Categories
Uncategorized

258. Keep Drinking O Jovial Guy!

I normally write my posts in Hindi. But now since I am participating in a month long campaign ‘My friend Alexa’ organized by Blogchatter, during September I would submit some of my posts in English. Today I submit a layman’s English translation of a Ghazal written by Akhtar Sheerani Ji and sung by Ghulam Ali jI. The title of the Ghazal is ‘Mastaana Piye Ja’. It is my humble effort, I know it is not a perfect translation, just an effort.

Keep Drinking O Jovial Guy

Hey jovial guy (Mastaana), keep drinking (wine),
keep drinking o jovial guy,
What to talk of a Peg, keep consuming
the whole of wine ( Bar-Maikhana).

And in this process, immerse all the sadness
caused by miseries of the world, in the wine.
Hey you, the loser heart,
drink it as a healing formulation.

You are not familiar with
the etiquettes of drinking,
So follow dictats of the
Bar-girl (/boy), and keep drinking.

In this holy land of drinkers,
you exist by your jovialness,
Be totally crazy and keep drinking,
with the spirit of a drinker.

The hustle-bustles of the Bar (maikhaana)
are to last for a little while more,
A new day is about to begin,
so keep drinking 
you, the  icon of craziness.

and here is the original Ghazal in Roman script-

Mastaana piye ja yun hi mastaana piye ja – 2
Paimaana to kya cheez hai maikhaana piye ja.

Kar gharq-e-mao-jaam gham-e-gardish-e-ayyaam – 2
 Ae dil-e-naakaam hakeemaana piye ja.

Mai-noshee ke aadaab se aagah nahin tu – 2
Jis tarah kahe saaqi-e-maikhaana piye ja

Is makr ki basti mein hai masti hi se hasti – 2
Deewana ban aur baa-dil-e-deewana piye ja

Maikhaane ke hungaame hain kuchh der ke mehmaan
Hai subah-o-qaareeb akhtar-e-deewana piye ja.

That’s all for today.

Have a nice day.

Categories
Uncategorized

119. धरती के कागज़ पर मेरी तस्वीर अधूरी रहनी थी!

आज फिर से प्रस्तुत है, एक और पुरानी ब्लॉग पोस्ट-

हिंदी के एक अत्यंत श्रेष्ठ गीतकार थे श्री भारत भूषण जी, मेरठ के रहने वाले थे और काव्य मंचों पर मधुरता बिखेरते थे। मैं यह नहीं कह सकता कि वे सबसे लोकप्रिय थे, परंतु जो लोग कवि-सम्मेलनों में कविता, गीतों के आस्वादन के लिए जाते थे, उनको भारत भूषण जी के गीतों से बहुत सुकून मिलता था।

वैसे भारत भूषण जी ने बहुत से अमर गीत लिखे हैं- ‘चक्की पर गेहूं लिए खड़ा, मैं सोच रहा उखड़ा- उखड़ा, क्यों दो पाटों वाली चाकी, बाबा कबीर को रुला गई’; ‘मैं बनफूल भला मेरा, कैसा खिलना, क्या मुर्झाना’, ‘आधी उमर करके धुआं, ये तो कहो किसके हुए’ आदि-आदि।

आज जो गीत मुझे बरबस याद आ रहा है वह एक ऐसा गीत है, जिसमें वे लोग जो जीवन में मनचाही उपलब्धियां नहीं कर पाते, असफल रहते हैं, वे अपने आप को किस तरह समझाते हैं, बहुत सुंदर उपमाएं दी हैं इस गीत में भारत भूषण जी ने, प्रस्तुत यह गीत-

तू मन अनमना न कर अपना, इसमें कुछ दोष नहीं तेरा,
धरती के कागज़ पर मेरी, तस्वीर अधूरी रहनी थी।

रेती पर लिखे नाम जैसा, मुझको दो घड़ी उभरना था,
मलयानिल के बहकाने पर, बस एक प्रभात निखरना था,
गूंगे के मनोभाव जैसे, वाणी स्वीकार न कर पाए,
ऐसे ही मेरा हृदय कुसुम, असमर्पित सूख बिखरना था।

जैसे कोई प्यासा मरता, जल के अभाव में विष पी ले,
मेरे जीवन में भी ऐसी, कोई मजबूरी रहनी थी।
धरती के कागज़ पर मेरी तस्वीर अधूरी रहनी थी॥

इच्छाओं के उगते बिरुवे, सब के सब सफल नहीं होते,
हर एक लहर के जूड़े में, अरुणारे कमल नहीं होते,
माटी का अंतर नहीं मगर, अंतर रेखाओं का तो है,
हर एक दीप के हंसने को, शीशे के महल नहीं होते।

दर्पण में परछाई जैसे, दीखे तो पर अनछुई रहे,
सारे सुख वैभव से यूं ही, मेरी भी दूरी रहनी थी।
धरती के कागज़ पर मेरी, तस्वीर अधूरी रहनी थी॥

मैंने शायद गत जन्मों में, अधबने नीड़ तोड़े होंगे,
चातक का स्वर सुनने वाले, बादल वापस मोड़े होंगे,
ऐसा अपराध किया होगा, जिसकी कुछ क्षमा नहीं होती,
तितली के पर नोचे होंगे, हिरणों के दृग फोड़े होंगे।

मुझको आजन्म भटकना था, मन में कस्तूरी रहनी थी।
धरती के कागज़ पर मेरी, तस्वीर अधूरी रहनी थी।।

इस गीत के साथ मैं उस महान गीतकार का विनम्र स्मरण करता हूँ।

नमस्कार
————

Categories
Uncategorized

118. ये धुआं सा कहाँ से उठता है!

आज फिर से प्रस्तुत है, एक और पुरानी ब्लॉग पोस्ट-

एक किस्सा याद आ रहा है, एक सज्जन थे, नशे के शौकीन थे, रात में सोते समय भी सिगरेट में नशा मिलाकर पीते थे, एक बार सुट्टे मारते-मारते सो गए, और बाद में अचानक उन्हें धुआं सा महसूस हुआ, कुछ देर तो सोचते रहे कि कहाँ से आ रहा है, बाद में पता चला कि उनका ही कंबल जल रहा था, खैर घर के लोगों ने जल्दी ही उस पर काबू पा लिया और ज्यादा नुक़सान नहीं हुआ।

मुझे मीर तक़ी ‘मीर’ जी की एक गज़ल याद आ रही है, जिसे मेहंदी हसन साहब ने अपनी खूबसूरत आवाज़ में गाया है। यहाँ भी एक नशा है, इश्क़ का नशा, जिसमें जब आग लगती है तो शुरू में पता ही नहीं चलता कि धुआं कहाँ से उठ रहा है।

ऐसा लगता है कि किसी दिलजले की आह, शोला बनकर आसमान में ऊपर उठ रही है। और यह भी कि जो इंसान उस एक ‘दर’ से उठ गया, तो फिर उसके लिए कहीं, कोई ठिकाना नहीं बचता। और फिर शायर जैसे अपने अनुभव के आधार पर कहते हैं कि हम उस गली से आज ऐसे उठे, जैसे कोई दुनिया से उठ जाता है।

अब ज्यादा क्या बोलना, वह गज़ल ही पढ़ लेते हैं ना-

देख तो दिल कि जां से उठता है,
ये धुआं सा कहाँ से उठता है।

गोर किस दिलजले की है ये फलक़,
शोला एक सुबह यां से उठता है।

बैठने कौन दे फिर उसको,
जो तेरे आस्तां से उठता है।

यूं उठे आह उस गली से हम,
जैसे कोई जहाँ से उठता है।

मीर साहब ने दो शेर और भी लिखे हैं, लेकिन उनकी भाषा इतनी सरल नहीं है, मैं यहाँ उतनी ही गज़ल दे रहा हूँ, जितनी मेंहदी हसन साहब ने गाई है।

नमस्कार
————

Categories
Uncategorized

257. सुंदर सपना बीत चला!

 

(Image Courtesy- Twitter)

स्व. राज कपूर जी द्वारा अभिनीत फिल्म- सपनों का सौदागर का एक गीत है-

सपनों का सौदागर आया, ले लो ये सपने ले लो,
तुमसे किस्मत खेल चुकी, तुम किस्मत से खेलो।

इसी गीत में आगे एक पंक्ति है-

वो तय कर लेगा मंज़िल, जो एक सपना अपनाए!

और हाँ, राज कपूर धुन के पक्के थे, फिल्मों का निर्माण, उनके ही साथ जीना, उनका एक बहुत बड़ा सपना था। इसी सपने को बड़ा स्वरूप देने के लिए राज कपूर जी ने ‘आर के स्टूडियो’ का निर्माण किया, जो फिल्म निर्माण की एक बहुत बड़ी प्रयोगशाला है, यह अपने आप में एक दर्शनीय स्थान बन गया था। फिल्म के लिए बहुत भव्य सेट इसमें मौजूद थे।

स्व. राज कपूर के पिता स्व. पृथ्वीराज कपूर स्वयं एक समर्पित कलाकार थे, जो इप्टा से जुड़े रहे थे और उन्होंने अपने सपने को ‘पृथ्वी थिएटर’ का स्वरूप प्रदान किया, जिसे उनके बाद उनके छोटे बेटे – स्व. शशि कपूर देखते रहे, यहाँ आज भी स्तरीय नाटकों का मंचन होता है।

खैर हम आर. के. स्टूडिओ का ज़िक्र कर रहे थे, जो राज कपूर का एक भव्य सपना था, जिसकी एक एक ईंट पर उनकी मेहनत और समर्पण अंकित थे। उन समर्पित कलाकारों का स्वर्गवास हो गया, न पृथ्वीराज कपूर रहे और न उनके बेटे- राज कपूर और शशि कपूर। शम्मी कपूर भी एक महान कलाकार थे, लेकिन अलग तरह के, उनकी इन क्षेत्रों में अधिक रुचि शायद नहीं थी।

हाँ तो राज कपूर जी की मृत्यु के बाद, शायद 7-8 महीने पहले ही यह खबर आई थी कि आर.के.स्टूडिओ में आग लग गई और सब कुछ जलकर खाक हो गया! जाहिर है कि पूरी तरह से जलना तभी संभव है, जब वहाँ कोई गतिविधि न चल रही हो! ऐसा लगता है कि नई पीढ़ी के लोगों ने, जिनमें से ऋषि कपूर और उनके बेटे रणबीर कपूर स्वयं अच्छे और सफल कलाकर हैं, लेकिन शायद उनकी आर.के.स्टूडिओ को संचालित करने में कोई रुचि नहीं है।

आज यह खबर आ रही कि ये लोग आर.के.स्टूडिओ को बेचने की तैयारी कर रहे हैं। यह स्टूडिओ जिसको राज कपूर ने, ‘मेरा नाम जोकर’ के निर्माण के बाद, लगभग दीवालिया हो जाने पर भी बिकने नहीं दिया था।
यह सब सुनकर जां निसार अख्तर साहब की लिखी   एक गज़ल का शेर याद आ रहा है, जो मुकेश जी ने गाई है-

पता नहीं कि मेरे बाद उनपे क्या गुजरी,
मैं चंद ख्वाब जमाने में छोड़ आया था।

आज के लिए इतना ही।

नमस्कार।

Categories
Uncategorized

116. फिरता है चांदनी में कोई सच डरा-डरा!

आज फिर से प्रस्तुत है, एक और पुरानी ब्लॉग पोस्ट-

दुष्यंत कुमार जी का एक शेर है-

खरगोश बनके दौड़ रहे हैं तमाम ख्वाब,
फिरता है चांदनी में कोई सच डरा-डरा।

यह शेर वैसे तो आपात्काल में लिखी गई उनकी गज़लों के संग्रह ‘साये में धूप’ से लिया गया है, जिस माहौल में यह शेर और भी अधिक गहन अर्थ ग्रहण करता है, परंतु यह शेर वैसे हर समय के लिए सत्य है, अर्थपूर्ण है।
सचमुच प्रत्येक व्यक्ति को सपने देखने का अधिकार है और सपने सुहाने ही होते हैं, अन्यथा वे दुःस्वप्न कहलाते हैं। यह भी है कि सपने जो हम पूरे मन से देखते हैं, वे पूरे होने चाहिएं। ऐसा महौल होना चाहिए देश और दुनिया में कि जो सपने हम देखते हैं, वे पूरे भी हों।और अगर हम पूरे मन से, संकल्प के साथ सपने देंखेंगे, तो माना यह जाता है कि वे अवश्य पूरे होते हैं।

इस दृष्टि से स्वप्न ही सच्चाई की पहली पायदान हैं। जो आज हमारा सपना है, वो कल हमारी सच्चाई होनी चाहिए, इसलिए सच को डरा हुआ नहीं होना चाहिए, जब तक कि आपात्काल जैसा माहौल न हो। ऐसा वातावरण बनाने में सरकार की कुछ भूमिका हो सकती है, परंतु ज्यादा बड़ी भूमिका समाज की है और जहाँ समाज जागरूक हो, वहाँ कोई सरकार भी इस वातावरण को बिगाड़ नहीं सकती।

लीजिए दुष्यंत कुमार जी की वह गज़ल पूरी पढ़ लेते हैं, जिससे यह शेर लिया गया था-

तुमको निहारता हूँ सुबह से ऋतम्बरा
अब शाम हो रही है मगर मन नहीं भरा।

ख़रगोश बन के दौड़ रहे हैं तमाम ख़्वाब
फिरता है चाँदनी में कोई सच डरा—डरा।

पौधे झुलस गए हैं मगर एक बात है
मेरी नज़र में अब भी चमन है हरा—भरा।

लम्बी सुरंग-सी है तेरी ज़िन्दगी तो बोल
मैं जिस जगह खड़ा हूँ वहाँ है कोई सिरा।

माथे पे हाथ रख के बहुत सोचते हो तुम
गंगा क़सम बताओ हमें क्या है माजरा।

नमस्कार
————

Categories
Uncategorized

115. सुविधा की होड़ और विद्रोही मुद्राएं!

आज फिर से प्रस्तुत है, एक और पुरानी ब्लॉग पोस्ट-

आज अपने ही एक गीत के बहाने बात कर लेता हूँ। शायद मैंने यह कविता पहले भी शेयर की हो, जब मैंने शुरू के अपने ब्लॉग, अपने जीवन के विभिन्न चरणों के बहाने, अपने बचपन से प्रारंभ करके लिखे थे, उस समय तो यहाँ ब्लॉग की साइट पर मैं खुद ही लिखने वाला और खुद ही पढ़ने वाला था। बाद में मालूम हुआ कि हम एक-दूसरे को फॉलो करें तभी उनके ब्लॉग पढ़ पाएंगे और तभी हमारे ब्लॉग भी पढ़े जा सकेंगे।

अभी मेरे कुछ ऐसे संपर्क बने हैं, आशा है आगे यह संख्या और बढेगी, तब मैं शायद अपने शुरू के ब्लॉग भी री-ब्लॉग करूंगा, जिनसे मुझे बहुत लगाव है। उनमें उन बहुत से शानदार लोगों का ज़िक्र है, जिनके संपर्क में आने का मुझे अवसर मिला।

अब अपना वह गीत शेयर कर लेता हूँ, जिसे आज आपके समक्ष रखना चाह रहा हूँ। भूमिका के तौर पर इतना कि कुछ वर्षों तक मैंने नवगीत लिखे, थोड़ा बहुत मंचों पर भी गया। वहाँ के नाटक भी देखे, जहाँ कविगण वैसे विद्रोही तेवर दिखाते हैं, लेकिन सुविधाएं पाने के लिए कुछ भी करने को तैयार हो जाते हैं। वैसे यह कविता के ही नहीं, जीवन के हर क्षेत्र में लागू होती है।

प्रस्तुत है मेरा यह नवगीत-

एकलव्य हम
मौसम के फूहड़ आचरणों पर व्यंग्य बाण,
साधे पूरे दम से, खुद को करके कमान,
छूछी प्रतिमाओं को दक्षिणा चढ़ानी थी
यह हमसे कब हुआ।

कूटनीति के हमने, पहने ही नहीं वस्त्र,
बालक सी निष्ठा से, लिख दिए विरोध-पत्र,
बैरी अंधियारे से कॉपी जंचवानी थी,
यह हमसे कब हुआ।

सुविधा की होड़ और विद्रोही मुद्राएं,
खुद से कतराने की रेशमी विवशताएं,
खुले हाथ-पांवों में, बेड़ियां जतानी थी,
यह हमसे कब हुआ।
                                                                  (श्रीकृष्ण शर्मा)

नमस्कार

————

Categories
Uncategorized

256. WOW: 30 चीजें जिनसे मुझे वास्तव में खुशी मिलती है!

बहुत अच्छा लगने वाला लेकिन काफी कठिन सवाल है! क्या है जो आपको बहुत अच्छा लगता है। ऐसा मुझसे सामान्यतः पूछा जाए, तो शायद मैं दो-तीन चीजें गिनाकर रुक जाऊंगा। लेकिन ऐसी 30 चीजें! बहुत मुश्किल है उस आंकड़े तक पहुंचना जी। चलिए आपके साथ मिलकर वहाँ तक पहुंचने की कोशिश करते हैं।

कुछ बातें तो मैं समझता हूँ कि ऐसी हैं जो सभी को अच्छी लगती हैं। जैसे प्यार, आदर, प्रशंसा- ये तीनों तो सभी को अच्छे लगते हैं, भले ही बहुत छोटा बच्चा हो अथवा बुज़ुर्ग हो। कोई इस पर विचार नहीं करेगा कि वह वास्तव में इन तीनों को पाने का अधिकारी है या नहीं। हाँ ये तीनों पदार्थ नहीं हैं और इनका संबंध किसी ‘सेंस’ (ज्ञानेंद्रिय) से नहीं है, हाँ इनकी अभिव्यक्ति बोलकर, हाथ मिलाकर, चूमकर अथवा चरण छूकर, अनेक प्रकार से होती है, उसमें हमारी ‘सेंस’ उपयोग में आती हैं।

अब जैसे ज़ुबान से हम मीठा अथवा कड़वा बोलते हैं, और कानों से सुनकर उन मीठी अथवा कड़ुवी बातों को ग्रहण करते हैं और अंततः उसका प्रभाव हमारे दिल पर पड़ता है और अंततः स्वास्थ्य पर भी पड़ सकता है। उसी प्रकार अपनी जीभ के वशीभूत होकर, स्वाद के लिए हम बहुत से व्यंजन मजे लेकर खाते हैं, और ऐसा हो सकता है बल्कि अक्सर होता है कि जो पदार्थ खाने में हमारी जिव्हा को ज्यादा आनंद देता है वह हमारे पेट, हमारे पाचन-तंत्र के लिए जटिल साबित हो जाता है!

हाँ एक मामले में मुझे इस प्रश्न का उत्तर देने में आसानी लग रही है। जी हाँ अगर 30 व्यंजनों का, पकवानों का, मिठाइयों का ही नाम बताना हो तो ये काम तो बड़े आराम से किया जा सकता है। अब ये समझ लीजिए कि ऊपर तीन- प्यार, आदर और प्रशंसा हो गए और दो मीठा और कड़ुवा बोलना, सुनना! ये तो पांच हो गए।

हाँ मीठा या कडुवा खाना नहीं गिनते, इसको पदार्थों के नाम से ही जानेंगे। हाँ तो 25 और बताने हैं ना जी! वैसे ज्ञानेंद्रिय तो सभी अब तक ही शामिल हो गई हैं ना! बाकी तो आप कहें तो बड़े आराम से व्यंजनों का ही नाम ले लेते हैं। अब गिनती नहीं करूंगा जी, लेकिन मुझे विश्वास है कि पदार्थों के नाम तो इतने हो ही जाएंगे!

इस मामले में शुरुआत करूंगा अपनी सर्वाधिक प्रिय डिश से! जी हाँ अगर रसोई में मान लीजिए आटा ही भूना जा रहा है तो उसकी महक के कारण ही मैं पूछ लेता हूँ कि ‘हलुवा बन रहा है क्या?’ अब  हलुवा सूजी का भी हो सकता है, आटे का भी! मुझे आलू उबालकर उनका हलुआ बनाना- खाना भी बहुत अच्छा लगता है। इसमें बेसन का हलुआ भी मिला लें तो चार प्रकार के हलुए ही हो जाएंगे। कुल मिलाकर मिठाइयों से भी मेरी सूची पूरी हो सकती है!

मिठाइयों की जितनी सूची मुझे अचानक ही याद आती है, उसमें जलेबी, रसमलाई, चमचम, गुलाब जामुन, रबड़ी-फालूदा, दो और हलुए याद आ गए जी- गाजर का हलुआ और मूंग दाल का हलुआ! वैसे बर्फी, कलाकंद और मैसूर पाग भी अपनी अलग पहचान रखते हैं। रक्षा बंधन और सावन के मौसम की एक विशेष मिठाई है- घेवर! त्यौहारों के मौके पर घर में गुजिया बनाई जाती है, उसका भी अपना महत्व है।

वैसे आप जानते ही होंगे कि जब घर में मीठी स्वादिष्ट खीर बनती है, किशमिश-बादाम डालकर तब उसका आनंद अलग ही होता है।

अब सोचता हूँ कि मिठाइयों से ही सूची को पूरा करने की ज़िद क्यों की जाए! कुछ फलों को भी शामिल कर लेते हैं ना जी!

मुझे आम बहुत अच्छे लगते हैं, कहते हैं सीता-माता के दहेज में देने के लिए इनको विकसित किया गया था! आम में ही इतने प्रकार और इतने स्वाद शामिल हैं कि मिठास के विभिन्न स्वरूप देखने को मिल जाते हैं। केला, संतरा, सेब, मुसम्बी भी मुझे बहुत आनंद देते हैं और जामुन भी, जब उनको नमक मिलाकर किसी लोटे आदि में घोट लिया जाए।

कुछ और पदार्थ, जो ड्राई फ्रूट की श्रेणी में भी आ जाते हैं, जैसे खजूर, जो सूखकर छुआरा बन जाता है, मुझे इसके दोनो स्वरूप पसंद हैं। बाकी बादाम, किशमिश, अखरोट, अंजीर आदि-आदि कितने नाम गिनाएं।

कुल मिलाकर वे चीजें बहुत अच्छा तात्कालिक प्रभाव छोड़ती हैं, जो हमारी जिव्हा को खुश करके पेट में जाती हैं, भले ही कभी-कभी वे पेट को कष्ट भी दे देती हैं।

वैसे मैंने यह अत्याचार कर दिया कि किसी नमकीन डिश का नाम नहीं लिया, तो लीजिए पूरी श्रद्धा के साथ समोसा और कचौरी का नाम ले देता हूँ, इसके अलावा बहुत प्रकार की चाट भी होती हैं। और जी ‘पान लबों की शान’, उसको भी नहीं भूल सकते जी!

बहुत सारी चॉइस मेरे पास नहीं हैं, क्योंकि मांसाहार मैं करता नहीं और शराब की तारीफ तो अच्छी नहीं है ना जी, और सिगरेट की भी तो!

लेकिन हूज़ूर असली आनंद तो इसमें है कि आप मेरा ब्लॉग पढ़कर, मेरी रचना को पढ़कर अथवा सुनकर मेरी प्रशंसा करें।किसी भी कारण से मेरा ही क्यों, किसी का भी आदर करें, सम्मान करें।

लेकिन ज्यादा लंबा खींचने पर लोग नाराज भी हो सकते हैं और कुछ न कहें तो बीच में ही पढ़ना छोड़ सकते हैं, इसलिए मुझे अभी-अभी सद्बुद्धि आ गई है और मैं अपना आलेख यहीं समाप्त करता हूँ।

नमस्कार।

This post is a part of Write Over the Weekend, an initiative for Indian Bloggers by BlogAdda.

नमस्कार।


Categories
Uncategorized

254.पंजिम: मांडवी नदी और मीरामार!

 

पिछले दिनों मैंने देश-विदेश के कुछ स्थानों के भ्रमण पर आधारित ब्लॉग लिखे, जिनका प्रारंभ मैंने लंदन से किया था और इस बात को भी रेखांकित किया था कि लंदन के जीवन में थेम्स नदी की कितनी महत्वपूर्ण भूमिका है!

मैं पिछले एक वर्ष से अधिक समय से गोआ में, पंजिम के निकट रह रहा हूँ और अभी तक यहाँ से संबंधित कोई ब्लॉग पोस्ट नहीं लिखी है। इसका कारण यह भी है कि गोआ वैसे ही ट्रैवेल ब्लॉगर्स का हॉट फेवरिट है, बहुत ब्लॉग लिखे जाते हैं, यहाँ के बारे में। मेरा भी जब मन होगा, जब एक टूरिस्ट की तरह गोआ घूमूंगा तब शायद यहाँ के स्थानों के बारे में ट्रैवल ब्लॉग लिखूंगा। आज पंजिम, मीरामार और मांडवी नदी के बारे में बात कर लेता हूँ, जहाँ मुझे एक टूरिस्ट के रूप में नहीं बल्कि सामान्यतः कुछ कामों के लिए जाना पड़ता है।

जैसे नदी अथवा समुद्र वाले टूरिस्ट स्पॉट्स में सामान्यतः होता है, नाव अथवा शिप में यात्रा करना वहाँ की एक प्रमुख गतिविधि होती है, वह गोआ में, पंजिम में भी है। इसके अलावा यहाँ एक तरह से कई द्वीप हैं और कुछ स्थानों पर जाने के लिए सड़क मार्ग के मुकाबले जलमार्ग से जल्दी पहुंचा जा सकता है। गोआ में शिप में और अन्यत्र चलने वाले कैसिनो भी काफी लोकप्रिय हैं। वैसे यहीं के निवासी होने के नाते हम किसी विशेष अवसर पर अक्सर, सी-बीच पर स्थित किसी रेस्टोरेंट में भोजन के लिए चले जाते हैं।

अपने क्षेत्र पंजिम, गोआ के बारे में आज बात करते हुए आइए हम, पंजिम बस स्टैंड से मांडवी नदी के साथ-साथ मीरामार बीच की तरफ आगे बढ़ते हैं, मांडवी नदी का काफी चौड़ा पाट, समुद्र जैसा ही स्वरूप दिखाता है, नदी का नजारा वास्तव में देखने लायक है, इसमें अनेक आकर्षक नौकाएं और शिप दिखाई देते हैं, जिनमें चलने वाले कैसिनो भी पर्यटकों को आकर्षित करते हैं। थोड़ा आगे बढ़ने पर, कंपाल में गोआ वन विभाग द्वारा विकसित किया गया विशाल पार्क है, जहाँ टूरिस्ट लोग विश्राम कर सकते हैं और प्राकृतिक छटाओं को निहार सकते हैं। इसके बाद नदी के किनारे पर ही ‘कला अकादमी’ का विशाल भवन है, जो एक बड़ा आकर्षण का केंद्र है, यहाँ सांस्कृतिक गतिविधियां चलती रहती हैं। जिनमें जहाँ हल्के-फुल्के नाटक होते हैं, वहीं गंभीर प्रस्तुतियां भी होती हैं। इस संस्थान के बारे में मौका मिलेगा तो बाद में विस्तार से लिखूंगा।

यहाँ से कुछ दूर आगे चलने पर हम मीरामार बीच पर पहुंच जाते हैं, जो काफी टूरिस्टों को आकर्षित करती है, विशेष रूप से इस बीच के बाहर चौपाटी है, जैसे मुंबई में है, शायद सभी जगह समुद्र के पास टूरिस्टों को खाने-पीने का आकर्षण प्रदान करने के लिए होती हो, यहाँ विशेष रूप से रात में बहुत भीड़ होती है, जब टूरिस्ट लोग दिन भर की भागदौड़ के बाद चटपटे व्यंजनों तथा आइस-क्रीम और कुल्फी का आनंद लेते हैं।

इससे कुछ दूर जाने पर दोना-पाओला का व्यू पाइंट भी एक आकर्षण का केंद्र है।

पंजिम, मांडवी नदी और मीरमार बीच के बारे में, आज इतना ही।

नमस्कार।


 

Categories
Uncategorized

114. वो कर रहा था मुरव्वत भी दिल्लगी की तरह!

आज फिर से प्रस्तुत है, एक और पुरानी ब्लॉग पोस्ट-

कुछ विषय ऐसे हैं, कि जब आपके पास बात करने के लिए कोई विषय न हो, तब आप इनको लेकर अपना स्वेटर या कहें कि आलेख बुन सकते हैं।

जैसे एक विषय है मौसम, दूसरा है प्यार!

वैसे प्यार कौन नहीं करता और किसका काम चल पाता है बिना प्यार के?

लेकिन कविता, गीत, शायरी में उस प्यार की बात कम होती है, जिसके बिना ज़िंदगी नहीं चलती। वैसे हर आइटम की हर किस्म का अपना महत्व है। मां और मातृभूमि के प्यार पर भी बहुत सी कविताएं लिखी जाती हैं और मानव-मात्र से किए जाने वाले प्रेम पर भी।

कुल मिलाकर बात इतनी है कि आज मुझे एक गज़ल याद आ रही है, जो मैंने गुलाम अली जी की आवाज़ में सुनी है, वैसे शायद इसे जगजीत सिंह जी और चित्रा जी ने भी गाया है।

तो अब, जब सोचा है तो मैं ये गज़ल आपसे भी शेयर करूंगा, मुझे तो क़तील शिफाई साहब की यह गज़ल बहुत प्यारी लगती है, प्यार में शिकायतें भी होती हैं और आघात भी होते हैं।
तो लीजिए ये गज़ल प्रस्तुत है-

किया है प्यार जिसे हमने ज़िंदगी की तरह,
वो आशना भी मिला हमको अजनबी की तरह।

किसे खबर थी बढ़ेगी कुछ और तारीक़ी,
छुपेगा वो किसी बदली में चांदनी की तरह।

बढ़ा के प्यास मेरी, उसने हाथ छोड़ दिया,
वो कर रहा था मुरव्वत भी दिल्लगी की तरह।

सितम तो ये है कि वो भी न बन सका अपना,
क़ुबूल हमने किया जिसका गम खुशी की तरह।

कभी न सोचा था हमने क़तील उसके लिए,
करेगा हम पे सितम वो भी हर किसी की तरह।

इस क्रम में स्व. इंदुमती कौशिक जी की दो पंक्तियां भी याद आ रही हैं-

हमने जिस कोमल कोने में अपना कक्ष चिना,
उसने अपनी ईंट-ईंट को सौ सौ बार गिना।

इस विषय में वैसे तो बहुत कुछ याद आता है, मुकेश जी के बहुत सारे गीत भी हैं, लेकिन बाद में भी बात करनी है ना! सो फिलहाल इतना ही।

नमस्कार
————

Categories
Uncategorized

113. तानसेन

आज फिर से प्रस्तुत है, एक और पुरानी ब्लॉग पोस्ट-

तानसेन से जुड़ा एक प्रसंग याद आ रहा है, जो कहीं सुना या पढ़ा था।

अकबर के दरबार में तानसेन गाते थे और सभी मंत्रमुग्ध होकर सुनते थे। अकबर उनकी भरपूर तारीफ करते, कहते तानसेन आप कितना सुंदर गाते हो, एक दूसरी ही दुनिया में ले जाते हो। आपके जैसा कोई नहीं है।

एक बार इसी प्रकार तानसेन को सुनने के बाद अकबर ने प्रश्न किया- ‘तानसेन, क्या आपके जैसा गाने वाला कोई और भी है?

इस पर तानसेन ने कहा कि मेरे गुरूजी जैसा गाते हैं, मेरा गायन उसके सामने कुछ भी नहीं है। तानसेन ने अपने गुरू- संत हरिदास जी के बारे में बताया।

इस पर अकबर ने कहा कि हम उनको सुनना चाहते हैं, ये बताओ कि वे किस प्रकार यहाँ आ सकते हैं। आप जितना कहोगे, हम उनको दे देंगे।

इस पर तानसेन ने बताया कि संत हरिदास जी का वहाँ आना किसी प्रकार संभव नहीं है, कुछ भी देने पर वे नहीं आएंगे।

इस पर अकबर ने पूछा कि फिर उनको कैसे सुना जा सकता है?
तानसेन ने बताया कि एक ही तरीका है कि उनके आश्रम के पास जाकर, सुबह अथवा शाम के वक्त, जब वे अपनी मस्ती में गाते हैं, तब छिपकर उनको सुन लिया जाए।

इस पर अकबर वेश बदलकर, एक बैलगाड़ी में बैठकर तानसेन के साथ वहाँ गया, ये भी कहा जाता है कि शाम के समय वे देर से पहुंचे तब देर हो गई थी और संत हरिदास अपना संध्या वंदन करके शयन के लिए चले गए थे, अतः अकबर ने रात भर वहीं इंतज़ार किया, सुबह होने पर संत हरिदास जी ने बहुत देर तक मस्ती में प्रभाती गाई, अपने प्रभु के प्रेम में गाते रहे, अकबर और तानसेन मंत्रमुग्ध होकर सुनते रहे और जब उनका गायन बंद हुआ, वे चुपचाप वापस चले गए।

अगली बार जब अकबर के सामने तानसेन अपना गायन प्रस्तुत कर रहे थे, तब अकबर ने पूछा- तानसेन, आप अपने गुरूजी के जैसा क्यों नहीं गा सकते?

इस पर तानसेन ने कहा- यह संभव ही नहीं है। मैं कुछ पाने के लिए गाता हूँ और वे अपने मन की मस्ती में, अपने प्रभु को याद करके गाते हैं। उनके गायन में जो दिव्य तत्व आता, वह मेरे गायन में आना संभव नहीं है।

नमस्कार
————