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78. इच्छाधारी सर्प!

आज फिर से प्रस्तुत है, एक और पुरानी ब्लॉग पोस्ट। मैंने शायद दो ही ऐसी पोस्ट लिखी थीं जो रहस्य से भरी थीं। उनको ही क्रम से प्रस्तुत कर रहा हूँ, आज उनमें से पहली पोस्ट पेश है-

आज एक वृतांत सुना रहा हूँ जो मैंने दिल्ली में अपने एक मित्र और सहकर्मी से सुना था, मेरे ये मित्र मूलतः मुल्तान के रहने वाले थे, मुझसे कुछ पहले ही रिटायर हो चुके हैं और अभी दिल्ली में रह रहे हैं। दो किस्से हैं, सच्ची घटनाएं जो उनको, उनके दादाजी ने सुनाई थीं। उस समय की घटनाएं हैं जब वे (दादाजी) मुल्तान में रहते थे, देश की आज़ादी से काफी पहले की घटनाएं हैं।
मेरा अपने मित्र पर पूरा विश्वास है, जैसा उनका अपने दादाजी पर था, इसलिए मैं इनको सच्ची घटना के रूप में सुना रहा हूँ, आप चाहें तो इनको किस्से के रूप में सुन लीजिए।

तो पहली घटना, जो दादाजी के मित्र के सामने हुई और उसने उनको बताई, वह मित्र जंगल के बीच से जा रहा था जहाँ मार्ग के दोनों तरफ मिट्टी के ऊंचे-ऊंचे दीवारनुमा टीले थे और उन टीलों में काफी ऊंचाई तक सूराख बने हुए थे, सर्प के बिल जैसे। उस व्यक्ति ने देखा कि एक तरफ के टीले के सूराख में से एक पतला सा सर्प, हरे रंग का निकला और दूसरी तरफ के टीले के सूराख मे घुस गया। इतना में उधर दो साधु वेशधारी व्यक्ति आए, उन्होंने उससे पूछा कि क्या उन्होंने देखा है कि सर्प कौन से सूराख में घुसा है, उस व्यक्ति ने उनको बता दिया।

उन लोगों ने बताया कि वह इच्छाधारी सर्प है, उनके पास एक तसले में गोबर भरा हुआ था वे गोबर को उस सूराख पर डालने लगे जिसमें वह सर्प घुसा था। जैसे ही वे गोबर डालते वह जल जाता, वे पुनः गोबर डालते, इस प्रकार काफी देर तक चलता रहा, अंत में गोबर जलना बंद हो गया, इसके बाद उनमें से एक साधु ने उस बिल (सूराख) के अंदर हाथ डाला और उस पतले से हरे रंग के सर्प को बाहर निकाल लिया।

उनके पास एक दूसरा साफ तसला भी था और उनमें से एक ने उस सर्प को सीधा उस तसले के ऊपर लटका लिया और सीधा उसको दबाकर ऊपर से नीचे तक अपना हाथ ले आए, जिससे उसका सारा रक्त उस तसले में आ गया। उनमें से एक ने वह रक्त पिया और वह अदृश्य हो गया, उसके बाद दूसरे ने उस तसले में बाकी बचे रक्त को चाट लिया और वह भी अदृश्य हो गया। इसके बाद उन सज्जन ने केवल उनके जाते समय, उनके धन्यवाद का स्वर सुना।

मुझे यह किस्सा सुने 40 वर्ष से ऊपर हो गए, उस समय की बात है जब मैं दिल्ली में नौकरी करता था और दिल्ली मैंने 1980 में छोड़ दी थी। मेरे मित्र के दादाजी ने कब ये किस्सा सुनाया होगा पता नहीं और घटना तो लगता है लगभग 100 वर्ष पुरानी होगी!

आज अचानक याद आया तो शेयर कर लिया, आप चाहें इसे जिस भी रूप में लें। दूसरा किस्सा भी काफी रोचक है यद्यपि उसमें किसी के गायब होने की बात नहीं है, अब अगला झटका थोड़ा रुककर देते हैं न!

नमस्कार।


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77. शैतान की फसल!

आज फिर से प्रस्तुत है, एक और पुरानी ब्लॉग पोस्ट –

एक समस्या जिससे हमारा देश बहुत लंबे समय से जूझ रहा है और आज वह विश्वव्यापी समस्या बन गई है, वह है आतंकवाद की समस्या।

आज पूरी दुनिया के देश तरक्की करने के रास्ते खोज रहे हैं, एक स्वस्थ प्रतियोगिता हो रही है दुनिया के देशों के बीच में, वहाँ की शासन व्यवस्था चाहे किसी भी प्रकार की हो। संयुक्त राष्ट्र संघ और अनेक अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर राष्ट्राध्यक्ष मिलकर इस बारे में विचार करते हैं कि किस प्रकार आपसी सहयोग के साथ प्रगति की नई ऊंचाइयों को छुआ जाए। लेकिन यह शैतान, सभी योजनाओं में पलीता लगा देता है।

कुछ देशों के बीच सीमा-विवाद रहता है, हमारे देश को भी दुर्भाग्य से ऐसे पड़ौसी मिले हैं कि हमेशा कोई न कोई विवाद बना रहता है और जो राशि हमें देश की प्रगति पर खर्च करनी चाहिए, उसका एक बड़ा हिस्सा रक्षा तैयारियों पर करना हमारी मजबूरी बन गई है।

इतना ही नहीं, लंबे समय से हम आतंकवाद के, एक ऐसे शत्रु से लड़ाई लड़ रहे हैं, जिसका पता नहीं होता कि वह कहाँ छिपा बैठा है और कब, कहाँ हमला करेगा। यह शत्रु नैतिकता के किसी प्रकार के नियमों का भी पालन नहीं करता, निहत्थे नागरिकों की हत्या करने में, ट्रेन में या बाजार में ब्लास्ट करने में भी इसको कोई संकोच नहीं होता।

इस प्रकार की परिस्थितियों का हम लंबे समय से सामना करते रहे हैं, आज अमरीका, ब्रिटेन आदि बड़े देशों को भी इसका सामना करना पड़ रहा है। अभी हाल ही में,  ब्रिटेन में अंडरग्राउंड ट्रेन में बड़ा हादसा हुआ था।

जो लोग ऐसा काम करते हैं, वे इंसान कहलाने के लायक तो नहीं हैं, मैं नहीं समझ पाता कि ऐसा कौन से दर्शन है जो इन नीच लोगों को ऐसे काम करने के लिए प्रेरित करता है।

समय की मांग है कि दुनिया की सभी ताकतें मिलकर आतंकवाद के इस राक्षस का जड़ से सफाया करने के लिए सम्मिलित प्रयास करें और हमारी यह दुनिया- हर देश, प्रदेश, धर्म और जाति के लोगों के खुशहाली के साथ आगे बढ़ने के लिए जानी जाए।

आतंकवाद का यह दुश्मन छिपा हुआ है, इसलिए और अधिक जागरूकता के साथ दुनिया के सभी प्रगतिशील देशों को, इस बुराई को जड़ से समाप्त करने के लिए भरसक प्रयास करना होगा।

हमारी शुभकामना है आतंकवाद की समाप्ति में हम सफल हों और जल्द ही ऐसा दिन आए कि हम इस बुराई से पूरी तरह मुक्त हो जाएं।

आज के लिए इतना ही।
नमस्कार।


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76. प्रद्युम्न के बहाने!

आज फिर से प्रस्तुत है, एक और पुरानी ब्लॉग पोस्ट –

कुछ मामलों पर चर्चा करने की एकाएक हिम्मत नहीं होती। सात वर्ष का बच्चा प्रद्युम्न, एक प्रतिष्ठित स्कूल का नन्हा छात्र, सुबह उसके पिता उसको स्कूल छोड़कर आए और कुछ देर में ही खबर मिली कि उसकी हत्या हो गई।

हत्या हुई एक प्रतिष्ठित स्कूल के बाथरूम में, सुबह स्कूल पहुंचते ही, हत्या का इल्ज़ाम एक बस कंडक्टर पर, जो बाथरूम से उस रक्त रंजित बच्चे को बाहर लेकर आया, जिसकी गर्दन को चाकू से, बेरहमी के साथ काटा गया था। बस कंडक्टर यह स्वीकार कर रहा है कि उसने ही हत्या की है लेकिन विश्वास नहीं होता। विश्वास नहीं होता कि कोई भी उस मासूम की हत्या करेगा, क्या दुश्मनी हो सकती है किसी की उस मासूम के साथ!

इस घटना को हुए एक वर्ष होने वाला है, इस बीच यह भी मालूम हुआ कि बेचारे कंडक्टर को जबर्दस्ती फंसाया गया था, ताकि किसी रईस के होनहार को बचाया जा सके!

लेकिन हत्या तो हुई है, वह भी राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में, एक प्रतिष्ठित स्कूल में, जहाँ की फीस बहुत ऊंची होती है, जहाँ प्रबंधन पैसे वसूलने के नए-नए तरीके तलाशता रहता है। अब जबकि ऐसी अशोभनीय घटना घट गई है, उस स्कूल में तो लोगों को हर तरह की शिकायतें करने का एक मौका भी मिल गया है।

यह भी सही है कि इस प्रकार की घटनाएं हिंदुस्तान में कहीं न कहीं हर रोज़ होती हैं, लेकिन क्योंकि यह घटना राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में और एक प्रतिष्ठित स्कूल में हुई है, जहाँ मीडिया को आने-जाने में सुविधा रहती है, तो इस पर चर्चा भी खूब हो रही है। पत्रकार लोग स्कूल की बाउंड्री कितनी जगह से टूटी है यह देख रहे हैं और शराब का ठेका कितने कदम दूर है, यह माप रहे हैं। वैसे भारत में तो बहुत सारे स्कूल ऐसे हैं जिनकी बाउंड्री ही नहीं है।

मासूम प्रद्युम्न की मौत वास्तव में दिल पर चोट करती है और इस बहाने अगर हम अधिक जागरूक हो जाएं, ऐसे कदम उठाए जाएं जिनसे ऐसी घटनाएं न हो सकें तो बहुत अच्छा होगा। लेकिन हम सिस्टम में ऐसी कमियां जान-बूझकर छोड़ देते हैं शायद। जैसे कि यह अक्सर होता है कि सीसीटीवी कैमरे लगे हुए हैं, लेकिन जब ऐसी कोई घटना हो जाती है, तब मालूम होता है कि कैमरे काम नहीं कर रहे हैं। सामान्य परिस्थितियों में इन व्यवस्थाओं का ऑडिट क्यों नहीं होता!

एक खबर इसकेे  बाद आई  कि दिल्ली के एक स्कूल ने अपने डांस टीचर को नौकरी से हटा दिया और उसके विरुद्ध पुलिस में शिकायत भी की कि वह डांस छात्राओं के साथ गलत व्यवहार करता है! क्या आपको लगता है कि इस मामले में अचानक स्कूल प्रबंधन की आत्मा जाग गई। ऐसा केवल इसलिए हुआ कि प्रद्युम्न की हत्या के बाद जो एक जन-आंदोलन जैसा हुआ, उसमें उस स्कूल के लोगों को लगा कि यह जो गतिविधि वहाँ चल रही है, जिसकी जानकारी निश्चित रूप से उस स्कूल के कुछ लोगों को पहले से थी, वह अब बर्दाश्त नहीं की जाएगी।

आज जो वातावरण इस घटना के बाद बना है, इसमें अच्छा होगा कि ऐसी गतिविधियां जो स्कूलों में अथवा किसी भी संस्थान में, कुछ लोगों की जानकारी में चलती रहती हैं, उनको बर्दाश्त न किया जाए और उसको समय रहते समाप्त किया जाए। सीसीटीवी जैसी, जो भी निगरानी सुविधाएं जहाँ मौज़ूद हैं उनका पूरी क्षमता के साथ इस्तेमाल किया जाए और सबसे बड़ी बात तो यह है कि जो अपराधी है उनको समय पर और अधिकतम संभव दंड मिले जिससे और लोगों की ऐसा करने की हिम्मत न हो।

आज के लिए इतना ही।
नमस्कार।


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75.जो हुआ ही नहीं अखबार में आ जाएगा!

आज फिर से प्रस्तुत है, एक और पुराना ब्लॉग, ब्लॉग पोस्ट दोहराने में भी एक मज़ा है, तो लीजिए आज की यह पुरानी ब्लॉग पोस्ट देखते हैं- –

ज़नाब राहत इंदौरी का एक शेर याद आ रहा है जो उन्होंने कुछ समय पहले ‘द कपिल शर्मा शो’ में पढ़ा था-

बनके इक हादसा, किरदार में आ जाएगा
जो हुआ ही नहीं, अखबार में आ जाएगा।

अब खबरों की दुनिया की क्या बात करें। आज बड़े-बड़े चैनलों पर जो पत्रकार, एंकर काम कर रहे हैं उनकी शक्ल देखने से पहले उनका चश्मा दिखाई देता है, कौन सी घटना इनके लिए महत्वपूर्ण होगी कौन सी नहीं, ये इनका प्रोग्राम देखने वाला कोई भी व्यक्ति बता सकता है, यहाँ तक कौन सी लाश पर ये देर तक बीन बजाएंगे और कौन सी हत्या या हत्याएं इनके लिए महत्वपूर्ण नहीं है! इतना ही नहीं, मोदी जी और राहुल बाबा की तरह इनके भी फैन हैं, जो इनके द्वारा किसी खबर को महत्व दिए जाने और किसी को नकारे जाने के मामले में पूरी तरह साथ रहते हैं। इस मामले में यह भी शामिल है कि कहाँ घटना हो तो वहाँ का मुख्यमंत्री ज़िम्मेदार है और कहाँ उस गरीब की कोई ज़िम्मेदारी नहीं है।

खैर, ये तो मैंने बात शुरू करने के लिए कह दिया, मैं यात्रा करना चाहता हूँ पुराने दिनों में, जब हमने नगर संवाददाताओं, पत्रकारों, छोटे-छोटे अखबार छापने वालों को शुरू-शुरू में जाना था।

शाहदरा की बात है, शायद सत्तर के दशक की, वहाँ मैं कवि-गोष्ठियां आदि सुनने के लिए जाता था, वहाँ मालूम होता था कि किसी राष्ट्रीय समाचार पत्र के नगर संवाददाता थे, उनका काम खबरें एकत्रित करना नहीं था, बल्कि ये था कि किस खबर को अखबार में जाने दिया जाए और किसको रोक दिया जाए। अक्सर आयोजक लोग कवि गोष्ठी की खबर छपवाने के लिए उनसे गुहार लगाते थे। बाद में तो इस प्रकार के आयोजनों और उनकी रिपोर्ट छपवाने की गतिविधियां मैंने स्वयं काफी कीं, जन संपर्क का काम देखा तो पत्रकारों को मित्र बनाया और कंपनी से जुड़ी बहुत सी खबरें, रिपोर्टें उनके माध्यम से छपवाईं।

आगे बढ़ने से पहले एक पत्रकार मित्र की बात बताऊं जो आगरा में एक छोटा सा अखबार छापते थे। उनके हाथ कुछ यशकामी लोग लग जाते थे या वे उनको ऐसा बना देते थे। जैसे एक कल्लू टाल वाले थे, जो लकड़ियों की एक बड़ी सी टाल चलाते थे। कमाई ठीक-ठाक थी उनकी, वे उनसे मिलते और बोलते कि देखो कल तुम मर जाओगे, लोग तुमको किस नाम से जानेंगे, ‘कल्लू टाल वाला’, तुम्हारे नाम से कुछ छाप देता हूँ अखबार में, नाम हो जाएगा। और अगर वो नहीं मानता तो ये भी बताते कि तुम्हारे खिलाफ कुछ लिख दूंगा, फिर सफाई देते फिरना। इस प्रकार वो कल्लू टालवाला चक्कर में आ जाता था और उनको कुछ दाना-पानी दे देता था।
वैसे कल्लू टालवाले के बहाने मुझे कुछ फिल्मी पात्र भी याद आ गए, एक तो ‘चमेली की शादी’ में थे ‘हैं जी’, जो ख्याति पाने के लिए राजनीति में उतरना चाहते थे और एक बेचारे थे मुकरी, जिनके छोटे से शरीर पर ‘अइयो बल्ली प्यार का दुश्मन, हाय-हाय’ जैसी लानत लगी थी!
खैर फिर से वास्तविक दुनिया के पत्रकारों पर आते हैं, देश के कुछ सुदूर स्थानों पर छोटे-छोटे अखबार छापकर ब्लैकमेल करने का धंधा भी काफी चलता रहा है, शायद आज भी कुछ स्थानों पर चलता हो। जब मैं एनटीपीसी, विंध्यनगर में था, जो मध्य प्रदेश के सीधी जिले में स्थित है, जहाँ कुंवर अर्जुन सिंह जी ने ‘चुरहट लॉटरी कांड’ को अंजाम देकर, उस क्षेत्र को ख्याति दिलाई थी।

हाँ तो इस परियोजना जब मैं था, तब वहाँ सीधी के एक सज्जन थे, जो पत्रकार कहलाते थे, वे चार पन्नों का एक अनियतकालीन अखबार निकालते थे-‘विंध्य टाइगर’। कंपनी के गेस्ट हाउस में उनको आते ही कमरा मिल जाता था, साथ में खाना और दारू भी, क्योंकि गेस्ट हाउस चलाने वाले ठेकेदार को अपनी खैरियत की चिंता थी। एनटीपीसी तो वैसे भी इलाके के बदमाश लोगों के लिए सोने का अंडा देने वाली मुर्गी थी। तो ये पत्रकार महोदय आकर ठेकेदारों से वसूली करते, धमकी देते और जिसके साथ इनकी पिछली बार पैसे को लेकर बात नहीं बनी थी, उसके खिलाफ छापकर लाया हुआ चार पृष्ठ का (छोटे आकार का) अखबार कॉलोनी और दफ्तर में अनेक स्थानों पर चिपका देते।

ऐसे लोगों को ब्लैकमेल करने के लिए तो लोग मिल ही जाते हैं। जैसे मुझे याद आ रहा है कि वहाँ नगर प्रशासन विभाग के प्रधान एक बार बने श्री रघुरमन, उनके समय में यह हुआ कि सड़कों आदि की जीवन अवधि अचानक काफी कम हो गई। इसको हमने इस रूप में जाना कि जिस प्रकार पौधों में जीवन प्रमाणित करने वाला परीक्षण ‘रमन इफेक्ट’ कहलाता है, वैसे ही सड़कों की आयु कम करने वाला परीक्षण ‘रघुरमन इफेक्ट’ है।
क्षमा करें, यह नाम अचानक याद आ गया, बहुत पुरानी बात है और ये सज्जन इंचार्ज थे, मैं कोई दोष उनको नहीं दे रहा हूँ, बस अपनी बात कहने का माध्यम उनको बना लिया, ये कोई और ‘इफेक्ट’ भी हो सकता है।

इस प्रकार एक-दो पत्रकारों के माध्यम से, जो याद आया कि छोटे स्थानों पर जो एक विशेष प्रकार की पत्रकारिता होती थी, शायद आज भी होती हो, उसकी एक बानगी प्रस्तुत की है।
आज के लिए इतना ही।

नमस्कार।


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74. बोल मेरी मछली कितना पानी!

आज फिर से प्रस्तुत है, एक और पुराना ब्लॉग, ब्लॉग पोस्ट दोहराने में भी एक मज़ा है, तो लीजिए आज की यह पुरानी ब्लॉग पोस्ट देखते हैं-     –  

पिछले कुछ दिनों आया आंधी-तूफान का मौसम अपने हिस्से की तबाही मचा चुका है, अभी घनघोर गर्मी पड़ रही है, फिर बारिश और उसके बाद गरीबों को सर्दी का सामना करना होगा। क्योंकि हर मौसम की मार, गरीबों को ही तो वास्तव में सहनी पड़ती है। अमीर अथवा मध्यम वर्ग तो अपने परिधानों अथवा अनुकूलन की सुविधाओं से अपने को बचा लेते हैं, वो रूम हीटर हों अथवा कूलर, एयर कंडीशनर।

मैं तो क्योंकि अब गोआ में हूँ, इसलिए दिल्ली की सर्दी और दिल्ली की गर्मी तो अब याद करने वाली बात हो गई, हाँ यहाँ बारिश दिल्ली से ज्यादा होती है।

बारिश को याद करके, एक खेल याद आ रहा है, जिसे खेलते हुए, हम बचपन में गाया करते ‘हरा समुंदर, गोपी चंदर, बोल मेरी मछली कितना पानी’! ये गीत अब के बच्चे तो शायद कम ही गाते होंगे, हम लोग दिल्ली, यू.पी. के इलाके में इसे गाते थे, जहाँ समुंदर आसपास नहीं था।

एक बार पहले भी मैंने इस विषय में चर्चा की है कि जहाँ, हमारे देश में वर्षा इतनी तबाही मचाती है, वहीं ‘वाटर टेबल’ लगातार नीचे जा रहा है, कुएं सूख रहे हैं, क्योंकि बस्तियां बसाने के लिए तालाबों को समाप्त कर दिया जाता है और जल संरक्षण के कोई प्रभावी उपाय नहीं किए जाते हैं। इस दिशा में सरकारों, नागरिक संगठनों और गंभीरता से काम करने वाले गैर सरकारी संगठनों (एनजीओ) द्वारा कदम उठाए जाने की आवश्यकता है, क्योंकि इसकी उम्मीद आप बिल्डरों से नहीं कर सकते।

पानी पर्याप्त मात्रा में जमीन के नीचे इकट्ठा होता रहे, यह आज की बहुत गंभीर आवश्यकता है, इसके लिए जो भी कदम उठाने हों, ऐसे पेड़ लगाना जो जल संरक्षण, वर्षा में सहायक हों, जो भी आवश्यक है किया जाए जिससे आने वाली पीढ़ियां हमारी लापरवाही को दोष न दें। प्रकृति में पानी की कमी नहीं है, उसके संरक्षण, बेहतर प्रबंधन की आवश्यकता है, जिससे हमारी खुशियों पर पानी चढ़े, पानी फिर न जाए।

कहीं आने वाले समय में यही गूंज न सुनाई दे- ‘बोल मेरी मछली, कितना पानी’।

अंत में ये पंक्तियां याद आ रही हैं-

इस दुनिया में जीने वाले, ऐसे भी हैं जीते

रूखी-सूखी खाते हैं और ठंडा पानी पीते,

भूखे की भूख और प्यास जैसा।

पानी रे पानी तेरा रंग कैसा।

*********

वैसे तो हर रंग में तेरा जलवा रंग जमाए

जब तू फिरे उम्मीदों पर तेरा रंग समझ न आए।

कली खिले तो झट आ जाए पतझड़ का पैगाम,

पानी रे पानी तेरा रंग कैसा।

नमस्कार।


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73. संगीत की देवी स्वर-सजनी!

आज फिर से प्रस्तुत है, एक और पुरानी ब्लॉग पोस्ट –

ज़िंदगी सिर्फ मोहब्बत नहीं कुछ और भी है,
ज़ुल्फ-ओ-रुखसार की जन्नत नहीं कुछ और भी है,
भूख और प्यास की मारी हुई इस दुनिया में
इश्क़ ही एक हक़ीकत नहीं, कुछ और भी है।
तुम अगर नाज़ उठाओ तो, ये हक़ है तुमको
मैंने तुमसे ही नहीं, सबसे मोहब्बत की है।

आज हक़ीकत और कल्पना पर आधारित कुछ फिल्मी गीतों के बारे में बात करते हैं। ऊपर जिस गीत के बोल लिखे गए हैं, वह हक़ीकत के बोझ से दबे, ज़िम्मेदार शायर के बोल हैं, जो देखता है कि दुनिया में इतने दुख हैं, ऐसे में कैसे किसी एक के प्यार में पागल हुआ जाए।

अब कल्पना की धुर उड़ान के बारे में बात कर ली जाए, जहाँ प्रेमी अपने तसव्वुर में इतना पागल है कि सामने जो हक़ीकत है उसको स्वीकार नहीं कर पाता और देखें उसकी कल्पना की उड़ान कितनी दूर तक जाती है-

चंचल, शीतल, निर्मल, कोमल, संगीत की देवी स्वर-सजनी,
सुंदरता की हर मूरत से, बढ़कर के है तू सुंदर सजनी।

दीवानगी का एक और आलम ये भी है-

ये तो कहो कौन हो तुम, कौन हो तुम,
हमसे पूछे बिना दिल में आने लगे,
नीची नज़रों से बिजली गिराने लगे।

एक और मिसाल-

मेहताब तेरा चेहरा, एक ख्वाब में देखा था,
ऐ जान-ए-जहाँ बतला,
बतला कि तू कौन है।

और जवाब-

ख्वाबों में मिले अक्सर,
एक राह चले मिलकर,
फिर भी है यही बेहतर-
मत पूछ मैं कौन हूँ।

और इसके बाद फिर हक़ीकत की पथरीली ज़मीन पर आते हैं-

देख उनको जो यहाँ सोते हैं फुटपाथों पर,
लाश भी जिनकी कफन तक न यहाँ पाती है,
पहले उन सबके लिए, एक इमारत गढ़ लूं,
फिर तेरी मांग सितारों से भरी जाएगी।

अंत में डॉ. कुंवर बेचैन की कुछ पंक्तियां याद आ रही हैं-

अर्थहीन संदर्भ हुआ अब तेरे मेरे प्यार का,

जैसे एक पुराना कागज़, फटे हुए अखबार का।

बहलाने को दिल आता है, स्वप्न कभी अभिसार का,

जैसे एक क्लर्क के घर में, आए दिन इतवार का॥

आज के लिए इतना ही!
नमस्कार।


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72. सोच समझ वालों को थोड़ी नादानी दे मौला!

आज फिर से प्रस्तुत है, एक और पुराना ब्लॉग –

इंटरनेट पर ज्ञान देने वाले तो भरे पड़े हैं, पर मैं  अज्ञान का ही पक्षधर हूँ। जो व्यक्ति आज भी दिमाग के स्थान पर दिल पर अधिकतम भरोसा करते हैं, उनमें कवि-शायर काफी बड़ी संख्या में आते हैं। वहाँ भी सभी ऐसे हों, ऐसा नहीं है।

आज मन हो रहा है निदा फाज़ली साहब की शायरी के बारे में कुछ बात करूं। इस इंसान ने कितना अच्छा लिखा है, देख-सुनकर आश्चर्य होता है, पूरी तरह ज़मीन से जुड़े हुए व्यक्ति थे निदा फाज़ली साहब। अपने दोहों में ही उन्होंने आत्मानुभूति का वो अमृत उंडेला है कि सुनकर मन तृप्त हो जाता है।शुरू में तो उसी गज़ल के अमर शेर प्रस्तुत कर रहा हूँ, जिससे शीर्षक लिया है-

गरज-बरस प्यासी धरती पर फिर पानी दे मौला,
चिड़ियों को दाने, बच्चों को, गुड़धानी दे मौला।

फिर मूरत से बाहर आकर, चारों ओर बिखर जा,
फिर मंदिर को कोई मीरा दीवानी दे मौला।

दो और दो का जोड़ हमेशा चार कहाँ होता है,
सोच समझ वालों को थोड़ी नादानी दे मौला।

और कितनी सादगी से कितनी बड़ी बात कहते हैं, कुछ गज़लों से कुछ शेर यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ-

उसको रुखसत तो किया था, मुझे मालूम न था,
सारा घर ले गया, घर छोड़ के जाने वाला।

एक मुसाफिर के सफर जैसी है सबकी दुनिया,
कोई जल्दी तो कोई देर में जाने वाला।

************
अपनी मर्ज़ी से कहाँ अपने सफर के हम हैं,
रुख हवाओं का जिधर का है, उधर के हम हैं।
*************

घर से मस्ज़िद है बहुत दूर चलो यूं कर लें,
किसी रोते हुए बच्चे को हंसाया जाए।
************

बच्चों के छोटे हाथों को, चांद सितारे छूने दो,
चार किताबें पढ़कर ये भी, हम जैसे हो जाएंगे।
************

दुनिया जिसे कहते हैं, जादू का खिलौना है,
मिल जाए तो मिट्टी है, खो जाए तो सोना है।

बरसात का बादल तो, दीवाना है क्या जाने,
किस राह से बचना है, किस छत को भिगोना है।
***********

वृंदाबन के कृष्ण कन्हैया अल्ला हू,
बंसी, राधा, गीता, गैया अल्ला हू।

एक ही दरिया नीला, पीला, लाल, हरा,
अपनी अपनी सबकी नैया अल्ला हू।

मौलवियों का सज़दा, पंडित की पूजा,
मज़दूरों की हैया हैया, अल्ला हू।
***********
दुनिया न जीत पाओ तो हारो न खुद को तुम,
थोड़ी बहुत तो ज़ेहन में नाराज़गी रहे।
***********

हर आदमी में होते हैं दस-बीस आदमी,
जिसको भी देखना हो, कई बार देखना।

मुझको निदा जी के जो शेर बहुत अच्छे लगते हैं, उन सभी को लिखना चाहूं तो दस-बीस ब्लॉग तो उसमें निकल जाएंगे, मैंने कुछ गज़लों से एक- या दो शेर लिखे हैं, लेकिन उनमें से कोई शेर भी छोडने योग्य नहीं है।
अंत में उनके कुछ दोहे, जिनमें बड़ी सादगी से गहरा दर्शन प्रस्तुत किया गया है-

मैं रोया परदेस में, भीगा मां का प्यार,
दुख ने दुख से बात की, बिन चिट्ठी, बिन तार।

छोटा करके देखिए जीवन का विस्तार,
आंखों भर आकाश है, बांहों भर संसार।

सबकी पूजा एक सी, अलग अलग हर रीत,
मस्ज़िद जाए मौलवी, कोयल गाए गीत।

सपना झरना नींद का, जागी आंखें प्यास,
पाना, खोना, खोजना, सांसों का इतिहास।

मैंने कुछ शेर यहाँ दिए, क्योंकि यहाँ लिखने की कुछ सीमाएं हैं। इन कुछ उद्धरणों के माध्यम से मैं उस महान शायर को याद करता हूँ, जिसने हिंदुस्तानी शायरी में अपना अनमोल योगदान किया है।

नमस्कार।
****************

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209. हाफ़िज खुदा तुम्हारा!

कल मैंने एक पुराना गीत शेयर किया था, जिसे मेरे एक पुराने मित्र और सहकर्मी गाया करते थे। आज फिर से एक पुराना गीत शेयर कर रहा हूँ, इसे भी मेरे वही मित्र गाते थे।

इस गीत को शेयर करते समय एक बात याद आ रही है, बच्चों में संगीत के टेलेंट को लेकर जो शो चलते हैं, उनमें अक्सर गायक, संगीतकार लोग मेंटर के रूप में अपनी टीम बना लेते हैं। ऐसे ही एक ‘शो’ में मुझे याद आ रहा है कि हिमेश रेशमिया ने अपनी टीम के एक सिंगर के बारे में बात करते हुए कहा था- ‘मुझे इसके घर में रोटी चाहिए’। बेशक अगर कोई अच्छा गायक बनकर मार्केट में चल भी जाए, तो वह भरपूर कमा सकता है।

इस गीत की बात करते हुए मुझे ‘रोटी’ का यह किस्सा अचानक इसलिए याद आ गया कि, यह गीत तो बहुत अच्छा है ही, लेकिन जब मैं युवा था, पढ़ाई और नौकरी के लिए ट्रेन से यात्रा करता था, तब ट्रेन में भिक्षा मांगने वाले अक्सर इस गीत को गाया करते थे। तो यह गीत, जैसे भी हो, उनको रोटी भी देता था।

खैर, यह गीत है 1956 में रिलीज़ हुई फिल्म- ‘शीरीं-फरहाद’ का, इस गीत को तनवीर नक़वी जी ने लिखा है और एस. मोहिंदर जी के संगीत निर्देशन में, लता मंगेशकर जी ने अपने मधुर स्वर में गाया है।
लीजिए प्रस्तुत है यह मधुर गीत-

गुज़रा हुआ जमाना, आता नहीं दोबारा
हाफ़िज खुदा तुम्हारा।

खुशियाँ थी चार दिन की, आँसू हैं उम्र भर के
तनहाइयों में अक्सर रोयेंगे याद कर के
वो वक्त जो कि हमने, एक साथ है गुज़ारा।

मेरी कसम है मुझ को, तुम बेवफ़ा ना कहना
मजबूर थी मोहब्बत सब कुछ पड़ा है सहना
टूटा हैं ज़िंदगी का, अब आखिरी सहारा।

मेरे लिए सहर भी, आई है रात बनकर
निकला मेरा जनाज़ा, मेरी बरात बनकर
अच्छा हुआ जो तुम ने, देखा ना ये नज़ारा।

आज के लिए इतना ही

नमस्कार।

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208. ज़िंदगी देने वाले सुन!

आज एक पुराना गीत याद आ रहा है, जिसे मुझे मेरे एक पुराने मित्र और सहकर्मी- श्री चुन्नी लाल जी गाया करते थे। ये गीत बहुत पुरानी फिल्म- दिल-ए-नादां का है, जिसे शकील बदायुनी जी ने लिखा है और गुलाम मुहम्मद जी के संगीत निर्देशन में तलत महमूद जी ने गाया है।

कुल मिलाकर फिल्मी गीतों में बहुत ज्यादा कांटेंट नहीं होता, सीमित समय में गीत गाया जाना होता है, दो या तीन अंतरे का! लेकिन जो छाप इन कुछ पुराने गीतों की मन पर पड़ती है, उसका वर्णन करना मुश्किल है। इस गीत को भगवान से एक शिकायत भरी प्रार्थना के रूप में देख सकते हैं। मेरे मित्र भी पूरी तरह डूबकर इस गीत को गाते थे, लीजिए इस गीत को याद कर लेते हैं-

ज़िंदगी देने वाले सुन,
तेरी दुनिया से दिल भर गया,
मैं यहाँ जीते जी मर गया।

रात कटती नहीं, दिन गुज़रता नहीं,
ज़ख्म ऐसा दिया है कि भरता नहीं,
आंख वीरान है,
दिल परेशान है,
ग़म का सामान है,
जैसे जादू कोई कर गया।

बेख़ता तूने मुझ से खुशी छीन ली,
ज़िंदा रखा मगर ज़िंदगी छीन ली,
कर दिया दिल का खूं,
चुप कहाँ तक रहूं,
साफ क्यूं न कहूं,
तू खुशी से मेरी जल गया।
ज़िंदगी देने वाले सुन॥

इतना ही कहूंगा कि अगर आपको भगवान से प्रेम है, उस पर भरोसा है तो आप उससे क्या नहीं कह सकते! और लड़ तो सकते ही हैं।

आज के लिए इतना ही

नमस्कार।

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71. इतना तो मेरे यार करो मैं नशे में हूँ!

आज फिर से प्रस्तुत है, एक और पुराना ब्लॉग –

जगजीत सिंह जी की गाई, शायर शाहिद कबीर की इस गज़ल के बहाने आज बात शुरू करेंगे-

ठुकराओ अब कि प्यार करो, मैं नशे में हूँ
जो चाहो मेरे यार करो, मैं नशे में हूँ।

गिरने दो तुम मुझे, मेरा सागर संभाल लो,
इतना तो मेरे यार करो, मैं नशे में हूँ।

अब भी दिला रहा हूँ, यक़ीन-ए-वफा मगर,
मेरा न ऐतबार करो, मैं नशे में हूँ।

वैसे देखा जाए तो प्रेम करने के लिए होश में होना ज़रूरी नहीं है, इसलिए जो वफा का यक़ीन नशे में दिलाया जा रहा है, वह शायद ज्यादा कारगर हो, हाँ व्यापार करने के लिए होश में होना बहुत ज़रूरी है।

इसीलिए तो इस गज़ल में धर्म गुरुओं, उपदेशकों से यह भी कहा गया है-

मुझको कदम-कदम पे भटकने दो वाइज़ो
तुम अपना कारोबार करो, मैं नशे में हूँ।

एक और गज़ल में, यह भी कहा गया है-

होश वालों को खबर क्या, बेखुदी क्या चीज़ है,
इश्क़ कीजे, फिर समझिए, ज़िंदगी क्या चीज़ है।

और फिर इस दुनिया के नियमों के बारे में उस्ताद गुलाम अली जी ने क्या कहा है (मतलब गाया है)-

मयनोशी के आदाब से आगाह से, आगाह नहीं तू,
जिस तरह कहे साक़ी-ए-मैखाना पिए जा।

और फिर अकबर इलाहाबादी जी की, हंगामा बरपा वाली गज़ल में-

हर ज़र्रा चमकता है अनवार-ए-इलाही से,
हर सांस ये कहती है, हम हैं तो खुदा भी है।

नातज़ुर्बाकारी से, वाइज़ की ये बातें हैं,
इस रंग को क्या जाने, पूछो जो कभी पी है।

आखिर में मुकेश जी की टिप्पणी-

है ज़रा सी बात और छलके हैं कुछ प्याले,
पर न जाने क्या कहेंगे ये जहाँ वाले,
तुम बस इतना याद रखना
मैं नशे में हूँ।

वैसे नशे के बारे में ऐसी दलीलें देने के लिए तो शायद होश में रहना ज़रूरी है, और ये दलीलें कितनी लंबी चल सकती हैं, इसकी कोई सीमा नहीं है

मैंने ऐसी कोई कसम भी तो नहीं खाई थी कि हमेशा होश की ही बात करुंगा।
नमस्कार।