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चंपा का फूल

आज मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि  गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य संकलन- ‘PoemHunter.com’ से लेता हूँ। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘The Champa Flower’ का भावानुवाद-

गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता 

चंपा का फूल

 

कल्पना करो कि मैं, बस ऐसे ही आनंद लेने के लिए-

चंपा का फूल बन जाता, और किसी वृक्ष की ऊंची शाखा पर खिलता,
और हवा के साथ, मुक्त हंसी के साथ हिलता, और
नई-नई निकली कोंपलों के ऊपर नृत्य करता,

तब क्या तुम मुझे पहचान पातीं मां?
तुम आवाज लगातीं, “बच्चे, कहाँ हो तुम?”

और मैं भीतर ही भीतर हंसता और चुप रहता।

मैं चालाकी से अपनी पंखुड़ियां खोलता,

और तुम्हे काम में लगे हुए देखता।
जब तुम स्नान करने के बाद,

       गीले केश अपने कंधों पर बिखराए हुए,     

                    चंपा वृक्ष की छाया में  चलते हुए, छोटे से आंगन में आतीं,
जहाँ तुम अपनी प्रातः वंदना करती हो,

तुम इस पुष्प की गंध तो महसूस करतीं,
परंतु नहीं जान पातीं, कि यह गंध मुझसे आ रही है।     

                             और जब दोपहर के भोजन के बाद,                                      तुम खिड़की के पास बैठकर-
                                     रामायण पढ़ोगी, और वृक्ष की छाया                                                             तुम्हारे केशों और आंचल पर पड़ेगी,
                                         मैं अपनी छोटी सी छाया उस पृष्ठ पर,                    ठीक वहाँ डालूंगा,  जहाँ तुम पढ़ रही होवोगी,
लेकिन क्या तुम पहचान पाओगी कि यह तुम्हारे बच्चे की नन्ही सी छाया है?

और जब संध्या वेला में, जब तुम अपने हाथ में जलता दीपक लेकर
गाय के अहाते में जाओगी, तब मैं अचानक धरती पर कूद जाऊंगा
और फिर से तुम्हारा बच्चा बन जाऊंगा, और तुमसे कहूंगा
कि मुझे तुम कहानी सुनाओ।

“कहाँ थे तुम अब तक, मेरे शैतान बच्चे?” तुम कहोगी,  
“मैं तुमको नहीं बताऊंगा, मां”

यही है जो तुमको और मुझको उस समय करना चाहिए।

रवींद्रनाथ ठाकुर

 

 

और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ- 

 

The Champa Flower

Supposing I became a chanpa flower,

just for fun, and grew on a
branch high up that tree, and shook

in the wind with laughter and
danced upon the newly budded leaves,

would you know me, mother?
You would call, “Baby, where are you?”

and I should laugh to
myself and keep quite quiet.
I should slyly open my petals

and watch you at your work.
When after your bath, with wet hair

spread on your shoulders,
you walked through the shadow

of the champa tree to the little court
where you say your prayers,

you would notice the scent of the
flower, but not know that it cane from me.
When after the midday meal you sat at the window reading
ramayana, and the tree’s shadow

fell over your hair and your lap,
I should fling my wee little shadow

on to the page of your book,
just where you were reading.
But would you guess that it was

the tiny shadow of your
little child?
When in the evening you went

to the cow shed with the lighted
lamp in your hand I should

suddenly drop on to the earth again and
be your own baby once more,

and beg you to tell me a story.
“Where have you been, you naughty child?”
“I won’t tell you, mother.”

That’s what you and I would say
then.

  Rabindranath Tagore

 

नमस्कार।

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43. रात लगी कहने सो जाओ देखो कोई सपना!

आज फिर प्रस्तुत है एक और पुराना ब्लॉग-

मैंने अपने शुरू केे ब्लॉग्स में बचपन  से लेकर वर्ष 2010 तक, जबकि मेरे सेवाकाल का समापन एनटीपीसी ऊंचाहार में हुआ, तब तक अपने आसपास घटित घटनाओं को साक्षी भाव से देखने का प्रयास किया, जैसे चचा गालिब ने कहा था-

बाज़ार से गुज़रा हूँ, खरीदार नहीं हूँ।

मैंने ज़िक्र किया था कि एक बार हमारे अंग्रेजी शिक्षक ने स्पेयर पीरियड में हमसे एक निबंध लिखने को कहा था-‘इफ आइ वर ए माली’, मैंने रफ कॉपी में वह निबंध लिखा था और सब छात्रों की तरह उनको सुना दिया था। बाद में उन शिक्षक ने मुझसे वो निबंध मांगा था, क्योंकि उनको लगा होगा कि उसमें कुछ ऐसे पॉइंट्स थे जो वे शिक्षण हेतु अपने ड्राफ्ट में शामिल कर सकते थे। लेकिन मैं उनको वह नहीं दे पाया था, क्योंकि मैंने उसे रफ कॉपी में लिखा था और फाड़ दिया था।

मेरे ये ब्लॉग, आज की तारीख में लिखे गए नए ड्राफ्ट हैं, लेकिन ये रफ कॉपी में नहीं लिखे गए हैं। संभव है कि भविष्य मेरे कोई गुरू इनकी मांग करें तो मैं संजोकर इनको दे सकता हूँ अथवा संभव है कि किसी प्रकार पुस्तक रूप में प्रकाशन की सनक भी चढ़ जाए तो इनका सदुपयोग किया जा सकता है। मेरी कुछ कविताएं भी इस बहाने सुरक्षित हो जाएंगी। इसलिए इसका ज्यादा महत्व नहीं है कि कितने लोग इसको पढ़ते हैं।

अतीत में झांकना इंसान को अच्छा लगता है, क्योंकि जो घटनाएं अपने समय पर अत्यंत पीड़ादायक रही हों, वे भी आज की तारीख में सुरक्षित अनुभव और मार्गदर्शक बन जाती हैं।

लेकिन फिर भी, कब तक अतीत में रहा जाए, जंप लगाकर वर्तमान में आना अच्छा रहेगा?

चलिए ऐसा ही करते हैं।

सेवानिवृत्त होने के बाद 1 मई, 2010 से कुछ महीने तक हम लखनऊ के अपने घर में रहे, जिसे बड़ी मेहनत से अर्जित और विकसित किया था, लेकिन जल्दी ही एहसास हुआ कि हमें दिल्ली, ग़ुड़गांव आना होगा बच्चों के पास। मकान को अर्जित करने के लिए पत्नी और बच्चों ने अधिक मेहनत की थी, निपटाने के लिए मैंने ज्यादा की, क्योंकि उसके लिए दिल्ली/गुड़गांव से कई बार लखनऊ आना पड़ा।

कुछ समय दिल्ली में मालवीय नगर के पास और उसके बाद गुड़गांव में 2-3 जगहों पर 5-6 साल तक रहे और अभी 6 महीने पहले ही एक हाई राइज़ टॉवर्स वाली सोसायटी में शिफ्ट हुए, बड़ी खूबसूरत सोसायटी है, पत्नी और बेटों ने लगभग 6 महीने तक भटककर यह आवास चुना, 9वें फ्लोर पर रहते हैं, मैं एकदम वर्तमान में आ गया हूँ।  (ये ब्लॉग पोस्ट लगभग 20 माह पुरानी है। मैं पिछले डेढ़ वर्ष से गोआ में रहता हूँ।)

सोसायटी में जैसा आप जानते हैं, प्रवेश करने पर आगंतुकों को जिसके यहाँ जा रहे हैं उससे संपर्क करना होता है, तब प्रवेश मिलता है। बाहर निकलते समय यदि आप कार में हैं, तो कोई तलाशी नहीं होती, आप यहाँ से कुछ लेकर भी जा सकते हैं। अगर आप पैदल बाहर जा रहे हैं और पूरे फॉर्मल कपड़े पहने हैं तो गेट पर आपकी पूरी तलाशी होगी।

अगर आप बंडी और निक्कर में हैं, तो गार्ड समझ जाएगा कि बंदा यहीं रहता है और सोसायटी में फ्लैट खरीदने या किराये पर लेने में, बेचारा लुट-पिट चुका है, इसकी क्या तलाशी लेनी, और वह आपको ऐसे ही जाने देगा।

खैर,ये तो मज़ाक था, मैं आपको एकदम वर्तमान में ले आया और अब भविष्य की बता दूं। मैंने शुरू में भी काल देवता और स्थान देवता की बात की थी।

बताना यह है कि अब स्थान देवता बदलने वाले हैं। यह संक्रमण काल है, पैकिंग चल रही है। 8-10 दिन में ही अपना शहर गुड़गांव से बदलकर गोआ होने वाला है। बच्चे तो कई बार गोआ घूमकर आए हैं, लेकिन हम पति-पत्नी पहली बार जाएंगे, और अब वहीं रहेंगे।

इसलिए सूचना यह है कि अब शायद अगले ब्लॉग गोआ से ही लिखे जाएंगे, जहाँ तक पूर्वानुमान है वे वर्तमान को लेकर ही होंगे और उनके केंद्र में, मैं स्वयं नहीं रहूंगा। वैसे अतीत का एरिया तो अपनी ही प्रॉपर्टी है, जब कभी मन हो, वहाँ जा सकते हैं।

चलिए अब श्री रमानाथ अवस्थी जी का एक गीत पढ़ लेते हैं-

सो न सका कल याद तुम्हारी आई सारी रात
और पास ही बजी कहीं शहनाई सारी रात।

मेरे बहुत चाहने पर भी नींद न मुझ तक आई
ज़हर भरी जादूगरनी-सी मुझको लगी जुन्हाई
मेरा मस्तक सहला कर बोली मुझसे पुरवाई
दूर कहीं दो आँखें भर-भर आईं सारी रात
और पास ही बजी कहीं शहनाई सारी रात। 

गगन बीच रुक तनिक चन्द्रमा लगा मुझे समझाने
मनचाहा मन पा लेना है खेल नहीं दीवाने
और उसी क्षण टूटा नभ से एक नखत अनजाने
देख जिसे तबियत मेरी घबराई सारी रात
और पास ही बजी कहीं शहनाई सारी रात।

रात लगी कहने सो जाओ देखो कोई सपना
जग ने देखा है बहुतों का रोना और तड़पना
यहाँ तुम्हारा क्या, कोई भी नहीं किसी का अपना
समझ अकेला मौत मुझे ललचाई सारी रात
और पास ही बजी कहीं शहनाई सारी रात।

मुझे सुलाने की कोशिश में जागे अनगिन तारे
लेकिन बाज़ी जीत गया मैं वे सबके सब हारे
जाते-जाते चाँद कह गया मुझसे बड़े सकारे
एक कली मुरझाने को मुसकाई सारी रात
और पास ही बजी कहीं शहनाई सारी रात। 

नमस्कार।

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इतना सा मेरापन!

आज मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि  गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य संकलन- ‘PoemHunter.com’ से लेता हूँ। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘Little Of Me’  का भावानुवाद-

 

गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता 

इतना सा मेरापन!

मुझमें इतना सा मेरापन रह जाने दो,
कि जिसके बाद मैं, अपने समूचे अस्तित्व को तुम्हारा नाम दे सकूं।  

मेरी इच्छा को इतना भर रह जाने दो,
जिससे कि मैं हर तरफ तुमको ही महसूस करूं,  
और मैं हर मामले में तुम्हारे पास ही पहुंचू,
और हर क्षण तुमको ही अपना प्रेम समर्पित करूं।  

मुझमें, मेरा ‘मैं’ इतना कम रह जाने दो,
कि मैं कभी तुमको न छुपाऊं,  
मुझसे बंधी अपनी डोर को इतना छोटा कर दो,
कि मैं तुम्हारी इच्छा से बंधा रहूँ,
और मेरा जीवन, तुम्हारे उद्देश्यों की पूर्ति का माध्यम बने-

 और यह तुम्हारे प्रेम की ही डोर हो।

रवींद्रनाथ ठाकुर

 

 

और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ- 

 

Little Of Me

Let only that little be left of me 
whereby I may name thee my all. 

Let only that little be left of my will 
whereby I may feel thee on every side, 
and come to thee in everything, 
and offer to thee my love every moment. 

Let only that little be left of me 
whereby I may never hide thee. 
Let only that little of my fetters be left 
whereby I am bound with thy will, 
and thy purpose is carried out in my life—

and that is the fetter of thy love. 

  Rabindranath Tagore

 

नमस्कार।

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Traditions or Best Practices!

There was a story I read  in my childhood. In that story a person who had gone for pilgrimage, puts the money he had with him, in a copper vessel and places  it in a hole he dug in the ground and then covered it and put some flowers on the elevated mud cover, so that when he comes back after having a holy dip in the river, he could recognize it and take back his money from there.

Somebody saw that place covered with flowers, he thought it might be some religious activity, and it  might  give some good results by doing so at that place, so he also put some flowers after making a small peak in the mud, and soon there were so many small hillock type shapes, covered with flowers in that area and that fellow lost his money, since he could not find where exactly he had put his money underground.

One can say that there might be some traditions or say rituals, formed in such a way, which do not have any solid reason and scientific explanation behind  them.  But yes there are so many which have good reasons, making them worth following. And the traditions which our masses follow are mostly time tested and there are good reasons for following them.

The human race has got a long history, we learn many things with time and if there are some traditions formed, based on practical experience of our forefathers, then it is possible that people adopt them as traditions, without  knowing the exact reasons why such traditions were formed. As long as these do not have anything wrong in them, we can follow them without knowing the detailed reasons behind them.

Yes, the wise people must also keep testing these age old traditions and if they find them to be useless, they can advise the common people to do away with them.  There have been many traditions which have been discontinued with time. Progressive societies keep testing their traditions too with time.

In corporate sector also, there are best practices developed, based on experience, our society, communities also do so.

In Hindu religion, and in other religions also, people believe in celebrations and we find reasons to celebrate together. But only thing is that we may gather as many people as possible to celebrate, but it should not be against anybody.

The biggest thing in the world is love, it is also said that ‘God is love’. So any activity, any tradition we follow, should help us in spreading love, and in no case should it be instrumental in creating hatred.

With these words I submit my humble views regarding Traditions, which I feel are the best practices evolved in any society, community or religious group.

 

Thanks for reading.

 


 

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Gadgets with a better design!

I do not feel well versed with the modern gadgets, for example there are many functions in the mobile phone sets, which I am not comfortable in using. I do not find myself in a position to find faults in the gadgets but I am inspired to talk about one gadget or device, which people use quite extensively these days.

I still remember a revolutionary change that had come in India, around the year 2000 if I correctly remember. That time I was living in Mumbai.Til  that time if anybody had to suddenly rush to some place, may be after getting any good or bad news, he needed to rush to some bank for withdrawing money and also people normally kept some ready cash at home also, to meet such requirements.

It was in that background I remember, when the ATM service was introduced, initially it was available in big cities, for Mumbai at least one can say that the city never sleeps, one can move to any place, any time. The money support was also enabled by putting ATM machines at selected locations that time, open 24 hours. One could get out anytime, draw money from his account  and move on.

This was simply not worth believing for me at that time. We have seen that there are some areas in the country, where when trains or buses pass through, passengers fear that if they are carrying cash with them they might get looted. There are some areas where such people are pampered by politicians and many people treat it as their profession. Their number is coming down and I hope that some day it would be completely neutralized.

When these ATMs were introduced, I simply felt amazed, I thought  do we really deserve to get the benefit of such facility, in a country where there are people who can murder somebody for a little amount he or she is carrying, while here we know that a lot of amount is physically present in that machine and a greedy thief could try to grab that.

Several such attempts have been made but I am happy that this system have become very popular and several persons who tried to grab cash from them have been caught and punished.

What I dream is that the paper currency may be done away with, some system may be developed where this paper currency becomes bare minimum, so that no parallel economy could be developed and enemy country may not become a trader in fake currency.

These are my views on ‘Someone Really Needs To Design A Better…machine or system’.

This post is a part of Write Over the Weekend, an initiative for Indian Bloggers by BlogAdda.

Thanks for reading.


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कोल्हापुर-महाराष्ट्र

कल शुरू किया था एक यात्रा विवरण, आज उसको निपटा लेता हूँ। जहाँ गया था ‘बारामती’, वहाँ तक का तो बस रास्ता ही तय किया, कुछ मंदिर हैं वहाँ पर, उनको भी नहीं देख पाया, शाम होते-होते सोचा कि अब वापसी यात्रा पर चलते हैं। यह फैसला किया था कि वापसी में कोल्हापुर घूमते हुए आऊंगा। कोल्हापुर को लेकर एक ही चीज याद थी- कोल्हापुरी चप्पल!

तो बारामती से कोल्हापुर जाने की जुगाड़ देखने लगा। सीधी बस पकड़कर, सतारा होते हुए जाने का विकल्प था, लेकिन ऐसी कोई बस रात में उपलब्ध नहीं थी और आते समय जिस तरह भटका था, वैसा भटकने की अभी हिम्मत नहीं थी। एक ही स्थान है- पुणे, जहाँ के लिए वहाँ से लगातार बसें मिलती रहती हैं, लगभग ढाई घंटे का सफर! पुणे होकर कोल्हापुर जाना, रास्ते को लंबा करना था, लेकिन रात में वहाँ रुकना नहीं होगा, और लगातार यात्रा करके सुबह तक- कोल्हापुर पहुंच जाएंगे। इसके लिए यही है कि-‘तुझको चलना होगा’!, हाँ तो चल रहे हैं ना!

रात में लगभग 10 बजे पुणे पहुंचे और वहाँ से दूसरी बस पकड़कर सुबह कोल्हापुर पहुंचकर फिर वही, दिन के समय 4-5 घंटे सोना। पिछली ब्लॉग-पोस्ट में जो चित्र डाला था, वह कोल्हापुर के उस होटल के प्रवेश-द्वार का चित्र था, जिसमें मैं रुका था।

हाँ तो सुबह के लगभग 5 बजे मैं कोल्हापुर पहुंचा था, 4-5 घंटे सोने के बाद, लगभग 11 बजे, एक ऑटो करके कुछ प्रमुख स्थल वहाँ के, देखने का मन बनाया।

ऑटो वाले साथी पहले मुझे ‘न्यू पैलेस’ ले गए, जहाँ पर राजा के महल को श्री छत्रपति शाहू संग्रहालय बना दिया गया है। ऐसे महलों में कुछ वस्तुएं तो ऐसी होती हैं, जो सभी महलों में होती हैं, लेकिन कुछ ऐसी अवश्य होती हैं जिनके चित्र लेने का मन होता है और विशेष रूप से ब्लॉग में उनको शामिल करने का लालच भी, लेकिन मोबाइल स्विच-ऑफ करने की शर्त, और ऐसे में छिपकर फोटो खींचना भी तो अच्छा नहीं लगता। निश्चित रूप से कोल्हापुर जाएं तो यह संग्रहालय भी देखना चाहिए।

वैसे कोल्हापुर के टाउन हॉल में भी एक बड़ा संग्रहालय है, लेकिन जब वहाँ भी मोबाइल बंद करने की शर्त देखी तो मैं अंदर ही नहीं गया, हाँ बगल में बने गणपति मंदिर के दर्शन किए और पार्क में घूम लिया।

हिंदुओं के लिए, कोल्हापुर का सबसे प्रमुख स्थान निश्चित रूप से श्री महालक्ष्मी मंदिर है। इस मंदिर को पुराणों में वर्णित शक्तिपीठों में शामिल किया गया है। इस प्रमुख मंदिर के पास ही भवानी मंडप है, जो 200 वर्ष पूर्व निर्मित किया गया था और शाही निवास था। यह नागरिकों और भक्तजनों, दोनो के लिए समान रूप से महत्वपूर्ण है। कोल्हापुर का शिवाजी महाराज से गहरा नाता रहा है। यहाँ छोटा सा भवानी मंदिर भी है और वहाँ यह भी दर्शाया गया है कि किस प्रकार शिवाजी महाराज फलों के टोकरों में छिपकर गए थे।

रंकाला झील भी कोल्हापुर का एक प्रमुख आकर्षण है। इसके अलावा पन्हला फोर्ट, कोल्हापुर से लगभग 22 कि.मी. दूर, कोल्हापुर-रत्नागिरी मार्ग पर स्थित है। गगनगिरी महाराज मठ, ज्योतिबा मंदिर, कन्हेरी मठ, रौतवाडी झरना आदि अनेक दर्शनीय स्थान यहाँ पर हैं, यदि आप 2-3 दिन का समय लेकर वहाँ घूमने वहाँ जाएं। मैंने तो 3-4 घंटे ही वहाँ बिताए, इसलिए नगर से बाहर के स्थान- किला, मठ आदि मैं नहीं देख पाया।

यह यात्रा विवरण मैं यहीं समाप्त करता हूँ।

नमस्कार।

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रास्ता सिर्फ!

यात्रा संबंधी ब्लॉग में अक्सर किसी ऐसे स्थान पर जाकर वहाँ का अनुभव शेयर किया जाता है, जहाँ कोई प्राकृतिक, सांस्कृतिक, ऐतिहासिक अथवा राजनैतिक महत्व और आकर्षण होता है, लेकिन वास्तव में यात्रा का अनुभव भी अपने आप में बहुत महत्वपूर्ण होता है, जो प्रमुख स्थान हैं उनके बारे में तो काफी साहित्य होता ही है और बहुत सारे यात्रा ब्लॉगर इन प्रमुख स्थलों के बारे में ब्लॉग लिख चुके होते हैं।

आज मैं एक ऐसी यात्रा के अनुभव शेयर करना चाहता हूँ जहाँ मंज़िल बहुत प्रसिद्ध नहीं थी। यह यात्रा थी, मेरे अपने स्थान-पंजिम, गोवा, जो स्वयं बहुत प्रसिद्ध है, वहाँ से महाराष्ट्र के एक शहर- बारामती तक, जिसे शायद ज्यादा लोग नहीं जानते होंगे। एक लंबे अंतराल के बाद बस द्वारा लंबी यात्रा का अनुभव किया और इस यात्रा के दौरान पूरा सफर मैंने बस द्वारा ही किया। कुल मिलाकर यह अधिकांश रूप से यात्रा का अनुभव ही है, जिसमें मंज़िल पर पहुंचना अधिक महत्वपूर्ण नहीं है।

हाँ तो यात्रा का प्रारंभ मैंने रात 9-30 बजे की स्लीपर बस से किया, एक प्रायवेट बस सेवा थी। मुझे बस में स्लीपर पर यात्रा करना अधिक पसंद नहीं है, इसलिए मैंने ऑनलाइन बुकिंग द्वारा एक सीट ही चुनी थी। बस में पहुंचने पर मालूम हुआ कि जो सीट मुझे मिली थी उसकी साइड में ही ऊपर स्लीपर पर चढ़ने के लिए सीढ़ी लगी थी। एक तरह से उस सिंगल सीट पर बैठने के बाद सवारी पूरी तरह बंधन में हो जाती थी, हिल-डुल भी नहीं सकते। खैर कुछ समय बाद एक अन्य सीट खाली मिल गई और मैं काफी कष्ट से बच गया!

 

जैसा मैंने शुरू में कहा यह मुख्य रूप से यात्रा, यानि ‘सफर’ का अनुभव है, जो हिंदी का कम, अंग्रेजी का ‘सफर’ ज्यादा था। मैंने लंबे समय के बाद, मुख्य रूप से रात में, बस के द्वारा यह सफर  किया! मुझे जाना था- बारामती, महाराष्ट्र का एक छोटा सा नगर, और जैसा मुझे बताया गया था मुझे ‘सतारा’ में उतरकर वहाँ से दूसरी बस पकड़नी थी। लेकिन जो समय मैंने चुना, वह ऐसा कि मैं सुबह चार बजे ‘सतारा’ में हाइवे पर उतरा, जहाँ कंडक्टर ने मुझे बताया कि यहाँ उतरना होगा। जहाँ मैं उतरा वहाँ एलिवेटेड सड़क थी, रात 4 बजे का समय, बसें, ट्रक आदि तो आ-जा रहे थे, लेकिन आसपास कोई ऐसा व्यक्ति नहीं जो यह बता सके कि बस कहाँ से पकड़नी है!

रात के समय एक किलोमीटर से ज्यादा दूरी तक चलने के बाद एलिवेटेड सड़क समाप्त हुई, एक रेस्टोरेंट मिला, वहाँ चाय पीकर पूछा, बताया गया कि नीचे वाली सड़क से काफी दूर तक वापस जाने के बाद, पुल के नीचे से सड़क के दूसरी तरफ जाना है, जहाँ बस मिल सकेगी। यह अनुभव भी काफी जटिल था, पूरा विवरण नहीं लिखूंगा, काफी लंबा चलने के बाद, फिर बहुत देर इंतज़ार करने के बाद, रास्ते के एक स्थान तक के लिए बंद जीप की सवारी मिली, जहाँ से आगे के लिए फिर बस पकड़नी थी। क्योंकि सामान्य बस सेवा चालू होने के लिए सुबह 8 बजे तक इंतज़ार करना था, और वहाँ एक-डेढ़ घंटा बिताने के बाद भी अभी सुबह के साढ़े पांच ही बजे थे।

वैसे बारामती, महाराष्ट्र के पुणे क्षेत्र में एक छोटा सा शहर है, यहाँ कुछ मंदिर हैं, जिनका दर्शन किया जा सकता है। मैं वहाँ एक मीटिंग के लिए गया था लेकिन रात में बस का सफर करने के बाद, दिन का अधिकांश समय मैंने निद्रा में ही बिता दिया और फैसला किया कि अगली रात में फिर बस यात्रा करूंगा।

जहाँ पिछले वर्षों में बड़े-बड़े स्थानों की यात्रा की है, जिनमें दुबई और इंग्लैंड भी शामिल हैं, बस द्वारा देश के बहुत कम जाने हुए क्षेत्र की यह यात्रा एक अलग ही तरह का अनुभव दे गई। ऐसी यात्रा, जहाँ बस भी नहीं मिलती तो लोग ट्रक आदि में लिफ्ट लेकर आगे बढ़ते हैं।

आज का विवरण यहीं बंद करता हूँ, शायद आपको कल की यात्रा में, अंग्रेजी के ‘सफर’ के अलावा भी कुछ अनुभव मिल जाएगा।

नमस्कार।


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सुनहरी नाव

आज मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य संकलन- ‘PoemHunter.com’ से लेता हूँ। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘The Golden Boat’ का भावानुवाद-

गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता

सुनहरी नाव

आकाश में बादल गरज रहे हैं, जो लबालब भरे हैं वर्षा जल से,
और मैं बैठा हूँ नदी किनारे, उदास और एकाकी।
खेत में ढेरियां बनी हैं, फसल कट चुकी है,
नदी उफन रही है और उसका बहाव बहुत तेज है,
जैसे ही हमने धान की कटाई की, वर्षा प्रारंभ हो गई।

छोटा सा धान का खेत, कोई और नहीं, बस अकेला मैं –
हर तरफ बाढ़ का पानी उमड़ता-घुमड़ता हुआ,
दूर किनारे पर खड़े पेड़, जैसे स्याही के धब्बे हों,
जो गांव की गहरी भूरी सुबह के चित्र पर अंकित हों।
और इस तरफ धान का एक खेत, और कोई नहीं, बस अकेला मैं।

कौन है वह महिला, जो नाव पर किनारे की तरफ आ रही है,
गीत गा रही है? मुझे लगता है कि वह मेरी जानी-पहचानी है।
नौका काफी भरी हुई है, वह आगे गौर से देख रही है,
लहरें लाचार होकर नाव से दोनो तरफ टकराती हैं।
मैं ध्यान से देखता हूँ और महसूस करता हूँ, कि मैंने उसे पहले देखा है।

ओह, कौन सी विदेशी भूमि तक तुम नौकायन करती हो?
किनारे पर आओ, और अपनी नौका में कुछ क्षण के लिए लंगर डाल दो।
वहाँ जाओ, जहाँ तुम जाना चाहती हो, वहीं सामान दो, जहाँ देना चाहो,
परंतु कुछ क्षण के लिए किनारे पर आओ, अपनी मुस्कान बिखेरो-
और जब नौका लेकर जाओ, तब मेरा धान भी साथ ले जाओ।

ले जाओ इसे, जितना भी तुम नौका में लाद सकती हो,
क्या और भी है? नहीं और नहीं है, मैंने पूरा लाद दिया है।
मेरी घनघोर मेहनत, यहाँ नदी के किनारे-
मैंने इसे सबको त्याग दिया है, तह के ऊपर तह बिछाकर,
और अब मुझे भी ले जाओ, इतनी दया करो, मुझे भी अपनी नाव में ले जाओ।.

जगह नहीं है, कोई जगह नहीं, नाव बहुत छोटी है,
मेरे सुनहरे धान से लदी हुई, नाव पूरी तरह भर गई है।
दूर-दूर तक बारिश के बीच –आकाश में बादल, हाँफते हुए इधर-उधर हो रहे हैं,
नदी के निर्जन किनारे पर- मैं अकेला रह जाता हूँ-
जो कुछ था, वह चला गया: सुनहरी नाव सब लेकर चली गई।

रवींद्रनाथ ठाकुर

और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-

 

The Golden Boat

Clouds rumbling in the sky; teeming rain.
I sit on the river bank, sad and alone.
The sheaves lie gathered, harvest has ended,
The river is swollen and fierce in its flow.
As we cut the paddy it started to rain.

One small paddy-field, no one but me –
Flood-waters twisting and swirling everywhere.
Trees on the far bank; smear shadows like ink
On a village painted on deep morning grey.
On this side a paddy-field, no one but me.

Who is this, steering close to the shore
Singing? I feel that she is someone I know.
The sails are filled wide, she gazes ahead,
Waves break helplessly against the boat each side.
I watch and feel I have seen her face before.

Oh to what foreign land do you sail?
Come to the bank and moor your boat for a while.
Go where you want to, give where you care to,
But come to the bank a moment, show your smile –
Take away my golden paddy when you sail.

Take it, take as much as you can load.
Is there more? No, none, I have put it aboard.
My intense labour here by the river –
I have parted with it all, layer upon layer;
Now take me as well, be kind, take me aboard.

No room, no room, the boat is too small.
Loaded with my gold paddy, the boat is full.
Across the rain-sky clouds heave to and fro,
On the bare river-bank, I remain alone –
What had has gone: the golden boat took all.

Rabindranath Tagore

नमस्कार।


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है नमन उनको, कि जिनके सामने बौना हिमालय!

यादों के समुंदर से एक और मोती, लीजिए प्रस्तुत है एक और पुराना ब्लॉग, थोड़े संपादन के साथ!

मैंने लखनऊ प्रवास का ज्यादा लंबा ज़िक्र नहीं किया और ऊंचाहार के सात वर्षों को तो लगभग छोड़ ही दिया, क्योंकि मुझे लगा कि जो कुछ वहाँ हुआ, वह पहले भी हो चुका था। राजनीति की कोई कितनी बात करेगा!

एनटीपीसी-ऊंचाहार में भी मुझे भरपूर प्यार मिला, कवि सम्मेलनों के आयोजन, पहले की तरह नियमित रूप से होते रहे। जैसा मैंने पहले भी अनेक बार उल्लेख किया है, कवि सम्मेलन में शिष्ट हास्य भी मैंने समुचित मात्रा में रखने की हमेशा कोशिश की है, लेकिन मेरे प्रिय रहे हैं गीत कवि, जैसे- नीरज, सोम ठाकुर, किशन सरोज आदि, भारत भूषण जी का मंचों पर आना तो उस समय तक लगभग बंद हो गया था।

एक बात मैंने ऊंचाहार में रहते हुए नोट की, कि नीरज, सोम ठाकुर, किशन सरोज जैसे महान गीतकारों को लोग सुन भर लेते हैं, कोई प्रतिक्रिया नहीं, कोई उत्साह नहीं, जैसे हास्य कविता को सुनकर होता है। मुझे इससे पीड़ा होती थी। शायद वहाँ का श्रोता समुदाय अधिक युवा था। जो भी कारण हो, मुझे यह ठीक नहीं लगता था।

ऐसे में, मैं मानता हूँ कि यह अन्याय होगा कि मैं डॉ. कुमार विश्वास का ज़िक्र न करूं। मुझे कुछ ऐसा लगा कि जिस प्रकार राज कपूर ने, मेरा नाम जोकर के अपेक्षित सफलता प्राप्त न करने पर, बॉबी बनाकर यह चुनौती दी थी कि इसको फेल करके दिखाओ, उसी प्रकार हमने डॉ. कुमार विश्वास को अपने कवि सम्मेलनों का हिस्सा बनाकर, श्रोताओं को यह चुनौती दे डाली और हम इसमें पूरी तरह सफल हुए थे।
मैं यह मानता हूँ कि गीतों के प्रति डॉ. कुमार विश्वास के समर्पण में कोई कमी नहीं है। उन्होंने भी बहुत संघर्ष किया है। शुरू में जब वे सीधे गीत पढ़ने के लिए मंच पर जाते थे, तब कुछ स्थापित गीतकारों ने उनको आगे नहीं बढ़ने दिया।

बाद में डॉ. कुमार विश्वास ने मंच संचालन में अपनी वाक-पटुता और जो कुछ भी मसाला संचालन के लिए आवश्यक हो उसका प्रयोग करके, अपनी ऐसी जगह बनाई कि मंच पर उनका होना, आयोजन की सफलता की गारंटी बन गया।

डॉ. कुमार विश्वास हमारे आयोजनों में तीन बार ऊंचाहार आए और उनके सहयोग से हमने ऐसे अनेक कवि-शायरों को भी सुनने का अवसर प्राप्त किया, जिनसे मेरा संपर्क नहीं था और यह भी बात है कि भरपूर हास-परिहास के बाद वो ऐसा वातावरण बनाते हैं, इस प्रकार प्रस्तुत करते हैं कवियों को, कि लोग मधुर गीतों, रचनाओं को भी पूरे मन से सुनते हैं।

एक और बात कि हमने तीन बार उनको बुलाया, पहली बार उन्होंने कुछ मानदेय लिया, अगली बार उसका दो-गुना, और तीसरी बार तीन गुना। आज जितनी राशि वो लेते हैं, उसको देखते हुए, परियोजनाओं में उनको बुलाना बहुत कठिन है। मुझे खुशी है इस बात की, कि कोई गीत कवि सुरेंद्र शर्मा जैसे लोगों को टक्कर दे रहा है, जो कवि न होते हुए भी बहुत मोटी रकम लेते हैं।

डॉ. कुमार विश्वास के संचालन में जहाँ हमने ज़नाब मुनव्वर राना जी को दो-तीन बार सुना, ओम प्रकाश आदित्य जी भी उनके द्वारा संचालित आयोजन में आए थे, वहीं कुछ ऐसे प्रतिभावान कवि-शायर भी उनके माध्यम से हमारे आयोजनों में आए, जिनसे हमारा कोई संपर्क नहीं था। मेरे खयाल में, कम से कम ऊंचाहार में तो डॉ. कुमार विश्वास द्वारा संचालित ये तीन कवि सम्मेलन सर्वश्रेष्ठ थे।

डॉ. कुमार विश्वास आज देश-विदेश के श्रोताओं के दिलों पर राज करते हैं, उनकी कुछ रचनाओं की बानगी प्रस्तुत है, इनमें मैंने जान-बूझकर उनके सर्वाधिक लोकप्रिय मुक्तक शामिल नहीं किए हैं।

वो जिसका तीर चुपके से, जिगर के पार होता है,
वो कोई गैर क्या, अपना ही रिश्तेदार होता है,
किसी से अपने दिल की बात न कहना तू भूले से,
यहाँ तो खत भी थोड़ी देर में अखबार होता है।
*****************
कोई खामोश है इतना, बहाने भूल आया हूँ,
किसी के इक तरन्नुम में, तराने भूल आया हूँ,
मेरी अब राह मत तकना कभी ऐ आस्मां वालों,
मैं इक चिड़िया की आंखों में उड़ानें भूल आया हूँ।
********************
जो धरती से अम्बर जोड़े , उसका नाम मोहब्बत है ,
जो शीशे से पत्थर तोड़े , उसका नाम मोहब्बत है ,
कतरा कतरा सागर तक तो ,जाती है हर उम्र मगर ,
बहता दरिया वापस मोड़े , उसका नाम मोहब्बत है ।
***************
बस्ती बस्ती घोर उदासी पर्वत पर्वत खालीपन,
मन हीरा बेमोल बिक गया घिस घिस रीता तनचंदन,
इस धरती से उस अम्बर तक दो ही चीज़ गज़ब की हैं,
एक तो तेरा भोलापन है एक मेरा दीवानापन।
********
बहुत बिखरा बहुत टूटा थपेड़े सह नहीं पाया,
हवाओं के इशारों पर मगर मैं बह नहीं पाया,
अधूरा अनसुना ही रह गया यूं प्यार का किस्सा,
कभी तुम सुन नहीं पायी, कभी मैं कह नहीं पाया।

*******

और अंत में डॉ. कुमार विश्वास के हाल ही में प्रसिद्ध हुए एक गीत की कुछ पंक्तियां और जोड़ना चाहूंगा-

है नमन उनको कि जो यशकाय को अमरत्व देकर
इस जगत के शौर्य की जीवित कहानी हो गये हैं। 
है नमन उनको कि जिनके सामने बौना हिमालय 
जो धरा पर गिर पड़े पर आसमानी हो गये हैं ।

**********

लिख चुकी है विधि तुम्हारी वीरता के पुण्य लेखे 
विजय के उदघोष, गीता के कथन तुमको नमन है ।
राखियों की प्रतीक्षा, सिन्दूरदानों की व्यथाऒं 
देशहित प्रतिबद्ध यौवन के सपन तुमको नमन है ।

आज का ब्लॉग डॉ. कुमार विश्वास को समर्पित है।

नमस्कार।

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On being Flexible!

I remember some characters seen in some movies. Say some retired military official, who enforces strict discipline in his house. Like everybody in the family to be present on the dining table exactly at 8 PM, anybody who is late can’t take dinner with the family!


Such rules framed as per the desires of a person, in this case the head of family, might be useful in some sense but one does not earn real respect by these activities. Enforcing discipline could be an important thing up to a certain extent but what makes us rise us in the eyes of others is how much we understand their feelings and make adjustments to meet their needs, to make them happy.

We live in a big society, which extends from our little family up to the whole world as a big family. A saint living in a hut or an Ashram can live his life according to strict, unbending rules or ‘Niyamas’, but while living in a society, we need to adjust, be flexible according to the needs of others.

I heard about people in West Bengal that there are families known as supporters of Mohun Bagan team and the East Bengal team, being football lovers. Supporters of both the teams celebrate the victory of their favorite team and ridicule the other losing team. It is also heard that the supporters of one team do not even marry their wards in a family supporting the rival team.

This was an example of no flexibility among team supporters in a game. In today’s world there are so many elements making people rivals, not at all accepting the other narrative. One of the biggest such fields is politics. So much so that in that field people are ready to accept dynasty politics in today’s modern world, just for the hate they carry for some person or party.

So there are so many activities and groups which are busy making people rude, spread hate etc. but it simply depends on the individuals, how he or she would behave,  with whatever parties he or she gets aligned or whichever team they support by heart.

Further art and culture are the fields, which make us come near and love people from all over the world. Be them the novels, short stories, poems, paintings etc.

Our Indian culture is the greatest tutor of universal brotherhood. Further the more we are tolerant to the view points of others, the more we love other people, the more we would become flexible. Then we would never say-‘My way or highway!’.

We can have our own considered views and opinions regarding certain things, but if we love others and believe in truly democratic principles, we would always remember that these people can always have different views and we need to be tolerant to their viewpoints and always remain flexible. We would thus love others the way they are and they do not need to change in any way to get our unconditional love.

• This is my submission on the weekly #IndiSpire prompt- Being flexible and not rigid about opinions wins more hearts than anything else. Flexibility makes love happen. #FlexiLove .

Thanks for reading.