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41. मधु का सागर लहराता था…!

यादों के समुंदर में एक और डुबकी,लीजिए प्रस्तुत है एक और पुराना ब्लॉग!

मैंने कितनी नौकरियों और अलग-अलग स्थानों पर तैनाती के बहाने से अपनी राम-कहानी कही है, याद नहीं। लेकिन आज दो नौकरियों की याद आ रही है, जिनका ज़िक्र नहीं हुआ। जाहिर है ये काम मैंने शुरू के समय में, बेरोज़गार रहते हुए, शाहदरा में निवास के समय ही किए थे।

एक नौकरी थी फिल्म देखने की, और इस नौकरी के दौरान मैंने एक सप्ताह तक फिल्म देखी, फिल्म थी ‘हमराज़’, हर रोज़ फिल्म के चारों शो! मैं तैनात था फिल्म वितरक की तरफ से, डिस्ट्रीब्यूटर के नाम से ज्यादा जानते हैं शायद उसको, और मेरा काम था कि हर शो शुरू होने के बाद, प्रत्येक श्रेणी में कितनी सीटें खाली बची थीं यह देखना और यह विवरण मैंने दे दिया संबंधित व्यक्ति को, उसके बाद मैं चाहूं तो फिल्म देखता रहूं या बाहर टहलकर अगला शो शुरू होने का इंतज़ार करूं।

मैं रहता था शाहदरा में, और यह ड्यूटी मेरी गांधी नगर के किसी सिनेमा हॉल में लगी थी, इस प्रकार शो के बीच में घर जाकर वापस आने की तो गुंजाइश नहीं थी। मैंने एक-दो बार तो फिल्म लगभग पूरी देखी, उसके बाद अक्सर मैं गाने सुनने के लिए हॉल में आ जाता था, जबकि सामान्यतः लोग इसका उल्टा करते हैं। शायद पहली बार महेंद्र कपूर के कई गाने इस फिल्म में आए थे और वे बहुत लोकप्रिय भी हुए थे। ‘न मुंह छुपा के जियो और न सर झुका के जियो’ आदि।

अगर मुझे सही याद है तो इसी फिल्म के लिए महेंद्र कपूर को फिल्मफेयर पुरस्कार मिला था और जैसा मैंने पढ़ा है, उस समय के किसी स्थापित गायक ने उनको बधाई तक नहीं दी थी। लेकिन इस घटना के अगले दिन, उदार हृदय वाले अमर गायक मुकेश जी महेंद्र कपूर जी के घर बधाई देने चले गए थे। इस घटना का महेंद्र कपूर जी ने बड़े आदर के साथ उल्लेख किया है।

खैर, मैं अपनी ड्यूटी की बात कर रहा था, फिल्म के नायक राजकुमार तो अपनी अदाओं के लिए जाने ही जाते हैं, फिल्म में एक नई हीरोइन भी आई थी, जो बाद में पता नहीं कहाँ चली गई। फिल्म की कहानी तो बिल्कुल याद नहीं है (वैसे मेरा कहानी सुनाने का इरादा बिल्कुल नहीं है) हाँ राजकुमार के सफेद जूते ध्यान में आते हैं, शायद उनकी कहानी के सस्पेंस में, विशेष भूमिका थी।

यह किस्सा मैंने सुनाया एक सप्ताह की नौकरी का, उसका पैसा कितना मिला था याद नहीं और शायद बाद में वितरक को मेरी ज़रूरत नहीं पड़ी।

अब दूसरी नौकरी की कहानी सुना देता हूँ, ये नौकरी चली सिर्फ एक दिन। कोई टायर री-ट्रेडिंग कंपनी थी, उसकी तरफ से अन्य लोगों की तरह मुझे भी तैनात कर दिया गया था, एक पैट्रोल पंप पर। शायद झंडेवालान के पास था पेट्रोल पंप, सही याद नहीं।

तो हमको वहाँ पेट्रोल पंप पर रहना था, ऐसा दिखाना था कि हम पेट्रोल पंप के ही लोग हैं। जो लोग पेट्रोल भरवाने आते हैं, उनसे ठीक से बात करनी थी, कोई सहायता संभव हो तो करनी थी और निगाह टिकाये रखनी थी उनकी गाड़ी के टायरों पर, अगर कोई टायर घिसा हुआ मिल गया, तब हमारा काम था कि उनके शुभचिंतक बनकर उनको बताएं कि आपको टायर रीट्रेड कराने की ज़रूरत है, और हम आपकी सहायता के लिए मौज़ूद हैं, हम यहीं घिसा हुआ टायर निकालकर, उसके स्थान पर एक काम-चलाऊ टायर लगा देंगे और अगले दिन आप अपना री-ट्रेड किया हुआ टायर ले जा सकते हैं।

कुल मिलाकर किस्सा इतना कि दिन भर के प्रयास के बाद मुझे एक ग्राहक मिल गया। मुझसे काफी देर तक मालिक ने पूछा कि आपने उसको कैसे तैयार किया।

मैं इस सफलता से काफी उत्साहित था, लेकिन शाम के समय कुछ ऐसा हुआ कि मैं फिर से काम पर नहीं गया। कंपनी के मालिक शायद सरदार जी थे, उन्होंने मुझसे कहा- “मि. शर्मा, यू मे नॉट बी वेल ड्रेस्ड, बट यू मस्ट बी वेल प्रेस्ड”।

अब फक़ीरी का स्वभाव है, नौकरी रहे न रहे, लेकिन मेरा अपना स्वभाव रहा है और उसको बदलना आसान नहीं है।

मैंने कभी लिखा भी था-

‘क्रीज़ बनाए रखने की कोशिश में,
बिता देते हैं पूरा दिन-
इस्तरी किए हुए लोग’

ऐसा लगता है कई बार कि इस्तरी बंदे के कपड़ों पर नहीं, बल्कि उसकी पर्सनैलिटी पर हुई है। इस प्रकार, एक दिन की उस नौकरी का समापन हुआ।

आज हरिवंश राय बच्चन जी का एक गीत पढ़ लेते हैं-

मैं जीवन में कुछ न कर सका!
जग में अँधियारा छाया था,
मैं ज्वाला लेकर आया था
मैंने जलकर दी आयु बिता, पर जगती का तम हर न सका!
मैं जीवन में कुछ न कर सका!

अपनी ही आग बुझा लेता,
तो जी को धैर्य बँधा देता,
मधु का सागर लहराता था, लघु प्याला भी मैं भर न सका!
मैं जीवन में कुछ न कर सका!

बीता अवसर क्याआएगा,
मन जीवन भर पछताएगा,
मरना तो होगा ही मुझको, जब मरना था तब मर न सका!
मैं जीवन में कुछ न कर सका!

नमस्कार।

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वसंत का एक दिन – रवींद्रनाथ ठाकुर

आज मैं भारत के नोबल पुरस्कार कवि  गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता वन डे इन स्प्रिंग’ का भावानुवाद-

 

गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता 

वसंत का एक दिन

वसंत के मौसम में एक दिन, एक महिला
मेरे एकाकी वनों में आई,
वह प्रेयसी के अति सुंदर रूप में आई-
मुझे सौंपने के लिए मेरे गीत,  मेरी प्यारी धुनें,
मेरे स्वप्नों को, मिठास प्रदान करने के लिए,
अचानक एक तूफानी लहर आई,
उसने मेरे हृदय के किनारों ध्वस्त कर दिया,
और सभी भाषाओं को डुबो दिया।

मेरे होठों पर कोई नाम नहीं आया,
वह पेड़ के नीचे खड़ी थी, वह घूमी,
मेरे चेहरे की तरफ देखा, जो दर्द से उदास दिख रहा था,
वह तेज कदमों से आगे बढ़ी, और मेरे पास बैठ गई।
उसने मेरे हाथों को अपने हाथों में लिया, फिर वह बोली:
‘न तुम मुझे जानते हो और न मैं तुमको-
मुझे आश्चर्य है कि ऐसा कैसे हो सकता है?’
मैंने कहा:
‘हम दोनो मिलकर बना सकते हैं, हमेशा के लिए एक पुल
दो प्राणियों के बीच, जो एक-दूसरे से अनजान हैं,
यह उत्कंठापूर्ण अजूबा, सभी के दिल में शामिल है।’

मेरे दिल का जो क्रंदन है, वही उसके दिल का भी है;
जिस धागे से वह मुझे बांधती है, वही उसे भी बांधता है।
उसको मैंने हर जगह पाना चाहा है,
उसकी मैंने अपने भीतर पूजा की है,
उसी पूजा के भीतर छिपे रहते हुए ही, उसने भी मुझे पाना चाहा है।

विशाल समुद्रों को पार करते हुए, वह आई मेरा दिल चुराने के लिए।
जिसे वह वापस लौटाना भूल गई, क्योंकि उसने अपना खो दिया था।
उसका अपना सौंदर्य ही, उसको धोखा दे गया था,
वह अपना जाल फैलाती है, और यह नहीं जानती
कि वह इसमें किसी को पकड़ेगी, या खुद पकड़ी जाएगी।

 

और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-

One Day In Spring.

One day in spring, a woman came
In my lonely woods,
In the lovely form of the Beloved.
Came, to give to my songs, melodies,
To give to my dreams, sweetness.
Suddenly a wild wave
Broke over my heart’s shores
And drowned all language.

To my lips no name came,
She stood beneath the tree, turned,
Glanced at my face, made sad with pain,
And with quick steps, came and sat by me.
Taking my hands in hers, she said:
‘You do not know me, nor I you-
I wonder how this could be?’
I said:
‘We two shall build, a bridge for ever
Between two beings, each to the other unknown,
This eager wonder is at the heart of things.’

The cry that is in my heart is also the cry of her heart;
The thread with which she binds me binds her too.
Her have I sought everywhere,
Her have I worshipped within me,
Hidden in that worship she has sought me too.

Crossing the wide oceans, she came to steal my heart.
She forgot to return, having lost her own.
Her own charms play traitor to her,
She spreads her net, knowing not
Whether she will catch or be caught.

 

Rabindranath Tagore

 

नमस्कार।

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वो हंसके मिले, हम प्यार समझ बैठे!

आज 1966 में रिलीज़ हुई फिल्म- ‘बहारें फिर भी आएंगी’ का एक गीत याद आ रहा है। यह गीत- ओ.पी.नैय्यर जी के संगीत निर्देशन में आशा भौंसले जी ने गाया था। इस गीत के लेखक थे- श्री एस. एच. बिहारी जी। यह गीत लंबे समय तक बिनाका गीतमाला का टॉप गीत बना रहा था।

वास्तव में इस छोटे से गीत में लेखक ने बहुत जोरदार अभिव्यक्ति दी है और जानदार संगीत और उस पर आशा ताई की मधुर स्वर-लहरी।

लीजिए प्रस्तुत है यह गीत-

वो हँस के मिले हमसे, हम प्यार समझ बैठे
बेकार ही उल्फ़त का इज़हार समझ बैठे
वो हँस के मिले…

ऐसी तो न थी क़िस्मत, अपना भी कोई होता
अपना भी कोई होता
क्यूँ ख़ुद को मुहब्बत का हक़दार समझ बैठे
वो हँस के मिले…

रोएँ तो भला कैसे, खोलें तो ज़ुबाँ क्यूँ कर
खोलें तो ज़ुबाँ क्यूँ कर
डरते हैं कि न जाने क्या, संसार समझ बैठे
बेकार ही उल्फ़त का…

आज के लिए इतना ही।

नमस्कार।


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Books for Listening!

The point for today’s submission is whether books that we read are more effective or the books that we listen. This did not and can’t come to my mind, since I have never considered books to be something that should be listened. I am discussing it based on an IndiSpire prompt for this weekend.

Yes book reading has been something I loved for quite long time, now I rarely read anyway. May be internet is the villain in this case, there is no time left for reading. That habit also has been lost to great extent.

But listening to books? I understand that listening to music is nice and I  can keep listening to songs and ghazals sung by my favorite singers for hours and hours. So the audio medium is quite good for music no doubt.

Sometimes when somebody wants to worship and does not remember the prayer or mantras, he or she can play cassette, CD etc. of the mantras. Sometimes people also prefer to get the chanting done by the digital medium and by listening to the Mantras etc., they consider their worship to be complete.

Further the audio medium is good instructor, when people want to do some yoga, exercises or  any procedure of dhyaan etc. for their well being, they can use audio system. The audio can be a good instructor and we can follow the audio instructions for all that.

So the basic difference I feel is that – ‘books are best friends or companions’ we consider. This is true for the books in print only. I can’t think of any audio item (CD, Cassette or whatever digital audio form), to be book. These can be good instructors, good medium for listening to music, but I do not find it easy to accept that as a book, to listen to any story or say novel in audio form.

Further for listening to a big story, novel etc.  in audio form, the narrator needs to have some extra ordinary oration skills, it is not easy to keep the interest of the listener intact for long time. When we read and find something not easy to comprehend in first reading, we read that again. The orator has to keep in mind what may not be understood by listener in first instance. The atmosphere has to be created by the orator and interest of the listener to be kept alive.

For study material, the audio medium may be used  to some extent but it can not compete with the print form in any way.

 

Thanks for reading.

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Long live our Great Republic

We just celebrated the 70th Republic Day of our great country India. Our Republic became 69 yrs old on 26th January, 2019. Our great leaders had made untiring efforts, sacrifices and as a result we became a free nation on 15th August, 1947 and after prolonged discussions we developed our great constitution and adopted it on 26th January,1950 and we became a sovereign republic, the biggest democracy of the world.


Today I would not give much ‘Gyaan’ , Just would share a small rhyming write-up, based on the prompt given this time under WOW weekly prompt on ‘BlogAdda’.

 

We are Indians, we have loveffaction for the world.
We feel happyjoyful to see everybody around happy.
But there are people, who enjoy hurting others,
Their nastyevil joy depends on pains of others.
They like the colorblood the most.
They aim to capture the world by killing humanity.
Cowards, they hit innocent citizens.
What virtue, what religion they want to spread.
Their days are gone, let humanunity kill all those-
Who want to kill humanity.
2.
Let us spread love
The spirit of democracy,
The message of our saints,
Thoughts of Gandhi Ji,
Films of Raj Kapoor.
Words of poet Shailendra,
Soulful voice of Singer Mukesh.
Let all sing-
‘Mera jutaa hai jaapani,
Ye patloon englistaani, sir par laal topi roosi,
Fir bhi dil hai Hindustaani.

 

This is in response to the #WOW prompt – “Using Made Up Words, Write An Amusing Rhyming Poem“.

This post is a part of Write Over the Weekend, an initiative for Indian Bloggers by BlogAdda.

Thanks for reading.


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40. मालूम क्या किसी को, दर्द-ए-निहां हमारा!

सभी मित्रों को भारतीय गणतंत्र दिवस की बधाई देते हुए, आज फिर से यादों की पुरानी संदूकची खोल रहा हूँ, लीजिए प्रस्तुत है एक और पुराना ब्लॉग!

Brown Concrete India Gate

पता नहीं क्या सोचकर यह ब्लॉग लिखने की शुरुआत की थी। और इसको शेयर करता हूँ ट्विटर पर, फेसबुक पर!

जैसे गब्बर सिंह ने सवाल पूछा था, क्या सोचा था सरदार बहुत खुश होगा, शाबाशी देगा! यहाँ पर सरदार कौन है!

यह बहस तो शुरू से चली आ रही है कि कुछ भी लिखने से कुछ फर्क पड़ता है क्या? खास तौर पर उसको ट्विटर और फेसबुक पर शेयर करने से। यहाँ सबकी अपनी-अपनी सोशल हैसियत के हिसाब से फैन-फॉलोविंग है। यहाँ क्या कोई ऐसा है, जो खुद को दूसरों से कम विद्वान मानता है? मैं तो कई बार इन प्लेटफॉर्म्स को ‘आत्ममुग्ध सभा’ के नाम से जानना पसंद करता हूँ!

वो तो पढ़े जाने के लिए कुछ पढ़ना भी पड़ता है, वरना यहाँ हर विद्वान दूसरों को शिक्षित करने के पावन उद्देश्य से ही अपना अमूल्य समय दे रहा है।

यहाँ कोई भी कोहली को खेलना और कप्तानी करना सिखा सकता है और बड़े से बड़े पॉलिटिशियन को राजनीति के दांवपेच भी बता सकता है।

ऐसी महान ऑडिएंस के बीच कभी मन होता है कि हम भी कुछ बात कहें और कुछ लोग कर्त्तव्य भावना से, कुछ विशेष लिहाज़ करते हुए पढ़ लेते हैं।

मुझे एक पुराने कवि-मित्र श्री राजकुमार प्रवासी जी याद आ रहे हैं, उनकी पत्नी ने उनके एक मित्र को एक बार बताया था, “भैया पहले तो इनकी कविता थोड़ी-बहुत समझ में आती थी, अब बिल्कुल नहीं आती। लेकिन ये रात में भी कागज़-कलम साथ लेकर सोते हैं, कि पता नहीं कब सरस्वती जी दौरे पर हों और इनसे कुछ लिखवा लें।”

खैर अब इन ऊल-जलूल बातों को छोड़कर मैं उनके प्रति आभार अवश्य व्यक्त करना चाहूंगा जिन्होंने मेरे इन ब्लॉग्स को पढ़ा है और उन पर अपनी अमूल्य सम्मति दी है।

आज राज कपूर जी की फिल्म- ‘फिर सुबह होगी’ का एक खूबसूरत गीत शेयर कर रहा हूँ, जो साहिर जी ने लिखा है, मुकेश जी ने गाया है और इसका संगीत खय्याम जी ने दिया है-

चीन-ओ-अरब हमारा, हिंदोस्तां हमारा
रहने को घर नहीं है, सारा जहाँ हमारा।

खोली भी छिन गई है, बेंचें भी छिन गई हैं,
सड़कों पे घूमता है, अब कारवां हमारा।

जेबें हैं अपनी खाली, क्यों देता वरना गाली,
वो संतरी हमारा, वो पासबां हमारा।

जितनी भी बिल्डिंगें थीं, सेठों ने बांट ली हैं,
फुटपाथ बंबई के, हैं आशियां हमारा।

होने को हम कलंदर, आते हैं बोरीबंदर,
हर कुली यहाँ का, है राज़दां हमारा।

तालीम है अधूरी, मिलती नहीं मजूरी,
मालूम क्या किसी को दर्द-ए-निहां हमारा।

पतला है हाल अपना, लेकिन लहू है गाढ़ा,
फौलाद से बना है, हर नौजवां हमारा।

मिलजुलकर इस वतन को, ऐसा बनाएंगे हम,
हैरत से मुंह तकेगा, सारा जहाँ हमारा॥

इसी के साथ आज की कथा यहाँ संपन्न होती है।

नमस्कार।

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बादल और लहरें – रवींद्रनाथ ठाकुर

आज मैं भारत के नोबल पुरस्कार कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘क्लॉउड्स एंड वेव्स’ का भावानुवाद-

गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता

 


बादल और लहरें

सुनो मां, बादलों में  रहने वाले दोस्त मुझे बुलाते हैं-
“सुबह हमारे जागने के समय से दिन के अंत तक, हम साथ खेलते हैं।

हम सुनहरी भोर के साथ खेलते हैं, हम खेलते हैं- चमकीले चांद के साथ।”

मैं उनसे पूछता हूँ, “लेकिन मैं तुम्हारे पास कैसे आ सकता हूँ?”
उनका जवाब होता है, “धरती के किनारे पर आ जाओ, अपने हाथ ऊपर उठाओ-
आकाश की तरफ, और तुम बादलों में पहुंचा दिए जाओगे।“

“मेरी मां घर पर मेरी प्रतीक्षा कर रही है”, मैं कहता हूँ,”मैं उसे छोड़कर
कैसे आ सकता हूँ?”
ये सुनकर वे मुस्कुराते हैं, और तैरकर दूर चले जाते हैं।

परंतु मां, मैं उससे भी अच्छा एक खेल जानता हूँ।
मैं बादल बन जाऊंगा और तुम चांद बनोगी।
मैं तुमको अपने दोनों हाथों से ढक लूंगा, और हमारे घर की छत
नीला आकाश बन जाएगी।

लहरों में रहने वाले दोस्त मुझे बुलाते हैं-
                              “हम सुबह से रात तक गाते रहते हैं; आगे और आगे                                हम सैर करते रहते हैं, और हम नहीं जानते
कि हम कहाँ से होकर जा रहे हैं।

मैं पूछता हूँ, “लेकिन मैं तुम्हारे बीच कैसे आ सकता हूँ?”
वे मुझे बताते हैं, “समुद्र के किनारे आओ और अपनी आंखें बंद करके खड़े रहो
और लहरें तुम्हे अपने ऊपर बिठाकर लेकर आ जाएंगी।”

मैं कहता हूँ, “मेरी मां घर पर है, वह चाहती है कि मैं हर समय उसके साथ रहूं-
मैं उसको छोड़कर कैसे जा सकता हूँ?”
वे मुस्कुराते हैं और नाचते हुए आगे बढ़ जाते हैं।

परंतु मुझे इससे ज्यादा अच्छा खेल मालूम है,
मैं लहरें बन जाऊंगा और तुम एक अजाना किनारा बनोगी।
                                          मैं बल खाता हुआ आगे बढ़ता जाऊंगा,                                           तुम्हारी गोदी में आकर ठहाका मारकर हंसूगा,
और दुनिया में कोई नहीं जान पाएगा कि हम दोनों कहाँ हैं।

और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-

Clouds And Waves

Rabindranath Tagore

Mother, the folk who live up in the clouds call out to me-
“We play from the time we wake till the day ends.
We play with the golden dawn, we play with the silver moon.”
I ask, “But how am I to get up to you ?”

They answer, “Come to the edge of the earth, lift up your
hands to the sky, and you will be taken up into the clouds.”
“My mother is waiting for me at home, “I say, “How can I leave
her and come?”
Then they smile and float away.

But I know a nicer game than that, mother.
I shall be the cloud and you the moon.
I shall cover you with both my hands, and our house-top will
be the blue sky.

The folk who live in the waves call out to me-
“We sing from morning till night; on and on we travel and know
not where we pass.”
I ask, “But how am I to join you?”

They tell me, “Come to the edge of the shore and stand with
your eyes tight shut, and you will be carried out upon the waves.”
I say, “My mother always wants me at home in the everything-
how can I leave her and go?”
They smile, dance and pass by.

But I know a better game than that.
I will be the waves and you will be a strange shore.
                                                      I shall roll on and on and on,                                          and break upon your lap with laughter.
And no one in the world will know where we both are.

नमस्कार।


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व्यापारी- रवींद्रनाथ ठाकुर

आज मैं भारत के नोबल पुरस्कार कवि  गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता दा मर्चेंटका भावानुवाद-

 

गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता 

व्यापारी

 

कल्पना करो मां, कि तुम घर पर रहती हो और मैं यात्रा करता हूँ,
अजाने प्रदेशों की। 

कल्पना करो कि मेरी नाव तैयार है, रवाना होने को, पूरी तरह सामान से लदी हुई।
अब ठीक से सोचो मां, इससे पहले कि तुम मुझसे कहो, कि मैं वापस आते समय
तुम्हारे लिए क्या लेकर आऊं।

मां, क्या तुम चाहती हो सोने की अनेकों ढेरियां?
वहाँ, सुनहरी धाराओं के किनारों पर, खेत
सुनहरी फसलों से भरे पड़े हैं।

और वन-मार्ग के छायादार रास्तों में, सुनहरे चंपा के फूल
भूमि पर गिरते रहते हैं। 

मैं उनको सैंकड़ों टोकरियों में भरकर तुम्हारे लिए लाऊंगा। 
मां, क्या तुम पतझड़ में गिरने वाली बूंदों जैसे बड़े-बड़े मोती पाना चाहती हो?

मैं मोतियों वाले द्वीप का किनारा पार करूंगा,.
वहाँ प्रभात के समय, घास मैदान में फूलों पर, हल्के से मोती कंपकपाते हैं
ये मोती घास पर गिर जाते हैं, और मोती बिखरे रहते हैं,
समुद्र की बेकाबू लहरों के निकट, रेत में छितराए हुए।
मेरा भाई के पास, एक जोड़ी पंख वाले घोड़े होंगे,
उड़ने के लिए-. बादलों के बीच। 

पिताजी के लिए मैं ऐसी जादुई कलम लाऊंगा, जो स्वयं ही लिखेगी।
और तुम्हारे लिए मां, मुझे अवश्य लानी चाहिए, गहनों की ऐसी संदूकची, 
जिसकी कीमत, सात राजाओं को अपना राजपाट देकर चुकानी पड़े।

 

और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ- 

The Merchant

Rabindranath Tagore

Imagine, mother, that you are to stay at home and I am to travel into strange lands.
Imagine that my boat is ready at the landing fully laden.
Now think well, mother, before you say what I shall bring for
you when I come back.
Mother, do you want heaps and heaps of gold?
There, by the banks of golden streams, fields are full of
golden harvest.
And in the shade of the forest path the golden champ flower
drop on the ground.

I will gather them all for you in many hundred baskets.
Mother, do you want pearls big as the raindrops of autumn?
I shall cross to the pearl island shore.
There in the early morning light pearls tremble on the meadow
flowers, pearls drop on the grass, and pearls are scattered on the
sand in spray by the wild sea-waves.
My brother shall have a pair of horses with wings to fly among
the clouds.
For father I shall bring a magic pen that, without his
knowing, will write of itself.
For you, mother, I must have the casket and jewel that cost
seven kings their kingdom.

 

नमस्कार।

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जब दो बहनें (कुएं से) पानी भरने जाती हैं- टैगोर

आज भी मैं भारत के नोबल पुरस्कार कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित एक कविता का भावानुवाद है, जिसे अनुवाद के बाद मूल रूप में प्रस्तुत किया गया है। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘व्हेन टू सिस्टर्स गो टू फेच वॉटर’ का भावानुवाद-

गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता

जब दो बहनें (कुएं से) पानी भरने जाती हैं

 

जब वे दो बहनें पानी भरने जाती हैं,

वे इस स्थान तक पहुंचती हैं और वे मुस्कुराती हैं।
उन्हें अवश्य ही उस व्यक्ति के बारे में पता होगा,

जो उस समय पेड़ों के पीछे खड़ा होता है,

जब भी वे पानी भरने जाती हैं।

दोनों बहनें एक-दूसरे से फुसफुसाकर बात करती हैं,

जब वे इस स्थान से आगे बढ़ती हैं।
उन्होंने अवश्य उस व्यक्ति के रहस्य का अनुमान कर लिया होगा,

जो तब पेड़ों के पीछे खड़ा होता है, जब भी वे पानी भरने जाती हैं।

जैसे ही वे उस स्थान पर पहुंचती हैं,

उनके मटकों में अचानक झटका लगता है,

और कुछ पानी छलक जाता है।

उन्हें अवश्य यह पता हो गया है कि हमेशा उनके वहाँ से गुजरने के समय,

पेड़ों के पीछे खड़े व्यक्ति का-

दिल तेजी से धड़क रहा होता है।

दोनो बहनें जब इस स्थान पर पहुंचती हैं,

तब एक-दूसरे को देखती है और मुस्कुराती हैं।
उनके तेजी से बढ़ते कदमों में एक हास होता है,

जिससे किसी व्यक्ति के मन में भ्रम उत्पन्न होता है;

वह जो वहाँ पेड़ों के पीछे खड़ा होता है;

जब भी वे पानी भरने जाती हैं।

और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-

When The Two Sisters Go To Fetch Water

Rabindranath Tagore

WHEN the two sisters go to fetch water,

they come to this spot and they smile.
They must be aware of somebody who stands

behind the trees whenever they go to fetch water.

The two sisters whisper to each other when they pass this spot.
They must have guessed the secret of that somebody  who stands behind the trees whenever they go to fetch water.

Their pitchers lurch suddenly,

and water spills when they reach this spot.
They must have found out that

somebody’s heart is beating

who stands behind the trees whenever they go to fetch water.

The two sisters glance at each other

when they come to this spot,

and they smile.

There is a laughter in their swift-stepping feet,

which makes confusion in somebody’s mind

who stands behind the trees

whenever they go to fetch water.

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।


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यह श्वान – रवींद्रनाथ ठाकुर

आज मैं भारत के नोबल पुरस्कार विजेता तथा हमारे राष्ट्रगान के रचयिता कवि- गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित एक कविता का भावानुवाद है। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘दिस डॉग’ का भावानुवाद-

गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता

यह श्वान

हर सुबह यह श्वान, जिसका बहुत लगाव है मुझसे,
शांत बैठा रहता है मेरे कदमों के पास,
उसका मुंह मुझे छूता रहता है
और मैं उसके साथ को महसूस करता रहता हूँ।

यह ऐहसास उसको कितनी खुशी देता है,
विशुद्ध उल्लास उसके पूरे शरीर में तैर जाता है।

सभी मूक जीवों में
यह इकलौता प्राणी है
जो संपूर्ण मनुष्य को देखता है
उसकी उन अच्छाइयों और बुराइयों से आगे निकलकर,
जो उसने देखी हों,
क्योंकि उसका प्रेम न्यौछावर कर सकता है अपना जीवन
वह उसको केवल प्रेम भर के लिए भी प्रेम करता रह सकता है,
क्योंकि यह वही है, जो रास्ता दिखाता है,
जीवन से धड़कती इस विशाल दुनिया को।

जब मैं उसके गहन अनुराग को देखता हूँ
उसके समूचे अस्तित्व का समर्पण
तब मैं यह नहीं समझ पाता
उसकी इस सहज प्रवृत्ति से
कि उसने मनुष्य में क्या खोज लिया है।

अपनी शांत, उत्सुक और दयनीय निगाहों से
वो यह बता नहीं पाता कि वह क्या समझता है
परंतु वह मुझे यह बताने में सफल हुआ है कि
पूरी सृष्टि के बीच
मनुष्य की वास्तविक स्थिति क्या है।

 

और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-

This Dog

Rabindranath Tagore

Every morning this dog, very attached to me,
Quietly keeps sitting near my seat
Till touching its head
I recognize its company.

This recognition gives it so much joy
Pure delight ripples through its entire body.

Among all dumb creatures
It is the only living being
That has seen the whole man
Beyond what is good or bad in him
It has seen
For his love it can sacrifice its life
It can love him too for the sake of love alone
For it is he who shows the way
To the vast world pulsating with life.

When I see its deep devotion
The offer of its whole being
I fail to understand
By its sheer instinct
What truth it has discovered in man.

By its silent anxious piteous looks
It cannot communicate what it understands
But it has succeeded in conveying to me
Among the whole creation
What is the true status of man.

नमस्कार।

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