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WOW: Questions in Life!

Life in itself is full of a series of questions. In the beginning of civilization or rather before that, when human beings came into existence, survival was the biggest question. There were the wild animals and the human beings and how the world of today evolved anybody can study and know all the details.

 

Our spiritual leaders pose a big question; they call it the basic question- what is the purpose our coming on this planet called earth, living our lives? For the animals there is no other issue than survival, but we humans, who feel that we are civilized, think about all human beings, our past and future, we need to know what is the purpose of our life!

The basic and unique quality of humans is that we keep asking questions and finding answers for them. This is the biggest boon for humans which allows us to march ahead. We learn from our mistakes. We all need to live in love with all human beings, try to contribute for the society and make our presence felt.

The biggest question that haunts me is whether our world can live in peace, all the nations together! There are organizations like UNO and other forums where various countries are represented. Can’t they create an atmosphere where there are no fights amongst various countries, no terrorism etc.

I sincerely feel that world leaders should make sincere efforts in this direction, but we find that the big Super powers are interested in the sale of weapons that they manufacture.

There are countries like Pakistan, for whom terrorism is a part of their govt. policies or rather Military agenda. Since that country is run by the military establishment and the elected leader there is just a puppet in their hands.

I just dream that there is peace in the world and all the governments work towards the well-being and progress of their people and the world at large.

The Most Important Question In Life Is, would we witness that environment of peace and brotherhood in the world, where no country is bent upon extending its boundaries and creating an atmosphere of animosity and war like situations.

This post is a part of Write Over the Weekend, an initiative for Indian Bloggers by BlogAdda..

Thanks for reading.


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What’s wrong with Indian politics?

We Indians are the proud voters and masters of the biggest democracy in the world. After getting independence in 1947 we have made steady progress, which might be at a slower pace compared to some other countries, may be at higher pace compared to some others.

Some of our problems were born with us, since on gaining independence, our country was divided into two, on the basis of religion by the British rulers, for which we now know that the ambition of our leader was also responsible to great extent.

Anyhow the ambitions of some leaders continue to spoil our democracy. It could have been better if we had 2, 3 or 4 political parties with national presence and effective leaders with vision and mission for the progress were active participants of these national parties and compete with each other for winning elections and after election form government for welfare of the people.

In such a great democracy there needs to be competition based on policies, but no political parties should be termed as unfit or anti-national, and for that parties should not take stand on issues of national security, which are clearly anti-national.

The reason of so many family based parties being formed is simply that for some individuals their being at the helm of affairs is the basic aim, they can’t accept any formation in which they are not on that coveted seat. It is a strange thing that other than BJP and Communist Parties, almost all other parties are controlled by some families.

It is also a strange thing that after so many years of being independent there are small considerations on which our people have to vote- getting cheap food grains, loan waivers etc. etc., which is only because our rulers have not made any significant change in the living conditions of common people.

Further there in no national feeling in the minds of our politicians and they teach the same thing to common people. For example there are court cases continuing since long between adjoining states for distribution of river waters amongst them and at the time of elections also they make it an issue. Two chief ministers of the same party fight with each other, for getting votes in their own areas.

In short, we are a great democracy, have had so many great leaders, but the level of civility amongst our leaders is going down and down, with leaders like Rahul Gandhi, Arvind Kejrival, Mamta Banerji etc. etc. who are even challenging the federal structure of the nation and using very cheap language in the political debates etc.

I just hope that our voters become more responsible and make the politicians answerable for their words and deeds.

I wish all the best for our great republic, which is shortly going to get a new government after the general elections starting shortly, which would take more than a month’s time in various phases.

Yes corruption have been a big problem, our political system has been lately attracting more persons coming due to professional aspirations and no vision or mission for the progress of the country.

This is my humble submission on the weekly prompt- What is the biggest evil that plagues Indian politics? Corruption or lack of leaders with vision or…? #IndianPolitics

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वो ख्वाब सुहाना बचपन का!

मैंने बचपन की बात करते हुए जगजीत सिंह जी के गाये हुए एक-एक गीत और गज़ल शेयर कर लिए हैं, तो मैं अपने परम प्रिय गायक मुकेश जी के एक अमर गीत को कैसे भूल सकता हूँ, जिसमें बचपन का एहसास बहुत खूबसूरत तरीके से कराया गया है।
यह तो कहा जाता है कि अपने भीतर के बच्चे को जहाँ तक हो सके जीवित रखना चाहिए। कुछ हद तक कुछ लोग ऐसा कर भी लेते हैं, लेकिन जो परिवेश होता है बचपन का! उसे कहाँ से लेकर आएंगे, वो समय तो एक बार चला जाता है तब उसके बाद उसको याद ही कर सकते हैं। लीजिए प्रस्तुत है ये खूबसूरत गीत जिसे फिल्म- देवर में धर्मेंद्र जी पर फिल्माया गया था, आनंद बख्शी जी ने इसे लिखा था और रोशन जी के संगीत निर्देशन में मुकेश जी ने बहुत सुंदर तरीके से गाया था-

आया है मुझे फिर याद वो ज़ालिम
गुज़रा ज़माना बचपन का,
हाय रे अकेले छोड़ के जाना
और ना आना बचपन का,
आया है मुझे फिर याद वो ज़ालिम।

वो खेल वो साथी वो झूले
वो दौड़ के कहना आ छू ले,
हम आज तलक भी ना भूले – 2
वो ख्वाब सुहाना बचपन का
आया है मुझे फिर याद वो ज़ालिम।

इसकी सबको पहचान नहीं
ये दो दिन का मेहमान नहीं,
मुश्किल है बहुत, आसान नहीं – 2
ये प्यार भुलाना बचपन का
आया है मुझे फिर याद वो ज़ालिम।

मिल कर रोयें, फ़रियाद करें
उन बीते दिनों की याद करें
ऐ काश कहीं मिल जाये कोई – 2
जो मीत पुराना बचपन का
आया है मुझे फिर याद वो ज़ालिम।

आज के लिए इतना ही, नमस्कार।
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जब मेरे बचपन के दिन थे चाँद में परियाँ रहती थीं!

कल ही मैंने ‘पेरेंटिंग’ पर लिखी अपनी ब्लॉग पोस्ट के बाद बचपन की खूबसूरती, मदमस्ती और अलग ही दुनिया को याद करते हुए, श्री सुदर्शन फाकिर जी का लिखा गीत शेयर किया था। आज बचपन की ही खूबसूरती को दर्शाने वाली एक गज़ल शेयर कर रहा हूँ, जनाब जावेद अख्तर साहब की लिखी हुई। बहुत खूबसूरत गज़ल है, और हाँ यह गज़ल भी हम जैसे सामान्य श्रोता-पाठकों तक, जगजीत सिंह साहब के जादुई स्वर में पहुंची थी।


बचपन का समय भी क्या समय होता है। यही दुनिया होती है, जिसमें हम बड़े लोग रहते हैं, लेकिन अपने सपनीले एहसासों के साथ, जब तक हम बच्चे होते हैं, इस दुनिया को हम अलग तरह से देखते हैं और हमारे बड़े होते ही यह दुनिया पूरी तरह बदल जाती है। लीजिए प्रस्तुत है ये खूबसूरत गज़ल-

मुझको यक़ीं है सच कहती थीं जो भी अम्मी कहती थीं
जब मेरे बचपन के दिन थे चाँद में परियाँ रहती थीं|

इक ये दिन जब अपनों ने भी हमसे रिश्ता तोड़ लिया
इक वो दिन जब पेड़ की शाख़े बोझ हमारा सहती थीं|

इक ये दिन जब लाखों ग़म और काल पड़ा है आँसू का
इक वो दिन जब एक ज़रा सी बात पे नदियाँ बहती थीं|

इक ये दिन जब सारी सड़कें रूठी रूठी लगती हैं
इक वो दिन जब ‘आओ खेलें’ सारी गलियाँ कहती थीं|

इक ये दिन जब जागी रातें दीवारों को तकती हैं
इक वो दिन जब शामों की भी पलकें बोझल रहती थीं। 

इक ये दिन जब ज़हन में सारी अय्यारी की बातें हैं
इक वो दिन जब दिल में सारी भोली बातें रहती थीं। 

इक ये घर जिस घर में मेरा साज़-ओ-सामाँ रहता है
इक वो घर जिसमें मेरी बूढ़ी नानी रहती थीं। 

– जावेद अख्तर

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार।


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वो कागज़ की कश्ती, वो बारिश का पानी!

अभी एक मंच पर सप्ताहांत में दिए जाने वाले विषय के अंतर्गत ‘पेरेंटिंग’ पर, आज के समय में अभिभावकों की भूमिका पर अंग्रेजी में कुछ लिखने का अवसर मिला। इस विषय में विचार किया तो खयाल आया कि कितना फर्क आ गया है, हमारे समय के बचपन से आज के बचपन में!


वैसे फर्क जितना भी पड़ा हो, बचपन आखिर बचपन ही है, और हम लोगों की यह ज़िम्मेदारी है कि बच्चों के जीवन से ‘बचपन’ को दूर न होने दें।

बचपन के बारे में सोचते हैं तो श्री सुदर्शन फाकिर जी का लिखा यह गीत बरबस याद आ जाता है, जिसे जगजीत सिंह जी और चित्रा सिंह जी ने गाकर अपार प्रसिद्धि दी है तथा इसका संगीत भी जगजीत सिंह जी ने दिया है-

ये दौलत भी ले लो, ये शोहरत भी ले लो,
भले छीन लो मुझसे मेरी जवानी।
मग़र मुझको लौटा दो बचपन का सावन,
वो कागज़ की कश्ती, वो बारिश का पानी।

मोहल्ले की सबसे निशानी पुरानी,
वो बुढ़िया जिसे बच्चे कहते थे नानी,
वो नानी की बातों में परियों का डेरा,
वो चेहरे की झुर्रियों में सदियों का फेरा,
भुलाए नहीं भूल सकता है कोई,
वो छोटी-सी रातें वो लम्बी कहानी।

कड़ी धूप में अपने घर से निकलना
वो चिड़िया, वो बुलबुल, वो तितली पकड़ना,
वो गुड़िया की शादी पे लड़ना-झगड़ना,
वो झूलों से गिरना, वो गिर के सँभलना,
वो पीपल के पल्लों के प्यारे-से तोहफ़े,
वो टूटी हुई चूड़ियों की निशानी।

कभी रेत के ऊँचे टीलों पे जाना
घरौंदे बनाना,बना के मिटाना,
वो मासूम चाहत की तस्वीर अपनी,
वो ख़्वाबों खिलौनों की जागीर अपनी,
न दुनिया का ग़म था, न रिश्तों का बंधन,
बड़ी खूबसूरत थी वो ज़िन्दगानी।

आज के लिए इतना ही, नमस्कार।
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मस्त पवन गाये लोरी!

सदाबहार गायक मुकेश जी के गाये गीतों के क्रम में आज जो गीत प्रस्तुत कर रहा हूँ, वह एक लोरी है, अलग तरह की लोरी, जो किसी बच्चे को नहीं अपितु दुखियारी नायिका को सुलाने के लिए गायी गई है।

आज का गीत पुनर्जन्म की कथा पर आधारित फिल्म- ‘मिलन’ के लिए लक्ष्मीकांत प्यारेलाल जी की विख्यात जोड़ी के संगीत निर्देशन में, मुकेश जी ने अपने अनोखे अंदाज में गाया था। यह गीत सुनील दत्त जी और नूतन जी पर फिल्माया गया था।
आनंद बख्शी जी का लिखा यह गीत मुकेश जी के अमर गीतों में शामिल है और फिल्म में इसे बहुत सुंदर तरीके से फिल्माया गया है –

राम करे ऐसा हो जाए,
मेरी निंदिया तोहे मिल जाए,
मैं जागूं, तू सो जाए, मैं जागूं तू सो जाए हो।

गुजर जाएं सुख से तेरी, दुःख भरी रतियां,
बदल लूं मैं तोसे अंखियां,
बस में अगर हों ये बतियां,
मांगूं दुआएँ हाथ उठाए,
मेरी निंदिया तोहे मिल जाए,
मैं जागूं तू सो जाए।

मैं ही नहीं, तू ही नहीं, सारा जमाना
दर्द का है एक फसाना
आदमी हो जाए दीवाना,
याद करे गर भूल ना जाए
मेरी निंदिया तोहे मिल जाए,
मैं जागूं तू सो जाए।

स्वप्न चला आए कोई चोरी चोरी
मस्त पवन गाए लोरी,
चन्द्रकिरण बनके डोरी
तेरे मन को झूला झुलाए,
मेरी निंदिया तोहे मिल जाए,
मैं जागूं तू सो जाए।

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।


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Parenting- then and now!

Today I have to discuss on a serious subject like- Parenting.
Yes the need of taking parenting seriously was never as important, as it is today. I am now a grand- parent, but to tell the truth, I have never been a serious parent or now a grand-parent.


I remember our childhood days, there was a long lane in the mohalla of Delhi-Shahdara, so many families there, so many kids and we grew up, playing all day, not giving much headache to our parents and never being over serious about our studies, that is what I think today about those days.

Further the times when our children grew up, that time also parenting was not such a serious issue. Families till that time also generally meant much more than- ‘we two and our two children’. Many people were living in bigger families, uncles, aunts, grand-parents etc. all living together. Further the mohallas, the neighborhood those days were also almost the extension of family. So it was not always the parents, who had to take care of everything regarding the growing up children. Though there were many family heads who worked at a different location, like I did most of the time, living in industrial townships, where we had a big society and all facilities in place. There also children had sufficient social patronage and advantage.

Yes in later stages, when my children had already completed studies and were making efforts for getting suitable jobs, that time I noticed that some school children, studying in the township school committed suicide. Yes the feeling of being lonely or stressed was slowly finding place in the minds of children, as is much more now a days.

Further in the present environment, the children are in a way preparing for war! war of fitting into a suitable job. There are strenuous studies in the schools, tuitions, coaching etc. and every institution of these and the students are making a lot of efforts, to prove their virtues, so are the parents, everybody is always being tested.

Further we must try our best to understand in which field our child has natural interest and not try to make him act according to our own dreams, it is his or her life and the choice must be his or her own and in accordance to his or her capacities and interest.

There are so many frontiers in the lives of children and their parents, I am not in a position to advise on any of these, I would only suggest that we should add as little as possible to the burden our children are carrying and try to keep the ‘child’ in them alive and happy.

There are so many aspects of responsible parenting, yes we also inculcate values in our children through our behavior and teachings.
Everything that needs to be done for their careers etc. may be done but we must try not to give them extra burden to carry and try to understand their feelings and difficulties.

I could focus only on one area of studies and career development, which gives maximum stress to our children. There are several other factors which need to be discussed in the arena of responsible parenting. We could discuss that later.

• This is my humble submission on the #IndiSpire weekend prompt Parenting is a difficult task today. Our generation had a different set of parents. Today parents are more involved with their kids. What do you think? #ParentingThenAndNow .

Thanks for reading.


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52. पर हमें ज़िंदगी से बहुत प्यार था!

लीजिए आज फिर से प्रस्तुत है एक और पुराना ब्लॉग-
मेरे एक पुराने मित्र एवं सीनियर श्री कुबेर दत्त का एक गीत मैंने पहले भी शेयर किया है, उसकी कुछ पंक्तियां याद आ रही हैं-

करते हैं खुद से ही, अपनी चर्चाएं
सहलाते गुप्प-चुप्प बेदम संज्ञाएं,
बची-खुची खुशफहमी, बाज़ारू लहज़े में,
करते हैं विज्ञापित, कदम दर कदम।

चलिए आज खुद से एक सवाल पूछता हूँ और उसका जवाब देता हूँ।
सवाल है, आपको ब्लॉग लिखने की प्रेरणा किससे मिलती है?
अब इसका जवाब देता हूँ।
आज इंटरनेट का युग है और इसमें लोग अन्य तरीकों के अलावा ब्लॉग लिखकर भी खुद को अभिव्यक्त करते हैं।

मेरी दृष्टि में तो ब्लॉगिंग की सबसे बड़ी प्रेरणा तो गोस्वामी तुलसीदास जी थे। रामकथा के बहाने उन्होंने दुनिया की किस समस्या अथवा किस भाव पर अपने विचार नहीं रखे हैं। उनकी लिखी हजारों टिप्पणियों पर आधारित ब्लॉग लिखे जा सकते हैं। जैसे-

वंदऊं खल अति सहज सुभाए, जे बिनु बात दाहिने-बाएं।

पराधीन सपनेहु सुख नाही।

मैं यहाँ यही उदाहरण दे रहा हूँ, अन्यथा उदाहरण तो लगातार याद आते जाएंगे।
जो अच्छे फिल्म निर्माता हैं, वे भी ब्लॉगिंग के लिए बहुत बड़ी प्रेरणा माने जा सकते हैं।

मेरे लिए इस श्रेणी में राज कपूर सबसे पहले आते हैं। कई बार उनकी फिल्में, ऐसा लगता है कि अपने आप में एक सुंदर सी कविता अथवा ब्लॉग की तरह लगती हैं। ‘आवारा’ और ‘श्री 420’ से शुरू होकर उनकी शुरुआती फिल्में अनेक संदेश देती लगती हैं। एक देहाती व्यक्ति जो शहर में आता है, शुरू में खूब धोखा खाता है, बाद में चुनौती स्वीकार करता है और सबको अपनी चालाकी के सामने फेल कर देता है।
कुछ लाइनें जो मन में अटकी रह जाती हैं-

उल्टी दुनिया को, सीधा करके देखने के लिए, सिर के बल खड़ा होना पड़ता है।

रोना सीख लो, गाना अपने आप आ जाएगा।

यहाँ भी, दो ही उदाहरण दे रहा हूँ, क्योंकि ये तो लगातार याद आते जाएंगे।
आज का ब्लॉग लिखने के लिए, दरअसल मुझे एक फिल्म याद आ रही थी। फिल्म के नायक थे- मोती लाल । यह फिल्म मैंने देखी नहीं है लेकिन याद आ रही थी।
असल में इस फिल्म का एक गीत है, मुकेश जी की आवाज़ में, यह गीत मुझे मेरे एक मित्र- श्री शेज्वल्कर ने सुनाया था, बहुत पहले, जब मैं अपनी शुरुआती सरकारी नौकरी कर रहा था, उद्योग भवन में जहाँ वे मेरे साथ काम करते थे। कहानी भी शायद उन्होंने ही बताई थी।

एक आम आदमी की कहानी, जो लॉटरी का टिकट खरीदता है, मान लीजिए एक लाख के ईनाम वाला (उस जमाने के हिसाब से बोल रहा हूँ) । पत्नी बोलती है कि ईनाम आया तो मेरे लिए यह लाना, कुछ बेटा बोलता है, कुछ बेटी बोलती है, ईनाम की पूरी राशि का हिसाब हो जाता है, उस गरीब के, खुद के लिए कुछ नहीं बचता।

फिल्म का पहला सीन है कि उस व्यक्ति की शव-यात्रा निकल रही है, लॉटरी का ईनाम मिल जाने के बाद, सारी कहानी फ्लैश-बैक में है, उस शव-यात्रा के साथ मुकेश जी का यह गीत है, ‘रिसाइटेशन’ के अंदाज़ में, ‘रिसाइटेशन’ यह शब्द मैैं इसलिए जान-बूझकर इस्तेमाल कर रहा हूँ क्योंकि बच्चा जब कोई कविता पढ़ता है तो उसकी पूरी आस्था और निष्ठा उसमें शामिल होती है। वैसे मुकेश जी के गायन के साथ भी हमेशा मुझे ऐसा लगा है, कि उसमें यह गुण शामिल रहता है।

मैं भी उसी आस्था और निष्ठा के साथ यह पूरा गीत यहाँ उद्धृत कर रहा हूँ-

ज़िंदगी ख्वाब है, था हमें भी पता
पर हमें ज़िंदगी से बहुत प्यार था,
सुख भी थे, दुख भी थे-दिल को घेरे हुए,
चाहे जैसा था, रंगीन संसार था।

आ गई थी शिकायत लबों तक मगर
इसे कहते तो क्या, कहना बेकार था,
चल पड़े दर्द पीकर तो चलते रहे,
हारकर बैठ जाने से इंकार था।
चंद दिन का बसेरा था अपना यहाँ,
हम भी मेहमान थे, घर तो उस पार था।

हमसफर एक दिन तो बिछड़ना ही था-
अलविदा, अलविदा, अलविदा,अलविदा।

आज के लिए इतना ही, नमस्कार।
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51. लेकिन दृश्य नहीं बदला है !

लीजिए प्रस्तुत है एक और पुराना ब्लॉग-

आज बहादुरी के बारे में थोड़ा विचार करने का मन हो रहा है।


जब जेएनयू में, करदाताओं की खून-पसीने की कमाई के बल पर, सब्सिडी के कारण बहुत सस्ते में हॉस्टलों को बरसों-बरस पढ़ाई अथवा शोध के नाम पर घेरकर पड़े हुए, एक विशेष विचारधारा के विषैले प्राणी हाथ उठाकर देश-विरोधी नारे लगाते हैं, तब एक बार खयाल आता है कि क्या इसको ही बहादुरी कहते हैं!

वैसे आजकल सेना के बारे में उल्टा-सीधा बोलने को भी काफी बहादुरी का काम माना जाता है। कुछ लेखक और पत्रकार इस तरह के लेख, रिपोर्ताज आदि के बल पर अपने विज़न की व्यापकता की गवाही देने का कोई मौका नहीं छोड़ना चाहते।

शिव सैनिकों की बहादुरी भी यदा-कदा उत्तर भारतीयों पर और कभी टोल-नाकों पर काम करने वालों पर निकलती रहती है। इसमें और बढ़ोतरी हो जाती है जब अपने को बालासाहब का सच्चा वारिस मानने वाले दोनों भाइयों के बीच प्रतियोगिता हो जाती है कि किसके चमचे ज्यादा बहादुरी दिखाएंगे।

पिछले दिनों मध्य प्रदेश में किसान आंदोलन के दौरान, कांग्रेसी नेताओं ने बड़ी बहादुरी भरी भूमिका निभाई, कांग्रेस की एक विधायक ने जब अपने चमचों से खुले आम यह कह दिया कि थाने में आग लगा दो, तब शायद वे अपने आप को अंग्रेजों के विरुद्ध लड़ रही एक महान सेनानी मान रही थीं। वैसे देखा जाए तो वह उस महिला की बेवकूफी ही थी, ऐसी बहादुरी लोग चोरी-छिपे करते हैं।

कोई भी आंदोलन हो, तब ऐसे लोगों को महान मौका मिलता है जो जीवन में कुछ नहीं कर पाए हैं और ऐसा लगता भी नहीं कि कुछ करेंगे, कोई उनकी बात नहीं सुनता, कुंठित हैं ऐसे में वे किसी बस में, ट्रक में या कार में आग लगा देते हैं, किसी दुकान को जला देते हैं और यह बताते हैं कि वो भी कुछ कर सकते हैं।

क्या उस समय मौके पर रहने वाले सभी लोग इसी मानसिकता के होते हैं? इस तरह के लोग, यह नीच कार्य करके कैसे बच निकलते हैं? क्या वहाँ कोई ऐसा नहीं होता, जो स्वयं जाकर या गुप्त रूप से पुलिस को यह बता कि इन महान प्राणियों ने यह निकृष्ट कार्य किया है। क्या पुलिस भी ऐसे में जानते हुए कोई कार्रवाई नहीं करती। विरोध करने का हक़ तो सभी को है लेकिन सार्वजनिक या व्यक्तिगत संपत्ति को नुकसान पहुंचाने वाले लोगों को ऐसा सबक मिलना चाहिए कि वे दुबारा ऐसी बहादुरी करने के बारे में न सोच सकें।

इस शृंखला में जहाँ शिव सैनिकों की महान भूमिका वहीं भारतीय संस्कृति का रक्षक होने का दावा करने वाले बजरंग दल , गौ रक्षक आदि पर भी जमकर नकेल कसे जाने की ज़रूरत है। सत्तरूढ़ दल को यह गलतफहमी नहीं होनी चाहिए कि इनके दम पर वे सत्ता में फिर से आ सकते हैं।

सबका साथ- सबका विकास, इस नारे को जरा भी अपनी दृष्टि से ओझल नहीं करना चाहिए बीजेपी को, यदि वे वास्तव में देश की सेवा करना चाहते हैं और इसके लिए आगे भी सत्ता में आना चाहते हैं।

आज अपने एक और लघु गीत को शेयर करने का मन हो रहा है, जो हमारी विकास यात्रा की एक झलक देता है-

मीठे सपनों को कडुवाई आंखों को
दिन रात छला है।
कितने दर्पण तोड़े तुमने
लेकिन दृश्य नहीं बदला है।

बचपन की उन्मुक्त कुलांचे
थकी चाल में रहीं बदलती,
दूध धुली सपनीली आंखें
पीत हो गईं- जलती-जलती,
जब भी छूटी आतिशबाजी-
कोई छप्पर और जला है।

कितने दर्पण तोड़े तुमने
लेकिन दृश्य नहीं बदला है।।

नमस्कार।


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अपने हाथों में हवाओं को गरिफ्तार न कर!

सदाबहार गायक मुकेश जी के गाये, प्रेमगीतों के क्रम में आज जो गीत प्रस्तुत कर रहा हूँ, वह अपने आप में अलग तरह का गीत है। ऐसी परिस्थिति का गीत जबकि सब कुछ प्रेम के विरुद्ध होता है।


आज का गीत 1968 में रिलीज हुई फिल्म- ‘हिमालय की गोद में’ के लिए कल्याणजी आनंदजी के संगीत निर्देशन में, मुकेश जी ने अपने अनोखे अंदाज में गाया था। यह गीत मनोज कुमार जी पर फिल्माया गया था। वैसे तो मुकेश जी ने लगभग सभी नायकों के लिए गीत गाये हैं, लेकिन राज कपूर साहब के बाद, मनोज कुमार जी दूसरे ऐसे प्रमुख अभिनेता हैं, जिनके लिए मुकेश जी ने सबसे अधिक गीत गाये हैं।
क़मर जलालाबादी जी का लिखा यह गीत अत्यंत प्रभावशाली बन पड़ा है और बहुत सुंदर तरीके से फिल्माया गया है –

मैं तो एक ख्वाब हूँ
इस ख्वाब से तू प्यार न कर,
प्यार हो जाए तो
फिर प्यार का इजहार न कर।

ये हवाएं यूं ही, चुपचाप चली जायेंगी,
लौट के फिर कभी गुलशन में नहीं आयेंगी,
अपने हाथों में हवाओं को गरिफ्तार न कर।
मैं तो एक ख्वाब हूँ…

तेरे दिल में है मोहब्बत के भड़कते शोले,
अपने सीने में छुपा ले ये धधकते शोले,
इस तरह प्यार को रुसवा सर-ए-बाज़ार न कर।
मैं तो एक ख्वाब हूँ…

शाख से टूट के गुंचे भी कहीं खिलते हैं,
रात और दिन भी ज़माने में कहीं मिलते हैं,
भूल जा, जाने दे, तकदीर से तकरार न कर।
मैं तो एक ख्वाब हूँ…

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।