे हो, पानी लिखना।

बहता हुआ पानी गतिशीलता का, जीवंतता का और सरसता का प्रतीक है। शुरू से ही नदियों के किनारे नगर बसते आए हैं, सभ्यताओं का विकास हुआ है।
आधुनिक समय में, जबकि लोगों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है, यह तो संभव नहीं है कि लोग नदियों के किनारे ही बसे रहें। फिर नदियों का प्रदूषण और उनमें पर्याप्त जल न रहने की भी समस्याएं बढ़ती जा रही हैं। ऐसे में जल संरक्षण और नदियों की सफाई, पेय जल की उपलब्धता और वितरण की आवश्यकता बढ़ती जा रही है।
मुझे कुछ वर्ष पहले की घटना याद आ रही है, हम ट्रेन से शायद कन्याकुमारी जा रहे थे। रास्ते में ट्रेन किसी स्थान पर रुकी या शायद रोकी गई और उसके बाद बहुत सारे लोग अपने बर्तन लेकर ट्रेन में से पानी भरने आ गए। ट्रेन में भरा पानी जबकि पीने के योग्य तो नहीं होता, लेकिन शायद वे लोग पीने के लिए ही ले जा रहे थे।
राज्यों के बीच होने वाले सबसे गंभीर झगड़े पानी को लेकर ही होते हैं, केंद्र और राज्यों में एक ही पार्टी की सरकार होने पर भी इन झगड़ों का समाधान नहीं हो पाता, क्योंकि हर राज्य सरकार के लिए अपने ही राज्य का हित सर्वोपरि है।
दूसरी तरफ जब पानी ज्यादा बरसता है, तब नेपाल अपने यहाँ उसे संभाल नहीं पाता, बांधों से पानी छोड़ दिया जाता है और बिहार के काफी बड़े इलाके में लगभग हर साल बाढ़ आती है।
इस प्रकार जल संरक्षण और जल प्रबंधन पर बहुत अधिक ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है। जैसे पहले हर गांव में एक तालाब तो हुआ ही करता था, वैसी कुछ व्यवस्था भी, आधुनिक परिवेश में करनी होगी।
ये तो बड़ी बातें हैं, सामाजिक और सरकार के स्तर पर होने वाली, लेकिन हर व्यक्ति के लिए प्रकृति के इस अमूल्य संसाधन के महत्व को समझना आवश्यक है, जैसे कुछ बातें इस प्रकार हैं-

1.पानी का इस्तेमाल करते समय, जितना नल को खोलना आवश्यक हो और जितनी देर आवश्यकता हो, उतना ही खोलें। पानी का सदुपयोग करें, बर्बादी नहीं।
2. नहाते समय भी ध्यान रखें कि स्वच्छता अधिक पानी बर्बाद करने से नहीं होती।
3. नदियों और तालाबों को गंदा न होने दें।
4. पीने के पानी का प्रयोग केवल पीने के लिए करें। सिंचाई और गाड़ी आदि की सफाई के लिए यह पानी प्रयोग में न लाएं।
5. सोसायटियों आदि के द्वारा ड्रेन-वाटर को संसाधित करके उसको अन्य कार्यों में प्रयोग करने की व्यवस्था की जाए।

वैसे तो बहुत से बिन्दु गिनाए जा सकते हैं, परंतु सच्चाई यह कि लोग जानते हैं, कि कहाँ पानी का सदुपयोग हो रहा और कहाँ बर्बादी। उनको बस इस संबंध में जागरूक होने की आवश्यकता है।
सरकारों को भी समुद्र के जल को शोधित करके सामान्य उपयोग हेतु तैयार करने और जल संरक्षण आदि के लिए आवश्यक पहल करनी होगी। वरना-

वैसे तो हर रंग में तेरा जलवा रंग दिखाए,
जब तू फिरे उम्मीदों पर तेरा रंग समझ ना आए,
पानी रे पानी तेरा रंग कैसा।

नमस्कार।
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42. एक तो तेरा भोलापन है, एक मेरा दीवानापन!

यादों के समुंदर से एक और मोती, लीजिए प्रस्तुत है एक और पुराना ब्लॉग!
मैंने लखनऊ प्रवास का ज्यादा लंबा ज़िक्र नहीं किया और ऊंचाहार के सात वर्षों को तो लगभग छोड़ ही दिया, क्योंकि मुझे लगा कि जो कुछ वहाँ हुआ, वह पहले भी हो चुका था। राजनीति की कोई कितनी बात करेगा!
ऊंचाहार में भी मुझे भरपूर प्यार मिला, कवि सम्मेलनों के आयोजन, पहले की तरह नियमित रूप से होते रहे। जैसा मैंने पहले भी अनेक बार उल्लेख किया है, कवि सम्मेलन में शिष्ट हास्य भी मैंने समुचित मात्रा में रखने की हमेशा कोशिश की है, लेकिन मेरे प्रिय रहे हैं गीत कवि, जैसे- नीरज, सोम ठाकुर, किशन सरोज आदि, भारत भूषण जी का मंचों पर आना तो उस समय तक लगभग बंद हो गया था।
एक बात मैंने ऊंचाहार में रहते हुए नोट की, कि नीरज, सोम ठाकुर, किशन सरोज जैसे महान गीतकारों को लोग सुन भर लेते हैं, कोई प्रतिक्रिया नहीं, कोई उत्साह नहीं, जैसे हास्य कविता को सुनकर होता है। मुझे इससे पीड़ा होती थी। शायद वहाँ का श्रोता समुदाय अधिक युवा था। जो भी कारण हो, मुझे यह ठीक नहीं लगता था।
ऐसे में, मैं मानता हूँ कि यह अन्याय होगा कि मैं डॉ. कुमार विश्वास का ज़िक्र न करूं। मुझे कुछ ऐसा लगा कि जिस प्रकार राज कपूर ने, मेरा नाम जोकर के अपेक्षित सफलता प्राप्त न करने पर, बॉबी बनाकर यह चुनौती दी थी कि इसको फेल करके दिखाओ, उसी प्रकार हमने डॉ. कुमार विश्वास को अपने कवि सम्मेलनों का हिस्सा बनाकर, श्रोताओं को यह चुनौती दे डाली और हम इसमें पूरी तरह सफल हुए थे।
मैं यह मानता हूँ कि गीतों के प्रति डॉ. कुमार विश्वास के समर्पण में कोई कमी नहीं है। उन्होंने भी बहुत संघर्ष किया है। शुरू में जब वे सीधे गीत पढ़ने के लिए मंच पर जाते थे, तब कुछ स्थापित गीतकारों ने उनको आगे नहीं बढ़ने दिया।
बाद में डॉ. कुमार विश्वास ने मंच संचालन में अपनी वाक-पटुता और जो कुछ भी मसाला संचालन के लिए आवश्यक हो उसका प्रयोग करके, अपनी ऐसी जगह बनाई कि मंच पर उनका होना, आयोजन की सफलता की गारंटी बन गया।
डॉ. कुमार विश्वास हमारे आयोजनों में तीन बार ऊंचाहार आए और उनके सहयोग से हमने ऐसे अनेक कवि-शायरों को भी सुनने का अवसर प्राप्त किया, जिनसे मेरा संपर्क नहीं था और यह भी बात है कि भरपूर हास-परिहास के बाद वो ऐसा वातावरण बनाते हैं, इस प्रकार प्रस्तुत करते हैं कवियों को, कि लोग मधुर गीतों, रचनाओं को भी पूरे मन से सुनते हैं।
एक और बात कि हमने तीन बार उनको बुलाया, पहली बार उन्होंने कुछ मानदेय लिया, अगली बार उसका दो-गुना, और तीसरी बार तीन गुना। आज जितनी राशि वो लेते हैं, उसको देखते हुए, परियोजनाओं में उनको बुलाना बहुत कठिन है। मुझे खुशी है इस बात की, कि कोई गीत कवि सुरेंद्र शर्मा जैसे लोगों को टक्कर दे रहा है, जो कवि न होते हुए भी बहुत मोटी रकम लेते हैं।
डॉ. कुमार विश्वास के संचालन में जहाँ हमने ज़नाब मुनव्वर राना जी को दो-तीन बार सुना, ओम प्रकाश आदित्य जी भी उनके द्वारा संचालित आयोजन में आए थे, वहीं कुछ ऐसे प्रतिभावान कवि-शायर भी उनके माध्यम से हमारे आयोजनों में आए, जिनसे हमारा कोई संपर्क नहीं था। मेरे खयाल में, कम से कम ऊंचाहार में तो डॉ. कुमार विश्वास द्वारा संचालित ये तीन कवि सम्मेलन सर्वश्रेष्ठ थे।
डॉ. कुमार विश्वास आज देश-विदेश के श्रोताओं के दिलों पर राज करते हैं, उनकी कुछ रचनाओं की बानगी प्रस्तुत है, इनमें मैंने जान-बूझकर उनके सर्वाधिक लोकप्रिय मुक्तक शामिल नहीं किए हैं।

वो जिसका तीर चुपके से, जिगर के पार होता है,
वो कोई गैर क्या, अपना ही रिश्तेदार होता है,
किसी से अपने दिल की बात न कहना तू भूले से,
यहाँ तो खत भी थोड़ी देर में अखबार होता है।
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कोई खामोश है इतना, बहाने भूल आया हूँ,
किसी के इक तरन्नुम में, तराने भूल आया हूँ,
मेरी अब राह मत तकना कभी ऐ आस्मां वालों,
मैं इक चिड़िया की आंखों में उड़ानें भूल आया हूँ।
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जो धरती से अम्बर जोड़े , उसका नाम मोहब्बत है ,
जो शीशे से पत्थर तोड़े , उसका नाम मोहब्बत है ,
कतरा कतरा सागर तक तो ,जाती है हर उम्र मगर ,
बहता दरिया वापस मोड़े , उसका नाम मोहब्बत है ।
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बस्ती बस्ती घोर उदासी पर्वत पर्वत खालीपन,
मन हीरा बेमोल बिक गया घिस घिस रीता तनचंदन,
इस धरती से उस अम्बर तक दो ही चीज़ गज़ब की हैं,
एक तो तेरा भोलापन है एक मेरा दीवानापन।
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बहुत बिखरा बहुत टूटा थपेड़े सह नहीं पाया,
हवाओं के इशारों पर मगर मैं बह नहीं पाया,
अधूरा अनसुना ही रह गया यूं प्यार का किस्सा,
कभी तुम सुन नहीं पायी, कभी मैं कह नहीं पाया।

आज का ब्लॉग डॉ. कुमार विश्वास को समर्पित है।

नमस्कार।
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173. फसल काटती लड़की का गीत

आज विलियम वर्ड्सवर्थ की एक प्रसिद्ध कविता का सहज अनुवाद, हिंदी में प्रस्तुत करने का प्रयास कर रहा हूँ। यह अत्यंत प्रसिद्ध रचना है, संभव है इस अनुवाद में कोई कमी रह गई हो, क्योंकि कविता के अर्थ-विस्तार को समझना और फिर उसे पुनः सृजित करना उतना आसान तो नहीं होता, कोई कमी रह गई हो तो उसके लिए क्षमा चाहता हूँ, लेकिन प्रयास करता रहूंगा तो संभव है भविष्य में अधिक अच्छा अनुवाद भी प्रस्तुत कर पाऊंगा।
प्रस्तुत हैं अनुवाद और फिर मूल रचना।

फसल काटती एकाकी लड़की
– विलियम वर्ड्सवर्थ
देखो उसे गौर से, खेत में अकेली,
वह एक पहाड़ी लड़की!
फसल काटती जाती है और गाती जाती है:
यहाँ रुकें और धीरे से आगे बढ़ें!
अकेली काटती है और फिर बांधती है अनाज की फसल,
और गाती है उदासी और तनाव भरा गीत:
अरे सुनो इसे, क्योंकि विस्तृत घाटी
उसकी स्वरलहरी से लबालब भरी है।
किसी कोयल ने ऐसी कूक नहीं सुनाई होगी,
अरब के रेगिस्तान में,
किसी छायादार पथ में थके पथिक समूह के लिए
ऐसा मधुर स्वागत गान:
ऐसे रोमांचक स्वर नहीं सुने गए कभी
वसंत के मौसम में, कोयल के कंठ से भी,
जो सुदूर हैब्रिड द्वीपों में-
समुद्र के शोर को भी शांत कर दे।
क्या मुझे कोई बताएगा-
कि वह क्या गा रही है?-
शायद निराशा से भरे स्वर प्रवाहित हो रहे हैं,
पुरानी, दुख भरी, कहीं दूर घटी घटनाओं के लिए,
और बहुत पहले हुए युद्धों के लिए,
अथवा है यह कोई अधिक सामान्य बात,
आज का ही कोई, जाना-पहचाना मामला?
कोई सहज शोक, हानि अथवा दर्द,
जो हो चुका है और शायद दुबारा हो?

युवती के गीत का विषय जो भी हो,
जैसे यह गीत चलता ही रहेगा,
मैंने सुना उसे अपने काम के साथ गाते हुए,
और मुड़े हुए हंसिए के ऊपर तैरती आवाज-
मैंने सुनी निश्चल और निःस्तब्ध रहकर,
और जब मैं पहाड़ी के ऊपर चढ़ा,
मेरे हृदय में वह संगीत बसा रहा,
बाद में लंबे समय तक,
जबकि मैं और सुन नहीं पा रहा था।
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The Solitary Reaper
BY WILLIAM WORDSWORTH

Behold her, single in the field,
Yon solitary Highland Lass!
Reaping and singing by herself;
Stop here, or gently pass!
Alone she cuts and binds the grain,
And sings a melancholy strain;
O listen! for the Vale profound
Is overflowing with the sound.

No Nightingale did ever chant
More welcome notes to weary bands
Of travelers in some shady haunt,
Among Arabian sands:
A voice so thrilling ne’er was heard
In spring-time from the Cuckoo-bird,
Breaking the silence of the seas
Among the farthest Hebrides.

Will no one tell me what she sings?—
Perhaps the plaintive numbers flow
For old, unhappy, far-off things,
And battles long ago:
Or is it some more humble lay,
Familiar matter of to-day?
Some natural sorrow, loss, or pain,
That has been, and may be again?

Whate’er the theme, the Maiden sang
As if her song could have no ending;
I saw her singing at her work,
And o’er the sickle bending;—
I listened, motionless and still;
And, as I mounted up the hill,
The music in my heart I bore,
Long after it was heard no more.

नमस्कार।

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