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101. आईना हमें देख के हैरान सा क्यों है!

आज फिर से प्रस्तुत है, एक और पुरानी ब्लॉग पोस्ट –

एक हिंदी फिल्म आई थी गमन, जिसमें ‘शहरयार’ की एक गज़ल का बहुत खूबसूरत इस्तेमाल किया गया था। वैसे यह गज़ल, आजकल की भागदौड़ भरी ज़िंदगी की घुटन, कुंठाओं आदि का बहुत सुंदर चित्रण करती है। इंसान को भीतर ही भीतर मारने वाली ऐसी परेशानियां, शहर जिनका प्रतीक बन गया है! शहर जहाँ हर कोई दौड़ रहा है, एक अंधी दौड़ में, बहुत सी बार यह भी नहीं पता होता कि कहाँ पहुंचना है, कहाँ जाकर रुकना है।

अब उस गज़ल को ही शेयर कर लेता हूँ, फिर आगे बात करेंगे-

सीने में जलन, आंखों में तूफान सा क्यों है,
इस शहर में हर शख्स परेशान सा क्यों है।

दिल है तो धड़कने का बहाना कोई ढ़ूंढें,
पत्थर की तरह बेहिस-ओ-बेजान सा क्यों है।

तनहाई की ये कौन सी मंज़िल है रफीकों,
ता-हद-ए नज़र एक बियाबान सा क्यों है।

क्या कोई नई बात नज़र आती है हम में,
आईना हमें देख के हैरान सा क्यों है।

ये सब नेमतें हैं, आज के आधुनिक जीवन की, शहरी जीवन की, जिसमें हम लगातार एक दौड़ में शामिल हैं, भीड़ के बीच में हर व्यक्ति अकेला है। किसी के शेर हैं न-

ज़िंदगी की राहों में, रंज़-ओ-गम के मेले हैं,
भीड़ है क़यामत की, फिर भी हम अकेले हैं।

आइने के सौ टुकड़े करके हमने देखा है,
एक में भी तनहा थे, सौ में भी अकेले हैं।

ये हालात हैं, ये सच्चाइयां आज की ज़िंदगी की, ऐसे में कोई सहारा पाने के लिए, कोई सार्थकता तलाश करने के लिए, कितनी भारी संख्या में लोग बाबाओं के पीछे लग जाते हैं, वे इतने लीन हो जाते हैं अपने इस नए अवतार में, कि अगर आपको रेल या बस में मिल जाएं, तो उनका प्रयास रहता है कि लगे हाथ आपका भी कल्याण कर दिया जाए। वो आपको ऐसी ज्ञानवर्द्धक कहानियां सुनाने लगते हैं, कि उसके बाद भी यदि आपका उद्धार न हो, तो समझिए कि आपके पापों का बोझ ही शायद बहुत अधिक है, जो उनकी संगत में आने पर भी आपको सुधरने नहीं दे रहा है।

कुछ लोग राजनैतिक झंडा उठा लेते हैं, उनको लगता है कि उनका नेता ही इस देश में क्रांति लेकर आएगा। किसी का एक नेता में अपरंपार प्रेम होता है तो किसी के मन में किसी एक के प्रति असीम नफरत है।

कुछ लोग अपने जीवन को सार्थक बनाने के लिए धर्म की रक्षा में लग जाते हैं और वे जानते हैं कि धर्म की रक्षा के रास्ते में इंसानों की औकात क्या है, उनको तो एक इशारे पर मिटाया जा सकता है।

दिक्कत यही है कि जो लोग इन सन्मार्गों पर नहीं भटके हैं, वे परेशान रहते हैं, उनको अपने जीवन में कोई सार्थक(?) उद्देश्य नहीं मिल पाता।
मेरी संवेदना और सहानुभूति सदैव उस अकेले व्यक्ति के साथ हैं-

हजारों मील लंबे रास्ते तुझको बुलाते,
यहाँ दुखड़े सहने के वास्ते तुझको बुलाते,
है कौन सा वो इंसान यहाँ पर, जिसने दुःख न झेला।

नमस्कार।


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