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203. चराग़ों को जलाने में जला ली उंगलियाँ हमने!

आज इंसान की ज़िंदगी में जहाँ साधन संपन्नता बढ़ती जा रही है, वहीं प्रतियोगिता भी बढ़ रही है, जो साइकिल पर है उसे स्कूटर, मोटरसाइकिल की ललक है, जो इन पर उसका ध्यान कार पर टिका है और कार लेने के बाद मेरे भाई कोई एक मॉडल थोड़े ही है, ये मॉडल तो कुछ लाख से करोड़ों तक के होते हैं।

ये उदाहरण जैसे वाहन के थे, वैसे ही मकान और आजकल तो कपडों पर भी लोगों का काफी ध्यान जमने लगा है।

आज के जीवन में एक्सपोज़र काफी होता है, दूसरों की गाड़ियां, दूसरों के मकान और दूसरों के कपड़े भी देखकर हम सोचते हैं कि ये भी हमारे पास होने चाहिएं।

आपसी प्रेम का स्थान आज प्रतियोगिता और काफी बड़ी मात्रा में ईर्ष्या भी लेने लगी है।
एक गज़ल याद आ रही है, ज़नाब वाली आसी की लिखी हुई, जिसे जगजीत सिंह जी ने अपने मधुर स्वर में गाया है-

समझते थे मगर फिर भी न रखी दूरियाँ हमने
चराग़ों को जलाने में जला ली उंगलियाँ हमने।

कोई तितली हमारे पास आती भी तो क्या आती
सजाये उम्र भर कागज़ के फूल और पत्तियाँ हमने।

यूँ ही घुट घुट के मर जाना हमें मंज़ूर था लेकिन
किसी कमज़र्फ़ पर ज़ाहिर ना की मजबूरियाँ हमने।

हम उस महफ़िल में बस इक बार सच बोले थे ऐ ‘वाली’
ज़ुबाँ पर उम्र भर महसूस की चिंगारियाँ हमने।

                                                                     -वाली आसी

इंडीब्लॉगर पर #IndiSpire के अंतर्गत यह विषय उठाया गया था कि आज के जीवन में अनेक सुख-सुविधाएं हैं फिर भी लोग असुरक्षित महसूस करते हैं, दूरियां बढ़ती जा रही हैं, इसे ध्यान में रखते हुए ही आज का आलेख लिखा गया।

आज के लिए इतना ही, नमस्कार।

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