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181. तुम तरस नहीं खाते, बस्तियाँ जलाने में!

आज डॉ. बशीर बद्र की एक गज़ल याद आ रही है। बशीर बद्र जी शायरी में एक्सपेरिमेंट करने के लिए जाने जाते हैं और काफी नये किस्म के शेर, रवायत से हटकर लिखते रहे हैं।
आज की गज़ल का असल में पहला शेर याद आया था, क्योंकि गज़ल में तो यह संभव है कि हर शेर एक अलग बात कहता हो।
उच्चतम न्यायालय के एक निर्णय को लेकर हताश-निराश विपक्ष को एक मौका मिल गया, मायावती को लगा कि वे इस बहाने अपनी माया का प्रसार कर पाएंगी, लालू के तेजस्वी बेटे को लगा कि वे अपने विध्वंसक तेज का प्रदर्शन कर सकेंगे और राहुल भैया को भी लगा कि उन्हें भारतीय राजनीति में अपनी ‘रेलेवेंस’ सिद्ध करने का एक और मौका मिल गया है।

और एक दिन में कितनी सरकारी और निजी संपत्ति, बसें, वाहन आदि फूंक दिए गए और बहुत से लोगों की जान भी चली गई।

वैसे समय-समय पर विभिन्न स्थानों पर दंगे होते हैं, उनमें भी राजनैतिक नेताओं की भरपूर भागीदारी होती है। बस इसको लेकर ही इस गज़ल का पहला शेर याद आया, वे लोग अपना काम करेंगे, आप लीजिए इस खूबसूरत गज़ल का आनंद लीजिए-

लोग टूट जाते हैं, एक घर बनाने में
तुम तरस नहीं खाते, बस्तियाँ जलाने में।

और जाम टूटेंगे, इस शराबख़ाने में
मौसमों के आने में, मौसमों के जाने में।

हर धड़कते पत्थर को, लोग दिल समझते हैं
उम्र बीत जाती है, दिल को दिल बनाने में।

फ़ाख़्ता की मजबूरी ,ये भी कह नहीं सकती
कौन साँप रखता है, उसके आशियाने में।

दूसरी कोई लड़की, ज़िंदगी में आएगी
कितनी देर लगती है, उसको भूल जाने में।
                                                                         -बशीर बद्र

आज के लिए इतना ही, नमस्कार।

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