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220. लंदन में इधर-उधर!

लंदन प्रवास अब खत्म होने को है।

जो लोग लंदन की ज्योग्राफी समझते हों, उनके लिए बता दूं, कि मेरे बेटे का घर यहाँ पर ब्लू ब्रिज के पास, थेम्स नदी के किनारे है। यह स्थान ‘कोल्ड हार्बर’ है। जैसे यहाँ ‘व्हार्फ’ बहुत हैं, वैसे ही हार्बर भी बहुत हैं। हमको तो नदी किनारे घर होना, बहुत दिव्य लगता है, लेकिन असल में पूरा लंदन नगर ही थेम्स नदी के दोनों किनारों पर बसा है, अतः बहुत बड़ी संख्या में ऐसे मकान यहाँ हैं, जो थेम्स नदी के किनारे बने हैं। और नदी भी ऐसी जहाँ ढेर सारी छोटी-बड़ी बोट और बड़े-बड़े शिप चलते हैं।

यहाँ हमारे घर के पीछे ही नदी में घुमाव है और नदी के इस अर्द्ध चंद्राकार गोले में दूसरी तरफ, जहाँ एक टापू जैसा बन गया है, वहाँ नदी के बीच ओ-2 होटल और ईवेंट प्लेस है। वहाँ पर ही रोप वे पर आकर्षक ट्रॉली चलती है, जिसको एमिरेट्स एयरलाइंस द्वारा संचालित किया जाता है और उसको इस नाम से ही जाना जाता है। हाँ तो इस घुमाव वाले क्षेत्र में जब कोई बड़ा शिप आ जाता है तब दो छोटी नांवों द्वारा खींचकर उसे घुमाव वाले क्षेत्र से बाहर निकाला जाता है, वैसे भी ट्रैफिक सुरक्षा की दृष्टि से शायद यह सहायता नगर क्षेत्र में दी जाती है।

यही कारण है कि जब हमारे घर के पीछे नदी के घुमाव में कोई बड़ा जहाज आता है तो उसके बाहर निकलने तक हम उसको बहुत पास से अच्छी तरह देख पाते हैं। अभी दो दिन पहले ही एक बड़ा शिप ‘वाइकिंग’ यहाँ से वापस लौटा और उससे दो दिन पहले वह आया था। घर में बैठकर ही ढेर सारी नावों और बड़े शिप को देखना, यहाँ पर हुआ एक नया अनुभव है।

हाँ तो लंदन में जहाँ हम रह रहे हैं, वहाँ से मेरी पैदल यात्रा के दो छोर ‘कैनरी व्हार्फ’ ट्यूब स्टेशन और ‘आइलैंड गार्डन’ स्टेशन हैं। जी हाँ कभी मैं ‘वाक’ के लिए ‘कैनरी व्हार्फ’ ट्यूब स्टेशन की तरफ निकल जाता हूँ और कभी ‘आइलैंड गार्डन’ स्टेशन की तरफ! कैनरी व्हार्फ की तरफ जाता हूँ तो बगल में ही इतनी अंडरग्राउंड मार्केट ‘कैनाडा स्क्वेयर’ आदि-आदि हैं, ऐसे कि वहाँ कभी-कभी रास्ता भूल जाता हूँ। दूसरी तरफ ‘आइलैंड गार्डन’ की तरफ ‘वाक’ को कुछ और लंबा करता हूँ तो अंडरग्राउंड टनेल से नदी के पार ‘ग्रीनविच’ क्षेत्र में चला जाता हूँ, जहाँ ‘कट्टी सार’ नामक शिप प्रदर्शनी के रूप में खड़ा है और उसके पास ही ‘ग्रीनविच वेधशाला’ भी है और रानी का एक महल वहाँ भी है।

ये कुछ स्थान, कुछ नाम जो यहाँ से जाने के बाद सिर्फ याद रह जाएंगे। नाम याद रह जाएं इसलिए यहाँ लिख भी दिया।

एक बात और शेयर करना चाहूंगा, ये तो हम जानते हैं कि आज की तारीख में, अधिकतर अखबारों की कमाई उस पैसे से नहीं होती, जो हम अखबार खरीदने के लिए देते हैं। असल में अखबार के लिए अगर हम 1 रुपया देते हैं तो उस पर खर्च 10 रुपए आता है। भारत में हम एक ‘टोकन’ राशि अखबार के लिए देते हैं। कमाई तो अखबार की विज्ञापनों से होती है। यहाँ ब्रिटेन और शायद पश्चिम के और देशों में भी, प्रमुख सार्वजनिक स्थानों पर अखबार रखे रहते हैं और आप वहाँ से अखबार उठाकर ले जा सकते हैं। यहाँ उसके लिए कोई दाम नहीं देना होता।

यहाँ पर ग्रोसरी स्टोर में भी सब कुछ ऑटोमेटिक है। स्कैनिंग मशीनें लगी हैं, आपने जो सामान खरीदने के लिए चुना है, उसको स्कैन कीजिए और कार्ड से अथवा नकद भी भुगतान करके उनको ले जा सकते हैं। आपको स्टोर के किसी व्यक्ति से मदद लेने की आवश्यकता नहीं है, यदि आप स्वयं ऐसा कर पाते हैं तो!

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।


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92. फिर से मेरा ख्वाब-ए-जवानी थोड़ा सा दोहराए तो!

आज फिर से आसान वाला रास्ता चुन रहा हूँ, जी हाँ प्रस्तुत है, एक और पुरानी ब्लॉग पोस्ट-
अतीत में रहना अक्सर लोगों को अच्छा लगता है, मेरी उम्र के लोगों को और भी ज्यादा। कुछ लोग तो जब मौका मिलता है अतीत में जाकर दुबक जाते हैं, या ऐसा कहते रहते हैं, हमारे समय में तो ऐसा होता है। वैसे मेरा तो यही प्रयास है कि हर समय, मेरा समय रहे, लेकिन अनुभव को मन में दोहराने के लिए कभी-कभार अतीत में डुबकी लगा लेना तो अच्छी बात है।

आज एक दृश्य याद आ रहा है, आकाशवाणी जयपुर में सेवा के समय का, वहाँ मैं 1980 से 1983 तक रहा था। मैं अपने पुराने ब्लॉग्स में उस अवधि के बारे में बता चुका हूँ। हाँ तो एक दृश्य याद आ रहा है, रिकॉर्डिंग स्टूडियो का, एक लाइन का संवाद, लेकिन उससे पहले लंबी-चौड़ी भूमिका तो बांध सकता हूँ, कैरेक्टर्स के बारे में बताने के बहाने।

हाँ तो आकाशवाणी में मैं प्रशासन शाखा में था, हिंदी अनुवादक होने के नाते, रिकॉर्डिंग स्टूडियो से मेरा सीधे तौर पर कोई नाता नहीं था, लेकिन मैं अक्सर रिकॉर्डिंग स्टूडियो में रहता था कभी किसी कवि-गोष्ठी में, कभी कविता रिकॉर्ड कराने के लिए और कभी अपनी आवाज़ में कोई कहानी रिकॉर्ड कराने के लिए।

मेरी मित्रता भी प्रशासन शाखा से बाहर, प्रोग्राम विभाग के लोगों से अधिक थी, जबकि प्रशासन शाखा के बहुत से लोग प्रोग्राम विभाग के लोगों से ईर्ष्या करते थे, क्योंकि उनको पैसा और ख्याति, दोनों अधिक मिलते हैं।

हाँ तो कार्यक्रम विभाग में एक थे- श्री राजेंद्र वोहरा, कार्यक्रम निष्पादक, बहुत ही सृजनशील व्यक्ति थे, बाद में वे केंद्र निदेशक के स्तर तक पहुंचे थे। एक थे मेरे मित्र- बैजनाथ गौतम, कृषि विभाग में कार्यक्रम सहायक थे। ईसुरी के लोकगीत बड़े सुरीले अंदाज में गाते थे। और एक थे श्री एस.एस.धमौरा, वे बहुत अच्छे कलाकार थे, पगड़ी बांधकर, पूरी तरह राजस्थानी परिधान में रहते थे। इस दृश्य में ये तीन व्यक्ति ही प्रमुख रूप से थे, वैसे आकाशवाणी में अनेक कलाकार मेरे मित्र थे, जिनमें बहुत जाने-माने तबला वादक ज़नाब दायम अली क़ादरी भी शामिल थे।
हाँ तो एक लाइन के संवाद वाले इस दृश्य के बारे में बात करते हैं। मैं किसी रिकॉर्डिंग के मामले में स्टूडियो गया था और इस दृश्य में मेरी कोई भूमिका नहीं थी।

दरअसल कृषकों के लिए चौपाल की रिकॉर्डिंग होनी थी, धमौरा जी ने कहा- ‘राम राम बैजनाथ भाई, क्या हाल है, आज की चौपाल में चर्चा शुरू की जाए? इस पर श्री बैजनाथ गौतम बोले- ‘हाँ धमौरा भाई मैं तो मजे में हूँ, चर्चा शुरू करते हैं, बस थोड़ा ‘वोहरा साहब’ आ जाएं।‘

इतना बोलना था, कि धमौरा जी, जो रुतबे में गौतम जी से बहुत छोटे थे, लेकिन अनुभवी कलाकार थे, उन्होंने रिकॉर्डिंग बंद करा दी और चिल्लाए- ‘ये वोहरा साहब क्या होता है? यहाँ प्रोग्राम में कोई किसी का साहब नहीं है!’

बस यही अचानक याद आया, हर जगह का अलग संस्कार होता है, दफ्तर में अगर नाम के साथ साहब न लगाएं तो वह अशिष्टता है और चौपाल में अगर किसी के नाम के साथ साहब लगाएं तो वह गलत है।

आज के लिए यही एक बहाना था, अतीत में झांकने का, और उन पलों को दोहराने का, जगजीत जी की गाई गज़ल के शेर याद आ रहे हैं-

झूठ है सब तारीख हमेशा अपने को दोहराती है,
फिर से मेरा ख्वाब-ए-जवानी थोड़ा सा दोहराए तो।

शफक़, धनुख, महताब, घटाएं, तारे, नगमे, बिजली, फूल,
उस दामन में क्या-क्या कुछ है, वो दामन हाथ में आए तो।

नमस्कार।


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217. ईटिंग ऑउट इन लंदन!

 

आज लंदन में कुछ और देखते हैं। इंसान जहाँ भी जाए, कुछ काम जो वो हर जगह करता है उनमें से एक है भोजन करना। और घर का भोजन कब तक चलता रहेगा भाई, कुछ तो बज़ार में भी चट्टन-वट्टन होना चाहिए। और हाँ महिलाओं के लिए एक गतिविधि, जो हर जगह होनी ही चाहिए, वो है शॉपिंग! तो आज इनकी ही बात करते हैं। इसमें शॉपिंग वाली गतिविधि की मुख्य पात्र मेरी श्रीमती जी हैं और बाज़ार के खाने के विशेषज्ञ मेरे बेटा-बहू हैं। वैसे लंदन में क्या कहाँ मिलेगा, ये भी तो बेटा-बहू ही जानते हैं। हम तो कुछ दिन नहीं, पूरे एक महीने के मेहमान थे, जो अब पूरा होने को है!

हाँ तो जी पहली घटना तो ये उस दिन की है जब हम ‘लंदन आई’ और ‘टॉवर ब्रिज’ देखने गए थे, इन दोनों स्थानों पर घूमने के बाद थक गए थे और यह विचार आय कि अब कहीं खाना खाएं और फिर वापस घर जाकर आराम करेंगे। तो अब मौका था मेरे बेटे की होटलों, रेस्तराओं संबंधी विशेषज्ञता के काम मे आने का! मेरे बेटे आशीष ने शायद जितनी फोटो इंसानों की खींची होंगी, लगभग उतनी ही होटलों में खाना खाने से पहले वहाँ की डिशेज़ की खींची होंगी।
अब हम लंदन के किस इलाके में हैं और कहाँ जा रहे हैं, ये सब याद रखना तो मेरे लिए बहुत मुश्किल है, हम टॉवर ब्रिज के पास से बस पकड़कर, वहाँ से काफी दूर गए, उसके बाद बस से उतरकर कुछ देर तक खोजना भी पड़ा उस रेस्टोरेंट को जहाँ जाना था, क्योंकि उसकी ठीक लोकेशन मेरे बेटा-बहू को याद नहीं थी।

हाँ तो ये था- ‘पंजाब’ रेस्टोरेंट, जिसे इसके मालिक ने भारत की आज़ादी से एक वर्ष पहले 1946 में स्थापित किया था और आज यह रेस्टोरेंट बड़ी शान से उस इलाके में भारतीय भोजन की पहचान बनकर चल रहा है, बार भी वहाँ है और ग्राहक भी भारतीय मूल के और अंग्रेज, सभी खूब आते हैं। कर्मचारियों में मैंने देखा कि एक-दो को छोड़कर सभी भारतीय या एशियन हैं, क्योंकि देखकर यह पहचान मुश्किल होती है कि भारतीय है अथवा पाकिस्तानी या बंग्लादेशी! खैर उस दिन लंदन में रहकर, पंजाब रेस्टोरेंट का खाना बहुत अच्छा लगा।

उसके बाद एक दिन शॉपिंग के लिए निर्धारित था, जिसमें मेरी और मेरे बेटे की भूमिका तो मेहमान कलाकार की थी, यह तो मेरी पत्नी और बहू की विशेषज्ञता का क्षेत्र है। इस काम के लिए हम एशियाई लोगों की घनी आबादी वाले ‘ईस्ट हैम’ इलाके में गए, यहाँ जिन भी दुकानों से जो भी शॉपिंग हुई हो, मैं ज़िक्र करूंगा यहाँ पर भी खाने का, जो हमने ‘टेस्ट ऑफ इंडिया’ नामक वेजीटेरियन  रेस्टोरेंट में किया, काफी बड़े इलाके में फैला रेस्टोरेंट है ये और पूरा भरा हुआ था। यहाँ भी लगभग सभी कर्मचारी भारतीय दिखाई दे रहे थे।

हमने दक्षिण भारतीय दिश ऑर्डर किए। गुड़गांव अथवा गोआ के अपने अनुभव के आधार पर हम मान रहे थे कि एक व्यक्ति के लिए एक डोसा अथवा उत्तपम काफी नहीं रहेगा, लेकिन जब ऑर्डर ‘सर्व’ हुआ तब हमने देखा कि डोसे आदि का आकार काफी बड़ा था और एक व्यक्ति के लिए उसको निपटाना मुश्किल हो गया।

अंत में मैं यही कहना चाहूंगा कि जो भी व्यक्ति, जिस भी क्षेत्र में मेहनत और ईमानदारी के साथ काम कर रहा है, वो अपनी पहचान बनाता है और ये लोग भी एक तरह से यहाँ भारत की पहचान हैं और भारतीयों को रोज़गार भी दे रहे हैं। मैं इन दो रेस्टोरेंट्स में ही गया वैसे यहाँ और भी बहुत होंगे। मेरी यही कामना है कि ये भारतीय भोजन के बहाने दुनिया को भारत की पहचान कराते रहें।

(बीच में ब्लॉग का 217 नंबर छूट गया था, इसलिए आज ये नंबर दे दिया)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।


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218. ये कहानी फिर सही!

अभी लंदन में ही कुछ दिन और हूँ, और कुछ यहाँ के बारे में शेयर करने का मन होगा तो अवश्य करूंगा। एक बात अभी यही कहना चाहूंगा कि यहाँ कुत्ते खूब देखने को मिलते हैं, लेकिन सभी अपने स्वामी अथवा सेवक के साथ! सड़क पर कोई आवारा कुत्ता अभी तक तो नहीं मिला , संभव है कोई ऐसा कोना लंदन का हो, जहाँ पर वे भी हों। और एक बात, बच्चों के बारे में सुना कि यहाँ पर लोग उनको पहले तो प्रैम में रखते हैं उसके बाद वे पैदल चलते हैं। बच्चों को वे गोदी में लेकर नहीं चलते, हाँ  कुत्तों को गोदी में लेकर जाते हुए  मैंने कुछ  लोगों को देखा। और कुत्ते भी यहाँ कुछ अलग तरह के दिखे, कुछ नेवले जैसे भी, छोटे-छोटे पैर, ऊंचाई भी कम लेकिन लंबाई अनुपात में काफी अधिक।

खैर आज पुराने रंग में, कुछ गीत-गज़ल की पंक्तियां याद आ रही हैं, पहले तो ‘मेरा नाम जोकर’ फिल्म के एक ज्यादा प्रचलित न हुए गीत में मुकेश जी की गाई हुई कुछ पंक्तियां, जो मुझे काफी अच्छी लगती हैं-

गोरे तन से चमके बिजुरिया,
कहीं आग न लग जाए।
मैंने हमेशा ज़ख्म ही खाए,
जिससे भी दिल को लगाया,
जब भी हंसा मैं, जग को हंसाने,
आंखों में पानी आया,
दिल के जले को तुम न जलाना,
आग न लग जाए। 

अब इसके बाद, इसी भावभूमि पर गुलाम अली जी की गाई हुई, ज़नाब मसरूूूरर अनवर की एक गज़ल, जो बहुत प्रचलित है और कई बार हम ज्यादा प्रचलित होने के कारण भी कुछ चीजों पर ज्यादा ध्यान नहीं देते हैं। लीजिए प्रस्तुत है ये गज़ल भी-

हमको किसके गम ने मारा, ये कहानी फिर सही
किसने तोड़ा दिल हमारा, ये कहानी फिर सही।

दिल के लुटने का सबब पूछो न सबके सामने
नाम आएगा तुम्हारा, ये कहानी फिर सही।

नफरतों के तीर खा कर, दोस्तों के शहर में
हमने किस किस को पुकारा, ये कहानी फिर सही।

क्या बताएं प्यार की बाजी, वफ़ा की राह में
कौन जीता कौन हारा, ये कहानी फिर सही।

आज अचानक ये रचनाएं याद आ गईं, आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।


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216. टॉवर ब्रिज, लंदन का!

 

पिछली बार जैसा मैंने बताया था, निकले थे ‘लंदन आई’ और टॉवर ब्रिज देखने के लिए, लेकिन ‘लंदन आई’ की बात में ही लगा कि एक दिन के लिए इतना ही काफी है, क्योंकि ये उम्मीद तो की जाती है और ऐसा भी सोचना होता है कि उतना ही लिखा जाए जितना कोई एक बार में पढ़ पाए।

तो अब आगे की बात कर लेते हैं, टॉवर ब्रिज जाने के लिए हमने ‘लंदन आई’ वाले बस स्टॉप- वाटरलू से ही बस पकड़ी। वैसे मानना पड़ेगा कि लंदन में बस यात्रा और ट्यूब रेल यात्रा भी काफी आरामदायक हैं, हाँ बंदे को यह तो याद करना पड़ेगा कि स्टेशन में किधर से घुसना है और किधर निकलना। वैसे भी एक ही जगह पर दो-तीन दिशाओं में जा रही रेल लाइनें हैं, किधर जाकर कौन सी पकड़ेंगे और कहाँ निकलेंगे, ये याद करने में टाइम तो लगेगा, कुछ हद तक तो यह समस्या अब भारत में, दिल्ली में भी आती है!

फिर देखिए मैं इधर-उधर की बातें करने लगता हूँ। तो हम बस पकड़कर टॉवर ब्रिज के पास वाले स्टॉप पर पहुंचे और वहाँ से थोड़ा पैदल चलकर टॉवर ब्रिज के प्रवेश मार्ग पर पहुंचे।
वैसे तो लंदन में थेम्स नदी पर, आज की तारीख में 24 ब्रिज हैं, लेकिन टॉवर ब्रिज तो जैसे इंजीनियरिंग का एक नायाब नमूना है और जैसे लंदन की पहचान बन गया है। यह ब्रिज जून,1886 में बनना शुरू हुआ था और कुशल इंजीनियरिंग, कारीगरी और मेहनत के बल पर 8 वर्ष बाद, जून, 1894 में चालू किया गया। नदी के दोनों तरफ बने टॉवरों को जोड़ने वाले इस पुल की बहुत बड़ी विशेषता यह है कि दिन में कुछ खास समयों पर नदी पर बना यह विशाल पुल, बीच में से दो हिस्सों में ऊपर उठा दिया जाता है, जिससे नदी में से होकर विशाल जहाज आदि दूसरी तरफ जा सकें।

एक बड़ी राहत की बात मुझ जैसे बुज़ुर्ग लोगों के लिए यह भी है कि टॉवर में ऊपर चढ़ने के लिए लिफ्ट की व्यवस्था है। ऊपर दोनों टॉवरों के बीच दोहरा रास्ता है, जिसमें ब्रिज के और इसकी इंजीनियरी के इतिहास के संबंध में फिल्मों और प्रदर्शनी के माध्यम से उपयोगी जानकारी दी गई है। वहीं बीच में कुछ भाग में पारदर्शी शीशे का फर्श है, जिसमें से नीचे देखने पर इस पुल की ऊंचाई का एहसास होता है और शुरू में डर भी लगता है। कुल मिलाकर लंदन की पहचान की एक महत्वपूर्ण कड़ी माना जाने वाला यह पुल भी, जितनी बार देखा जाए, हर बार इसमें रोमांच, उत्साह और जानकारी की बढ़ोतरी होगी।

आगे और बात कल करेंगे, आज के लिए इतना ही

नमस्कार।


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215. लंदन की आंख!

 

चलिए एक बार फिर से लंदन की यात्रा पर निकलते हैं। लंदन के बहुत सारे स्थान जैसा मैंने पहले बताया था, हमने क्रूज़ की यात्रा के दौरान देखे था। अब बारी थी इनमें से एक-दो को पास से देखने की। इसी प्रयास में हम कल ‘लंदन आई’ और ‘टॉवर ब्रिज’ की यात्रा में निकले।
एक बात मैं जरूर कहना चाहता हूँ, मुझमें ‘ट्रैवल ब्लॉगर्स’ जैसा धैर्य नहीं है, मैं सामान्यतः किसी भाव को लेकर ब्लॉग लिखना शुरू करता हूँ और बहुत सी बार ब्लॉग पोस्ट खत्म होते-होते सोचता हूँ, अरे क्या मैंने इस विषय में लिखने के बारे में सोचा था! लेकिन ट्रैवल ब्लॉगिंग में एक जगह ‘फोकस’ रखकर लिखना होता है। ठीक है जी, मैं कोशिश करूंगा।

तो कल हम निकले, यह लक्ष्य बनाकर कि आज ‘लंदन आई’ और ‘टॉवर ब्रिज’ देखना है। अधिक समय बर्बाद न हो, इसलिए हमने घर से सीधे ‘लंदन आई’ का रुख किया। ‘लंदन आई’ जैसा कि आप जानते ही होंगे एक ‘आकाशीय झूला’ है, जो इतना बड़ा है और इतना धीरे चलता है कि अगर आप इसे थोड़ा भी दूर से देखें तो यह हमेशा रुका हुआ ही लगता है, एकदम पास जाने के बाद पता चलता है कि यह धीरे-धीरे चल रहा है। अपना एक फेरा यह लगभग आधे घंटे में पूरा करता है।

जिस ऊंचाई पर यह झूला ले जाता है, वहाँ जाने के बाद लंदन में ऐसा कौन सा प्रमुख स्थान है, जो आप नहीं देख सकते, लेकिन कुछ स्थानों को देखने के लिए दूरदृष्टि भी जबर्दस्त चाहिए ना जी!

खैर बड़े काम के लिए प्रयास भी बड़े करने पड़ते हैं। बाधाएं भी बड़ी आती हैं। मेरे बेटा-बहू, जो लंदन में ही रह रहे हैं और इन स्थानों को कई बार देख चुके हैं, वे हमें- पति-पत्नी को ये दिखाने ले गए थे। आधा घंटा तक बेटा लाइन में लगा रहा, तब टिकट मिल पाया। इस बीच हम वहाँ आसपास घूम लिए, जहाँ लगभग मेले जैसा माहौल रहता है। एक बात और मैंने देखी लंदन में पैसा कमाने के लिए लोग सार्वजनिक स्थानों में बाकायदा माइक और साज़ के साथ गाना गाते हैं। बहुत से वेश बनाते हैं, जैसे कि कल हम वहाँ एक ‘चार्ली चैप्लिन’ और एक ‘गोल्डन लेडी’ से मिले। हाँ चैप्लिन जी कुछ मोटे ज्यादा हो गए थे, मुझे लगा कि ऐसे में वो फुर्ती कैसे दिखा पाएंगे, जो उनकी फिल्मों में देखने को मिलती है। (मुझे यह भी खयाल आता है कि भारत में ज्यादा जोर लोग एटीएम लूटने अथवा अन्य प्रकार के फ्रॉड सीखने पर लगा रहे हैं!)
बेटा जब टिकट लेकर आ गया, तब हम सबने वहाँ 360 डिग्री अनुभव वाली लगभग 10-15 मिनट की फिल्म देखी, जो ‘लंदन आई’ अनुभव का एक हिस्सा है। भारत में भी ‘छोटा चेतन’ जैसी 3-डी फिल्म पहले बनी थी, और विशेष चश्मा पहनकर कुछ अलग अनुभव कराने का प्रयास किया गया था, लेकिन मानना पड़ेगा कि इस अनुभव के सामने वह सब कुछ भी नहीं था, ऐसा लगा कि सब कुछ अपने तीन तरफ हो रहा है, कबूतर जैसे कान से टकराते हुए चला गया, कई बार अपना सिर हिलाना पड़ा, लगा कि कोई वस्तु टकरा जाएगी। सचमुच ‘लंदन आई’ के आकाशीय झूले’ पर चढ़ने से पहले मिला यह अनुभव दिव्य था।


इसके बाद लगभग आधा घंटा और लाइन में लगे रहने के बाद आकाश-यात्रा का अपना नंबर आया, मैंने गिना नहीं लेकिन बहुत सारे अति सुंदर केबिन इस झूले में हैं, हर केबिन में 15-20 लोग तो आराम से आ ही जाते हैं, कुछ बैठ भी जाते हैं, वैसे चारों तरफ के दिव्य नजारे को देखने, अपने कैमरों में कैद करने के लिए अधिकतर लोग खड़े रहना ही पसंद करते हैं। नीचे बहती विशाल थेम्स नदी, उसके दोनो किनारों से झांकता लंदन का इतिहास और वर्तमान। ये सब ऐसा है जो बयान करने की चीज नहीं है और मेरी इतनी क्षमता भी नहीं है। बस यही कि अगर जीवन में मौका मिले तो ये अनुभव अवश्य कर लेना चाहिए।

आगे और बात कल करेंगे, आज के लिए इतना ही, नमस्कार।
नमस्कार।


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91. हाथ खाली हैं मगर व्यापार करता हूँ!

 

आज फिर से लंदन में घूमे और विशेष रूप से ‘लंदन आई’ और टॉवर ब्रिज को देखा। लेकिन फिलहाल लिखने की हिम्मत नहीं है, शायद कल इस बारे में लिखूंगा। आज फिर से प्रस्तुत है, एक और पुरानी ब्लॉग पोस्ट-

बचपन में चंदामामा पत्रिका में विक्रम और वैताल की कहानियां पढ़ा करता था, जिनकी शुरुआत इस प्रकार होती थी- ‘विक्रमादित्य ने जिद नहीं छोड़ी’ और फिर अपनी ज़िद के कारण जब वह वैताल को लादकर चलता है, तब वैताल उसे कहानी सुनाता है और बीच में टोकने पर वह फिर वापस उड़कर चला जाता है।

कुछ इस तरह ही मुझे याद है, और मुझे लगता है कि ब्लॉग लिखना एक बार शुरू किया तो फिर इसको बार-बार लिखने की ज़िद भी कुछ ऐसी ही है, यहाँ कहानी सुनाने वाले भी खुद और सुनने वाले भी खुद ही। हाँ ये देखकर अच्छा लगता है कि मेरी साइट पर जाकर बहुत सारे अजनबी लोग, पुराने ब्लॉग्स को खोज-खोजकर पढ़ते हैं।

हाँ तो मैंने अपने एनटीपीसी के सेवाकाल के संबंध में काफी लिखा है। वहाँ पर मुझे क्रय-समितियों में बहुत बार दौरों पर जाना पड़ा है। सच बात तो ये है कि मैं कभी खुद अपने लिए भी खरीदारी नहीं करता। क्रय समितियों में जो औपचारिकताएं हैं, चयन से संबंधित, वे सब वित्त और सामग्री विभाग के लोग पूरा करते थे, मैं मानव संसाधन विभाग का प्रतिनिधि होने के नाते, केवल मौन मध्यस्थ की भूमिका में उनके साथ रहता था। क्रय समिति में जाने का आकर्षण मेरे लिए मात्र दूसरे शहर में घूमना ही होता था।

हाँ कभी-कभी मेरी भूमिका आती थी, जैसा कि मैंने एक ब्लॉग में लिखा था, चरित्र की शिक्षा देने वाले एक विद्यालय के शिक्षक जब, स्कूल से संबंधित खरीदारी के लिए साथ गए थे, और कमीशन खाने के चक्कर में एक खास पार्टी की वकालत करने लगे थे, तब हमने वहाँ से न खरीदने का फैसला लिया और कोटेशन लेकर वापस आ गए थे।

आज अचानक शुरू-शुरू का एक क्रय-समिति में जाने का अनुभव याद आ गया।

विंध्यनगर, मध्य प्रदेश में मैं कार्यरत था, कार्यपालक के रूप में और वहाँ पास के ही बाज़ार से कुछ पुरस्कार आदि खरीदने थे। हमारी क्रय समिति में, अन्य लोगों के साथ ही साथ, मेरे अपने विभाग के एक पर्यवेक्षक थे, जो संभवतः काफी आदर करने वाले थे और मुझसे बात करते समय, उनके हर वाक्य में दो बार ‘सर’ आता था।

आज यह घटना अचानक क्यों याद आ गई, उसका कारण यही है कि वह दुकान, जहाँ से हमने सामान खरीदा वहाँ पर ही मैंने इस तरफ ध्यान दिया कि मेरा यह साथी जो हर वाक्य में दो बार ‘सर’ बोलता था, दुकान पर एक घंटा चर्चा करने के दौरान उसके मुंह से एक बार भी ‘सर’ नहीं निकला और इसके अलावा यदि ध्यान से दुकानदार से बातचीत के अंदाज को देखा जाए तो यही लगेगा कि वह साथी ही मेरे बॉस थे।

खैर अचानक मेरा यह ऑब्ज़र्वेशन मुझे आज याद आ गया, इस बदले अंदाज़ से यदि मेरे उस साथी को कोई लाभ हुआ तो वही जानता होगा, वैसे मैं बाद में सामान्यतः दूसरे विभागों के अपने समकक्ष या अपने से वरिष्ठ अधिकारियों के साथ ही गया और विक्रेता को अपनी स्थिति के बारे में ‘इम्प्रेस’ करने में मेरी कभी कोई रुचि नहीं रही, मुझे तो यही जल्दी रहती थी कि यह झमेला खत्म हो तो मैं कुछ समय शहर में घूम लूं।

खरीदारी की विशेषज्ञता तो मैं चाहता हूँ कि मेरी ऐसी ही बनी रहे-

हूँ बहुत नादान, करता हूँ ये नादानी
बेचकर खुशियां खरीदूं आंख का पानी,
हाथ खाली हैं मगर व्यापार करता हूँ।
आदमी हूँ आदमी से प्यार करता हूँ॥

नमस्कार।


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90. मेरे नाम से खत लिखती है तुमको मेरी तन्हाई!

आज कुछ नया लिखने का मन नहीं है जी, तो जो आसान काम है वही करता हूँ, प्रस्तुत है, एक और पुरानी ब्लॉग पोस्ट-

कुछ समय पहले (यह ब्लॉग पोस्ट लगभग 8-10 महीने पुरानी है) प्रसिद्ध अभिनेता विनोद खन्ना का देहांत हो गया। बहुत से कलाकार हैं जो कुदरत ने हमसे छीन लिए हैं, जाना तो सभी को होता है, लेकिन एक बात कुछ अलग हुई थी विनोद खन्ना जी के मामले में। जैसा हम जानते हैं विनोद खन्ना जी ने फिल्म जगत में जिन ऊंचाइयों को प्राप्त किया था, वहाँ तक बहुत कम अभिनेता पहुंच पाते हैं। वे अमिताभ बच्चन जी के समकक्ष माने जाते थे। एक अत्यंत सफल फिल्मी हीरो थे और बाद में राजनीति में भी उन्होंने सक्रिय भूमिका निभाई।

इतना ही नहीं, विनोद खन्ना जी बड़े दम-खम वाले व्यक्ति लगते थे और फिल्मों में उन्होंने कुछ भूमिकाएं ऐसी निभाईं जो हिम्मत, हौसले और मर्दानगी की मिसाल लगती थीं।

कुछ दिन तक विनोद खन्ना जी खबरों से बाहर रहे और फिर एक दिन अचानक सोशल मीडिया में एक फोटो आई, उनकी मृत्यु से शायद एक-दो महीने पहले, एक कृशकाय व्यक्ति और यह सवाल किया गया कि क्या यह विनोद खन्ना हैं। देखकर विश्वास ही नहीं हुआ, ऐसा लगा कि जिस तरह सोशल मीडिया पर बेसिर-पैर की बातें फैलाई जाती हैं, वैसा ही कुछ है। लेकिन फिर यह स्पष्ट हो गया कि वास्तव में विनोद खन्ना जी को कैंसर हुआ था और कुछ समय बाद उनकी मृत्यु भी हो गई।

उस समय सचमुच वो शेर याद आया था-

दश्त-ए-तन्हाई-ए-हिजरां में खड़ा सोचता हूँ
हाय क्या लोग मेरा साथ निभाने निकले।

लगभग 25-30 साल पहले दिल्ली में, साहित्य अकादमी में एक शायर से उनके कुछ शेर सुने थे ‘तन्हाई’ पर, शायद पाकिस्तानी शायर थे, दो शेर आज तक याद हैं (शायर कौन थे, मैं नहीं कह सकता), शेर इस तरह हैं-

मैं तो खयालों की दुनिया में खुद को बहला लेता हूँ,
मेरे नाम से खत लिखती है, तुमको मेरी तन्हाई।

घर में मुकफ्फल करके उसको, मैं तो सफर पे निकला था,
रेल चली तो बैठी हुई थी, मेरे बराबर तन्हाई।

एक शेर और याद आ रहा है, निदा फाज़ली साहब का-

एक महफ़िल में कई महफ़िलें होती हैं शरीक
जिस को भी पास से देखोगे अकेला होगा ।

लीजिए लगे हाथ उनका ही एक शेर और-

हर आदमी में होते हैं, दस-बीस आदमी, 

जिसको भी देखना हो कई बार देखिए। 

तन्हाई नाम का यह शत्रु, कोई छोटा-मोटा शत्रु नहीं है। इस शत्रु का सामना करने के लिए, जहाँ तक संभव हो, हम दिल से एक साथ हो जाएं तो इस शत्रु का अस्तित्व ही नहीं रहेगा, लेकिन इस बात को कहना आसान है, करना नहीं।

शायद तन्हाई से बचने का ही लोगों को सबसे अच्छा रास्ता यह लगता है कि वे एक पार्टी का झंडा थाम लेते हैं और दूसरी पार्टी को गालियां देने में अपनी पूरी प्रतिभा का इस्तेमाल करते हैं।
इस ब्लॉग के मामले में मैंने यह विकल्प नहीं चुना है। वैसे भी जो लोग यह सोचते हैं कि एक पार्टी दूध की धुली है और दूसरी को वे कौरव सेना मानते हैं उनको शायद कल्पना लोक में रहना ज्यादा अच्छा लगता है।

इस ब्लॉग के माध्यम से मैं उन ही नर्म-नाज़ुक दिलों का दरवाज़ा खटखटाना चाहता हूँ, जो मानवीय संवेदनाओं के लिए खुले हैं, बाकी निश्चिंत रहें उनको डिस्टर्ब करने का मेरा कोई इरादा नहीं है।

नमस्कार।


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214. लंदन फिर एक बार!

स्कॉटलैंड की तीन दिन की यात्रा के बाद वापस लंदन लौट आए, हाँ एक बात है- ‘स्कॉटलैंड यार्ड’, जिसे बहुत बार फिल्मों में देखा और सुना, वो कहाँ है, न किसी ने पूछा और न बताया! खैर एक महीने के लंदन प्रवास में से आधा पूरा हो गया है। रोज जब सैर पर जाता हूँ तो वे ही गोरे दिखाई देते हैं, जिन्होंने लंबे समय तक हम पर राज किया था।
जैसा मैंने पहले बताया था, एशियाई मूल के लोग भी बड़ी संख्या में यहाँ हैं और कुछ खास इलाकों में अधिक बसे हैं।

एक बात जो शुरू में अजीब लगी थी, अब आदत पड़ गई है, सुबह जितनी जल्दी आंख खुल जाए सूरज की रोशनी दिखाई देती है और रात में साढ़े नौ-दस बजे तक रहती है। आजकल गर्मी और डे लाइट सेविंग के समय यह हालत है, जबकि घड़ी का समय भी एक घंटा आगे कर दिया जाता है ताकि बिजली की बचत की जा सके।

आजकल जहाँ लगभग 18 घंटे दिन की रोशनी रहती है वहीं सर्दियों में इसका उल्टा हो जाता है, और शाम 3 बजे ही अंधेरा हो जाता है।

जैसे भारत के अलग-अलग नगरों में स्थानों के अलग तरह के नाम होते हैं, जैसे पुरानी दिल्ली में- कटरा, हाता, छत्ता आदि, मंडी, बाग आदि भी बहुत से स्थानों में शामिल होते हैं, हैदराबाद में पेठ होते हैं, इंग्लैंड में जो नाम सबसे ज्यादा सुनने को मिला अभी तक, वह है- ‘व्हार्फ’, जैसे पास में ही ट्यूब स्टेशन है- ‘कैनरी व्हार्फ’। ‘व्हार्फ’ होता है नदी किनारे विकसित किया गया वह, सामान्यतः ढलान वाला प्लेटफार्म, जिसके माध्यम से यात्री और सामान आसानी से बाहर आ सकें। और यहाँ नगर को एक सिरे से दूसरे तक जोड़ती, बीच में बहती थेम्स नदी है, तो इस तरह ‘व्हार्फ’ भी होंगे ही।

जैसे मुम्बई में नगर के बीचों-बीच दो रेलवे लाइनें हैं, जो मुम्बई की लाइफ-लाइन कहलाती हैं, उसी तरह लंदन में नगर के बीच से बहती ‘थेम्स’ नदी, मुझे लगता है कि सामान और यात्रियों के यातायात में इसकी काफी बड़ी भूमिका है।

भारत में जो लकड़ी की बॉडी वाले ट्रक दिखाई देते हैं, वे यहाँ नहीं दिखे, कुछ बड़े बंद ट्रक तो हैं, इसके अलावा कार के पीछे ट्रॉली जोड़कर भी सामान का यातायात होता है और नदी के मार्ग से भी जहाँ तक संभव है।

जैसा मैंने पहले बताया था यहाँ हमारे घर के पीछे ही थेम्स नदी बहती है, दिन भर जहाँ हम यात्री नौकाओं को देखते हैं, वहीं ऐसी नौकाएं भी देखते हैं, जिनके पीछे एक बड़ा कंटेनर जोड़कर, उसके माध्यम से, सामान्य ट्रक से शायद ज्यादा सामान ढ़ोया जाता है।

आज बस ऐसे ही कुछ ऑब्ज़र्वेशन लंदन नगर के बारे में देने का मन हुआ, आगे जो कुछ बताने लायक लगेगा, वो भी लिखूंगा।

नमस्कार।


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213. स्कॉटलैंड यात्रा-3

 

अब स्कॉटलैंड यात्रा में तीसरे और अंतिम दिन के बारे में बात करते हैं, जैसा कि प्रोग्राम था, उसके अनुसार नाश्ता करने के बाद होटल से चेक आउट करके निकलना था और हम लोगों ने ऐसा ही किया।

अंतिम दिन का प्रमुख आकर्षण था- एडिनबर्ग, जो कि एक ऐतिहासिक नगर होने के अलावा स्कॉटलैंड की राजधानी भी है। नगर में पहुंचने के बाद हमने रानी का महल देखा, जहाँ वे अपने एडिनबर्ग प्रवास के दौरान रहती हैं। जैसा कि होता है बहुत भव्य महल है। उसके सामने ही स्कॉटलैंड की संसद का भवन भी है।

इन दो प्रमुख भवनों के पास ही, ऊंची कार्ल्टन पहाड़ी पर विकसित की गई एक सिटी ऑब्ज़र्वेटरी है जहाँ से नगर का बहुत सुंदर दृश्य दिखाई देता है। इस पहाड़ी पर एक पुर्तगाली तोप भी है, और लोगों ने यहाँ से नगर के बहुत सुंदर चित्र लिए।

इसके बाद अनेक स्थानों का भ्रमण करते हुए टूर ऑपरेटर ने हम लोगों को ‘एडिनबर्ग कैसल’ के पास छोड़ दिया क्योंकि इसके पास का इलाका बहुत सुंदर और गतिविधिपूर्ण है, मानो दिल्ली का कनॉट प्लेस, हालांकि वहाँ जो दृश्य देखने को मिले वे बहुत ही भव्य थे। वहाँ पास ही में राष्ट्रीय संग्रहालय, राष्ट्रीय पुस्तकालय आदि भी हैं।

‘एडिनबर्ग कैसल’ काफी ऊंचाई पर स्थित है और बहुत भव्य है, वहाँ देखने वालों की भारी भीड़ होती है। वहाँ से नीचे उतरते हुए सेंट गाइल्स कैथेड्रल और बाजार में अनेक जीवंत आकर्षण हैं। वहाँ एक भव्य मूर्ति है, जिसके बारे में माना जाता है कि उसके पांव के पंजे पर हाथ रगड़ने से लोगों की किस्मत चमक जाती है। बाजार में लगातार आकर्षण देखने को मिलते हैं, बहुत से डॉगी चश्मा पहने बैठे दिखाई देते हैं और उनका स्वामी संगीत का साज़ बजाते हुए उन दोनो के लिए कमाई कर रहा होता है।

इसी बाज़ार के पास राष्ट्रीय संग्रहालय है, जिसमें अत्यधिक आकर्षक वस्तुओं का संग्रह है। इसके पास ही ‘बॉबी’ नाम के एक कुत्ते की मूर्ति बनी है, जिसके बारे में कहा जाता है कि वह अपने मालिक की मृत्यु के बाद, अपनी मृत्यु तक उसकी कब्र पर ही बैठा रहता था। इस कुत्ते को देखने के लिए बहुत लोग आते थे, अब उसकी मूर्ति को देखने आते हैं।

इस प्रकार तीन दिन की इस यात्रा में अनेक दर्शनीय स्थानों और प्रकृति की अनूठी छवियों को देखने, उसे यथासंभव अपने कैमरों में कैद करने के बाद हम लोग वापसी की लगभग 9 घंटे लंबी यात्रा पर रवाना हुए और रास्ते में कुछ स्थानों पर चाय-पानी के रुकते हुए हम वापस चले, और रात को 12 बजे के बाद हम वापस लंदन पहुंचे।

जैसे कि हर अनुभव करता है, इस यात्रा ने भी हम लोगों को भीतर से समृद्ध किया।
नमस्कार।