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58. वहाँ पैदल ही जाना है…..!

आज फिर से पुराने ब्लॉग का दिन है, लीजिए प्रस्तुत है एक और पुराना ब्लॉग-
आज ऐसे ही, गीतकार शैलेंद्र जी की याद आ गई। मुझे ये बहुत मुश्किल लगता है कि किसी की जन्मतिथि अथवा पुण्यतिथि का इंतज़ार करूं और तब उसको याद करूं।
मैंने कहीं पढ़ा था कि शैलेंद्र जी इप्टा से जुड़े थे और वहीं किसी नाटक के मंचन के समय पृथ्वीराज कपूर जी उनसे मिले, बताया कि उनके बेटे राज कपूर अपनी पहली फिल्म बनाने वाले हैं और उनसे फिल्म में गीत लिखने का अनुरोध किया। शैलेंद्र उस समय अपनी विचारधारा के प्रति पूरी तरह समर्पित थे और उन्होंने कहा कि वे फिल्म के लिए गीत नहीं लिखेंगे। पृथ्वीराज जी ने उनसे कहा कि जब उनका मन हो तब वे आकर मिल लें, अगर वे आएंगे तो उनको बहुत अच्छा लगेगा। इत्तफाक़ से वह घड़ी बहुत जल्द आ गई और हमारी फिल्मों को शैलेंद्र जैसा महान गीतकार मिल गया। सिर्फ इतना ही नहीं, शैलेंद्र, हसरत जयपुरी, मुकेश, शंकर जयकिशन का राजकपूर के साथ मिलकर एक ऐसा समूह बना, जिसने हमारी फिल्मों अनेक अविस्मरणीय गीत दिए, जिनमें सिर्फ महान विचार और भावनाएं नहीं अपितु आत्मा धड़कती है। संगीतकार के तौर पर इस समूह में कल्याण जी-आनंद जी और शायद लक्ष्मीकांत प्यारे लाल भी जुड़े। कुछ ऐसा संयोग बन गया कि शैलेंद्र अथवा हसरत गीत लिखेंगे, शंकर जयकिशन उसका संगीत देंगे, मुकेश उसके पुरुष कंठ होंगे और पर्दे पर पर राज कपूर की प्रस्तुति इस सभी का संयोग बनकर वह गीत अमर बन जाएगा-

तुम जो हमारे मीत न होते
गीत ये मेरे- गीत न होते।
तुम जो न सुनते,
क्यों गाता मैं,
दर्द से घुट कर रह जाता मैं।
सूनी डगर का एक सितारा-
झिलमिल झिलमिल रूप तुम्हारा।

एक बहुत बड़ी शृंखला है ऐसे गीतों की, जिनमें बहुत गहरी बात को बड़ी सादगी से कह दिया गया है। नशे का गीत है तो उसमें भी बड़ी सरलता से फिलॉसफी कह दी गई है-

मुझको यारो माफ करना, मैं नशे में हूँ-
कल की यादें मिट चुकी हैं, दर्द भी है कम
अब जरा आराम से आ-जा रहा है दम,
कम है अब दिल का तड़पना, मैं नशे में हूँ।
है जरा सी बात और छलके हैं कुछ प्याले,
पर न जाने क्या कहेंगे, ये जहाँ वाले,
तुम बस इतना याद रखना, मैं नशे में हूँ।

शराबियों से ही जुड़ी एक और बात, वो रोज तौबा करते हैं और रोज भूल जाते हैं, इन बातों को इस गीत में कितनी खूबसूरती से कहा गया है-

याद आई आधी रात को, कल रात की तौबा,
दिल पूछता है झूम के, किस बात की तौबा!
जीने भी न देंगे मुझे, दुश्मन मेरी जां के,
हर बात पे कहते हैं कि- इस बात की तौबा!
बातों में वफा और वो मर मिटने की कस्में,
क्या दौर था, उस दौर के जज़्बात की तौबा।

और फिर सादगी और मानवीयता के दर्शन से भरे ये गीत-

किसी की मुस्कुराहटों पे हो निसार,

किसी का दर्द मिल सके तो ले उधार,

किसी के वास्ते हो तेरे दिल में प्यार-

जीना इसी का नाम है।

रिश्ता दिल से दिल के ऐतबार का,

जिंदा है हमीं से नाम प्यार का,

किसी के आंसुओं में मुस्कुराएंगे,

मर के भी किसी को याद आएंगे,

कहेगा फूल हर कली से बार-बार

जीना इसी का नाम है।

या फिर-

इन काली सदियों के सिर से, जब रात का आंचल ढ़लकेगा,
जब दुख के बादल छिटकेंगे, जब सुख का सागर छलकेगा,
जब अंबर झूमके नाचेगा, जब धरती नगमे गाएगी-
वो सुबह कभी तो आएगी।

एक और-

जेबें हैं अपनी खाली, क्यों देता वर्ना गाली,
ये संतरी हमारा, ये पासबां हमारा।
चीन-ओ-अरब हमारा, हिंदोस्तां हमारा,
रहने को घर नहीं है, सारा जहाँ हमारा।

और अंत में-

तुम्हारे महल- चौबारे, यहीं रह जाएंगे सारे,
अकड़ किस बात की प्यारे, ये सर फिर भी झुकाना है।
सजन रे झूठ मत बोलो, खुदा के पास जाना है,
न हाथी है न घोड़ा है, वहाँ पैदल ही जाना है।

ये सब मैंने कहा, कवि शैलेंद्र जी को याद करके, हालांकि मुझे इस बात की जानकारी नहीं है कि जिन गीतों की पंक्तियां मैंने यहाँ लिखी हैं, उनमें कौन सा गीत शैलेंद्र जी का है, कौन सा नहीं, लेकिन इतना ज़रूर है कि ये सभी गीत उसी परंपरा के हैं, जिसके शैलेंद्र जी प्रतिनिधि थे। हाँ इन सभी गीतों को मुकेश जी ने अपनी सीधे दिल में उतर जाने वाली आवाज़ दी है।

मुझे नहीं मालूम कि आपको यह आलेख कैसा लगेगा, लेकिन मुझे इस सफर से गुज़रकर बहुत अच्छा लगा और आगे भी जब मौका मिलेगा, मैं इस प्रकार की बातें करता रहूंगा। हर गीत की कुछ पंक्तियां लिखने के बाद मुझे लगा है कि जो पंक्तियां मैंने यहाँ नहीं दी हैं, उनको लिखता तो और अच्छा रहता। इन अमर गीतों की कुछ पंक्तियों के बहाने मैं शैलेंद्र जी को और इन गीतों से जुड़े सभी महान सर्जकों, कलाकारों को याद करता हूँ।
नमस्कार।
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57. जब से गए हैं आप, किसी अजनबी के साथ!

आज फिर से पुराने ब्लॉग का दिन है, लीजिए प्रस्तुत है एक और पुराना ब्लॉग-

आज एक बार फिर संगीत, विशेष रूप से गज़ल की दुनिया की बात कर लेते हैं। भारतीय उप महाद्वीप में जब गज़ल की बात चलती है तब अधिकतम स्पेस गुलाम अली जी और जगजीत सिंह जी घेर लेते हैं। हालांकि इनसे बहुत पहले बेगम अख्तर जी से गज़ल गायकी लोकप्रिय हुई थी। इसके बाद जिस नाम को सबसे ज्यादा शोहरत मिली, वो थे पाकिस्तान के मेहंदी हसन साहब। एक समय था जब गज़ल की दुनिया में उनका कोई मुकाबला नहीं था।

सुना है गुलाम अली साहब, जो मेहंदी हसन जी के साथ तबला बजाते थे, उन्होंने उनसे कहा- उस्ताद मैं भी गाना चाहता हूँ, इस पर मेहंदी हसन बोले आप तबला बजाओ, यही ठीक है। लेकिन बाद में एक समय ऐसा आया कि गुलाम अली जी ने लोकप्रियता के मामले में, मेहंदी हसन साहब को पीछे छोड़ दिया। वैसे मेहंदी हसन साहब का अपना एक बहुत ऊंचा मुक़ाम था। उनकी एक लोकप्रिय गज़ल के कुछ शेर याद आ रहे हैं, जिनमें उनकी गायकी की विशेष झलक मिलती है-

देख तो दिल कि जां से उठता है,
ये धुआं सा कहाँ से उठता है।
यूं उठे आज उस गली से हम,
जैसे कोई जहाँ से उठता है।
बैठने कौन दे भला उसको,
जो तेरे आस्तां से उठता है।

इसके बाद तो गज़ल की दुनिया में गुलाम अली जी और जगजीत सिंह जी छाए रहे। गुलाम अली जी ने जहाँ सीमित साज़ों के साथ अपनी गायकी की धाक जमाई, वहीं जगजीत सिंह जी ने अच्छी गायकी के साथ, आर्केस्ट्रा का भी भरपूर इस्तेमाल किया है।
इनकी गज़लों में से कोई एक दो शेर चुनना तो बहुत मुश्किल है, लेकिन फिर भी कुछ उदाहरण दे रहा हूँ| पहले जगजीत सिंह जी की गाई गज़ल के प्रसिद्ध शेर, जिनमें उनकी गायकी की झलक मिलती है-

जवां होने लगे जब वो तो हमसे कर लिया परदा,
हया बरलक्स आई और शबाब आहिस्ता-आहिस्ता।

एक और-

होश वालों को खबर क्या, बेखुदी क्या चीज़ है,
इश्क कीजे फिर समझिए, ज़िंदगी क्या चीज़ है।

या फिर-

दुनिया जिसे कहते हैं, जादू का खिलौना है,
मिल जाए तो मिट्टी है, खो जाए तो सोना है।

अब गुलाम अली जी-

छेड़कर तब्सिरा ए दौर ए जवानी रोया,
रात यारों को सुनाकर मैं, कहानी रोया।
जब भी देखी है किसी चेहरे पे एक ताज़ा बहार,
देखकर मैं तेरी तस्वीर पुरानी रोया।

एक और-

सो गए लोग उस हवेली के,
एक खिड़की मगर खुली है अभी।
कुछ तो नाज़ुक मिजाज़ हैं हम भी,
और ये चोट भी नई है अभी।

अब गज़ल की दुनिया में तो इतने लोग हैं कि कुछ नाम ले लूं, तो ये होगा कि बहुत सारे छूट जाएंगे। मेरे प्रिय फिल्मी गायक मुकेश जी ने भी कुछ गज़लें गाई हैं, एक गज़ल के एक दो शेर याद आ रहे हैं-

जरा सी बात पे, हर रस्म तोड़ आया था,
दिल-ए-तबाह ने भी क्या मिजाज़ पाया था।
शगुफ्ता फूल सिमटकर कली बने जैसे,
कुछ इस कमाल से तूने बदन छुपाया था।
गुज़र गया है कोई लम्हा-ए-शरर की तरह,
अभी तो मैं उसे पहचान भी न पाया था।

एक गज़ल चंदन दास जी की गाई हुई मुझे बहुत अच्छी लगती है-

अपना गम लेके कहीं और न जाया जाए,
घर की बिखरी हुई चीज़ों को सज़ाया जाए।
घर से मस्ज़िद है बहुत दूर चलो यूं कर लें,
किसी रोते हुए बच्चे को हंसाया जाए।

असल में गाने वाले तो इतने हैं, और फिल्मों में बहुत अच्छी गज़लें आई हैं, उनका ज़िक्र करते हुए कई ब्लॉग लिखे जा सकते हैं, रफी साहब ने बहुत अच्छी गज़लें गाई हैं, जैसे-

रंग और नूर की बारात किसे पेश करूं
ये मुरादों की हसीं रात किसे पेश करूं।

अनूप जलोटा जी ने भजनों के अलावा बहुत सी गज़लें भी गाई हैं, उनमें से कुछ काफी अच्छी बन पड़ी हैं। जैसे एक है-

अशआर मेरे यूं तो ज़माने के लिए हैं,
कुछ शेर फक़त तुमको सुनाने के लिए हैं।
आंखों में जो रख लोगे तो कांटों से चुभोगे,
ये ख्वाब तो पलकों पे सज़ाने के लिए हैं।

एक गज़ल जिसमें काफी दर्द उभरा है, जो भोगा हुआ यथार्थ लगता है! जैसा सुना है कि रूप कुमार राठौर, अनूप जलोटा के साथ तबला बजाते थे और अनूप जी और सोनाली जलोटा, एक साथ गाते थे। बाद में सुरों का तालमेल कुछ ऐसा हुआ कि सोनाली जलोटा, रूप कुमार राठौर के साथ मिलकर सोनाली राठौर बन गईं और उनका सिंगिंग पेयर बन गया। इसके बाद अनूप जी ने ये गज़ल गाई थी, जिसमें पूरा दर्द उभरकर आया है-

जब से गए हैं आप, किसी अजनबी के साथ,
सौ दर्द जुड़ गए हैं, मेरी ज़िंदगी के साथ।

खैर ये किस्सा तो चलता ही जाएगा, क्योंकि गाने वाले एक से एक हैं, और बहुत अच्छे हैं, कुछ का नाम लेना ठीक नहीं रहेगा। फिर कभी बात करेंगे और लोगों के बारे में, आज के लिए इतना ही।

नमस्कार।


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199. हम जिस तरफ़ चले थे उधर रास्ता न था!

हमारे एक प्रसिद्ध फिल्मी अभिनेता, निर्माता, निर्देशक हुए हैं, अभी वे सक्रिय नहीं हैं, ईश्वर उनको लंबी उम्र दे, वे हैं- श्री मनोज कुमार।
फिल्म निर्माता के रूप में उन्होंने एक विशेष विषय पर फिल्में बनाई- देशप्रेम और देशभक्ति। उनकी फिल्म के एक गीत की पंक्ति है-

है प्रीत जहाँ की रीत सदा,
मैं गीत उसी के गाता हूँ,
भारत का रहने वाला हूँ,
भारत की बात सुनाता हूँ।

अचानक यह गीत याद आया तो खयाल आया कि देश, देशप्रेम एक बहुत अच्छा विषय है, लेकिन कवियों / शायरों के लिए मूलभूत विषय तो ज़िंदगी है। असल में उसके बाद ही, उससे जुड़कर ही बाकी सभी विषय आगे आते हैं।
श्रेष्ठ कवि श्री रामावतार त्यागी जी की पंक्तियां हैं-

एक हसरत थी कि आंचल का मुझे प्यार मिले,
मैंने मंज़िल को तलाशा, मुझे बाज़ार मिले,
ज़िंदगी और बता, तेरा इरादा क्या है!

इस गीत में वे ज़िंदगी को चुनौती देते हुए दिखाई देते हैं। बस इस ज़िंदगी के सफर से जुड़ी एक गज़ल शेयर कर रहा हूँ, जिसे श्री हरिहरन, पंकज उधास और शायद और भी कई गायकों ने गाया है। इस खूबसूरत गज़ल के लेखक हैं- श्री मुमताज़ राशिद।
लीजिए इस गज़ल का आनंद लीजिए-

पत्थर सुलग रहे थे कोई नक्श-ए-पा न था
हम जिस तरफ़ चले थे उधर रास्ता न था।

परछाइयों के शहर की तनहाइयां न पूछ,
अपना शरीक-ए-ग़म कोई अपने सिवा न था।

पत्तों के टूटने की सदा घुट के रह गई,
जंगल में दूर-दूर, हवा का पता न था।

राशिद किसे सुनाते गली में तेरी गज़ल,
उसके मकां का कोई दरीचा खुला न था।

पत्थर सुलग रहे थे कोई नक्श-ए-पा न था,
हम उस तरफ़ चले थे जिधर रास्ता न था।

नमस्कार।

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198. जापानी इंसेफेलाइटिस के लक्षण और इससे बचाव!

यह आलेख लिखा था एक उत्पाद का प्रचार करने की दृष्टि से, लेकिन मालूम हुआ कि उत्पादक को इसकी आवश्यकता नहीं है। अब लिखा गया है तो शेयर कर ही लेता हूँ, संभव है किसी के काम आ जाए, हाँ उस उत्पाद के प्रचार वाला भाग इससे निकाल दिया है!

मनुष्य जीवन की मूलभूत आवश्यकताएं मानी जाती हैं- रोटी, कपड़ा और मकान। मान लीजिए ये सभी हैं और किसी की आर्थिक स्थिति भी बहुत अच्छी है, संपन्नता है, भोग-विलास की सामग्री है, लेकिन स्वास्थ्य ठीक नहीं है, तब क्या वह इन सबका आनंद ले पाएगा?

मान लीजिए कि आप ठीक हैं, परंतु आपके बुज़ुर्ग माता-पिता अथवा बच्चे को कोई रोग लग गया है, तब भी आपके आनंद को ग्रहण लग जाता है।

धीरे-धीरे मनुष्य ने बहुत सी बीमारियों पर विजय पाई है, कुछ का प्रभाव कम भी हुआ है, लेकिन अभी भी बहुत से रोग पनपते हैं और स्वास्थ्य के संबंध में सावधान रहना बहुत ज़रूरी है।

ऐसा ही एक रोग है- जापानी इंसेफेलाइटिस, यह एक संक्रमण है जो एशिया और पश्चिमी पेसिफिक क्षेत्रों में अधिक होता है. इससे दिमाग में सूजन होती है। वैसे यह मच्छर के काटने के कारण, जानवरों से जानवरों में फैलता है, और विशेष रूप से ग्रामीण इलाकों में यह जानवरों के आसपास रहने वाले मनुष्यों को भी हो जाता है। इस रोग को पूरी तरह विकसित होने में 5 से 15 दिन लगते हैं, और इसके लक्षणों में बुखार, सिरदर्द और उल्टियां आना शामिल होता है।

बच्चे और बूढ़े,  क्योंकि उनमें रोग प्रतिरोधक क्षमता कम होती है, अतः वे इसके जल्दी शिकार हो सकते हैं। यह रोग बच्चों और बूढों के मामले में घातक भी सिद्ध हो सकता है अतः सावधान रहना और समय पर उचित कदम उठाना आवश्यक है।

यह रोग होने पर तो डॉक्टर से परामर्श आवश्यक हो जाता है, लेकिन क्या ही अच्छा हो कि हम उसकी नौबत ही न आने दें! इसके लिए समुचित सावधानी ज़रूरी है।

जब आप ऐसे स्थानों पर अक्सर जाते हैं, जहाँ इस रोग का प्रभाव अधिक है, तब आपको जापानी इंसेफेलाइटिस से बचाव संबंधी टीके लगवा लेने चाहिएं।

इस रोग को फैलाने वाले मच्छरों से बचाव के लिए आप-
– पूरी बांह वाली हल्के रंग की कमीज, लंबी पेंट पहनें।

  • मच्छरों को दूर भगाने वाले किसी प्रभावशाली साधन का प्रयोग करें।

  • आसपास पानी न रुका रहने दें, क्योंकि उसमें मच्छर पनपते हैं।

मच्छरों से बचाव के लिए आप जहाँ अपने कमरे में मच्छरों को भगाने वाले किसी साधन का प्रयोग करें, कोई  सुरक्षात्मक क्रीम भी, शरीर के खुले भागों पर मल सकते हैं, जिससे रक्षा कवच और भी मजबूत हो जाता है।

इस प्रकार समुचित सावधानियों और रक्षा संबंधी प्रोडक्ट्स का प्रयोग करते हुए आप जापानी इंसेफेलाइटिस से अपनी और अपने परिजनों की रक्षा कर सकते हैं।

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56. दैर-ओ-हरम में बसने वालो !

आज फिर से, लीजिए प्रस्तुत है एक और पुराना ब्लॉग-
यह जानकर, हर किसी को अच्छा लगता है कि कुछ लोग हमको जानते हैं। लेकिन दुनिया में हर इंसान अलग तरह का है, कितने लोग वास्तव में ऐसे होते हैं, जो किसी व्यक्ति को ठीक से जानते हैं।
कुछ लोग हैं, जो हमारे साथ मुहल्ले में रहते हैं, वे हमें इस लिहाज़ से जानते हैं कि हम किस प्रकार के पड़ौसी हैं, कैसे नागरिक हैं, सामुदायिक गतिविधियों में क्या हमारी कोई भूमिका होती है?
इसी प्रकार में दफ्तर में हमारे साथ काम करने वाले, हमको हमारे पद, विभाग और अन्य लोगों के साथ हमारे व्यवहार, दफ्तर में होने वाली गतिविधियों में हमारी भागीदारी तथा एक कर्मचारी के रूप में हमारी भूमिका उनको किस प्रकार प्रभावित करती है अथवा हमारी कैसी छवि बनाती है, उसके आधार पर जानते हैं।
एक और आधार होता है लोगों के मन में हमारी छवि बनाने का, यह आधार कुछ जगहों पर बहुत प्रभावी होता है, जैसे बिहार में जब मैं कार्यरत था तब एक अधिकारी बता रहे थे कि उनको वहाँ के कोई स्थानीय पत्रकार मिले और उनसे पूछा, जी आप कौन हैं? अब पत्रकार तो काफी जागरूक माने जाते हैं। उन्होंने अपना नाम बताया, वो संतुष्ट नहीं हुए, पद बताया वे नहीं माने, उन्होंने कहा कि मैं अमुक स्थान का रहने वाला हूँ, इंसान हूँ, वो फिर बोले वैसे आप क्या हैं? वैसे मतलब, उन्होंने पूछा, तब पत्रकार महोदय बोले, आपकी जाति क्या है जी!
कुछ लोगों के लिए यह जानकारी सबसे अधिक महत्वपूर्ण होती है। आप अच्छे इंसान हैं या नहीं, जहाँ आप हैं, आप अपनी भूमिका का निर्वाह कितनी ज़िम्मेदारी से, कितनी इंसानियत के साथ करते हैं, यह महत्वपूर्ण नहीं होता कुछ लोगों के लिए, पहले तो आपका धर्म और उसके बाद आपकी जाति, यही दो बातें उनके लिए महत्वपूर्ण होती हैं।
तो इस आधार पर अगर पूछा जाए कि मैं क्या हूँ, तो मुझे बताना होगा कि मैं हिंदू हूँ, ब्राह्मण हूँ। हालांकि इन दोनों पहचानों को विकसित करने में मेरी कोई भूमिका नहीं है। मेरा यज्ञोपवीत संस्कार विवाह से पहले तो कभी हुआ नहीं, विवाह के समय पंडित जी ने जनेऊ पहनाया था, जो मैंने आयोजन के बाद उतार दिया और उसके पहले अथवा बाद में कभी नहीं पहना। ईश्वर में मेरी गहरी आस्था है, लेकिन मैं कभी-कभार औपचारिक आयोजनों के अलावा कभी पूजा-पाठ नहीं करता।
मैं अक्सर देखता हूँ कि ब्राह्मण महासभा, क्षत्रिय महासभा आदि-आदि अनेक आयोजन होते रहते हैं, वास्तव में जहाँ यह भाव पनपना चाहिए कि सभी मनुष्य एक जैसे हैं, सभी का उनके गुणों के आधार पर सम्मान होना चाहिए, इस प्रकार के आयोजन आपस में विभाजन पैदा करने वाले होते हैं। आज आधुनिक समय की मांग है कि इंसानों को बांटने वाले इस प्रकार के संगठनों को समाप्त किया जाए।
न किसी धर्म के नाम पर, न जाति के नाम पर, अगर लोग इकट्ठा होते हैं, तो वे मानव-जाति के नाम पर एकत्र हों।
मुझे जगजीत सिंह जी की गाई एक गज़ल याद आ रही है, इस मौके पर-

दैर-ओ-हरम में बसने वालो
मय-ख्वारों में फूट न डालो।

तूफां से हम टकराएंगे
तुम अपनी कश्ती को संभालो।

आरिज़-ओ-लब सादा रहने दो
ताजमहल पर रंग न डालो।

मैखाने में आए वाइज़,
इनको भी इंसान बना लो।

नमस्कार।


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197. अपने घर के लिए, इंटीरियर डिजाइनर क्यों?

(Advantages of Hiring an Interior Designer and Architect for Your New Home)
ID Prop –Details
आप अपना नया घर बनवाते हैं, पुराने घर का नवीकरण कराते हैं, तब यह क्यों जरूरी है कि आप इंटीरियर डिजाइनर की सेवाएं प्राप्त करें?
एक बात तो आप मानेंगे कि इंसान के जो सबसे बड़े सपने होते हैं जीवन में, जो मूलभूत आवश्यकताएं हैं, उनमें से एक है अपना घर! कहते हैं न- रोटी, कपड़ा और मकान। बहुत अधिक जरूरी है कि इंसान के पेट में रोटी जाए, तन पर कपड़ा हो और सिर पर छत हो, क्या ही अच्छा हो कि यह छत ऐसे घर की हो, जिसके मालिक आप खुद हों।
हाँ तो जब आप अपना मकान बनवाते हैं, तब यह आपका एक बहुत बड़ा और महत्वपूर्ण सपना होता है। यह भी सच है कि यह घर उन सभी सदस्यों का सपना होता है, जो घर का महत्व समझते हैं, मतलब बहुत छोटे बच्चों को छोड़कर। वैसे छोटे बच्चों को भी यह उम्मीद होती ही कि घर में उनके लिए खेलकूद का, पढ़ाई का एक कोना, हो सके तो एक अलग कमरा होना चाहिए।
कुल मिलाकर घर का हर सदस्य इस बारे में अपनी राय दे सकता है कि घर में क्या-क्या सुविधाएं होनी चाहिएं, लेकिन आप अपनी मेहनत की कमाई से जितना बड़ा जमीन का टुकड़ा खरीद पाते हैं, उनमें उन सभी सुविधाओं को किस तरह अधिकतम प्रभावी तरीके से शामिल किया जाए, कैसे सही सामग्री का चयन किया जाए, यह इस क्षेत्र का कोई विशेषज्ञ ही बता पाएगा। जिस प्रकार आप किसी एक क्षेत्र के विशेषज्ञ हो सकते हैं, लेकिन आपका घर सही तरह से सभी सुविधाओं से युक्त हो, इसके लिए आपको किसी इंटीरियर डिजाइनर की सेवाएं लेनी पड़ेंगी।
वह विशेषज्ञ ही है जो आपके घर के सभी सदस्यों की राय, उनकी आवश्यकताओं की जानकारी लेने के बाद, आपकी उपलब्ध जमीन में, किस प्रकार उन सभी सुविधाओं का समावेश किया जा सकता है और कुल मिलाकर आपके बजट के अनुसार, इस सपने को किस प्रकार सुंदर आकार दिया जा सकता है, यह निर्णय ले सकता है।
यही कारण है कि आजकल अधिकतर लोग इंटीरियर डिजाइनर्स और आर्किटेक्ट्स की सेवाएं प्राप्त करने लगे हैं।
इन सुविधाओं के लिए आप इन लिंक्स के माध्यम से समुचित विशेषज्ञों से संपर्क कर सकते हैं-
सेवा संपर्क यूआरएल
interior designer       http://www.idprop.com/
best architects in india         http://www.idprop.com/experts/architects
home/apartment interior design ideas        http://www.idprop.com/photos/residential

मकान बनाए की सोचते ही आप इतने दिग्भ्रमित हो जाते हैं, इतना अधिक दबाव आपके ऊपर होता है, क्योंकि आपको इस क्षेत्र का अनुभव नहीं है। इसीलिए यह आलेख आपकी सहायता हेतु, भारत के सर्वश्रेष्ठ इंटीरियर डिजाइनरों और वास्तुविदों (आर्किटेक्ट्स) के संबंध में जानकारी प्रदान करने की दृष्टि से लिखा गया है। जैसा कि आप समझ सकते हैं, इनकी सेवाएं प्राप्त करने से निम्न लाभ प्राप्त हो सकते हैं:-

  1. आपको अपने घर\एपार्टमेंट, उसके इण्टीरियर डिजाइन के बारे में सर्वश्रेष्ठ विकल्प चुन सकते हैं।

इंटीरियर डिजाइनर/आर्किटेक्ट इस क्षेत्र में प्रशिक्षण प्राप्त होते हैं, स्वाभाविक रूप से वे आपके बजट के अंतर्गत संभव डिजाइन संबंधी सर्वश्रेष्ठ विकल्प चुन सकते हैं। इसके अलावा वे आपके और आपके परिजनों के सुझावों को भी इसमें समाहित कर सकते हैं।

  1. आप यह देख सकते हैं कि डिजाइन को किस प्रकार लागू किया गया है

जब आप इस क्षेत्र में काम कर रहे किसी विशेषज्ञ की सेवाएं प्राप्त करते हैं, तब वह अपना कोई पहले किया गया काम, उसके चित्र दिखाकर आपको समझा सकता है कि अंतिम रूप किस प्रकार का होगा।

  1. आप उनके अनुभव से काफी कुछ सीख सकते हैं

इन विशेषज्ञों को सैद्धांतिक और व्यावहारिक अनुभव होता है, जिससे आप यह जान सकते हैं कि आपके विचारों को कैसे रूपांतरित किया जा सकता है।
4. आप आराम से बैठकर अपने सपने को साकार होता हुआ देख सकते हैं।

जब विशेषज्ञ आपका काम कर रहा है, आप प्रगति को देखते हुए, आगे की बातों पर ध्यान दे सकते हैं।

आईडी प्रोप. (ID Prop) एक ऑनलाइन प्लेटफोर्म है, जो भारत में उपलब्ध सर्वश्रेष्ठ interior designers तथा architects की जानकारी देता है। यहाँ पहले काम करा चुके ग्राहकों द्वारा दी गई प्रतिक्रियाएं भी उपलब्ध होती हैं, जिनके आधार सही सेवा प्रदाता को चुनकर, उससे संपर्क कर सकते हैं। इसके अलावा यहाँ ऑनलाइन home and apartment interior design के संबंध में बहुत सी जानकारी भी उपलब्ध होती है, जिनको आप देख सकते हैं। यह आलेख आईडी प्रोप. द्वारा उपलब्ध कराई जा रही, इंटीरियर डिजाइन और आर्किटेक्ट संबंधी सुविधाओं की जानकारी आपको उपलब्ध कराने के उद्देश्य से लिखा गया है।
आलेख में सम्मिलित जानकारी एवं चित्र भी आईडी प्रोप. द्वारा प्रदान किए गए हैं।

अंत में डॉ. कुंवर बेचैन जी की गीत पंक्तियां याद आ रही हैं-

जिसे बनाया वृद्ध पिता के श्रमजल ने
दादी की हँसुली ने, माँ की पायल ने
उस सच्चे घर की कच्ची दीवारों पर
मेरी टाई टँगने से कतराती है।

नमस्कार।

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196. ये न होता तो क्या होता!

#AlterationsToLife
IndiSpire पर दिए गए संदर्भ से प्रेरणा लेते हुए आज का आलेख लिख रहा हूँ। लेकिन मैं उन प्रसंगों का ही उल्लेख कर रहा हूँ जिनसे मेरे जीवन, मेरे करियर को सकारात्मक दिशा मिली है। ऐसे प्रसंग नहीं हैं जिनके बारे में मैं नकारात्मक रूप में लिख सकूं।

मैंने अपने शुरू के ब्लॉग्स में अपने जीवन की महत्वपूर्ण घटनाओं, प्रसंगों, प्रभावित करने वाले और कुछ बाधक बनने वाले व्यक्तियों का क्रमबद्ध तरीके से उल्लेख किया, आज संक्षेप में कुछ घटनाओं का उल्लेख करूंगा, जो जीवन को दिशा देने वाली सिद्ध हुईं।
मेरा जन्म हुआ था दिल्ली के दरिया गंज में, लेकिन जब तक मैंने पढ़ाई शुरू की तब तक हम शाहदरा जा चुके थे, जहाँ रहते हुए मैंने पढ़ाई की और जब मैं बीएससी फाइनल में आया था तब मेरे पिता, जो एक विक्रय प्रतिनिधि के रूप में दौरों पर जाते रहते थे, वे एक बार गए तो फिर वापस नहीं आए। मैं यह कह सकता हूँ कि काश यह न हुआ होता, तब शायद ज़िंदगी ज्यादा आसान हो सकती थी, लेकिन पिताजी का काम ठीक से चल नहीं रहा था और वे सन्यास लेने की सोच रहे थे काफी समय से, शायद उनकी ज़िंदगी ज्यादा आराम से बीती हो उसके बाद! वैसे शायद यदि वे न गए होते तो मैं कुछ और हुआ होता!
खैर पिता के जाने के बाद मैंने, पढ़ाई छोड़कर, पहले चार वर्षों में प्रायवेट नौकरियां कीं, जिनमें वेतन रु. 100/- से लेकर शायद 250 तक पहुंचा। उसके बाद केंद्रीय सचिवालय में क्लर्क के रूप में सेवा की लगभग 6 वर्ष तक। विस्तृत विवरण मैं अपने शुरू के ब्लॉग्स में दे चुका हूँ।
जब क्लर्क था, तब की एक घटना, जिसका उल्लेख मैं पहले भी कर चुका हूँ। मैं एलडीसी था और उससे ऊपर का स्तर होता है यूडीसी, जिसमें एक बुज़ुर्ग साथी कार्यरत थे। खूब ओवरटाइम करते थे, अधिक कमाई करने के लिए, जिससे घर का खर्च चल सके! एक बार ओवरटाइम करके लौटते हुए वे साइकिल से गिर गए, बेहोश हो गए, अस्पताल में जब उनको होश आया, तब उनका यही सवाल था-‘ मेरा ओवरटाइम चल रहा है न!’
यह प्रसंग मैंने इसलिए सुनाया कि उस नौकरी में रहते हुए मैं शायद इस गति को प्राप्त होने के ही सपने देख सकता था, शायद उससे ऊपर के स्तर ‘सहायक’ तक पहुंच पाता, रिटायर होने तक!
इस दौरान मैंने बीच में छूटी पढ़ाई को आगे बढ़ाते हुए प्रायवेटली बी.ए. कर लिया था और स्टॉफ सेलेक्शन कमीशन की परीक्षा पास करके मैं ‘हिंदी अनुवादक’ के पद हेतु चुन लिया गया था, जो उस समय के हिसाब से अच्छी उड़ान थी और मेरी पोस्टिंग आकाशवाणी, जयपुर में हो गई। आकाशवाणी में रहते हुए मैंने हिंदी में एम.ए. भी कर लिया।
एक ही और घटना का उल्लेख करना चाहूंगा, आकाशवाणी की नौकरी करते हुए मैंने केंद्रीय अनुवाद ब्यूरो का प्रशिक्षण प्राप्त किया, जिसमें मैं प्रथम आया और मुझे मैडल मिला। उसके बाद हिंदुस्तान कॉपर लिमिटेड, घाटशिला, झारखंड में मैंने सहायक हिंदी अधिकारी के पद हेतु आवेदन किया।  केद्रीय मंत्री रहीं सुश्री राम दुलारी सिन्हा जी के स्टॉफ के एक सज्जन भी वहाँ  इंटरव्यू देने आए थे और वे मान रहे थे कि चयन तो उनका ही होना है। उनका चयन नहीं हुआ और मेरा हो गया। बाद में उनकी शिकायत आई जिसे दो केंद्रीय मंत्रियों ने अग्रेषित किया था।
ये सारे प्रसंग अपनी जगह, लेकिन मैं जिसके सपने शुरू में एल.डी.सी से सहायक तक बनने की थी, वह अंततः एनटीपीसी से मिडिल मैंनेजमेंट स्तर तक पहुंचकर रिटायर हुआ, कैसे कहूं कि काश ये न हुआ होता या वो न हुआ होता!

डुबोया मुझको होने ने,
न मैं होता तो क्या होता!

चचा गालिब का ये शेर तो ऐसे ही याद आ गया जी, कोई अर्थ तलाश मत कीजिए।

नमस्कार।

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195. गाते गाते रोये मयूरा, फिर भी नाच दिखाए!

फिर से अपने प्रिय गायक मुकेश जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ, जो महान कलाकार और भारत के सबसे बड़े शो मैन राजकपूर जी की शुरू की एक फिल्म- ‘आशिक़’ से है, गीत लिखा है- हसरत जयपुरी जी ने और संगीतकार है- शंकर जयकिशन की जोड़ी। महत्वपूर्ण बात यह भी है कि इस फिल्म के निर्देशक थे- श्री हृषिकेश मुकर्जी।

इसे बालगीत कहा जा सकता है, हालांकि इसमें सरल भाषा में जो समझाया गया, उसको अगर इंसान समझ ले तो शायद यह ज़िंदगी में बहुत काम आ सकता है। हाँ यह भी सही है कि यह समझाना, ऐसे संस्कारों को प्रस्थापित करना, बच्चों के साथ बहुत दूरगामी प्रभाव वाला और उपयोगी हो सकता है।

आइए इस गीत का आनंद लेते हैं-

तुम आज मेरे संग हंस लो
तुम आज मेरे संग गा लो,
और हंसते-गाते इस जीवन की
उलझी राह संवारो।

शाम का सूरज, बिंदिया बनके,
सागर में खो जाए,
सुबह सवेरे वो ही सूरज
आशा लेकर आए,
नई उमंगें, नई तरंगें,
आस की जोत जगाए रे,
आस की जोत जगाए।
तुम आज मेरे संग हंस लो
तुम आज मेरे संग गा लो

दुख में जो गाए मल्हारें,
वो इंसां कहलाए,
जैसे बंसी के सीने में
छेद हैं फिर भी गाए,
गाते-गाते रोये मयूरा,
फिर भी नाच दिखाए रे-
फिर भी नाच दिखाए।
तुम आज मेरे संग हंस लो
तुम आज मेरे संग गा लो,
और हंसते-गाते इस जीवन की
उलझी राह संवारो।

इसके साथ ही मैं कामना करता हूँ कि आपका जीवन आशा, उमंग और उत्साह से भरा रहे।

नमस्कार।

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194. राख के ढ़ेर में शोला है ना चिंगारी है!

आज मोहम्मद रफी जी के मधुर और बुलंद स्वर में, कैफी आज़मी साहब का लिखा एक गीत शेयर कर रहा हूँ, जो शोला और शबनम फिल्म के लिए ज़नाब मोहम्मद ज़हूर तथा खैयाम जी के संगीत निर्देशन में रिकॉर्ड किया गया था।

इन गीतों को सुनने पर यह गर्व होता है कि पहले कैसे महान शायर फिल्मों से जुड़े थे, कितने महान गायक और संगीतकार थे और गीत तैयार करने के लिए कितनी मेहनत की जाती थी। अब भी अच्छे गीत आते हैं, लेकिन उनका प्रतिशत बहुत कम हो गया है।

कैफी साहब के लिखे इस सुंदर गीत को रफी साहब ने पूरे मन से गाया है और अपनी मधुर वाणी से इसे लोगों के दिलों पर अंकित कर दिया है- ‘अब वो प्यार न उस प्यार की यादें बाकी…’ ।

पहले की फिल्मों में खास तौर पर दिल की दुनिया उजड़ने के प्रसंग काफी अधिक आते थे, शायद प्रेम भी उस समय अधिक होता था, आज तो विकल्प खुले रहते हैं। पहले का हीरो लगता था कि रोमांस कर रहा है तो ठीक, नहीं तो शांत ज्वालामुखी बन जाता था, 15 मिनट में हीरो की दाढ़ी 1 सेंटीमीटर बढ़ जाती थी!

यह बात ऐसे ही मज़ाक में कह दी, असल में उस समय दिल में झांकने का अवसर ज्यादा मिलता था, आज बाहरी घटनाएं ज्यादा होती हैं, तब भीतरी भावनाओं को ज्यादा दर्शाया जाता था।

वैसे यह भी होता है कि सबको अपना ज़माना अच्छा लगता है, इसलिए शायद मैं भी ‘नॉस्टेल्जिया’ के तहत ही यह सब कह रहा हूँ।

छोड़िए जी, आप इस सुंदर गीत का आनंद लीजिए-

जाने क्या ढूँढती रहती हैं ये आँखे मुझमें
राख के ढ़ेर में शोला है ना चिंगारी है।

अब ना वो प्यार उस प्यार की यादें बाकी
आग वो दिल में लगी कुछ ना रहा, कुछ ना बचा
जिसकी तस्वीर निगाहों में लिये बैठी हो
मैं वो दिलदार नहीं उसकी हूँ खामोश चिता।

जिंदगी हँस के गुजरती थी बहुत अच्छा था
खैर हँस के ना सही रो के गुजर जायेगी
राख बरबाद मोहब्बत की बचा रखी है
बार बार इसको जो छेड़ा तो बिखर जायेगी।

आरजू ज़ुर्म, वफ़ा ज़ुर्म, तमन्ना है गुनाह
ये वो दुनिया है जहाँ प्यार नहीं हो सकता
कैसे बाजार का दस्तूर तुम्हे समझाऊँ
बिक गया जो वो खरीदार नहीं हो सकता।

नमस्कार।

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193. वृक्ष खुली पुस्तक हर पृष्ठ फड़फड़ाया!

कई दिन से पुराने ब्लॉग परोस रहा था, वैसे एक बात है कि जब ब्लॉग लिखना शुरू किया तब बहुत अधिक उत्साह था, काफी कुछ मन में था- ये कहना है, ये भी कहना है। पुराने ब्लॉग ज्यादातर साथियों के साथ शेयर भी नहीं हुए थे। आगे भी कुछ ऐसे ब्लॉग शेयर करूंगा।
आज सर्वेश्वर दयाल सक्सेना जी की एक कविता याद आ रही है, देश के कुछ हिस्सों में जब सर्दियों में कई दिन तक धूप नहीं निकलती है और फिर किसी दिन सुहावनी धूप निकल आती है, जिसे धर्मवीर भारती जी ने लिखा था- ‘जार्जेट के पल्ले सी, यह दोपहर नवंबर की!’
सर्वेश्वर जी की यह गीत-कविता भी सर्दियों की दोपहर का बहुत सुंदर वर्णन प्रस्तुत करती है, ‘सूरज खरगोश धवल, गोद उछल आया’, ‘मेघ ऊन का गोला बुनती सुकुमारी’।
लीजिए इस सुंदर कविता का आनंद लीजिए-

बहुत दिनों बाद मुझे धूप ने बुलाया।
ताते जल नहा, पहन श्वेत वसन आई
खुले लॉन बैठ गई दमकती लुनाई
सूरज खरगोश धवल गोद उछल आया।
बहुत दिनों बाद मुझे धूप ने बुलाया।

नभ के उद्यान छत्र तले मेघ टीला
पड़ा हरा फूल कढ़ा मेजपोश पीला
वृक्ष खुली पुस्तक हर पृष्ठ फड़फड़ाया
बहुत दिनों बाद मुझे धूप ने बुलाया।

पैरों में मखमल की जूती सी क्यारी
मेघ ऊन का गोला बुनती सुकुमारी–
डोलती सलाई, हिलता जल लहराया
बहुत दिनों बाद मुझे धूप ने बुलाया।

बोली कुछ नहीं, एक कुरसी की खाली
हाथ बढ़ा छज्जे की छाया सरका ली
बाहं छुड़ा भागा, गिर बर्फ हुई छाया
बहुत दिनों बाद मुझे धूप ने बुलाया।

                                                                – सर्वेश्वर दयाल सक्सेना

नमस्कार।