Categories
Uncategorized

74. बोल मेरी मछली कितना पानी!

आज फिर से प्रस्तुत है, एक और पुराना ब्लॉग, ब्लॉग पोस्ट दोहराने में भी एक मज़ा है, तो लीजिए आज की यह पुरानी ब्लॉग पोस्ट देखते हैं-     –  

पिछले कुछ दिनों आया आंधी-तूफान का मौसम अपने हिस्से की तबाही मचा चुका है, अभी घनघोर गर्मी पड़ रही है, फिर बारिश और उसके बाद गरीबों को सर्दी का सामना करना होगा। क्योंकि हर मौसम की मार, गरीबों को ही तो वास्तव में सहनी पड़ती है। अमीर अथवा मध्यम वर्ग तो अपने परिधानों अथवा अनुकूलन की सुविधाओं से अपने को बचा लेते हैं, वो रूम हीटर हों अथवा कूलर, एयर कंडीशनर।

मैं तो क्योंकि अब गोआ में हूँ, इसलिए दिल्ली की सर्दी और दिल्ली की गर्मी तो अब याद करने वाली बात हो गई, हाँ यहाँ बारिश दिल्ली से ज्यादा होती है।

बारिश को याद करके, एक खेल याद आ रहा है, जिसे खेलते हुए, हम बचपन में गाया करते ‘हरा समुंदर, गोपी चंदर, बोल मेरी मछली कितना पानी’! ये गीत अब के बच्चे तो शायद कम ही गाते होंगे, हम लोग दिल्ली, यू.पी. के इलाके में इसे गाते थे, जहाँ समुंदर आसपास नहीं था।

एक बार पहले भी मैंने इस विषय में चर्चा की है कि जहाँ, हमारे देश में वर्षा इतनी तबाही मचाती है, वहीं ‘वाटर टेबल’ लगातार नीचे जा रहा है, कुएं सूख रहे हैं, क्योंकि बस्तियां बसाने के लिए तालाबों को समाप्त कर दिया जाता है और जल संरक्षण के कोई प्रभावी उपाय नहीं किए जाते हैं। इस दिशा में सरकारों, नागरिक संगठनों और गंभीरता से काम करने वाले गैर सरकारी संगठनों (एनजीओ) द्वारा कदम उठाए जाने की आवश्यकता है, क्योंकि इसकी उम्मीद आप बिल्डरों से नहीं कर सकते।

पानी पर्याप्त मात्रा में जमीन के नीचे इकट्ठा होता रहे, यह आज की बहुत गंभीर आवश्यकता है, इसके लिए जो भी कदम उठाने हों, ऐसे पेड़ लगाना जो जल संरक्षण, वर्षा में सहायक हों, जो भी आवश्यक है किया जाए जिससे आने वाली पीढ़ियां हमारी लापरवाही को दोष न दें। प्रकृति में पानी की कमी नहीं है, उसके संरक्षण, बेहतर प्रबंधन की आवश्यकता है, जिससे हमारी खुशियों पर पानी चढ़े, पानी फिर न जाए।

कहीं आने वाले समय में यही गूंज न सुनाई दे- ‘बोल मेरी मछली, कितना पानी’।

अंत में ये पंक्तियां याद आ रही हैं-

इस दुनिया में जीने वाले, ऐसे भी हैं जीते

रूखी-सूखी खाते हैं और ठंडा पानी पीते,

भूखे की भूख और प्यास जैसा।

पानी रे पानी तेरा रंग कैसा।

*********

वैसे तो हर रंग में तेरा जलवा रंग जमाए

जब तू फिरे उम्मीदों पर तेरा रंग समझ न आए।

कली खिले तो झट आ जाए पतझड़ का पैगाम,

पानी रे पानी तेरा रंग कैसा।

नमस्कार।


Leave a Reply