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वो कागज़ की कश्ती, वो बारिश का पानी!

अभी एक मंच पर सप्ताहांत में दिए जाने वाले विषय के अंतर्गत ‘पेरेंटिंग’ पर, आज के समय में अभिभावकों की भूमिका पर अंग्रेजी में कुछ लिखने का अवसर मिला। इस विषय में विचार किया तो खयाल आया कि कितना फर्क आ गया है, हमारे समय के बचपन से आज के बचपन में!


वैसे फर्क जितना भी पड़ा हो, बचपन आखिर बचपन ही है, और हम लोगों की यह ज़िम्मेदारी है कि बच्चों के जीवन से ‘बचपन’ को दूर न होने दें।

बचपन के बारे में सोचते हैं तो श्री सुदर्शन फाकिर जी का लिखा यह गीत बरबस याद आ जाता है, जिसे जगजीत सिंह जी और चित्रा सिंह जी ने गाकर अपार प्रसिद्धि दी है तथा इसका संगीत भी जगजीत सिंह जी ने दिया है-

ये दौलत भी ले लो, ये शोहरत भी ले लो,
भले छीन लो मुझसे मेरी जवानी।
मग़र मुझको लौटा दो बचपन का सावन,
वो कागज़ की कश्ती, वो बारिश का पानी।

मोहल्ले की सबसे निशानी पुरानी,
वो बुढ़िया जिसे बच्चे कहते थे नानी,
वो नानी की बातों में परियों का डेरा,
वो चेहरे की झुर्रियों में सदियों का फेरा,
भुलाए नहीं भूल सकता है कोई,
वो छोटी-सी रातें वो लम्बी कहानी।

कड़ी धूप में अपने घर से निकलना
वो चिड़िया, वो बुलबुल, वो तितली पकड़ना,
वो गुड़िया की शादी पे लड़ना-झगड़ना,
वो झूलों से गिरना, वो गिर के सँभलना,
वो पीपल के पल्लों के प्यारे-से तोहफ़े,
वो टूटी हुई चूड़ियों की निशानी।

कभी रेत के ऊँचे टीलों पे जाना
घरौंदे बनाना,बना के मिटाना,
वो मासूम चाहत की तस्वीर अपनी,
वो ख़्वाबों खिलौनों की जागीर अपनी,
न दुनिया का ग़म था, न रिश्तों का बंधन,
बड़ी खूबसूरत थी वो ज़िन्दगानी।

आज के लिए इतना ही, नमस्कार।
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2 replies on “वो कागज़ की कश्ती, वो बारिश का पानी!”

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