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भोपाल नामा

आज फिर, लंबे अंतराल के बाद यात्रा से संबंधित ब्लॉग-पोस्ट लिख रहा हूँ। पिछले सप्ताह एक विवाह समारोह में भाग लेने के लिए भोपाल जाना हुआ। मौके का फायदा उठाकर वहाँ अपने कुछ संबंधियों से मिलने और कुछ स्थानों का भ्रमण करने का भी कार्यक्रम बना लिया। प्रयास करूंगा कि इस यात्रा के कुछ अनुभव यहाँ साझा कर लूं।

यात्रा-प्रसंगों को ऐसा बनाने में मेरा विश्वास नहीं है कि वे सीधे-सीधे किसी पर्यटन विभाग के प्रचार-पत्र में काम आ सके। हाँ अगर वैसा करने को कहा जाए तब वह भी कर सकता हूँ, अन्यथा मेरा तो यही विश्वास है कि-

जिन्हें मंज़िलों की तलाश हो, मेरे कारवां से अलग रहें,
कि मेरा तो मक़सद-ए-ज़िंदगी, फक़त उम्र भर के सफर में है।

मेरे लिए मंज़िल पर पहुंचकर समय बिताने जितना ही महत्वपूर्ण सफर का अनुभव भी है।

हाँ तो यह 8 दिसंबर की शाम की बात है, जब मैं और मेरी पत्नी, गोवा से  इंदौर के लिए रवाना हुए, जहाँ से रात में एक ट्रेन पकड़कर सुबह भोपाल पहुंचे। तारीख का ज़िक्र मैंने इसलिए किया क्योंकि वह समय काफी महत्वपूर्ण था, राजनैतिक हलचल की दृष्टि से! पांच राज्यों में वोट पड़ चुके थे, अनेक  एग्ज़िट पोल आ रहे थे और जल्दी ही परिणाम भी आने वाले थे। चुनाव परिणाम वाले इन राज्यों में मध्य प्रदेश भी शामिल था, जहाँ की राजधानी भोपाल में हम गए थे।

खैर 9 और 10 तारीख को हम विवाह के कार्यक्रमों में शामिल हुए। भोपाल में एम.पी.नगर के एक होटल में रुके थे हम लोग और विवाह के कार्यक्रम मेरियट कोर्टयार्ड में संपन्न होने थे, जैसे कि 9 तारीख को शाम वहाँ रूफ-टॉप पर स्थित आयोजन स्थल में में रिंग सेरेमनी और 10 तारीख को एक अन्य हॉल में विवाह का मुख्य आयोजन था।

यह उल्लेख मैं इसलिए कर रहा हूँ कि आयोजकों और बारातियों आदि के लिए यह अत्यंत उत्साह और उमंग की बात होती है, जबकि होटल के स्टॉफ के लिए यह रूटीन होता है, रोज ऐसे आयोजन होते रहते हैं, कभी-कभी तो एक ही समय में 3-4 तक! एक बारात उस गेट से आ रही है और एक इधर दूसरे गेट से!

खैर वहाँ के आयोजन में भी लोग इस बात पर चर्चा करते रहे कि अगले दिन चुनाव परिणामों में क्या होने वाला है।

दो दिन हम इस आयोजन में शामिल रहे, उसके बाद 11 तारीख को सुबह ही हम अपने संबंधी, मेरे भांजे के घर चले गए, और इसके साथ ही चुनाव परिणामों की धूमधाम भी चालू हो गई। मध्य-प्रदेश के चुनाव परिणाम विशेष रूप से क्रिकेट मैच की तरह रोमांच से भरे रहे, लेकिन अंत में शायद किसानों की ऋण माफी जैसे आश्वासन काम कर गए और 13 साल तक मुख्यमंत्री रहने के बाद शिवराज मामा को कुर्सी छोड़नी पड़ी।

मेरे भांजे को राजनीति से विशेष लगाव नहीं है, लेकिन उसका यह कहना था कि शिवराज जी ने मुख्यमंत्री के रूप में भोपाल में विकास के बहुत से काम किए हैं, और अब लगता है कि वे काम आगे नहीं बढ़ पाएंगे, क्योंकि अब तो ‘पॉपुलिस्ट’ किस्म के काम करने में ही खजाना लग जाएगा।

खैर मैं राजनीति की बात आगे नहीं करूंगा, कल से वहाँ किए गए भ्रमण के बारे में कुछ लिखूंगा, आज अपनी बात यहीं समाप्त करता हूँ।

नमस्कार।


2 replies on “भोपाल नामा”

Going to family functions are exciting. So many relatives whom we have not met in long time, we get to see. Plus all the eating and festivities. Personally, I don’t like to go to these functions. But my family members are all very excited to attend marriages. They get to wear and show nice clothing, jewellery and learn new gossips.

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