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बहुत दूर मत चली जाना

आज भी मैं विख्यात कवि, नोबेल पुरस्कार विजेता- श्री पाब्लो नेरुदा की मूल रूप से ‘स्पेनिश’ भाषा में लिखी गई एक कविता के अंग्रेजी अनुवाद के आधार पर उसका भावानुवाद और उसके बाद अंग्रेजी में अनूदित कविता, जिसका मैंने अनुवाद किया है, उसको प्रस्तुत करने का प्रयास करूंगा। आज के लिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया कविता का भावानुवाद-

पाब्लो नेरुदा
बहुत दूर मत चली जाना

बहुत दूर मत चली जाना, एक दिन के लिए भी नहीं, क्योंकि-
क्योंकि – मैं नहीं जानता कि इस बात को कैसे कहूं: दिन बहुत लंबा होता है
और मैं तुम्हारा इंतज़ार करता रहूंगा, जैसे कोई करे किसी खाली स्टेशन पर
जबकि गाड़ियां किसी और जगह खड़ी हों, आराम कर रही हों!

मुझे अकेला मत छोड़ना, एक घंटे के लिए भी, क्योंकि
क्योंकि तब पीड़ा की छोटी-छोटी बूंदें मिलकर एक साथ दौड़ेंगी,
जैसे धुआं अपने लिए जगह ढूंढ़ता है, वह भर जाएगा-
मेरे भीतर, और मेरे खोये हुए दिल को अवरुद्ध कर देगा।

ओह, काश तुम्हारी छाया कभी भी समुद्र-तट पर जल में विलीन न हो जाए;
काश तुम्हारी पलकें कभी भी शून्य विस्तार को ताकते हुए न फड‌फड़ाएं।
प्रियतम, मुझे एक क्षण के लिए भी अकेला मत छोड़ना,

क्योंकि जिस क्षण तुम इतनी दूर चली जाओगी,
मैं पूरी धरती पर उद्देश्यहीन भटकूंगा, यह पूछते हुए,
कि क्या तुम वापस आओगी? क्या तुम मुझे यहाँ मरता हुआ छोड़ दोगी?

और अब वह अंग्रेजी अनुवाद, जिसके आधार मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-

Pablo Neruda
Don’t Go Far Off

Don’t go far off, not even for a day, because —
because — I don’t know how to say it: a day is long
and I will be waiting for you, as in an empty station
when the trains are parked off somewhere else, asleep.

Don’t leave me, even for an hour, because
then the little drops of anguish will all run together,
the smoke that roams looking for a home will drift
into me, choking my lost heart.

Oh, may your silhouette never dissolve on the beach;
may your eyelids never flutter into the empty distance.
Don’t leave me for a second, my dearest,

because in that moment you’ll have gone so far
I’ll wander mazily over all the earth, asking,
Will you come back? Will you leave me here, dying?

नमस्कार।
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आज रात मैं लिख सकता हूँ

आज भी मैं विख्यात कवि नोबेल पुरस्कार विजेता- श्री पाब्लो नेरुदा की जो मूलतः चिले से थे, की मूल रूप से ‘स्पेनिश’ भाषा में लिखी गई कविता, के अंग्रेजी अनुवाद के आधार पर उसका भावानुवाद और उसके बाद अंग्रेजी में अनूदित मूल कविता, जिसका मैंने अनुवाद किया है, उसको प्रस्तुत करने का प्रयास करूंगा। आज के लिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया कविता का भावानुवाद-
(मेरे कल के आलेख में उनको अंग्रेजी कवि लिख दिया गया था, उसके लिए मैं क्षमाप्रार्थी हूँ)।

पाब्लो नेरूदा

आज रात मैं लिख सकता हूँ

आज रात मैं लिख सकता हूँ, सर्वाधिक उदास पंक्तियां।
जैसे मैं लिख सकता हूँ, कि तारों से सजी है रात,
तारे नीले हैं और दूर-दूर कांप रहे हैं।’

आसमान में रात की हवा घूमती है और गाती है।

आज रात मैं लिख सकता हूँ, सर्वाधिक उदास पंक्तियां।
मैंने उसे प्रेम किया, और कभी-कभी उसने भी मुझे प्रेम किया।

आज जैसी रातों में, मैंने उसे अपनी बांहों में लिए रखा।
अनंत आकाश के तले मैं उसे बारबार चूमता रहा।

उसने मुझे प्यार किया, कभी-कभी मैंने भी उसे प्यार किया।
कोई कैसे उसकी अति सुंदर स्थिर आंखों को प्यार न करता।

आज रात मैं लिख सकता हूँ, सर्वाधिक उदास पंक्तियां।
मुझे लगता है कि मैं उसे प्यार नहीं करता, यह महसूस करने के लिए मैंने उसे खो दिया।

घनघोर रात की ध्वनियां सुनने को, जो और भी घनघोर है, उसके बिना,
और ये काव्य पंक्तियां पड़ती हैं आत्मा पर, जैसे ओस गिरती है घास पर।

इससे क्या फर्क पड़ता है कि मेरा प्रेम उसे अपने पास नहीं रख पाया।
रात तारों से भरी है और वह मेरे पास नहीं है।

यही सब है, दूर कहीं कोई गीत गा रहा है दूर कहीं।
मेरी आत्मा संतुष्ट नहीं है कि इसने उसे खो दिया।

मेरी दृष्टि प्रयास करती है उसे खोजने का, जैसे उसे पास लाने का।
मेरी आत्मा उसे खोजती है, और वह मेरे पास नहीं है।

वही रात, वही उन्हीं पेड़ों का सफेद हो जाना,
लेकिन उस समय के हम, हम अब वही नहीं हैं।

मैं अब उसे प्यार नहीं करता, यह तो निश्चित है, लेकिन मैं कैसे उसे प्यार करता था।
मेरी आवाज़ ने प्रयास किया कि हवा को खोज ले, जो उसके सुनते हुए, उसे स्पर्श करे।

किसी और की, वह होगी किसी और की, जैसे कि वह मेरे चुंबनों से पहले थी।
उसकी आवाज़, उसका दमकता बदन। उसकी असीम आंखें।

मैं अब उसे प्रेम नहीं करता, यह निश्चित है, लेकिन शायद मैं उसे प्यार करता हूँ।
प्रेम की उम्र इतनी कम है और भूलना होता है इतनी देर तक!

क्योंकि आज जैसी रातों में मैं उसे, अपनी बांहों में भरे रहता था,
मेरी आत्मा संतुष्ट नहीं है कि मैंने उसे खो दिया है।

यद्यपि यह शायद अंतिम दर्द हो, जो उसने मुझे दिया है,
और यह अंतिम कविता जो मैं उसके लिए लिख रहा हूँ।

अंग्रेजी अनुवाद- डब्लू. एस. मेर्विन

और अब वह अंग्रेजी अनुवाद, जिसके आधार मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-

Pablo Neruda
Tonight I Can Write

Tonight I can write the saddest lines.

Write, for example, ‘The night is starry
and the stars are blue and shiver in the distance.’

The night wind revolves in the sky and sings.

Tonight I can write the saddest lines.
I loved her, and sometimes she loved me too.

Through nights like this one I held her in my arms.
I kissed her again and again under the endless sky.

She loved me, sometimes I loved her too.
How could one not have loved her great still eyes.

Tonight I can write the saddest lines.
To think that I do not have her. To feel that I have lost her.

To hear the immense night, still more immense without her.
And the verse falls to the soul like dew to the pasture.

What does it matter that my love could not keep her.
The night is starry and she is not with me.

This is all. In the distance someone is singing. In the distance.
My soul is not satisfied that it has lost her.

My sight tries to find her as though to bring her closer.
My heart looks for her, and she is not with me.

The same night whitening the same trees.
We, of that time, are no longer the same.

I no longer love her, that’s certain, but how I loved her.
My voice tried to find the wind to touch her hearing.

Another’s. She will be another’s. As she was before my kisses.
Her voice, her bright body. Her infinite eyes.

I no longer love her, that’s certain, but maybe I love her.
Love is so short, forgetting is so long.

Because through nights like this one I held her in my arms
my soul is not satisfied that it has lost her.

Though this be the last pain that she makes me suffer
and these the last verses that I write for her.

Translated in English by W.S. Merwin

नमस्कार।
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यदि तुम मुझे भूल जाओगी!

आज से मैं विख्यात कवि, नोबेल पुरस्कार विजेता श्री पाब्लो नेरुदा जो मूलतः चिले से थे- की कुछ कविताओं का भावानुवाद और उसके बाद मूल कविता प्रस्तुत करने का प्रयास करूंगा। उनकी स्पेनिश में लिखी गई मूल कविता के अंग्रेजी अनुवाद के आधार पर आज के लिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया कविता का भावानुवाद-

यदि तुम मुझे भूल जाओगी!

“मैं चाहता हूँ कि तुम
एक बात जान लो।
तुम जानती हो कि कैसा होगा:
अगर मैं देखूं
सुस्त पतझड़ की लाल टहनी पर
स्फटिक से चमकते चांद को, अपनी खिड़की से,
अगर मैं आग के निकट स्पर्श करूं-
स्पर्श न करने योग्य- राख को,
अथवा जल चुके लकड़ी के लट्ठे के, सिलवटों से भरे शरीर को,
तो हर वस्तु मुझे तुम तक ले जाती है,
मानो प्रत्येक वस्तु जिसका अस्तित्व है,
कोई भी गंध, प्रकाश, धातुएं,
सभी ऐसी छोटी-छोटी नौकाएं हैं,
जो तुम्हारे उन
टापुओं तक चलती हैं,
जो मेरी प्रतीक्षा कर रहे हैं।

और, अब,
अगर तुम धीरे-धीरे, मुझे प्यार करना बंद कर दो,
मैं भी धीरे-धीरे तुम्हें प्यार करना बंद कर दूंगा।

अगर अचानक
तुम मुझे भूल जाओ,
तो मेरी तलाश मत करना,
क्योंकि मैं तुम्हे पहले ही भूल चुका होऊंगा।”

और अब वह अंग्रेजी अनुवाद, जिसका मैंने भावानुवाद किया है-

If you forget me

“I want you to know
one thing.
You know how this is:
if I look
at the crystal moon, at the red branch
of the slow autumn at my window,
if I touch
near the fire
the impalpable ash
or the wrinkled body of the log,
everything carries me to you,
as if everything that exists,
aromas, light, metals,
were little boats
that sail
toward those isles of yours that wait for me.

Well, now,
if little by little you stop loving me
I shall stop loving you little by little.

If suddenly
you forget me
do not look for me,
for I shall already have forgotten you.”

नमस्कार।
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21. रेत के घरौंदों में सीप के बसेरे!

जीवन यात्रा का एक पड़ाव और, एक पुराना ब्लॉग!

जयपुर में रहते हुए ही मैंने हिंदुस्तान कॉपर लिमिटेड की एक वैकेंसी देखी, हिंदी अनुवादक के लिए, यह कार्यपालक श्रेणी का पद था, जबकि आकाशवाणी में, मैं पर्यवेक्षकीय स्तर पर था, हालांकि पदनाम वही था। इसके अलावा वेतन में काफी अंतर था। मैंने आवेदन किया और चयन परीक्षा एवं साक्षात्कार के लिए मुझे बुलावा भी आ गया।

इस बीच मेरे दूसरे पुत्र का जन्म जयपुर में हो चुका था। और आगे की यात्रा पर जाने वाले हम चार लोग थे।

मुझे जाना था बिहार के संथाल परगना क्षेत्र में, जो अब झारखंड में आता है। टाटानगर से लगभग 40 कि.मी. दूर है यह इलाका। जाने से पहले ही मैंने अखबार में यह खबर पढ़ी कि वहाँ गैर आदिवासी लोगों को 10 इंच छोटा करने (गर्दन काटने) की घटनाएं हो रही थीं। परम आदरणीय शिबू सोरेन जी का इलाका है वह।

खैर मैं वहाँ पहली बार जा रहा था और इत्तफाक से मुझे कोई सही मार्गदर्शन करने वाला भी नहीं मिला, बल्कि एक सज्जन ने अधूरे ज्ञान के आधार पर मुझे जो बताया वह मुझे बहुत महंगा पड़ सकता था। मैंने वहाँ जाने के लिए टाटानगर एक्सप्रेस पकड़ी, जो बताया गया था कि सुबह 6 बजे पहुंचेगी, लेकिन वह 9 बजे के बाद पहुंची। वहाँ से मुझे हिंदुस्तान कॉपर लिमिटेड के कार्यालय, मऊभंडार जाना था, जहाँ जाने के लिए केवल टेम्पो मिलते हैं, जो सवारियां ठूंसकर भरने पर चलते हैं, और 40 किलोमीटर का वह जंगली रास्ता भी माशाअल्ला था।

खैर रोते-धोते मैं 11 बजे के बाद वहाँ पहुंचा, जबकि उम्मीदवारों की लिखित परीक्षा वहाँ 10 बजे से प्रारंभ होकर पूरी हो चुकी थी और अब साक्षात्कार होना था। मैंने अपनी परिस्थितियां बताईं और मुझे अनुमति दे दी गई, जबकि अन्य लोगों का साक्षात्कार शुरु हो रहा था, मुझे टेस्ट देने के लिए बिठा दिया गया और अंत में मेरा साक्षात्कार हो गया। जैसा मैंने बताया था कि केंद्रीय अनुवाद ब्यूरो के प्रशिक्षण के उपरांत मुझे मिला मेडल मेरे काफी काम आया बाकी चयन परीक्षा का निष्पादन तो होगा ही।

बाद में जब मैं गेस्ट हाउस में रुका तो मुझे मालूम हुआ कि प्रत्याशियों में एक ऐसे सज्जन भी शामिल थे, जो केंद्रीय मंत्री रहीं श्रीमती राम दुलारी सिन्हा के पर्सनल स्टॉफ में शामिल रहे थे और वे यह मान रहे थे कि उनका चयन तो कोई रोक नहीं सकता। बाद में मुझे बताया गया कि वहाँ के उप महाप्रबंधक (का. एवं प्रशा.)- श्री राज सिंह निर्वाण ने वहाँ के वरि. प्रबंधक (राजभाषा)- डॉ. राम सेवक गुप्त से कहा था कि वह मिनिस्टर का आदमी है अतः उसका चयन कर लें वरना दिक्कत हो जाएगी। इस पर गुप्ता जी ने कहा था कि आप कर लीजिए, मैं तो उसी को चुनूंगा, जो मुझे ठीक लग रहा है। खैर निर्वाण जी भी गलत काम करना नहीं चाहते थे।

काफी समय बाद जब मैं वहाँ से आ रहा था, तब मुझे वहाँ के सतर्कता प्रभारी ने मुझे वे पत्र दिखाए, जो दो केंद्रीय मंत्रियों- श्री वसंत साठे और श्री एन.के.पी. साल्वे ने मेरी नियुक्ति के विरुद्ध लिखे थे। इन दोनो मंत्रियों ने श्रीमती सिन्हा के स्टाफ में रहे उस व्यक्ति की शिकायत को अग्रेषित किया था। उन सज्जन को भी एक पाइंट यह मिल गया था कि मैं देर से पहुंचा था। खैर इसका मेरे मैडल और निष्पादन का हवाला देते हुए, समुचित उत्तर दे दिया गया था।

हिंदुस्तान कॉपर लिमिटेड की इस इकाई का नाम इंडियन कॉपर कॉम्प्लेक्स था, जो पहले अंग्रेजो द्वारा चलाई जाती थी और उस समय उसका नाम था- इंडियन कॉपर कार्पोरेशन। वहाँ की माइंस थीं मुसाबनी माइंस, जो देश की सबसे गहरी ऑपरेशनल खदानें थीं। किसी जमाने में, अंग्रेजों ने यहाँ से तांबे के अलावा बड़ी मात्रा में सोना, चांदी भी निकाले थे। खदानों के मामले में यह लागू होता है कि खदान जितनी गहरी होती जाएगी, खनन की लागत उतनी ही बढ़ती जाएगी। जबकि खदान में तांबे की मात्रा बहुत कम हो गई थी और खनन लागत बढ़ती जा रही थी। कई बार ऐसा लगता था कि स्टाफ को यदि घर बिठाकर पैसा दिया जाए तो घाटा कम होगा, खनन करने पर ज्यादा। खैर कई उपाय अपनाए जा रहे थे वहाँ पर खनन लागत को कम करने के लिए। वैसे अब स्थिति यह है कि, ये खदानें कई वर्ष पहले बंद की जा चुकी हैं।

अंग्रेजों के समय से ही वहाँ की टाउनशिप बनी थी, और उसे लोगों को बांटने की अंग्रेजों की नीति के अनुसार ही बसाया गया था। ऑफिस के कर्मचारियों को अलग बसाया गया था, उसका नाम था स्टाफ कालोनी, अंग्रेज काफी बड़ी संख्या में नेपालियों को भी मज़दूर के रूप में काम करने के लिए ले आए थे और उनके लिए नेपाली कालोनी बना दी थी, उनके बच्चों का अब कोई भविष्य नहीं था, वे पूरा दिन जुआ खेलते थे। अंग्रेजों ने कर्मचारियों को बांटकर रखा, उनको अच्छी सुविधाएं दीं लेकिन शिक्षा के लिए कोई व्यवस्था नहीं की थी।

हिंदुस्तान कॉपर में आने के बाद यहाँ शिक्षा की सुविधाएं विकसित करने का प्रयास किया गया। हिंदुस्तान कॉपर लिमिटेड के कलकत्ता स्थित मुख्यालय में श्रेष्ठ कवि डॉ. बुद्धिनाथ मिश्र कार्यरत थे, उनके एक आशावादी गीत के साथ यह ब्लॉग समाप्त करते हैं, वहाँ के बारे में बाकी बातें बाद में करेंगे-

एक बार और जाल फेंक रे मछेरे
जाने किस मछली में बंधन की चाह हो।

सपनों की ओस गूंथती कुस की नोंक है,
हर दर्पण में उभरा एक दिवालोक है,
रेत के घरौंदों में सीप के बसेरे,
इस अंधेर में कैसे प्रीत का निबाह हो।
एक बार और जाल फेंक रे मछेरे….

उनका मन आज हो गया पुरइन पात है,
भिगो नहीं पाती यह पूरी बरसात है,
चंदा के इर्द-गिर्द मेघों के घेरे,
ऐसे में क्यों न कोई मौसमी गुनाह हो।
एक बार और जाल फेंक रे मछेरे….

गूंजती गुफाओं में कल की सौगंध है,
हर चारे में कोई चुंबकीय गंध है,
कैसे दे हंस झील के अनंत फेरे,
पग-पग पर लहरें जब बांध रही छांव हो।
एक बार और जाल फेंक रे मछेरे….

कुमकुम सी निखरी कुछ भोरहरी लाज है,
बंसी की डोर बहुत कांप रही आज है,
यूं ही ना तोड़ अभी बीन रे सपेरे,
जाने किस नागिन में प्रीति का उछाह हो।
एक बार और जाल फेंक रे मछेरे
जाने किस मछली में, बंधन की चाह हो॥

                                ( पुरइन पात- कमल का पत्ता)
                                           <strong>डा. बुद्धिनाथ मिश्र</strong>

फिलहाल इतना ही, नमस्कार।
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Violence and Democracy!

Our world has gone through many stages in history. Our country was considered to be the torch bearer of wisdom, a Guru for the world. We never tried to capture the land or the kingdom of others.

While there were big democracies in the world, our country was divided into so many kingdoms lately and the British, who came as businessmen made us their colony and ruled here for almost 200 years. Earlier the Moghuls also ruled us for very long time.

We, who were a very old civilization, were not perhaps fit to survive in the modern atmosphere! In the concept of Ram Rajya, which is so dear to us and we feel it as our ideal system, the saints and sadhus, living in Ashrams, away from the glamour and impurity of the life of ruling class, they told the ruler what is right and what is wrong. The princes acquired the principles of life, of ruling from those Gurus!

But our age old values did not help us to survive in modern times, the country disintegrated into small kingdoms, which became easy prey for the foreign aggressors, who had only one principle, grab power and enjoy. So we had to live the life under foreign rule, become slaves and face injustice for such a long time.

There are stages in world history, when the society has no option left with them, other than direct action, violence in any form etc. We anyhow threw away these shackles of bondage, our efforts were a good mix of armed action and non violent movement. That is a subject which can be discussed for very long, but at the moment I am not discussing it.

Today we are the biggest democracy in the world and we keep electing our governments with our votes and change a government if it does not work as per our expectations. Incidentally the party that was actively involved in our freedom movement has now become the party of one family, which has been in power for most part of our democratic governments.

Yes there are some drawbacks of our democracy, since many political parties in our country have become the personal property of a particular family. This is not good for a healthy democracy. I think BJP and Communist Party are the only big parties, which are not family based parties. Both of them have their own positive and negative points.

What we are discussing today is violence! Which violence? Yes if it came to the mind of the common people under foreign rule, that now violence is necessary to come out of these dark times, it was an indicator, but it is not the way in modern times. Not easy to face the power of the rulers through such violent efforts, it has to be a mix of various strategies.

Anyhow in a democratic system like ours, there is no place for violence. We can raise our voice through various fora and finally if it does not work, we can change the government through our votes. Here we find that violent measures are resorted mostly by such politicians who are rejected by people and they want to come to limelight, to gain their confidence through such violent protests. Some leaders need a dead body to work on their dirty plans.
I would only like to submit that in a democratic system like ours, violence should not find any place, whatever problems we need to overcome, whatever corrupt practices we want to highlight, there are democratic ways to project them, protest about them, create an atmosphere and finally remove a government that does not deliver.

So as far as our democratic society is concerned, violence and depraved society can’t be allowed to functioned that way, It was a thing of past when we were ruled by others and when there was not a strong democratic system in place.

This is my submission based on the weekly prompt on #IndiSpire with the heading #TruthAboutSociety.

Thanks for reading.
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WOW: What If I could travel the world like this!

We keep living our lives in a formal atmosphere, most of the time discharging our duties- in office and at home. There is very little scope to dream, think of doing impossible looking things, even talking on such subjects lest people may not think that we have gone crazy!

This time, the prompt on BlogAdda, advised to talk about- fantasy, wishes, dreams, anything that one would wonder or wish for! It appears like a permission to dream, to think freely, like a child can!

I am a travel enthusiast, but actually I am not able to travel much, nowhere matching my travel desires. It might be so with most of the people! Though by now I have travelled many a places across the country and a few destinations out of my country. But the travel thirst keeps increasing with time.

In the meantime I learnt a new technique, an age old wisdom, which does not require any laboratories, any chemicals, any devices to make great achievements, to make great leaps into the vast kingdom of God. I would not disclose this in details here, would only like to say that our language, Sanskrit is such that if you pronounce some words the way they need to be pronounced, the objects, the activities, for which these words stand, may actually happen. Only that much disclosure now.

So I remember my last trip to London for which we had to travel for nine hours from Mumbai, with the fastest device available on earth for such travels, flying by an aeroplane from Mumbai to Hethrow airport in London. Again we had to go to Mumbai from Goa at night to catch early morning flight from there and in London also getting out of that very big airport, immigration formalities and then road journey, to my son’s place took another 3-4 hours. So it was a great but very tiresome experience, while spending very much time and money and also going through so many formalities.

What I could achieve, learning the old, unwritten science, may not be legal in worldly terms but it made travelling to any part of the world very easy, simple, free of all expenses and formalities! In this process, let me tell about my journeys, I somewhere nullified, and somewhere took help from the force of gravitation. While even while flying we had to spend in total 17-18 hours for reaching our destination in London, which included journeys to airports, waiting, flying time etc.

What I do with the ancient science, there are no road journeys, no flights, no airports, no immigration formalities etc. I just had to know the exact position of my destination on celestial map, one can also view and confirm it from the space.

And no flying across the earth, it is going up like a rocket, to a definite height in space and from there dropping directly to the desired destination, which takes maximum 2-3 hours for any location on earth. Yes carrying much luggage is not advisable but dressing properly is required, but I would not pass on all that knowledge here!

This way I visited a few places on earth where some people known to me or related to me were there, It also happened that at some places in America, Paris, London the local intelligence could get the information that someone is there without going through the immigration formalities, in some instance I flew back before they could reach me and in some other I had to fly back, after being caught by them and then they kept searching for me.

Anyway I never wanted to harm anybody and actually I wish that the tourism departments of these countries and also various states in India to invite me to visit the tourist destinations in their countries and states and I would write travel blogs in Hindi, which would make these places much more popular across India and they would earn more and more money from Indian tourists.

Anybody listening!

This post is a part of Write Over the Weekend, an initiative for Indian Bloggers by BlogAdda.

Thanks for reading.

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20. आंचल ही न समाए तो क्या कीजे!

चलिए पुराने पन्ने पलटते हुए, एक क़दम और आगे बढ़ते हैं।
आज फिर से जीवन का एक पुराना पृष्ठ, कुछ पुरानी यादें, एक पुराना ब्लॉग!

जयपुर पहुंच गए लेकिन काफी कुछ पीछे छूट गया। मेरी मां, जिनके लिए हमारा वह पुराना मोहल्ला अपने गांव जैसा था, बल्कि मायका भी था क्योंकि उनके भतीजे- वकील साहब वहीं रहते थे। वो दिल्ली नहीं छोड़ पाईं। एक-दो बार हमारे साथ गईं भी, जहाँ भी हम थे, लेकिन वहाँ नहीं रुक पाईं।

एक और बात हम दिल्ली से जयपुर ट्रेन में बैठकर चले गए थे, एक दो अटैची साथ लेकर, कोई और लगेज नहीं था हमारे साथ। जो सामान हमारा छूटा, घरेलू सामान थोड़ा बहुत मां के पास रहा, बाकी 50-60 किलो तो रहा ही होगा, किताबों और पत्रिकाओं के रूप में। पत्रिकाओं में सबसे बड़ा भाग था सारिका के अंक, जिनमें बहुत से कथा- ऋषि विशेषांक भी थे, जिनमें दुनिया भर के श्रेष्ठ लेखकों की रचनाएं शामिल थीं।

पता नहीं क्यों मुझे एक पाकिस्तानी लेखक की रचना याद आ रही है, जो ऐसे ही एक अंक में छपी थी। कहानी संक्षेप में यहाँ दोहरा देता हूँ-

महानगर पालिका में बहस हो रही थी कि ‘रेड-लाइट एरिया’, शहर के बीचों-बीच क्यों बना है। काफी लंबी बहस के बाद फैसला हुआ कि इन लोगों को नगर की सीमा के बाहर बसा दिया जाए। ऐसा ही किया गया, पहले वहाँ एक पान वाले ने अपनी दुकान खोली, चाय वाला आया, फिर कुछ और दुकानें खुलीं।

दस साल बाद, महानगर पालिका में फिर से बहस हो रही थी कि ‘रेड-लाइट एरिया’, शहर के बीचों-बीच क्यों बना है!

खैर, ये तो मुझे याद आया और मैंने संक्षेप में कहानी शेयर कर ली। मैं बता यह रहा था कि हम अपना साहित्य भंडार वकील साहब के यहाँ छोड़ आए, जो मेरे बड़े भाई लगते थे। उन्होंने कुछ वर्षों तक इस अमानत की बंधी हुई पोटलियों को संभालकर रखा, बाद में चूहों में साहित्य पिपासा कुछ अधिक जाग गई तो उन्होंने यह सब लायब्रेरी में दे दिया।

दिल्ली के जो महत्वपूर्ण वृतांत छूट गए, उनमें एक यह भी है कि हमने बच्चों की एक पत्रिका ‘कलरव’ के कुछ अंक भी प्रकाशित किए थे। दिल्ली प्रेस में मेरे एक साथी थे- श्री रमेश राणा, जिनको मेरी साहित्यिक प्रतिभा में कुछ ज्यादा ही विश्वास था, उन्होंने यह प्रस्ताव रखा। इसमें संपादन की ज़िम्मेदारी मेरी थी, बाकी सब उनके जिम्मे था। मैं सामग्री का चयन करता था और ‘नन्हे नागरिक से’ शीर्षक से संपादकीय भी लिखता था। यह संपादकीय सबसे सुरक्षित था, क्योंकि नन्हे पाठकों से कोई शिकायत मिलने की गुंजाइश नहीं थी। श्री बालकवि वैरागी ने इस पत्रिका के लिए कई रचनाएं भेजीं और उपयोगी सुझाव भी दिए।

अब याद नहीं कि इस पत्रिका के कितने अंक छपे थे और इस प्रयास में कितना आर्थिक नुकसान हुआ ये तो भाई रमेश राणा ही जानते होंगे क्योंकि मेरा तो एक धेला भी खर्च नहीं हुआ था। बस एक अनुभव था-

किन राहों से दूर है मंज़िल, कौन सा रस्ता आसां है,
हम जब थककर रुक जाएंगे, औरों को समझाएंगे।

जयपुर के बाद हम बिहार के संथाल परगना इलाके में गए, जो अब झारखंड में आता है। कुछ प्रसंग तो ऐसे हैं, जो जैसे समय आता है, मुझे याद आते हैं और मैं शेयर करता जाता हूँ, लेकिन बिहार में कार्यग्रहण का किस्सा ऐसा है, जिसे सुनाने की मुझे भी बेचैनी रहती है, वो सब मैं अगले ब्लॉग में बताऊंगा।

फिलहाल मैं यह बता दूं कि ईश्वर की कृपा से मुझे कभी किसी नौकरी के लिए सिफारिश की ज़रूरत नहीं पड़ी और मैं जब इंटरव्यू देने जाता था तब मैं बता देता था कि मैं यहाँ ज्वाइन करने वाला हूँ। हाँ मैं मुकेश जी का गाया यह भजन भी अक्सर गाता था और गाते-गाते मेरी आंखों में आंसू निकल आते थे-

तुम कहाँ छुपे भगवान करो मत देरी।
दुख हरो द्वारकानाथ शरण मैं तेरी।
यही सुना है दीनबंधु तुम सबका दुःख हर लेते,
जो निराश हैं उनकी झोली, आशा से भर देते,
अगर सुदामा होता मैं तो दौड़ द्वारका आता,
पांव आंसुओं से धोकर मैं, मन की आग बुझाता,
तुम बनो नहीं अनजान सुनो भगवान, करो मत देरी।

दुख हरो द्वारकानाथ शरण मैं तेरी।
जो भी शरण तुम्हारी आता, उसको धीर बंधाते,
नहीं डूबने दाता, नैया पार लगाते,
तुम न सुनोगे तो किसको मैं, अपनी व्यथा सुनाऊं,
द्वार तुम्हारा छोड़ के भगवन, और कहाँ मैं जाऊं।
प्रभु कब से रहा पुकार, मैं तेरे द्वार करो मत देरी।
दुख हरो द्वारकानाथ शरण मैं तेरी।

जो भी शरण तुम्हारी आता, उसको धीर बंधाते,
नहीं डूबने दाता, नैया पार लगाते,
तुम न सुनोगे तो किसको मैं, अपनी व्यथा सुनाऊं,
द्वार तुम्हारा छोड़ के भगवन, और कहाँ मैं जाऊं।
प्रभु कब से रहा पुकार, मैं तेरे द्वार करो मत देरी।
दुख हरो द्वारकानाथ शरण मैं तेरी।

सब कुछ देता है ऊपर वाला, लेकिन फिर-

बहुत दिया देने वाले ने तुझको,
आंचल ही न समाए तो क्या कीजे।

अब अगले ब्लॉग में, मेरा चयन हिंदुस्तान कॉपर लिमिटेड में और उसके विरोध में दो केंद्रीय मंत्रियों के पत्र!

नमस्कार।
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दीवार की मरम्मत!

आज भी मैं विख्यात अंग्रेजी कवि श्री रॉबर्ट फ्रॉस्ट की एक कविता का भावानुवाद और उसके बाद मूल कविता प्रस्तुत कर रहा हूँ। पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया कविता का भावानुवाद-

दीवार की मरम्मत

ऐसा कुछ है, जो दीवार को पसंद नहीं करता,
वह, उसके नीचे जमी हुई जमीन को नीचे से फुला देता है,
और ऊपर लगे पत्थरों को धूप में फैला देता है;
और बीच में इतनी जगह बना देता है कि दो लोग भी सटकर पार हो सकते हैं।

शिकारियों द्वारा किए गए ऐसे कामों की बात अलग हैं:
मैंने उनको देखा है और उसकी मरम्मत की है
जहाँ वे एक भी पत्थर को अपनी जगह नहीं लगा रहने देंगे,
लेकिन किसी छिपे हुए खरगोश को अवश्य बाहर निकाल लेंगे,
अपने भौंकते कुत्ते को खुश करने के लिए।

मैं दीवारों में बने ऐसे संकरे रास्तों की बात कर रहा हूँ,
जिनको किसी ने बनते नहीं देखा, इसकी आवाज़ भी नहीं सुनी।
लेकिन वसंत में मरम्मत का समय आने पर, हम उन्हें वहाँ पाते हैं।

मैं अपने पड़ौसी को पहाड़ी के पार;
और जब किसी दिन हम उस लाइन पर एक साथ चलने-
और अपने बीच की दीवार को फिर से दुरुस्त करने के लिए मिलते हैं,
तब यह जानने का अवसर देता हूँ।
जब हम चलते हैं, तो वह दीवार अपने बीच रखते हैं।

और प्रत्येक बड़ा पत्थर जो किसी भी तरफ गिर गया है,
और कुछ छोटे सपाट टुकड़े और कुछ गेंद जैसे गोल,
उनको सही स्थान पर स्थिर करने के लिए, हमें कुछ समय तक प्रयास करना होता है:
“जहाँ हो वहीं बने रहो, जब तक हम पीठ नहीं फेर लेते!”
उन पत्थरों पर काम करते समय हम अपनी उंगलियों को भी खुरदुरा बना लेते हैं।

अरे, यह भी एक प्रकार का मैदानी खेल है,
एक-एक खिलाड़ी, दोनो तरफ, यह इससे थोड़ा अधिक है:
जहाँ पर यह है, वहाँ हमें दीवार की जरूरत नहीं है;

उसके देवदार (सनोबर) के पेड़ हैं और मेरा सेब का बगीचा,
मेरे सेब के पेड़ उस पार कभी नहीं जाएंगे,
और उसके सनोबर के नीचे जाकर चिल्गोजे नहीं खाएंगे, मैं उससे कहता हूँ।
वह इतना ही कहता है, “अच्छी बाड़ लगाने से अच्छे पड़ौसी बनते हैं।”

वसंत मेरे मस्तिष्क में शरारत की तरह आता है, मुझे लगता है
अगर मैं उसके दिमाग में एक बात डाल सकूं:
“वे लोग अच्छे पड़ौसी क्यों बनाते हैं? क्या ये
वहाँ नहीं होता जहाँ गाय होती हैं? लेकिन यहाँ तो कोई गाय नहीं है।

दीवार बनाने से पहले मैं पूछना चाहता हूँ,
क्या है जिसे मैं दीवार के अंदर या किसे उससे बाहर कर रहा हूँ,
और किसको मेरे कारण खतरा हो सकता था।

कुछ है, जिसे दीवार पसंद नहीं है,
“वह इसको गिरा हुआ देखना चाहता है।” मैं उसको “पारलौकिक बौना” कह सकता हूँ,
परंतु वह वास्तव में बौना नहीं है, और शायद मैं हूँ।

उसने अपने आपसे कहा, मैं उसको वहाँ देख रहा हूँ,
वह अपने हर हाथ में एक पत्थर को मजबूती से ऊपर उठाकर ला रहा है
पाषाण युग के बर्बर हथियार की तरह,
मुझे लगता है कि वह अंधेरे में चल रहा है,
केवल जंगलों का और पेड़ों की छायाओं का अंधेरा नहीं,
वह अपने पिता के कहने के अनुसार नहीं चलेगा,
और वह इसका विचार बहुत अच्छी तरह रखना चाहता है,
वह फिर से कहता है, “अच्छी बाड़ लगाने से अच्छे पड़ौसी बनते हैं।”

                    <strong>- रॉबर्ट फ्रॉस्ट</strong>

और अब मूल अंग्रेजी कविता-

Mending Wall

Something there is that doesn’t love a wall,
That sends the frozen-ground-swell under it,
And spills the upper boulders in the sun;
And makes gaps even two can pass abreast.
The work of hunters is another thing:
I have come after them and made repair
Where they have left not one stone on a stone,
But they would have the rabbit out of hiding,
To please the yelping dogs. The gaps I mean,
No one has seen them made or heard them made,
But at spring mending-time we find them there.

I let my neighbour know beyond the hill;
And on a day we meet to walk the line
And set the wall between us once again.
We keep the wall between us as we go.
To each the boulders that have fallen to each.

And some are loaves and some so nearly balls
We have to use a spell to make them balance:
“Stay where you are until our backs are turned!”
We wear our fingers rough with handling them.

Oh, just another kind of out-door game,
One on a side. It comes to little more:
There where it is we do not need the wall:
He is all pine and I am apple orchard.
My apple trees will never get across
And eat the cones under his pines, I tell him.

He only says, “Good fences make good neighbours.”
Spring is the mischief in me, and I wonder
If I could put a notion in his head:
“Why do they make good neighbours? Isn’t it
Where there are cows? But here there are no cows.

Before I built a wall I’d ask to know
What I was walling in or walling out,
And to whom I was like to give offence.

Something there is that doesn’t love a wall,
That wants it down.” I could say “Elves” to him,
But it’s not elves exactly, and I’d rather
He said it for himself. I see him there
Bringing a stone grasped firmly by the top
In each hand, like an old-stone savage armed.

He moves in darkness as it seems to me,
Not of woods only and the shade of trees.
He will not go behind his father’s saying,
And he likes having thought of it so well
He says again, “Good fences make good neighbours.”

                                                                           Robert Frost</strong>

नमस्कार।
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19. हम खें जुगनिया बनाय गए, अपुन जोगी हो गए राजा!

आज फिर से प्रस्तुत है एक और पुराना ब्लॉग,जो मेरे लिए अविस्मरणीय है।

दिल्ली में सरकारी सेवा के दौरान ही मैंने स्टाफ सेलेक्शन कमीशन की एक और परीक्षा दी, जो हिंदी अनुवादक के पद पर चयन के लिए थी। इस परीक्षा में मैं सफल हुआ और उसके आधार पर ही आकाशवाणी, जयपुर में अनुवादक पद के लिए मेरा चयन हुआ।

इस परीक्षा के प्रश्न-पत्र का एक प्रश्न मुझे आज तक याद है। प्रश्न शायद‌ था ‘लोकतंत्र बनाम भीड़तंत्र’। इस प्रश्न के उत्तर में मैंने एच.जी.वेल्स के विज्ञान आधारित उपन्यास ‘द आइलैंड ऑफ डॉ. मोया’ का उदाहरण देते हुए इसकी व्याख्या की थी। मैंने लिखा था कि जैसे कि यह माना जाता है कि हमारे पूर्वज बंदर थे और विकसित होते-होते आज के मानव का परिष्कृत रूप सामने आया है।

उपर्युक्त उपन्यास का उदाहरण देते हुए मैंने लिखा था कि डॉ. मोया इसमें विभिन्न प्रजातियों के जानवरों को लाकर एक द्वीप पर रखते हैं और उनको इंसान की तरह व्यवहार करना सिखाते हैं। किस तरह उठना-बैठना है, किस तरह खाना-पीना है। इस प्रकार सभी जानवर इंसान जैसा व्यवहार करने लगते हैं, लेकिन धीरे-धीरे उनकी संख्या बढ़ती है, उनको अनुशासित रखना मुश्किल होता जाता है, जहाँ मौका मिलता है, कुत्ता जीभ निकालकर उसी तरह पानी पीने लगता है, जैसे पहले पीता था, हिंसक जानवरों की मूल प्रवृत्ति वापस लौटने लगती है और डॉ. मोया वहाँ से अपनी जान बचाकर भागते हैं।
उपर्युक्त उदाहरण देकर मैंने यह लिखा था कि यह माना जाता है कि हम पशु से विकसित होकर मनुष्य बने थे लेकिन जैसे-जैसे भीड़ बढ़ती जा रही है, हमारे अंदर की पाशविक प्रवृत्ति पुनः पनपने लगी है।

खैर, जो भी हो मैं परीक्षा में सफल हुआ और आकाशवाणी, जयपुर में मेरी हिंदी अनुवादक के पद पर नियुक्ति हुई। उद्योग मंत्रालय तथा संसदीय राजभाषा समिति में 6 वर्ष सेवा करने के बाद 30 सितंबर,1980 की रात में मैंने दिल्ली छोड़ी और 1 अक्तूबर को आकाशवाणी, जयपुर में कार्यग्रहण किया।

जयपुर के साहित्यिक मित्रों और वहाँ के परिदृश्य के संबंध में, मैं शुरू के ही एक ब्लॉग में लिख चुका हूँ, कुछ और बातें, जो पहले नहीं कह पाया था अब कहूंगा।

आकाशवाणी में मैं प्रशासन शाखा में था और मेरी मित्रता वहाँ कार्यक्रम विभाग के लोगों से अधिक थी।
प्रशासन शाखा में, मेरे सामने बैठते थे- श्री राम चंद्र बैरवा, जो हेड क्लर्क थे, कार्यक्रम विभाग के सभी लोगों की फाइलें, सर्विस-बुक आदि उनके पास ही आती थीं और वो पूरा समय इस बात को लेकर कुढ़ते रहते थे कि कार्यक्रम विभाग के लोगों को कितनी अधिक तनख्वाह मिलती है।
मेरे बगल में श्री राम प्रताप बैरवा थे, जो क्लर्क थे और बाहरी कलाकारों को अन्य केंद्रों पर प्रोग्राम आदि के अनुबंध वही जारी करते थे अतः कलाकार उनके पास आते रहते थे। मुझे याद है कि उनके पास आने पर मैंने ज़नाब अहमद हुसैन, मुहम्मद हुसैन के साथ अनेक बार चाय पी है।

आकाशवाणी के बाहर ही एम. आई. रोड पर एक चाय की दुकान थी और अक्सर ऐसा होता था कि हेड क्लर्क महोदय किसी एक के साथ चाय पीकर वापस लौटते थे और किसी दूसरे के साथ वापस चले जाते थे।

आकाशवाणी में एक उद्घोषक थे, नाम याद नहीं आ रहा है, उन्होंने अपने कमरे में यह शेर लिखकर लगाया हुआ था-

हर दौर में हम हाफिज़-ए-किरदार रहेंगे
खुद्दार थे, खुद्दार हैं, खुद्दार रहेंगे।

वैसे पता नहीं वो खुद्दारी का मतलब क्या समझते थे, क्योंकि उनका सबसे झगड़ा रहता था।
एक और मित्र थे, कार्यक्रम विभाग में- श्री बैजनाथ गौतम, जो ईसुरी के प्रसिद्ध लोकगीत बड़े मन से गाते थे. जैसे-

हम खें जुगनिया बना गए, अपुन जोगी हो गए राजा।
दस दरवाज़ों का महल बना गए,
ताही में पिंजरा टंगा गए, अपुन जोगी हो गए राजा।

पिंजरे में तोता और मैंना बिठा गए,
बोली अनेकों रटा गए, अपुन जोगी हो गए राजा।

शायद ईसुरी के लोकगीत के आधार पर ही राज कपूर जी ने अपनी फिल्म में यह गीत रखा था-

रंगमहल के दस दरवाजे,
ना जाने कौन सी खिड़की खुली थी,
सैंया निकस गए, मैं ना लड़ी थी।

तीन साल के जयपुर प्रवास में जहाँ मैंने हिंदी में स्नातकोत्तर डिग्री प्राप्त की, वहीं केंद्रीय अनुवाद ब्यूरो के तीन माह के प्रशिक्षण में प्रथम स्थान प्राप्त करके, डा. कर्ण सिंह जी के कर कमलों से सिल्वर मैडल भी प्राप्त किया। इस प्रशिक्षण के प्रतिभागियों में मैं बहुत जूनियर था तथा यह मेरे लिए एक बड़ी उपलब्धि थी और यह मैडल बाद में मेरे काफी काम आया।

जयपुर प्रवास के दौरान हम तीन मकानों में बहुत थोड़ी अवधि के लिए और एक मकान में लंबे समय रहे, जिसमें टीन की छत थी, लेकिन हमारे मकान मालिक का प्रेम ऐसा था कि हम उसे छोड़ ही नहीं पाते थे। इस मकान में जाने की कहानी भी विशेष थी, हम यह मकान देख चुके थे लेकिन टीन की छत होने के कारण जाना नहीं चाहते थे। हमने एक मकान पसंद करके, पहला मकान छोड़ दिया और हम अपना घर का सामान, जो कि उस समय एक ठेले पर ही आ गया था, साथ लेकर नए मकान की ओर चल दिए, जिसके बारे में एक दिन पहले ही बात हो चुकी थी। लेकिन उस लालची आदमी को हमारे बाद शायद किसी ने ज्यादा पैसे ऑफर कर दिए और उसने वह मकान उसको दे दिया।
अब हम, ठेले पर अपने सामान के साथ सड़क पर थे, तब हम अचानक टीन की छत वाले इस मकान पर गए और उन्होंने हमारा भरपूर स्वागत किया। मेरे मकान मालिक मुझे भाई साहब कहते थे और मेरी पत्नी को बेटी कहते थे। जयपुर प्रवास का अधिकतम समय हमने इसी घर में बिताया।

अब अंत में श्री बलबीर सिंह रंग जी के एक दो शेर याद आ रहे हैं –

आब-ओ-दाना रहे, रहे ना रहे
ये ज़माना रहे, रहे ना रहे,
तेरी महफिल रहे सलामत यार,
आना-जाना रहे, रहे ना रहे।

हमने गुलशन की खैर मांगी है,
आशियाना रहे, रहे ना रहे।

फिलहाल इतना ही, नमस्कार।
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मैं पानी की कलाई हूँ!

कविता के क्षेत्र में जो लोग मेरे लिए गुरुतुल्य रहे हैं, उनमें से एक हैं डॉ. कुंवर बेचैन जी। मैं एक छात्र के रूप में कुछ समय के लिए गाजियाबाद के एम.एम.एच. कालेज भी गया था, मैं तो विज्ञान का छात्र था, उस समय भी डॉ. कुंवर बेचैन जी उसी कालेज में पढ़ाते थे। उनकी क्लास ऐसी लोकप्रिय होती थी कि अन्य विषय के छात्र भी उनकी कक्षा में आकर बैठ जाते थे, क्योंकि वे साहित्य पढ़ाते समय समझाने के लिए अपनी कविताएं सुनाते थे।

डॉ. बेचैन जी से मेरी शुरू में कविता में रुचि लेने वाले एक श्रोता के रूप में कवि सम्मेलनों में, फिर एक जूनियर कवि के रूप में कवि गोष्ठियों में और बाद में एक आयोजक के रूप में भी मुलाक़ात हुई, क्योंकि अपने संस्थान एनटीपीसी में कवि सम्मेलन और अन्य आयोजन कराने का सुअवसर भी मुझे मिलता था।

मैंने अपने शुरू के ब्लॉग्स में अन्य लोगों के साथ-साथ डॉ. बेचैन जी का उल्लेख भी किया है और उनके गीत अनेक बार उद्धृत किए हैं।

एक गीत जो मुझे पहले से ही बहुत प्रिय है, उसको हाल ही में डॉ. बेचैन जी ने डॉ. कुमार विश्वास द्वारा प्रस्तुत किए जाने वाले एक कार्यक्रम में पढ़ा और पुनः उस गीत के सौंदर्य पर ध्यान गया। इस कार्यक्रम में डॉ. कुमार विश्वास ने भी यह बताया कि डॉ. बेचैन उनके भी गुरुजनों में रहे हैं।
मैं डॉ. बेचैन जी का यह खूबसूरत गीत इस शुभकामना के साथ यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ कि वे लंबे समय तक हमें मधुर गीतों की सौगात देते रहें। प्रस्तुत है डॉ. कुंवर बेचैन जी का लिखा ये सुंदर गीत-

नदी बोली समन्दर से, मैं तेरे पास आई हूँ।
मुझे भी गा मेरे शायर, मैं तेरी ही रुबाई हूँ।।

मुझे ऊँचाइयों का वो अकेलापन नहीं भाया;
लहर होते हुए भी तो मेरा मन न लहराया;
मुझे बाँधे रही ठंडे बरफ की रेशमी काया।
बड़ी मुश्किल से बन निर्झर, उतर पाई मैं धरती पर;
छुपा कर रख मुझे सागर, पसीने की कमाई हूँ।।

मुझे पत्थर कभी घाटियों के प्यार ने रोका;
कभी कलियों कभी फूलों भरे त्यौहार ने रोका;
मुझे कर्तव्य से ज़्यादा किसी अधिकार ने रोका।
मगर मैं रुक नहीं पाई, मैं तेरे घर चली आई;
मैं धड़कन हूँ मैं अँगड़ाई, तेरे दिल में समाई हूँ।।

पहन कर चाँद की नथनी, सितारों से भरा आँचल;
नये जल की नई बूँदें, नये घुँघरू नई पायल;
नया झूमर नई टिकुली, नई बिंदिया नया काजल।
पहन आई मैं हर गहना, कि तेरे साथ ही रहना;
लहर की चूड़ियाँ पहना, मैं पानी की कलाई हूँ।

आज इस मधुर गीत के साथ ही मैं इस महान रचनाकार का स्मरण करता हूँ और ईश्वर से प्रार्थना करता हूँ कि उनको लंबी उम्र दें और वे इसी प्रकार हमें मधुर गीतों की सौगात देते रहें।

नमस्कार।
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