वो ख्वाब सुहाना बचपन का!

मैंने बचपन की बात करते हुए जगजीत सिंह जी के गाये हुए एक-एक गीत और गज़ल शेयर कर लिए हैं, तो मैं अपने परम प्रिय गायक मुकेश जी के एक अमर गीत को कैसे भूल सकता हूँ, जिसमें बचपन का एहसास बहुत खूबसूरत तरीके से कराया गया है।
यह तो कहा जाता है कि अपने भीतर के बच्चे को जहाँ तक हो सके जीवित रखना चाहिए। कुछ हद तक कुछ लोग ऐसा कर भी लेते हैं, लेकिन जो परिवेश होता है बचपन का! उसे कहाँ से लेकर आएंगे, वो समय तो एक बार चला जाता है तब उसके बाद उसको याद ही कर सकते हैं। लीजिए प्रस्तुत है ये खूबसूरत गीत जिसे फिल्म- देवर में धर्मेंद्र जी पर फिल्माया गया था, आनंद बख्शी जी ने इसे लिखा था और रोशन जी के संगीत निर्देशन में मुकेश जी ने बहुत सुंदर तरीके से गाया था-

आया है मुझे फिर याद वो ज़ालिम
गुज़रा ज़माना बचपन का,
हाय रे अकेले छोड़ के जाना
और ना आना बचपन का,
आया है मुझे फिर याद वो ज़ालिम।

वो खेल वो साथी वो झूले
वो दौड़ के कहना आ छू ले,
हम आज तलक भी ना भूले – 2
वो ख्वाब सुहाना बचपन का
आया है मुझे फिर याद वो ज़ालिम।

इसकी सबको पहचान नहीं
ये दो दिन का मेहमान नहीं,
मुश्किल है बहुत, आसान नहीं – 2
ये प्यार भुलाना बचपन का
आया है मुझे फिर याद वो ज़ालिम।

मिल कर रोयें, फ़रियाद करें
उन बीते दिनों की याद करें
ऐ काश कहीं मिल जाये कोई – 2
जो मीत पुराना बचपन का
आया है मुझे फिर याद वो ज़ालिम।

आज के लिए इतना ही, नमस्कार।
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3 Comments

  1. Yes in old days, Mukesh along with Mohammad Rafi, Manna Day and Hemant Kumar and Kishore Kumar used to be favourite male voices. This is one of my favourite songs. Very nice.

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