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237. ब्लॉग पर चर्चा!

अपनी ब्लॉग पोस्ट में, आज ब्लॉग लेखन के बारे में ही चर्चा करना चाहूंगा। जैसा कि ब्लॉग पोस्ट पर दिए गए नंबर से पता चलता है, ये मेरी 237 वीं पोस्ट है। बीच-बीच में मैं पुरानी पोस्ट दोहराता भी रहता हूँ, क्योंकि शुरु में मेरी पोस्ट को पढ़ने वाले भी अधिक नहीं थे। लेकिन यह 237 वीं नई पोस्ट है।

मैं जब युवा था, तब कविताएं, गीत लिखा करता था। समय के साथ वो सब छूट गया। आज मुझे कविता लिखने और फिर उसे छपवाने में अधिक संभावनाएं भी नजर नहीं आतीं, और वह काम अब ज्यादा सहज भी नहीं लगता अपने लिए। लंबे समय के बाद मैंने पाया कि आजकल स्वयं को अभिव्यक्त करने का, दूसरे लोगों तक पहुंचने का बहुत अच्छा साधन है ब्लॉग-लेखन! यही सोचकर शायद 14-15 महीने पहले मैंने ब्लॉग लिखना शुरू किया।

मुझे ‘मेरा नाम जोकर’ का एक दृश्य याद आ रहा है। जोकर ‘राजू’ ने किसी तरह सर्कस में ‘जोकर’ की नौकरी पा ली थी, जो काम करते हुए उसके पिता का स्वर्गवास ऊपर से गिरकर हो गया था, और दर्शक इसे भी एक करतब मानकर ताली बजा रहे थे! इसी कारण उसने अपनी बीमार मां को यह नहीं बताया था कि वह क्या काम करता है।

किसी तरह मां को यह संकेत मिलता है और वह सर्कस में पहुंच जाती है, तब मां को देखकर ‘राजू’ बोलता है- ‘मैं क्या करता मां, मेरी रगों में मेरे पिता का खून दौड़ रहा था, मैं जाता तो कहाँ जाता, मुझे यहीं आना पड़ा, और इस बार राजू को गिरता देखकर उसकी मां स्वर्ग सिधार जाती है!

ये सब कहने का आशय यही कि कविता लिखना तो छोड़ दिया, लेकिन जब ब्लॉग के माध्यम से खुद को अभिव्यक्त करने का मौका आया तो यही आसान लगा कि कविता, फिल्मी गीत आदि को मुख्यतः अपनी विषय वस्तु बनाया जाए। गीत-संगीत भी मुझे अत्यंत प्रिय हैं और राज कपूर, मुकेश, गुलाम अली, जगजीत सिंह आदि मुझे अत्यंत प्रिय हैं। कवियों का नाम लूंगा तो बहुत लंबी सूची हो जाएगी, ये मेरा सौभाग्य है कि बहुत से कवियों से, एक आयोजक की भूमिका अपनाने के कारण निकट मित्रता भी हो गई थी!

हाँ तो मुख्यतः मैं कविता, गज़ल, गीत-संगीत, फिल्मों आदि को लेकर ब्लॉग लिखता रहा। पिछले दिनों मैं एक माह तक लंदन में रहा और वहाँ जो ब्लॉग लिखे, उनमें से अधिकतर ‘यात्रा’ ब्लॉग की श्रेणी में आते थे जिनको लोगों ने अधिक पसंद किया और शायद उनके आधार पर ही मुझे एक इंडस्ट्रियल विज़िट के लिए भी आमंत्रित किया गया।

इंडस्ट्रियल विज़िट का यह अनुभव बहुत अच्छा रहा और इसमें पहली बार कुछ ब्लॉगर साथियों से भी मिलने का अवसर मिला और यह भी मालूम हुआ कि ब्लॉग लेखन में कमाई की भी बहुत संभावनाएं हैं। लेकिन जो विषय कमाई वाले हो सकते हैं उनमें तो मेरी रुचि और प्रवृत्ति ही नहीं है, जैसे ‘मनी मैनेजमेंट’ एक अच्छा विषय है, लेकिन मैं तो ‘निदा फाज़ली’ साहब का फॉलोवर हूँ-

दो और दो का मेल हमेशा, चार कहाँ होता है,
सोच समझ वालों को थोड़ी नादानी दे मौला!

तो धन के मैनेजमेंट के बारे में तो मैं एकदम फेल हूँ, इसके बाद आता है होटलों और रेस्त्रां का रिव्यू करना, होटलों में सुविधाओं के बारे में, मेज़बानी के बारे में तो कोशिश कर सकता हूँ, लेकिन भोजन तो मुझे हमेशा अच्छा ही लगता है, हाँ घर पर ज्यादा अच्छा लगता है और बाहर का खाना थोड़ा भारी लगता है!

एक क्षेत्र है ट्रैवल यानी यात्रा का, यात्रा का शौक तो मुझे शुरू से रहा है, इस विषय पर लिखा पहली बार, लंदन प्रवास के दौरान! अब कोशिश करूंगा कि आगे कुछ लिखूं और शायद शुरुआत के लिए अपनी कुछ पुरानी यात्राओं को भी ‘कवर’ कर सकता हूँ, क्योंकि-

घर पहुंचकर भी न होतीं खत्म यात्राएं,
गूंजती हैं सीटियां अब हम कहाँ जाएं।

मन में बस यही आता है कि कोई अच्छा स्पांसर मिल जाए तो यात्रा करता रहूं और लिखता रहूं।

अंत में स्व. रामावतार त्यागी जी के एक गीत की कुछ पंक्तियां याद आ रही हैं-

गमलों में सजते यूं घबराता हूँ,
तुम सुंदरता के नाम तराशोगे,
जब घावों को सहलाता देखोगे,
तब भी तुम आते-जाते खांसोगे,
मैं हूँ सरसों का फूल, मगर मेरा यह धर्म नहीं,
शहरी उद्यानों का दिग्गज बनना| 

मैं कवि हूँ मेरे बस की बात नहीं,
हर कालजयी कुल का वंशज बनना!

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।


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103. किसी का प्यार क्या तू, बेरुखी को तरसे!

आज फिर से प्रस्तुत है, एक और पुरानी ब्लॉग पोस्ट-

आज धर्मेंद्र जी के बारे में बात करने का मन हो रहा है। वैसे कोई किसी का नाम ‘धर्मेंद्र’ बताए तो दूसरा पूछता इसके आगे क्या है, शर्मा, गुप्ता, वर्मा, क्या? मगर अभिनेता धर्मेंद्र के लिए इतना नाम ही पर्याप्त है।वैसे उनके बेटों के नाम के साथ जुड़ता है- देओल, लेकिन धर्मेंद्र अपने आप में संपूर्ण हैं। बेशक एक सरल, महान और मेहनती कलाकार हैं।

सफल फिल्मों की एक लंबी फेहरिस्त है उनके नाम। भारतीय रजत पट की ‘स्वप्न सुंदरी’ कही जाने वाली हेमा जी से विवाह किया उन्होंने, अपनी पारंपरिक पत्नी के अलावा, जो सनी और बॉबी देओल की मां हैं।

शुरू में जब धर्मेंद्र फिल्मों में आए थे, तब वे ‘ही मैन’ के रूप में जाने जाते थे, मेहनती कलाकार शुरू से हैं, धीरे-धीरे उनकी कला निखरती गई और उनकी एक से एक अत्यंत सफल फिल्में पर्दे पर आईं। धर्मेंद्र जी की कुछ प्रमुख फिल्में हैं- बंदिनी, सत्यकाम, काजल, शोले, आए दिन बहार के, फूल और पत्थर, अनुपमा, चंदन का पलना, मेरे हमदम मेरे दोस्त, आया सावन झूम के, मेरा नाम जोकर, शराफत, गुड्डी, मेर गांव मेरा देश, राजा जानी, सीता और गीता, यादों की बारात, चुपके चुपके आदि आदि।

फिल्म सत्यकाम में उनका अभिनय बहुत जोरदार था, इसी प्रकार शोले, मेरा नाम जोकर में, कुछ फिल्मों में उन्होंने जोरदार कॉमेडी भी की है जिनमें अमिताभ के साथ उनकी फिल्म ‘चुपके चुपके’ भी शामिल है।

आज अचानक धर्मेंद्र जी का खयाल क्यों आया यह बता दूं। आजकल एक विज्ञापन आता है किसी प्रोडक्ट का, जिसमें धर्मेंद्र जी आते हैं, वे कहते हैं- ‘मेरी तरह फिट रहना है, तो —— का इस्तेमाल करें।

सचमुच समय बहुत बलवान है, धर्मेंद्र जी जो वास्तव में मर्दानगी की, जवानी की एक मिसाल हुआ करते थे, इस विज्ञापन में, बुढ़ापे की पहचान बने दिखाई देते हैं, और जिस अंदाज़ में वे इस विज्ञापन में दिखाई देते हैं, उसको देखकर थोड़ा झटका लगता है।

उनकी फिल्म सत्यकाम के एक गीत की कुछ पंक्तियां याद आ रही हैं, जो इस तरह हैं-

आदमी है बंदर.. रोटी उठा के भागे
कपड़े चुरा के भागे, कहलाये वो सिकंदर
बंदर, आदमी है बंदर..
आदमी है चरखा.. छू छू हमेशा बोले
चूं चूं हमेशा डोले, रुकते कभी ना देखा..
आदमी है चरखा..
बंदर नहीं है, चरखा नहीं है, आदमी का क्या कहना
प्यार मोहबत फितरत उसकी दोस्ती मज़हब उसका
दोस्ती है क्या बोलो दोस्ती है क्या
दोस्ती है लस्सी—-
दोस्ती है रस्सी—–
———————
लस्सी नहीं है, रस्सी नहीं है
दोस्ती दिल की धड़कंन,
दुश्मनी है सहरा सहरा तो
दोस्ती गुलशन-गुलशन।

एक और गीत, जो धर्मेंद्र जी के नाम से याद आता है, वो है-

मेरे दुश्मन तू मेरी दोस्ती को तरसे
मुझे गम देने वाली, तू खुशी को तरसे।

तू फूल बने पतझड़ का, तुझ पे बहार न आए कभी,
मेरी ही तरह तू तरसे, तुझको क़रार न आए कभी।
जिये तू इस तरह कि, ज़िंदगी को तरसे।

तेरे गुलशन से ज्यादा, वीरान कोई वीराना न हो,
इस दुनिया में कोई तेरा, अपना तो क्या बेगाना न हो,
किसी का प्यार क्या तू, बेरुखी को तरसे!

खैर इस विज्ञापन के बहाने ही, इस महान कलाकार और सरल हृदय इंसान की याद आई, मैं उनके स्वस्थ और दीर्घ जीवन की कामना करता हूँ।

नमस्कार।


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236. चार किताबें पढ़कर ये भी, हम जैसे हो जाएंगे!

निदा फाज़ली साहब की एक गज़ल है-

तन्हा तन्हा दुख झेलेंगे महफ़िल महफ़िल गाएँगे
जब तक आँसू पास रहेंगे तब तक गीत सुनाएँगे।

यह गज़ल पहले भी शायद मैंने शेयर की है, आज इस गज़ल का एक शेर खास तौर पर याद आ रहा था-

बच्चों के छोटे हाथों को, चांद सितारे छूने दो,
चार किताबें पढकर ये भी, हम जैसे हो जाएंगे।

ऐसे ही खयाल आया कि आखिर कैसे हो जाते हैं, या हो गए हैं हम चार किताबें पढ़ने के बाद, पढ़-लिख लेने के बाद!

इस पर धर्मवीर भारती जी के गीत की पंक्तियां याद आती हैं-

सूनी सड़कों पर ये आवारा पांव,
माथे पर टूटे नक्षत्रों की छांव,
कब तक, आखिर कब तक!

चिंतित पेशानी पर अस्त-व्यस्त बाल,
पूरब-पश्चिम-उत्तर-दक्षिण भूचाल,
कब तक आखिर कब तक!

और फिर लगे हाथ भारत भूषण जी के गीत की पंक्तियां याद आ रही हैं, जो शायद पहले भी शेयर की होंगी, लेकिन फिर उनको शेयर करने का मन हो रहा है-

चक्की पर गेंहू लिए खड़ा, मैं सोच रहा उखड़ा-उखड़ा,
क्यों दो पाटों वाली चाकी, बाबा कबीर को रुला गई।

कंधे पर चढ़ अगली पीढ़ी, ज़िद करती है गुब्बारों की,
यत्नों से कई गुना ऊंची, डाली है लाल अनारों की,
हर भोर किरन पल भर बहला, काले कंबल में सुला गई।

लेखनी मिली थी गीतव्रता, प्रार्थना-पत्र लिखते बीती,
जर्जर उदासियों के कपड़े, थक गई हंसी सींती-सींती,
खंडित भी जाना पड़ा वहाँ, ज़िंदगी जहाँ भी बुला गई।

गीतों की जन्म-कुंडली में, संभावित थी यह अनहोनी,
मोमिया मूर्ति को पैदल ही, मरुथल की दोपहरी ढोनी,
खंडित भी जाना पड़ा वहाँ, ज़िंदगी जहाँ भी बुला गई!

बड़ा होने के बाद क्या-क्या झेलना पड़ता है इंसान को, और बच्चा कहता है मुझे तो ये चाहिए बस! और परिस्थिति जो भी हो, उसको वह वस्तु अक्सर मिल जाती है!

ये भी कहा जाता है कि जो आप पूरे मन से चाहोगे, वह आपको मिल जाएगा। उस परम पिता परमात्मा के सामने हम भी तो बच्चे ही हैं, और हाँ हमारा वह परम पिता, हमारी तरह मज़बूर भी नहीं है, अगर हमको पूरे मन से ऐसा मानना मंज़ूर हो!

खैर ज्यादा बड़ी बातें नहीं करूंगा, अंत में रमेश रंजक जी की ये पंक्तियां-

फैली है दूर तक परेशानी,
तिनके सा तिरता हूँ तो क्या है,
तुमसे नाराज़ तो नहीं हूँ मैं!

मैं दूंगा भाग्य की लकीरों को,
रोशनी सवेरे की,
देखूंगा कितने दिन चलती है,
दुश्मनी अंधेरे की,

मकड़ी के जाले सी पेशानी,
साथ लिए फिरता हूँ तो क्या है,
टूटी आवाज़ तो नहीं हूँ मैं!

आखिर में यही दुआ है कि उम्र बढ़ते जाने के बावज़ूद, हमारे भीतर एक बच्चे जैसी आस्था, विश्वास और थोड़ी ज़िद भी बनी रहे!

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।


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102. फिर ख़्वाब अगर हो जाओ तो क्या!

आज फिर से प्रस्तुत है, एक और पुरानी ब्लॉग पोस्ट-

एक गज़ल है उबेदुल्लाह अलीम जी की, गुलाम अली जी ने डूबकर गाई है जो बहुत बार सुनी है, बहुत अच्छी लगती है। कुल मिलाकर धार्मिक अंदाज़ में, इसको भी जीवन की नश्वरता से जोड़ा जा सकता है, लेकिन यह कि इस ज़िंदगी को, जो वैसे भी अकेलेपन में, नीरस तरीके से गुज़र ही जानी है, अगर हम एक-दूसरे से प्रेम करें, साथ दें, तो जहाँ तक हो सके, इसे मधुर और रंगीन बना सकते हैं।

आज बस ये गज़ल शेयर कर रहा हूँ-

कुछ दिन तो बसो मेरी आँखों में
फिर ख़्वाब अगर हो जाओ तो क्या।

कोई रंग तो दो मेरे चेहरे को
फिर ज़ख़्म अगर महकाओ तो क्या।

जब हम ही न महके फिर साहब
तुम बाद-ए-सबा कहलाओ तो क्या ।

इक आइना था सो टूट गया
अब ख़ुद से अगर शरमाओ तो क्या ।

तुम आस बंधाने वाले थे
अब तुम भी हमें ठुकराओ तो क्या ।

दुनिया भी वही और तुम भी वही
फिर तुम से आस लगाओ तो क्या ।

मैं तन्हा था मैं तन्हा हूँ
तुम आओ तो क्या न आओ तो क्या ।

जब देखने वाला कोई नहीं
बुझ जाओ तो क्या गहनाओ तो क्या ।

अब वहम है ये दुनिया इस में
कुछ खोओ तो क्या और पाओ तो क्या।

है यूँ भी ज़ियाँ और यूँ भी ज़ियाँ
जी जाओ तो क्या मर जाओ तो क्या ।

नमस्कार।


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235. जिन्हें नाज़ है हिंद पर वो कहाँ हैं!

आज हम वर्ष 2018 में जी रहे हैं, सुना है हिंदुस्तान दुनिया की बड़ी ताक़त बन गया, आर्थिक शक्तिसंपन्न देशों में भारत की गिनती होने लगी है। कितने पैमाने होते हैं किसी देश की तरक्की को मापने, उन सबका उदाहरण देते हुए बताया जाता है कि भारतवर्ष कितना आगे बढ़ गया है!

एक बहुत पुराना पैमाना है, गोस्वामी तुलसीदास जी का बताया हुआ-

जासु राज सुन प्रजा दुखारी, सो नृप अवस नरक अधिकारी

और हम रामराज्य की कल्पना करते हैं, एक गाय को मारने अथवा ऐसा प्रयास करने में हमारे यहाँ लोग, कुछ इंसानों को मारने में भी संकोच नहीं करते।

रामराज्य के बारे में एक और उद्धरण गोस्वामी जी का याद आता है-

दैहिक, दैविक, भौतिक तापा
रामराज्य नहीं काहुई व्यापा।

मैं दलगत राजनीति की बात नहीं करना चाहता, सीधे बात करना चाहूंगा- देश की राजधानी दिल्ली में, तीन बच्चे भूख से मर गए। ये किसी भी समाज के लिए डूब मरने की बात है।

दिल्ली में- नगर की, केंद्र शासित क्षेत्र की और केंद्र की, दोनो सरकारें हैं। लेकिन मैं इस घटना को किसी पार्टी अथवा सरकार से नहीं जोड़ना चाहता। सबसे पहली बात तो यह है कि हमारे समाज में, आस-पड़ौस के लोगों को यह जानकारी होनी चाहिए कि उनके आस पास किसी परिवार में ऐसी स्थिति है कि बच्चों के भूख से मरने की नौबत आ रही है।

यह तीन बच्चों की नहीं, ये इंसानियत की मौत है, बेशक हमारी सरकारों को भी ऐसा तंत्र विकसित करना चाहिए कि कहीं ऐसी नौबत आने वाली है तो उसको पहचाना जाए और जरूरी कदम उठाए जाएं। और हाँ आस-पड़ौस के लोगों को भी सहायता के लिए तत्पर रहना चाहिए।

आज गुरुदत्त जी की फिल्म का एक गीत याद आ रहा है, जिसे यहाँ शेयर कर रहा हूँ। फिल्म प्यासा के इस गीत को साहिर लुधियानवी जी ने लिखा है और एस.डी.बर्मन जी के संगीत निर्देशन में मोहम्मद रफी साहब ने गाया है। प्रस्तुत है ये गीत-

ये कूचे, ये नीलामघर दिलकशी के
ये लुटते हुए कारवां जिंदगी के
कहाँ है, कहाँ है मुहाफ़िज़ खुदी के
जिन्हें नाज़ है हिंद पे वो कहाँ हैं
कहाँ है, कहाँ है, कहाँ है …

ये पुरपेच गलियां, ये बदनाम बाज़ार
ये गुमनाम राही, ये सिक्कों की झंकार
ये इस्मत के सौदे, ये सौदे पे तकरार
जिन्हें नाज़ है हिंद पे वो कहाँ हैं
कहाँ है, कहाँ है, कहाँ है …

ये सदियों से बेखौफ़ सहमी सी गलियां
ये मसली हुई अधखिली ज़र्द कलियां
ये बिकती हुई खोखली रंगरलियाँ
जिन्हें नाज़ है हिंद पे वो कहाँ हैं
कहाँ है, कहाँ है, कहाँ है …

वो उजले दरीचों में पायल की छन-छन
थकी हारी सांसों पे तबले की धन-धन
ये बेरूह कमरो में खांसी की ठन-ठन
जिन्हें नाज़ है हिंद पे वो कहाँ हैं
कहाँ है, कहाँ है, कहाँ है …

ये फूलों के गजरे, ये पीकों के छींटे
ये बेबाक नज़रें, ये गुस्ताख फ़िक़रे
ये ढलके बदन और ये बीमार चेहरे
जिन्हें नाज़ है हिंद पे वो कहाँ हैं
कहाँ है, कहाँ है, कहाँ है …

यहाँ पीर भी आ चुके हैं, जवां भी
तनूमन्द बेटे, अब्बा मियां भी
ये बीवी भी है और बहन भी, माँ भी
जिन्हें नाज़ है हिंद पे वो कहाँ हैं
कहाँ है, कहाँ है, कहाँ है …

मदद चाहती है ये हव्वा की बेटी
यशोदा की हम्जिन्स, राधा की बेटी
पयम्बर की उम्मत , जुलेखां की बेटी
जिन्हें नाज़ है हिंद पे वो कहाँ हैं
कहाँ है, कहाँ है, कहाँ है …

ज़रा इस मुल्क के रहबरों को बुलाओ
ये कूचे ये गलियां ये मंज़र दिखाओ
जिन्हें नाज़ है हिन्द पर उनको लाओ
जिन्हें नाज़ है हिंद पे वो कहाँ हैं
कहाँ है, कहाँ है, कहाँ है …

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।


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234. हुई शाम उनका ख़याल आ गया!

हमारी प्राचीन परंपराओं में ऐसा माना जाता रहा है कि सुबह, शाम, रात हर समय का, हर घड़ी का अपना महत्व है, हम हर क्षण का, हर घड़ी का आनंद लेने में, हर अवसर को सेलीब्रेट करने में विश्वास रखते हैं। हमारे यहाँ सुबह के समय जैसे प्रभाती गाई जाती थी, हर घड़ी के अलग-अलग राग होते थे, जिनको समय के अनुसार गाया जाता था। हम ऐसा मानते रहे हैं कि हर क्षण को पूरे मन के साथ, आनंद से व्यतीत करना चाहिए।

इस बात का इसलिए ध्यान आया कि आज के जीवन में तो लगता है कि हर क्षण, हर घड़ी उदास होने के लिए, दुखी होने के लिए है। एक गीत याद आ रहा है, यद्यपि यह गीत एक प्रेमी की स्थिति को दर्शाता है, जो प्रेम में टूट चुका है।

ज्यादा भूमिका नहीं बांधूंगा, फिल्म- ‘मेरे हमदम, मेरे दोस्त’ के लिए यह गीत धर्मेंद्र जी पर फिल्माया गाया है, मजरूह सुल्तानपुरी जी के लिखे गीत को लक्ष्मीकांत प्यारेलाल के संगीत निर्देशन में मोहम्मद रफी साहब ने बड़ी खूबसूरती के साथ गाया है।

कुल मिलाकर इतना है कि शाम हुई है और नायक अपने असफल प्यार को शराब के साथ सेलीब्रेट कर रहा है। खैर इस तरह दुख में अपने आप को शराब में डुबोना भी आज के जीवन की सच्चाई है और हमारा काम उपदेशक बनने का नहीं बल्कि आज के जीवन की इस सच्चाई को चित्रित करने वाले इस गीत का आनंद लेने का है। लीजिए प्रस्तुत है ये खूबसूरत गीत-

हुई शाम उनका ख़याल आ गया
वही ज़िंदगी का सवाल आ गया।

अभी तक तो होंठों पे था
तबस्सुम का एक सिलसिला
बहुत शादमाँ थे हम उनको भुलाकर
अचानक ये क्या हो गया,
कि चहरे पे रंग-ए-मलाल आ गया।
हुई शाम उनका ख़याल आ गया॥

हमें तो यही था ग़ुरूर
ग़म-ए-यार है हमसे दूर
वही ग़म जिसे हमने किस-किस जतन से
निकाला था इस दिल से दूर
वो चलकर क़यामत की चाल आ गया।
हुई शाम उनका ख़याल आ गया॥

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।


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101. आईना हमें देख के हैरान सा क्यों है!

आज फिर से प्रस्तुत है, एक और पुरानी ब्लॉग पोस्ट –

एक हिंदी फिल्म आई थी गमन, जिसमें ‘शहरयार’ की एक गज़ल का बहुत खूबसूरत इस्तेमाल किया गया था। वैसे यह गज़ल, आजकल की भागदौड़ भरी ज़िंदगी की घुटन, कुंठाओं आदि का बहुत सुंदर चित्रण करती है। इंसान को भीतर ही भीतर मारने वाली ऐसी परेशानियां, शहर जिनका प्रतीक बन गया है! शहर जहाँ हर कोई दौड़ रहा है, एक अंधी दौड़ में, बहुत सी बार यह भी नहीं पता होता कि कहाँ पहुंचना है, कहाँ जाकर रुकना है।

अब उस गज़ल को ही शेयर कर लेता हूँ, फिर आगे बात करेंगे-

सीने में जलन, आंखों में तूफान सा क्यों है,
इस शहर में हर शख्स परेशान सा क्यों है।

दिल है तो धड़कने का बहाना कोई ढ़ूंढें,
पत्थर की तरह बेहिस-ओ-बेजान सा क्यों है।

तनहाई की ये कौन सी मंज़िल है रफीकों,
ता-हद-ए नज़र एक बियाबान सा क्यों है।

क्या कोई नई बात नज़र आती है हम में,
आईना हमें देख के हैरान सा क्यों है।

ये सब नेमतें हैं, आज के आधुनिक जीवन की, शहरी जीवन की, जिसमें हम लगातार एक दौड़ में शामिल हैं, भीड़ के बीच में हर व्यक्ति अकेला है। किसी के शेर हैं न-

ज़िंदगी की राहों में, रंज़-ओ-गम के मेले हैं,
भीड़ है क़यामत की, फिर भी हम अकेले हैं।

आइने के सौ टुकड़े करके हमने देखा है,
एक में भी तनहा थे, सौ में भी अकेले हैं।

ये हालात हैं, ये सच्चाइयां आज की ज़िंदगी की, ऐसे में कोई सहारा पाने के लिए, कोई सार्थकता तलाश करने के लिए, कितनी भारी संख्या में लोग बाबाओं के पीछे लग जाते हैं, वे इतने लीन हो जाते हैं अपने इस नए अवतार में, कि अगर आपको रेल या बस में मिल जाएं, तो उनका प्रयास रहता है कि लगे हाथ आपका भी कल्याण कर दिया जाए। वो आपको ऐसी ज्ञानवर्द्धक कहानियां सुनाने लगते हैं, कि उसके बाद भी यदि आपका उद्धार न हो, तो समझिए कि आपके पापों का बोझ ही शायद बहुत अधिक है, जो उनकी संगत में आने पर भी आपको सुधरने नहीं दे रहा है।

कुछ लोग राजनैतिक झंडा उठा लेते हैं, उनको लगता है कि उनका नेता ही इस देश में क्रांति लेकर आएगा। किसी का एक नेता में अपरंपार प्रेम होता है तो किसी के मन में किसी एक के प्रति असीम नफरत है।

कुछ लोग अपने जीवन को सार्थक बनाने के लिए धर्म की रक्षा में लग जाते हैं और वे जानते हैं कि धर्म की रक्षा के रास्ते में इंसानों की औकात क्या है, उनको तो एक इशारे पर मिटाया जा सकता है।

दिक्कत यही है कि जो लोग इन सन्मार्गों पर नहीं भटके हैं, वे परेशान रहते हैं, उनको अपने जीवन में कोई सार्थक(?) उद्देश्य नहीं मिल पाता।
मेरी संवेदना और सहानुभूति सदैव उस अकेले व्यक्ति के साथ हैं-

हजारों मील लंबे रास्ते तुझको बुलाते,
यहाँ दुखड़े सहने के वास्ते तुझको बुलाते,
है कौन सा वो इंसान यहाँ पर, जिसने दुःख न झेला।

नमस्कार।


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233. ये कहानी फिर सही!

ज़िंदगी में अक्सर होता है कि जहाँ प्रेम होता है हम छोटी-छोटी बातों पर शिकायत करते हैं, तब तक, जब तक हमको लगता है कि हमारी शिकायत को कोई असर होगा, उसका कोई अच्छा नतीजा निकलेगा! लेकिन ऐसी स्थिति भी आती है कभी कि इंसान सोचता है कि शिकायत करने का क्या फायदा है।

कभी ऐसा खयाल आता है कि बाहर की घटनाओं पर तो दुनिया लिखती ही रहती है, भीतर- मन में घटने और घुटने वाली घटनाओं के बारे में लिखा जाना चाहिए। जैसे कवि रमेश रंजक जी ने लिखा था-

ये शिकन, टूटन, थकन संसार,
लिख नहीं पाता जिसे अखबार,
आज तक प्राचीन का प्राचीन!

खैर, जब हम मन के भीतर की घटनाओं के बारे में बात करते हैं तो हम देखते हैं कि कविता-शायरी में ज्यादातर यही तो होता है!

हाँ तो जहाँ से बात शुरू की थी, वहीं चलते हैं, जब इंसान को लगता है कि कुछ मन को जो चोट लगी है, जो कुछ अपने भीतर घटित हो चुका है, जो दुख मिले हैं किसी के कारण और हम उसका नाम भी नहीं ले सकते, इसी भावभूमि परपर एक गज़ल है, ज़नाब मसरूर अनवर जी की लिखी हुई, जिसे गुलाम अली जी ने गाया है और यह काफी प्रसिद्ध भी हुई है, आज वही शेयर करने का मन हो रहा है। गज़ल अपनी बात स्वयं बहुत सुंदर ढंग से कहती है। गज़ल से पहले गुलाम अली जी ने जोश मलीहाबादी जी के लिखे दो शेर अलग से भी पढ़े हैं, गज़ल के साथ वे दो शेर भी शेयर कर रहा हूँ-

दिल की चोटों ने कभी, चैन से रहने न दिया,
जब चली सर्द हवा, मैंने तुझे याद किया।

इसका रोना नहीं क्यों तूने किया दिल बर्बाद,
इसका गम है कि बहुत देर में बर्बाद किया।

और अब वो गज़ल-

हम को किस के ग़म ने मारा ये कहानी फिर सही
किसने तोड़ा दिल हमारा ये कहानी फिर सही ।

दिल के लुटने का सबब पूछो न सब के सामने
नाम आएगा तुम्हारा ये कहानी फिर सही।

नफ़रतों के तीर खा कर दोस्तों के शहर में
हमने किस किस को पुकारा ये कहानी फिर सही।

क्या बताएँ प्यार की बाज़ी वफ़ा की राह में
कौन जीता कौन हारा ये कहानी फिर सही।

अब जीत- हार को छोड़िए, आज के लिए इतना ही
नमस्कार।


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232. लंदन प्रवास की कुछ यादें- चित्रों की ज़ुबानी!

Some memories of London, Scotland visit-

 

https://photos.app.goo.gl/oXfoSqGtPGjz

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99. जार्जेट के पल्ले सी, दोपहर नवंबर की!

आज फिर से प्रस्तुत है, एक और पुरानी ब्लॉग पोस्ट-

बहुत बार लोग कविता लिखते हैं मौसम पर, कुछ कविताएं बहुत अच्छी भी लिखी जाती हैं। तुलसीदास जी ने, जब रामचंद्र जी, माता सीता की खोज में लगे थे, उस समय ऋतुओं के बदलने का बहुत सुंदर वर्णन किया है। पूरा मनोविज्ञान भरा है उस भाग में, जहाँ वे वर्षा में छोटे नदी-नालों के उफन जाने का वर्णन करते हैं- ‘थोरे में जनु खल इतराहीं’ और वर्षा के बाद ‘वर्षा गई शरद ऋतु आई। वह सब हमारी धरोहर है।

जैसा मैंने कहा, मौसम पर तो बहुत सी कविताएं लिखी गई हैं, डॉ. धर्मवीर भारती की एक कविता है, जो मौसम की कह सकते हैं, परंतु इसमें मौसम को एक महीने के बहाने से व्यक्त किया गया है।  वैसे यह मौसम भी भीतर का है। नवंबर का महीना, जब दोपहर की धूप अच्छी लगने लगती है, हिंदुस्तान में, खासकर उन इलाकों में, जहाँ गर्मी बहुत पड़ती है।

यह अलग तरह की कविता है, जैसे कोई कविता किसी एक भाव से भरपूर होती है, ये मांसलता से भरपूर है, वैसे वह भी कविता का एक भाग है।

आज यही कविता शेयर करने का मन है, लीजिए प्रस्तुत है-

अपने हलके-फुलके उड़ते स्पर्शों से मुझको छू जाती है
जार्जेट के पीले पल्ले-सी यह दोपहर नवम्बर की !

आयी गयी ऋतुएँ पर वर्षों से ऐसी दोपहर नहीं आयी
जो क्वाँरेपन के कच्चे छल्ले-सी
इस मन की उँगली पर
कस जाये और फिर कसी ही रहे
नित प्रति बसी ही रहे, आँखों, बातों में, गीतों में
आलिंगन में घायल फूलों की माला-सी
वक्षों के बीच कसमसी ही रहे
भीगे केशों में उलझे होंगे थके पंख
सोने के हंसों-सी धूप यह नवम्बर की
उस आँगन में भी उतरी होगी
सीपी के ढालों पर केसर की लहरों-सी
गोरे कंधों पर फिसली होगी बन आहट
गदराहट बन-बन ढली होगी अंगों में
आज इस वेला में
दर्द ने मुझको
और दोपहर ने तुमको
तनिक और भी पका दिया
शायद यही तिल-तिल कर पकना रह जायेगा
साँझ हुए हंसों-सी दोपहर पाँखें फैला
नीले कोहरे की झीलों में उड़ जायेगी
यह है अनजान दूर गाँवों से आयी हुई
रेल के किनारे की पगडण्डी
कुछ क्षण संग दौड़-दौड़
अकस्मात् नीले खेतों में मुड़ जायेगी।

एक अलग तरह की कविता है, जिसमें भीतर के और बाहर के मौसम को, एक महीने ‘नवंबर की दोपहर’ के बहाने व्यक्त किया गया है। अब इसके बारे में अलग से तो कुछ कहने की ज़रूरत नहीं है। कविता जितना बोलती है उतना मैं कहाँ बोल पाऊंगा।

नमस्कार।
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