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भारतीय राजनीति की वर्तमान दशा !

हमारे देश में आज भी हम, जहाँ देश की आज़ादी के लिए अपने प्राण न्यौछावर करने वाले सेनानियों, अथक संघर्ष करने वाले नेताओं को स्मरण करते हैं, वहीं हम यह भी मानते हैं कि देश की आजादी के साथ ही राजा-रजवाड़ों के बीच बंटे देश को एक डोरी में पिरोने वाले सरदार पटेल जी की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण थी। कश्मीर जैसे एकाध स्थान पर जहाँ सरदार पटेल जी की नहीं चल पाई, वहाँ हम आज भी खमियाजा भुगत रहे हैं।

आज लौह पुरुष सरदार पटेल जी की याद अचानक आ गई! आज जब हम आज के नेताओं के अत्यंत संकीर्ण दृष्टिकोण को देखते हैं तो शर्म आती है। बहुत सारी बातें हैं, जैसे वोट के लिए ये नेता लोग आरक्षण को एक सदा चलने वाली व्यवस्था बना दे रहे हैं, जबकि यह व्यवस्था सीमित समय के लिए थी। इस सीमित समय में सरकारों को ऐसी व्यवस्था करनी थी कि जो पिछड़े हैं वे बराबरी के स्तर पर प्रतियोगिता कर सकें।

वास्तव में पिछड़े लोगों को आगे लाने के लिए कुछ उल्लेखनीय नहीं हुआ है। पिछड़े लोगों के बीच एक सुविधा भोगी वर्ग पनप गया है और सारी सुविधाओं का लाभ वही लोग उठा रहे हैं। यह एक क्षेत्र है नेताओं द्वारा वोट-लोलुपता के कारण समस्याओं को बढ़ाते जाने का!

एक दूसरा क्षेत्र है राज्यों के बीच निरंतर पानी के बंटवारे के लेकर चलने वाले विवाद का! जब पानी ज्यादा बढ़ जाता है, बाढ़ की स्थिति आती है, तब तो राज्य तुरंत पानी छोड़ देते हैं वरना वे अपने राज्य से पानी को आगे जाने ही नहीं देना चाहते। नेता लोग न्यायसंगत जल-बंटवारा करने की बजाय उसके नाम पर राजनीति करने को तत्पर रहते हैं। कोई देश के लिए सोचने वाला है इन संकीर्ण दृष्टि वाले लोगों में!

इस विषय पर लिखने को मजबूर जिस घटना ने किया वह है गुजरात से इन दिनों हो रहा उत्तर प्रदेश और बिहार के श्रमिकों का पलायन। इस बहाने कुछ बहुत छोटे विचारों वाले नेता, स्थानीय लोगों के बीच अपना क़द बढ़ाना चाह रहे हैं। और यह कोई पहली बार होने वाली घटना नहीं है!

महाराष्ट्र में एक शुद्ध रूप से गुंडा परिवार है, जिसने इस विभाजक दृष्टि के आधार पर लंबे समय से वहाँ की राजनीति में अपना दबदबा बनाया हुआ है। अब तो यह परिवार भी दो हिस्सों में बंट गया है और उनमें यह प्रतियोगिता चलती है कि कौन ज्यादा बदतमीजी करेगा। जब ठाकरे परिवार इस मानसिकता से इतनी तरक्की कर सकता है तो अल्पेश ठाकोर और उस जैसे लोग इस फार्मूले को क्यों नहीं आजमायेंगे!

दिक्कत तब होती है जब कुछ राष्ट्रीय पार्टियां भी इस विषय में स्पष्ट बात कहने से कतराती हैं, क्योंकि वे उसी टोले में हैं।

आज यही निवेदन करने का खयाल आया कि जनता को जागरूक होने की जरूरत है। जैसे एक नेता को दिखाया गया कि वह धमकी दे रहा था कि कल सुबह तक यहाँ से निकल जाओ, नहीं तो बहुत बुरा अंजाम होगा।

कई बार कुछ बहुत बुरी बातें भी अच्छी लगती हैं और शायद कभी उनका होना जरूरी सा हो जाता है। जैसे जो नेता इस तरह की धमकी दे रहे थे, उनकी यदि सार्वजनिक रूप से जमकर ठुकाई की जाए तो मुझे बहुत अच्छा लगेगा।

गुंडागर्दी की ये गतिविधियां, एक दुर्भाग्यपूर्ण घटना को आधार बनाकर शुरू की गईं, जो सरासर गलत है। किसी एक अपराधी के कारण आप किसी प्रदेश के सभी लोगों को अपराधी मान लेंगे, तो ऐसे अपराधी तो गुजरात में भी होंगे।

यही कहना चाहता हूँ कि मेरे देश के जागरूक नागरिक ऐसी विभाजनकारी शक्तियों को हर तरह से ध्यान में रखें और भरपूर सबक सिखाएं।

आज के लिए इतना ही।

नमस्कार।
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A dream journey to remember!

https://youtu.be/3g6dDFy3d8oThe world is so beautiful, in a life time- one can view, adore and capture- in his eyes, his mobile, camera etc. a very small part of this wonderful world created by the almighty.

Everybody in the world is busy in routine responsibilities, duties whether he or she is an employee, businessman or women, student, housewife or whatever. Everybody has to keep busy in routine activities, fulfilling normal responsibilities for surviving and maintaining a lifestyle of their own.

But there is a time called vacations! One can’t keep continuously working and keep trapped in a fixed pattern, a time table, same places, same activities! We do need a brake at regular intervals. Employers also have provisions of leave system and may be once in a year or two, for LTC or Leave Travel Concession. That is a normal requirement for human beings.

Besides remaining away from office and family routine, it is also very important that we go away from our place of living, to some other city, tourist location, hill station etc.

We all have dreams about places to visit. Our financial condition and in some cases the support provided by the employers, clients etc. also does help us to determine the range of our journey, our flights, cruising etc.

Suresh was on a flight to London anyway. He was travelling from Mumbai to London by #Lufthansa’s flight. He started from Mumbai early in the morning and would reach London,s Heathrow airport in the afternoon. It is around 9 hours journey from Mumbai to London, but since London time is 5 hrs and 30 mins behind Indian time, so practically the time there would be just 4 hours more than the Indian time when he started.

Anyway he reached the Heathrow airport, such a big airport, took a great time to move out from there after immigration formalities. He was carried from there to cold harbour area in London. It was very nice to look around on the way, the buildings there were either very much traditional or ultra modern. Very wide and clean roads, long tunnels with four lane roads. He was very much impressed by whatever he saw there.

During his stay in London, Suresh enjoyed travelling in tube-rails, buses etc. everywhere he used one smart card for ticketing etc. The tube rail stations there were so beautiful, with various escalators in a row going up and down. The train stations for different stations were at several levels, it appeared sometimes that he had gone deep underground.

During his stay in London, he enjoyed steamer ride in Thames river, which flows across the city and practically half of London is there on each side of the river. Big ships and so many colorful boats keep sailing, in this very broad river and a great part of transportation there is through water way.
Suresh also visited Scotland which he had a great desire to visit as he had heard a lot about its beauty, Queen’s palace, lakes, view points and what not. He also visited some other stations there. There was a famous sea-beach where seven cliffs of a continuous reef mountain look very beautiful and it is called ‘Seven Sisters’.

Suresh was just thinking how he reached this destination, from where he caught train etc. but he was not able to remember. He also thought about how he obtained VISA for visiting there, this also he could not recollect. He was putting pressure on his mind when he heard a voice, it was a Doctor moving his shoulders and calling him, ‘can you hear me Mr. Suresh!’.

Actually Suresh had been in unconscious state for last 3-4 days. He had fell unconscious on way back to home from office and was taken to hospital by people who saw him in this condition.

Sometime earlier his boss had told him in details about his London visit and also shared pics and videos with him, perhaps all that was in his mind, which took him on such a long visit without any ticket and Visa formalities.

I wish, Suresh does get chance to visit London and many more places in near future.

I am participating in Lufthansa’s mind-blowing contest to win some unexpected #TheBlindList prizes.

#SayYesToTheWorld, #TheBlindList

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124. जीते जी तरना चाहे तो, पी ले गंगाजल के बदले!

आज फिर से प्रस्तुत है एक पुरानी ब्लॉग पोस्ट-

आस्था के बारे में एक प्रसंग याद आ रहा है, जो कहीं सुना था।

ये माना जाता है कि यदि आप सच्चे मन से किसी बात को मानते हैं, इस प्रसंग में यदि आप ईश्वर को पूरे मन से मानते हैं, तो वह आपको अवश्य मिल जाएगा।

इस बीच कवि सोम ठाकुर जी के गीत ‘प्रेम का प्याला’ से कुछ पंक्तियां याद आ रही हैं-

जीते जी तरना चाहे तो, पी ले गंगाजल के बदले,
मीरा ने टेरे श्याम पिया तो अर्थ हलाहल के बदले,
मरघट में पी खामोशी से, महफिल में शोर मचाकर पी।
ये प्याला प्रेम का प्याला है, तू नाचके और नचाकर पी,
खुल खेलके पी, झुक झूमके पी, मत गैर से नज़र बचाकर पी।
ये प्याला प्रेम का प्याला है।

बहुत ही सुंदर गीत है ये, जितना अचानक याद आया, मैंने शेयर कर लिया। असल में यह आस्था और विश्वास का ही मामला है। बच्चे का विश्वास! वो जो मानता है, पूरी तरह मानता है, कोई ढोंग नहीं करता।

तो प्रसंग यह है कि एक पंडित जी रोज सुबह नदी में स्नान करने जाते, वे नदी किनारे अपने वस्त्र आदि रखकर नदी में स्नान करते। अक्सर एक बच्चा, जो गाय चराने आता था, उससे वे अपने सामान का ध्यान रखने को कहते थे और वो ऐसा करता भी था।

इस बीच कवि सोम ठाकुर जी के गीत ‘प्रेम का प्याला’ से कुछ पंक्तियां याद आ रही हैं-

पीने के ढंग हजारों हैं, चाहे जिस चाल-चलन से पी,
गैरों से मेल-मिलाप से पी, मनमोहन से अनबन से पी,
तू मन की ताप-तरंगों में जीवन को रचा-पचाकर पी,
ये प्याला प्रेम का प्याला है।

बहुत ही सुंदर गीत है ये, जितना अचानक याद आया, मैंने शेयर कर लिया। असल में यह आस्था और विश्वास का ही मामला है। बच्चे का विश्वास! वो जो मानता है, पूरी तरह मानता है, कोई ढोंग नहीं करता।

तो प्रसंग यह है कि एक पंडित जी रोज सुबह नदी में स्नान करने जाते, वे नदी किनारे अपने वस्त्र आदि रखकर नदी में स्नान करते। अक्सर एक बच्चा, जो गाय चराने आता था, उससे वे अपने सामान का ध्यान रखने को कहते थे और वो ऐसा करता भी था।

वह बच्चा उनको स्नान के दौरान प्रार्थना करते देखता, जिसमें वे अपने कंठ को अपनी उंगलियों के बीच हल्का सा दबा लेते थे। एक बार जब वे इसी प्रकार बच्चे से निगरानी के लिए बोलकर, नदी में जा रहे थे तब बच्चे ने पूछा पहले ये बताओ कि आप ये कंठ को क्यों दबाते हो। पंडित जी ने बोला हम भगवान की प्रार्थना करते हैं, दर्शन देने के लिए कहते हैं।

बच्चे ने पूछा कि क्या आपको भगवान दिखाई देते हैं, पंडित जी ने टालने के लिए बोल दिया कि ‘हां’।
इसके बाद बच्चा एक बार नदी में नहाने के लिए गया और उसने अपना कंठ दबाकर प्रभु से प्रार्थना की कि वे उसको दर्शन दें। कुछ देर तक दर्शन न होने पर वो बोला ‘आप जानते नहीं मैं कितना ज़िद्दी हूँ, मुझे दर्शन दो, नहीं तो मैं कंठ से हाथ नहीं हटाऊंगा!’

प्रभु ने सोचा यह पागल तो मर जाएगा, सो उन्होंने नदी किनारे भगवान श्रीकृष्ण के रूप में, प्रकट होकर कहा अब तो हाथ हटाओ देखो मैं आ गया, बच्चे ने कहा वहीं रुको, फिर पूछा, ‘आप कौन हो’ , उन्होंने कहा मैं वही ईश्वर हूँ, जिसको तुम बुला रहे थे।‘ बच्चा बोला, मैं नहीं मानता, उसने उनको रस्सी से पेड़ के साथ बांधकर कहा- ‘रुको, मैं अभी आता हू‘, वह भागकर पंडित जी को बुलाकर लाया, शुरू में तो पंडित जी को कुछ दिखाई नहीं दिया, लेकिन बाद में बच्चे की ज़िद के कारण, भगवान ने ढोंगी पंडित जी को भी दर्शन दिए, तब जाकर भगवान बंधन मुक्त हो पाए।

बस यही बात है आज की, प्रेम में ढोंग नहीं, पागलपन ज्यादा काम आता है।

नमस्कार।
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WOW: When I Tell The Truth

Very well said by Mark Twain- “If you tell the truth, you don’t have to remember anything.” But it is quite hard to understand, why people weave stories when somebody asks a straight question and for reasons really not understandable to others, they tell something which is anything but the truth.

People form such a habit of telling lies, may be as a child in the beginning when they may have done something wrong, not done anything that was expected from them and all the more children get inspired by their parents and seniors, when they know that they are telling lies to some other person, for reasons best known to them!

The way honesty is called the best policy, not telling the truth to others is also an act of being dishonest to others. Why at all do we need to tell lies? And this becomes the habit. There is no reason why a person can not survive by always telling the truth!

I know one of the lies which people often tell others is telling their location wrongly. In this regard mobile phone have provided a great help to habitual liars. When you are talking on landline phone from your home or office, you can’t tell the other person that you are in the market or have gone to some other city? Further when you are in a famous market and some person asks you to bring something, which is famous and available in that particular market, you simply tell your location different or tell you have come back from that market long back.

We have heard stories of the truthful King Harishchandra and Gandhi Ji is quite famous for taking a pledge of truthfulness. He faced several odd situations for telling the truth as a child. His autobiography is quite famous with the name- ‘My experiments with truth’. The eldest Pandav in Mahabharat- Yudhishtir is also famous for his truthfulness and being always honest and fair.

People develop this habit of telling lies initially for saving themselves from a little awkward situations or not willing to do some favor to a person but when it becomes a habit, they normally start telling lies only. I remember when I was young, a friend of mine was making and repairing transistor radios etc. (Presently he has a big electronics shop). He told me once that it has become his habit that even if his father asks him the cost of a Transistor Radio, he is not able to instantly tell the truth.

I have seen such situations with habitual liars that they tell one thing to one person, may be about their location and another to the other, but wrong to both and then sometimes forget what they told to the first person and what to the other!

So I am clear about it, that when I have told somebody a lie it can get caught anytime and When I Tell The Truth, I do not have to worry that I would be proven wrong sometime.

So in my view one should try never to tell lies or otherwise they may make a diary, where they keep the record regarding what lies have been told to a particular person. So either tell the truth and remain cool and calm or go on telling lies and keeping their record.
Choice is yours!

This post is a part of Write Over the Weekend, an initiative for Indian Bloggers by #BlogAdda.

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जीवन में निरंतर सीखना!

जब हम लोगों से बात करते हैं, विशेष अधिक उम्र के लोगों से और उनकी किसी गलती या कमी की तरफ इशारा करते हाँ, अथवा कहते हैं कि ये काम शायद ठीक नहीं है, तब अक्सर हमें एक जवाब सुनने को मिल जाता है- ‘मैंने अपने बाल धूप में सफेद नहीं किए हैं’, अर्थात वे मानते हैं कि उस मामले में गलत नहीं हो सकते।

ऊपर दी गई प्रतिक्रिया का अर्थ यही है कि जब व्यक्ति की उम्र अधिक हो गई है तो इसका मतलब यह कि उसको अनुभव अधिक हो गया है, इसलिए उससे गलती होने की संभावना नहीं है, और बहुत से लोग तो यह सुनना ही पसंद नहीं करते कि कोई उनको उनकी गलती बताए।

उनका यह आत्मविश्वास अपनी जगह है और यह सच्चाई अपनी जगह है कि हमारे देश में, (बाहर भी होता होगा, लेकिन मैं तो अपने यहाँ की जानता हूँ, हाँ तो हमारे यहाँ बहुत से लोग ऐसे हैं जो उम्र बढ़ने के साथ-साथ पहले से ज्यादा मूर्ख होते जाते हैं।

इसका मुख्य कारण यही है समय बदलने के साथ-साथ अपने आपको, अपने सहज ज्ञान को मांजना, संवर्धित करना, नई परिस्थितियों के अनुरूप अपडेट करना, वेलिडेट करना जरूरी हो जाता है। और ऐसे में वे लोग जिनको परिवर्तन और विशेष अपने से छोटों के सुझाव मानने में दिक्कत होती है वे पिछड़े रह जाते हैं और कुछ मामलों में बहुत अव्यावहारिक हो जाते हैं।

इस बात में मैंने बुज़ुर्गों वाला एंगल ऐसे ही डाल दिया, कुछ मामलों में वह सही होता है, लेकिन सामान्यतः सभी लोगों में यह कमी अथवा सकारात्मक विशेषता हो सकती है।

जैसे एक व्यक्ति ऐसा हो सकता है जो अपने सामने आए परिणाम से भी नहीं सीखता और बार-बार उसी मुसीबत से लड़ता है, जबकि दूसरा व्यक्ति ऐसा हो सकता है, जो इस पहले व्यक्ति के सामने आए परिणाम से सीख लेकर अपना व्यवहार, अपनी नीति बदल सकता है और उस दुष्परिणाम को टाल देता है, जो इस पहले व्यक्ति को बार-बार भुगतना पड़ता है।

इससे जुड़ा एक उदाहरण मैंने अपनी पुरानी पोस्ट में भी दिया है, उसको ही दोहरा रहा हूँ। एक शराबी था, जिसने अपनी नशे की लत के कारण अपने परिवार को बर्बाद कर दिया, वह अपनी पत्नी को और बच्चों को भी नशा करके पीटता था, अंत में वह नशे के कारण असमय मृत्यु का शिकार हो गया।
उस शराबी के दो बेटे थे, एक बेटा उसकी ही तरह शराबी बना, उसने परिस्थितियों से कुछ नहीं सीखा बल्कि नकल भर की। वह बोला मेरा बाप शराबी था, मैं और क्या बन सकता था!

दूसरे बेटे ने अपने घर की परिश्तितियों को देखकर यह फैसला कर लिया था कि कुछ भी हो जाए, वह शराबी नहीं बनेगा और वह जीवन में बहुत सफल हुआ।

दोनो बेटों के सामने वही परिस्थितियां थीं। लेकिन उनमें से एक ‘स्मार्ट लर्नर’ था, जिसने घर की परिस्थितियों से, अपने पिता की नियति से सीख ली जबकि दूसरा अपने पिता की तरह, वही ठोकरें फिर से खाने को तैयार था।

कुछ ऐसे भी संस्थान होते हैं जहाँ कहते हैं- ‘अर्न व्हाइल यू लर्न’, जीवन भी एक ऐसा ही संस्थान है, यज्ञशाला भी है और पाठशाला भी! यहाँ हम अपनी भूमिका भी निभाते हैं, कर्म का यज्ञ भी करते हैं, वहीं हमारे सामने यह भी अवसर होता है कि हम अपनी परिस्थितियों, आसपास होने वाली घटनाओं, सभी से सीख ले सकते हैं, निरंतर शिक्षित हो सकते हैं और जीवन के युद्ध को और अधिक महारत के लिए लड़ने के लिए तैयार भी हो सकते हैं।

• आज का मेरा यह आलेख #IndiSpire के अंतर्गत दिए गए विषय Are you a smart learner? Do you learn lessons from everyday things? How did you learn the lessons? पर आधारित है।

आज के लिए इतना ही, नमस्कार ।
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तुझको चलना होगा!

आज एक पुराना फिल्मी गीत याद आ रहा है, फिल्म- ‘सफर’ का, जिसमें राजेश खन्ना और शर्मिला टैगोर मुख्य भूमिकाओं में थे। इस फिल्म में मुकेश जी का गाया एक बहुत मधुर गीत भी था- ‘कहीं दूर जब दिन ढल जाए’, लेकिन एक और गीत जो बहुत लोकप्रिय हुआ और बहुत ही सारगर्भित गीत है, उसका अंग्रेजी में भावानुवाद करने का प्रयास मैं यहाँ कर रहा हूँ।

यह गीत गाया है- मन्ना डे जी ने, इसे लिखा है इंदीवर जी ने और इस फिल्म का संगीत दिया था कल्याण जी, आनंद जी ने और इस फिल्म के लगभग सभी गीत, अमर गीत थे। लीजिए मन्ना डे जी के गाये और उनके साथ कोरस के स्वरों में को मिलाकर अमर हुए इस गीत का पहले मैं अपनी ओर से किया गया अंग्रेजी भावानुवाद और उसके हिंदी में मूल गीत प्रस्तुत कर रहा हूँ।

पहले प्रस्तुत है अंग्रेजी में भावानुवाद-

You too have to move!

River moves, the stream does also move,
The moon moves, stars do also move,
You too have to move,
You too have to move!

Life doesn’t stop anywhere,
It doesn’t feel afraid of storms and the whirlwind,
If you don’t move, the paths would move,
and you would keep dreaming of your destination,
being left far behind.

Only those reached across, who kept travelling,
The one who stopped-
got trapped in a cyclone,
what to talk of a boat,
even the bank can be swept away,
the stream of time is very strong.

You too have to move,
You too have to move!

और अब प्रस्तुत है मूल हिंदी गीत, यदि आपको हिंदी फिल्मी गीत अच्छे लगते हैं तो आपने यह गीत भी अवश्य सुना होगा-

तुझको चलना होगा!

नदिया चले, चले रे धारा,
चन्दा चले, चले रे तारा,
तुझको चलना होगा, तुझको चलना होगा।

जीवन कहीं भी ठहरता नहीं है,
आँधी से तूफां से डरता नहीं है,
तू ना चलेगा तो चल देंगी राहें
मंज़िल को तरसेंगी तेरी निगाहें,
तुझको चलना होगा, तुझको चलना होगा ।

पार हुआ वो रहा जो सफ़र में,
जो भी रुका घिर गया वो भंवर में,
नाव तो क्या बह जाये किनारा,
बड़ी ही तेज़ समय की है धारा,
तुझको चलना होगा, तुझको चलना होगा।

आज के लिए इतना ही, नमस्कार ।
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दिल्ली मेरी दिल्ली!

काफी लंबे समय के बाद दिल्ली आना हुआ, उस दिल्ली में जो लगभग डेढ़ वर्ष पहले तक मेरी थी, उसी तरह जैसे और भी लाखों, करोडों लोग इस या किसी भी महानगर को अपना मानते हैं। एक फिल्म जिसका मैंने पहले भी अपने ब्लॉग में ज़िक्र किया है- ‘कांकरर्स ऑफ दा गोल्डन सिटी’, इस फिल्म में एक आदमी आता है महानगर और कहता है कि एक दिन मैं इस शहर का मालिक बन जाऊंगा, लेकिन फिल्म के अंत में वह लुट-पिटकर वापस लौटता है।

हर कोई मुकेश अंबानी तो नहीं हो सकता, वैसे मुकेश अंबानी भी किसी महानगर का मालिक होने का दावा नहीं कर सकता। हद से हद उसका अपना परिवार बहुत सी मंज़िलों वाले घर में रह लेगा, जिसमें सोचना पड़े कि आज किस ‘फ्लोर’ को धन्य किया जाए! मुझे लगता है कि पुराने जमाने के महलों में भी इस तरह की दुविधा रहा करती होगी!
फिर दिल्ली में तो जहाँ आज के बहुत सारे नव धनाढ्य रहते हैं, वहीं बहुत से महल और किले भी हैं, जिनमें से कुछ तो खंडहर भी बन चुके हैं।

इस बार जब फिर से दिल्ली आया, किसी हद तक एक टूरिस्ट की हैसियत से तो यही खयाल आया कि वह कौन सी प्रमुख बात है जो दिल्ली को दिल्ली बनाती है!

राजा-महाराजाओं के किले तो हैं ही, जिनमें मुगल काल और यहाँ तक कि महाभारत काल तक की यादें समेटी गई हैं। इसके बाद ब्रिटिश शासकों ने भी- आज का राष्ट्रपति भवन (जो शायद वायसराय हाउस था), संसद भवन, सचिवालय, बोट क्लब और ढ़ेर सारी इमारतें बनवाई थीं, जो स्थापत्य कला की बेजोड़ धरोहर हैं।

महल और सरकारी इमारतें तैयार कराने में जहाँ शासकों का हाथ होता है, वहीं कुछ मंदिर-मस्ज़िद भी शासक बनवाते हैं, इस काम में कुछ श्रद्धालु पूंजीपतियों का भी योगदान होता है, जैसे बहुत से स्थानों पर बने लक्ष्मी नारायण मंदिर आज ‘बिड़ला मंदिर’ के नाम से जाने जाते हैं, जिन्होंने उनको बनवाया है। इसमें भी प्राथमिकताएं अलग-अलग हैं। बिड़ला जी का अधिक जोर मंदिर बनवाने पर है तो टाटा जी का अस्पताल अथवा रोग-अनुसंधान संबंधी संस्थान बनाने पर ज्यादा ध्यान रहा है।

हाँ एक बात और कि बेशक कुछ पहल करने वाले तो रहते ही हैं, लेकिन आज के समय में भी बहुत सारे नए-नए मंदिर श्रद्धालु जनता के पैसे से बनते जाते हैं। इसमें भी यह देखना पड़ता है कि आजकल कौन से भगवान ज्यादा चल रहे हैं। आप स्वयं भी देखें तो मालूम हो जाएगा कुछ भगवान तो पिछले दस-बीस सालों में ही ज्यादा पॉपुलर हुए हैं! वैसे पिछले कुछ समय में ही दिल्ली में लोटस टेंपल और मयूर विहार के पास बना अक्षर धाम मंदिर आधुनिक समय की बड़ी उपलब्धि हैं।

खैर मैं भटकता हुआ कहाँ से कहाँ आ गया, मैं बात इस विषय पर करना चाह रहा था कि आखिर वह क्या है जो दिल्ली को दिल्ली बनाता है! दिल्ली देश की राजधानी तो है ही, देश भर के लोग यहाँ के लगभग सभी इलाकों में इस तरह रहते हैं कि इस महानगर की अपनी अलग कोई पहचान है ही नहीं। दिन-दहाड़े यहाँ कोई किसी को मारकर चला जाए, किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता!

हाँ पहचान बनाने वाले तत्वों में एक तो देश की राजनैतिक सत्ता यहाँ पर है, ये देश की राजनैतिक राजधानी है, सांस्कृतिक राजधानी कहने में तो संकोच होता है, हालांकि कुछ ऐसे संस्थान यहाँ पर हैं, जैसे नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा, और भी बहुत हैं, जिनका योगदान इस बेदिल नगर को सांस्कृतिक केंद्र बनाने में है।

और बहुत सारी संस्थाएं आदि हैं, जैसे देश का सर्वोच्च न्यायालय यहाँ है, जो समय-समय पर देश में हलचल पैदा करता रहता है। बहुत बड़ी भूमिका इस संस्थान की है, लोकतंत्र को मजबूत बनाने में!

एक और स्थान है दिल्ली में जहाँ प्राचीनता की मिसाल- पुराना किला है और उसके बगल में ही प्रदर्शनी मैदान है, जहाँ आधुनिकतम विकास की मिसाल बहुत सी प्रदर्शनियों से मिलती है। यहाँ लगने वाले ‘पुस्तक मेले’ भी साहित्य-प्रेमियों के लिए बहुत उपयोगी होते हैं।

बस ऐसे ही कुछ स्थानों, संस्थानों, गतिविधियों के बारे में बात करने का मन था, जो इस बेदिल शहर को अच्छी पहचान दिलाते हैं। वैसे बुरी पहचान दिलाने वाले तत्व तो बड़े शहरों में होते ही हैं।

आगे अगर टाइम मिला और मूड भी हुआ तो इन स्थानों, संस्थानों और गतिविधियों के बारे में बात करूंगा, जो राजधानी दिल्ली की पहचान हैं।

आज के लिए इतना ही, नमस्कार ।
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123. सुनते थे वो आएंगे, सुनते थे सहर होगी!

मॉय फ्रेंड एलेक्सा’ कैंपेन तो निपट गया! लीजिए आज फिर से प्रस्तुत है एक और पुरानी ब्लॉग पोस्ट-

एक बार और दिल की बात कर लेते हैं, ऐसे ही कुछ बातें और आ रही हैं दिमाग में, आप इसे दिल पर मत लेना।

कितनी तरह के दिल लिए घूमते हैं दुनिया में लोग, एक गीत में किसी ने बताया था- ‘कोई सोने के दिल वाला, कोई चांदी के दिल वाला, शीशे का है मतवाले तेरा दिल’।
वैसे हमारा दिल, हमें चैन से रखने के लिए क्या कुछ कोशिशें नहीं करता-

दिल ढूंढता है, फिर वही फुर्सत के रात दिन,
बैठे रहें तसव्वुर-ए-जाना किए हुए!

जिगर मुरादाबादी साहब का शेर है-

आदमी, आदमी से मिलता है,
दिल मगर कम किसी से मिलता है।

एक शेर बशीर बद्र साहब का याद आ रहा है-

अभी राह में कई मोड़ हैं, कोई आएगा कोई जाएगा,
तुम्हें जिसने दिल से भुला दिया, उसे भूलने की दुआ करो।

एक और शेर किसी का याद आ रहा है-

एक इश्क़ का गम आफत, और उस पे ये दिल आफत,
या गम न दिया होता, या दिल न दिया होता।

एक शेर फैज़ अहमद फैज़ साहब का है-

कब ठहरेगा दर्द-ए-दिल, कब रात बसर होगी,
सुनते थे वो आएंगे, सुनते थे सहर होगी।

और बहादुर शाह ज़फर साहब का ये शेर तो बहुत प्रसिद्ध है-

कह दो इन हसरतों से कहीं और जा बसें,
इतनी जगह कहाँ है दिल-ए-दागदार में।

और अब दाग देहलवी साहब का एक शेर याद कर लेते हैं, क्योंकि वैसे तो यह अनंत कथा है-

तुम्हारा दिल, मेरे दिल के बराबर हो नहीं सकता,
वो शीशा हो नहीं सकता, ये पत्थर हो नहीं सकता।

चलिए अब एक फिल्मी गीत का मुखड़ा और जोड़ देते हैं-

दिल लगाकर हम ये समझे, ज़िंदगी क्या चीज है,
इश्क़ कहते हैं किसे और आशिक़ी क्या चीज है।

ये विषय ऐसा ही कि जब बंद करने की सोचते हैं, तभी कुछ और याद आ जाता है। फिल्मी गीतों के दो मुखड़े और याद आ रहे हैं, उसके बाद बंद कर दूंगा, सच्ची!

ये दिल न होता बेचारा, कदम न होते आवारा
जो खूबसूरत कोई अपना हमसफर होता।

और दूसरा-

चल मेरे दिल, लहराके चल, मौसम भी है, वादा भी है,
उसकी गली का फासला, थोड़ा भी है, ज्यादा भी है,
चल मेरे दिल।

अब चलते रहिए।
नमस्कार।
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