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166. ब्रह्मराक्षस

मुक्तिबोध जी की एक बहुत लंबी कविता है-‘ ब्रह्मराक्षस’, पहली बार बहुत पहले पढ़ी थी, जब कविताएं पढ़ा करता था। बहुत दिनों से यह कविता मन में कौंध रही थी, आज सोचा कि इसका कुछ हिस्सा आपके साथ शेयर ही कर लूं।

मैं इसका संपूर्ण अर्थ समझने का दावा नहीं करता, लेकिन एक बात तो यह है कि कहीं पर विद्वत्ता भी लोगों को परेशान करती है, इतने सिद्धांत मस्तिष्क में झगड़ा करते है, और ऐसा भाव भी कुछ लोगों के मन में आता है कि पूरी दुनिया को उनका शिष्य होना चाहिए, जैसे इस कविता में है, कि सूर्य की किरणें पहुंचती हैं तो उसको लगता है कि सूर्य ने उसको प्रणाम किया है।

सभी स्वयं सिद्ध विद्वानों को समर्पित हैं इस लंबी कविता के कुछ अंश-

शहर के उस ओर खंडहर की तरफ
परित्यक्त सूनी बावड़ी
के भीतरी
ठंडे अँधेरे में
बसी गहराइयाँ जल की…
सीढ़ियाँ डूबी अनेकों
उस पुराने घिरे पानी में…
समझ में आ न सकता हो
कि जैसे बात का आधार
लेकिन बात गहरी हो।
**************
बावड़ी की उन गहराइयों में शून्य
ब्रह्मराक्षस एक पैठा है,
व भीतर से उमड़ती गूँज की भी गूँज,
हड़बड़ाहट शब्द पागल से।
गहन अनुमानिता
तन की मलिनता
दूर करने के लिए प्रतिपल
पाप छाया दूर करने के लिए, दिन-रात
स्वच्छ करने –
ब्रह्मराक्षस
घिस रहा है देह
हाथ के पंजे बराबर,
बाँह-छाती-मुँह छपाछप
खूब करते साफ,
फिर भी मैल
फिर भी मैल!!

और… होठों से
अनोखा स्तोत्र कोई क्रुद्ध मंत्रोच्चार,
अथवा शुद्ध संस्कृत गालियों का ज्वार,
मस्तक की लकीरें
बुन रहीं
आलोचनाओं के चमकते तार !!
उस अखंड स्नान का पागल प्रवाह…
प्राण में संवेदना है स्याह!!
किंतु, गहरी बावड़ी
की भीतरी दीवार पर
तिरछी गिरी रवि-रश्मि
के उड़ते हुए परमाणु, जब
तल तक पहुँचते हैं कभी
तब ब्रह्मराक्षस समझता है, सूर्य ने
झुककर नमस्ते कर दिया।

पथ भूलकर जब चाँदनी
की किरन टकराए
कहीं दीवार पर,
तब ब्रह्मराक्षस समझता है
वंदना की चाँदनी ने
ज्ञान-गुरु माना उसे।

अति प्रफुल्लित कंटकित तन-मन वही
करता रहा अनुभव कि नभ ने भी
विनत हो मान ली है श्रेष्ठता उसकी!!

और तब दुगुने भयानक ओज से
पहचान वाला मन
सुमेरी-बेबिलोनी जन-कथाओं से
मधुर वैदिक ऋचाओं तक
व तब से आज तक के सूत्र
छंदस्, मंत्र, थियोरम,
सब प्रेमियों तक
कि मार्क्स, एंजेल्स, रसेल, टॉएन्बी
कि हीडेग्गर व स्पेंग्लर, सार्त्र, गांधी भी
सभी के सिद्ध-अंतों का
नया व्याख्यान करता वह
नहाता ब्रह्मराक्षस, श्याम
प्राक्तन बावड़ी की
उन घनी गहराइयों में शून्य।
***************
सुन रहा हूँ मैं वही
पागल प्रतीकों में कही जाती हुई
वह ट्रेजिडी
जो बावड़ी में अड़ गई।
************
पिस गया वह भीतरी
औ’ बाहरी दो कठिन पाटों बीच,
ऐसी ट्रेजिडी है नीच!!
बावड़ी में वह स्वयं
पागल प्रतीकों में निरंतर कह रहा
वह कोठरी में किस तरह
अपना गणित करता रहा
औ’ मर गया…
वह सघन झाड़ी के कँटीले
तम-विवर में
मरे पक्षी-सा
विदा ही हो गया
वह ज्योति अनजानी सदा को सो गई
यह क्यों हुआ !
क्यों यह हुआ !!
मैं ब्रह्मराक्षस का सजल-उर शिष्य
होना चाहता
जिससे कि उसका वह अधूरा कार्य,
उसकी वेदना का स्रोत
संगत पूर्ण निष्कर्षों तलक
पहुँचा सकूँ।
( गजानन माधव मुक्तिबोध)

नमस्कार
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2 replies on “166. ब्रह्मराक्षस”

आशे तुम्हारे ही सहारे जी रहे है हम सभी, सब कुछ गया रे है रे। तुमको न छोड़ेंगे कभी। आशे,तुम्हारे ही सहारे टिक रही है यही महि। धोखा न दीजो अंत में, बिनती हमारी है यही

Gadyansh sandarbh sahit Vyakhya kijiye

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