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मन की सीमारेखा!

आज ‘रजनीगंधा’ फिल्म के संदर्भ के साथ, मुकेश जी का गाया एक बहुत प्यारा सा गीत याद आ रहा है। यह श्री अमोल पालेकर जी की शुरू कि फिल्मों में से एक थी, जिससे उन्होंने अपनी एक अलग पहचान बनाई थी। फिल्म की नायिका थीं विद्या सिन्हा जी और अगर मुझे सही याद है तो इसमें श्री दिनेश ठाकुर भी सहनायक थे, जिनमें काफी संभावनाएं नज़र आती थीं, परंतु वे अधिक फिल्मों में आए नहीं।

यह फिल्म, मन्नू भंडारी जी की कहानी- ‘यही सच है’ पर आधारित। इसमें दर्शाया गया है कि कोई व्यक्ति, विशेष रूप से महिला कभी एक परिवेश में होती है और ऐसा मानती है कि यही उसका अपना परिवेश है, लेकिन फिर जब वह बदलकर एक नए परिवेश में आती है, उसे एक नया साथी मिलता है, तब वह धीरे-धीरे यह स्वीकार कर लेती है कि ये ही वास्तव में उसकी मंज़िल है।

यह फिल्म बहुत सुंदर तरीके से बनाई गई थी, बहुत सारी बातें इस फिल्म के बारे में याद आ रही हैं, लेकिन मैं वे सब नहीं करूंगा, एक ही डॉयलाग अमोल जी का, जो एक सामान्य बाबू का रोल इसमें बखूबी निभाते हैं, वह अपने फिल्मी पटकथा के किसी सहकर्मी का दक्षिण भारतीय सहकर्मी की बात बार-बार करते हैं, जो लगातार तरक्की करता जाता है और ये कहते जाते हैं-‘ वो साला रंगानाथन’।

कुल मिलाकर इस फिल्म में मन के सीमाएं लांघने वाले स्वभाव को दर्शाने वाले स्वभाव को दर्शाने वाले इस गीत को ही मैं यहाँ शेयर करना चाहूंगा, जिसे – योगेश जी ने लिखा है और सलिल चौधरी जी के संगीत निर्देशन में मेरे प्रिय गायक- मुकेश जी ने बहुत खूबसूरत ढंग से गाया है। प्रस्तुत हैं इस गीत के बोल-

 

कई बार यूं ही देखा है
ये जो मन की सीमारेखा है
मन तोड़ने लगता है।
अन्जानी प्यास के पीछे,
अन्जानी आस के पीछे,
मन दौड़ने लगता है।

राहों में, राहों में, जीवन की राहों में,
जो खिले हैं फूल-फूल मुस्कुराते,
कौन सा फूल चुराके, मैं रख लूं मन में सजाके
कई बार यूं ही देखा है।

जानूँ न, जानूँ न, उलझन ये जानूँ न,
सुलझाऊं कैसे कुछ समझ न पाऊँ,
किसको मीत बनाऊँ, मैं किसकी प्रीत भुलाऊँ
कई बार यूं ही देखा है।

आज के लिए इतना ही।
नमस्कार।


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Pretentions – How far they affect us!

Again it is time to write in reaction to a prompt on #IndiSpire. The prompt is- We are what we pretend to be, so we must be careful about what we pretend to be.” Kurt Vonnegut said that. Do you agree?


I am sorry I do not think we can become what we pretend to be! I can say there can be some negative effects that we can get, when we pretend to be, what we actually are not!

For becoming something, we must have a dream of becoming so, a strong aspiration, supported by faith, strong belief, positive and continuous planned action in that direction, can make us achieve that dream. Provided we are dreaming of something which is really worth achieving.

There are so many fields, such a vast empire of dream roles, professions, achievements which a rightfully thinking person can dream of and invest the best of his or her efforts to achieve that.

Now a days it is election time. We find some very shallow politicians, who might be getting the position they have, since they are born in a particular family and there would be many who have achieved, whatever they have through continuous hard work.

I would not like to discuss all this referring to political parties and personalities. I remember a film personality, though there are many, one is coming to my mind- Mr. Ranveer Singh. He was first seen in a film ‘Band, Bajaa, baraat’. Appeared a common street boy, who in the film along with another struggling girl, established the business of organizing marriage functions. In another film – I think ‘Gully Boy’, he played the role of a common street boy, who achieved great position in singing. A dialogues in film also said that ‘I do not accept that I am born to remain poor and serve others’ something like that.

It just strikes to my mind that the street like boy of ‘Band,Bajaa, Baraat’, when he married Deepika Padukon, It was a marriage observed all over the world, organised with great pomp and show. Such is the power of dreams and continuous struggle by an actor who did not have any Godfather in the film industry.

There could be so many examples from all walks of life, different fields. This is what instantly came to my mind while thinking on the prompt. Yes our dreams, supported by continuous efforts can make anything possible and not mere pretentions.

This is my submission on the prompt on #IndiSpire. #LifePretension.

Thanks for reading.


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57. जब से गए हैं आप, किसी अजनबी के साथ!

आज फिर से पुराने ब्लॉग का दिन है, लीजिए प्रस्तुत है एक और पुराना ब्लॉग-

आज एक बार फिर संगीत, विशेष रूप से गज़ल की दुनिया की बात कर लेते हैं। भारतीय उप महाद्वीप में जब गज़ल की बात चलती है तब अधिकतम स्पेस गुलाम अली जी और जगजीत सिंह जी घेर लेते हैं। हालांकि इनसे बहुत पहले बेगम अख्तर जी से गज़ल गायकी लोकप्रिय हुई थी। इसके बाद जिस नाम को सबसे ज्यादा शोहरत मिली, वो थे पाकिस्तान के मेहंदी हसन साहब। एक समय था जब गज़ल की दुनिया में उनका कोई मुकाबला नहीं था।

सुना है गुलाम अली साहब, जो मेहंदी हसन जी के साथ तबला बजाते थे, उन्होंने उनसे कहा- उस्ताद मैं भी गाना चाहता हूँ, इस पर मेहंदी हसन बोले आप तबला बजाओ, यही ठीक है। लेकिन बाद में एक समय ऐसा आया कि गुलाम अली जी ने लोकप्रियता के मामले में, मेहंदी हसन साहब को पीछे छोड़ दिया। वैसे मेहंदी हसन साहब का अपना एक बहुत ऊंचा मुक़ाम था। उनकी एक लोकप्रिय गज़ल के कुछ शेर याद आ रहे हैं, जिनमें उनकी गायकी की विशेष झलक मिलती है-

देख तो दिल कि जां से उठता है,
ये धुआं सा कहाँ से उठता है।

यूं उठे आज उस गली से हम,
जैसे कोई जहाँ से उठता है।

बैठने कौन दे भला उसको,
जो तेरे आस्तां से उठता है।

इसके बाद तो गज़ल की दुनिया में गुलाम अली जी और जगजीत सिंह जी छाए रहे। गुलाम अली जी ने जहाँ सीमित साज़ों के साथ अपनी गायकी की धाक जमाई, वहीं जगजीत सिंह जी ने अच्छी गायकी के साथ, आर्केस्ट्रा का भी भरपूर इस्तेमाल किया है।
इनकी गज़लों में से कोई एक दो शेर चुनना तो बहुत मुश्किल है, लेकिन फिर भी कुछ उदाहरण दे रहा हूँ| पहले जगजीत सिंह जी की गाई गज़ल के प्रसिद्ध शेर, जिनमें उनकी गायकी की झलक मिलती है-

जवां होने लगे जब वो तो हमसे कर लिया परदा,
हया बरलक्स आई और शबाब आहिस्ता-आहिस्ता।

एक और-

होश वालों को खबर क्या, बेखुदी क्या चीज़ है,
इश्क कीजे फिर समझिए, ज़िंदगी क्या चीज़ है।

या फिर-

दुनिया जिसे कहते हैं, जादू का खिलौना है,
मिल जाए तो मिट्टी है, खो जाए तो सोना है।

अब गुलाम अली जी-

छेड़कर तब्सिरा ए दौर ए जवानी रोया,
रात यारों को सुनाकर मैं, कहानी रोया।

जब भी देखी है किसी चेहरे पे एक ताज़ा बहार,
देखकर मैं तेरी तस्वीर पुरानी रोया।

एक और-

सो गए लोग उस हवेली के,
एक खिड़की मगर खुली है अभी।

कुछ तो नाज़ुक मिजाज़ हैं हम भी,
और ये चोट भी नई है अभी।

अब गज़ल की दुनिया में तो इतने लोग हैं कि कुछ नाम ले लूं, तो ये होगा कि बहुत सारे छूट जाएंगे। मेरे प्रिय फिल्मी गायक मुकेश जी ने भी कुछ गज़लें गाई हैं, एक गज़ल के एक दो शेर याद आ रहे हैं-

जरा सी बात पे, हर रस्म तोड़ आया था,
दिल-ए-तबाह ने भी क्या मिजाज़ पाया था।

शगुफ्ता फूल सिमटकर कली बने जैसे,
कुछ इस कमाल से तूने बदन छुपाया था।

गुज़र गया है कोई लम्हा-ए-शरर की तरह,
अभी तो मैं उसे पहचान भी न पाया था।

एक गज़ल चंदन दास जी की गाई हुई मुझे बहुत अच्छी लगती है-

अपना गम लेके कहीं और न जाया जाए,
घर की बिखरी हुई चीज़ों को सज़ाया जाए।

घर से मस्ज़िद है बहुत दूर चलो यूं कर लें,
किसी रोते हुए बच्चे को हंसाया जाए।

असल में गाने वाले तो इतने हैं, और फिल्मों में बहुत अच्छी गज़लें आई हैं, उनका ज़िक्र करते हुए कई ब्लॉग लिखे जा सकते हैं, रफी साहब ने बहुत अच्छी गज़लें गाई हैं, जैसे-

रंग और नूर की बारात किसे पेश करूं
ये मुरादों की हसीं रात किसे पेश करूं।

अनूप जलोटा जी ने भजनों के अलावा बहुत सी गज़लें भी गाई हैं, उनमें से कुछ काफी अच्छी बन पड़ी हैं। जैसे एक है-

अशआर मेरे यूं तो ज़माने के लिए हैं,
कुछ शेर फक़त तुमको सुनाने के लिए हैं।

आंखों में जो रख लोगे तो कांटों से चुभोगे,
ये ख्वाब तो पलकों पे सज़ाने के लिए हैं।

एक गज़ल जिसमें काफी दर्द उभरा है, जो भोगा हुआ यथार्थ लगता है! जैसा सुना है कि रूप कुमार राठौर, अनूप जलोटा के साथ तबला बजाते थे और अनूप जी और सोनाली जलोटा, एक साथ गाते थे। बाद में सुरों का तालमेल कुछ ऐसा हुआ कि सोनाली जलोटा, रूप कुमार राठौर के साथ मिलकर सोनाली राठौर बन गईं और उनका सिंगिंग पेयर बन गया। इसके बाद अनूप जी ने ये गज़ल गाई थी, जिसमें पूरा दर्द उभरकर आया है-

जब से गए हैं आप, किसी अजनबी के साथ,
सौ दर्द जुड़ गए हैं, मेरी ज़िंदगी के साथ।

खैर ये किस्सा तो चलता ही जाएगा, क्योंकि गाने वाले एक से एक हैं, और बहुत अच्छे हैं, कुछ का नाम लेना ठीक नहीं रहेगा। फिर कभी बात करेंगे और लोगों के बारे में, आज के लिए इतना ही।

नमस्कार।


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सोई जानहि जेहि देऊ जनाई!

एक और विषय, जो एक मंच पर ब्लॉग पोस्ट लिखने के लिए दिया गया था। उस विषय के बहाने यहाँ अपने विचार व्यक्त कर रहा हूँ, जिसे कह सकते हैं ‘नॉन पार्टिसिपेटिव एंट्री’। विषय था कोई ऐसा अनुभव जिसको आप तर्क के आधार पर नहीं समझा सकते! मेरे पास अपना ऐसा कोई अनुभव नहीं है अतः मैं वहाँ अपना आलेख प्रस्तुत नहीं कर रहा हूँ, परंतु अलग से यहाँ अपने विचार प्रस्तुत कर रहा हूँ।

मुझे एक बात याद आ रही है, जो मैंने कहीं पढ़ी थी। मैं कभी आचार्य आशो रजनीश जी का व्याख्यान सुनने तो नहीं गया, कुछ पुस्तकें उनकी अवश्य पढ़ी हैं। यह कहा जाता है कि उनके व्याख्यान स्थल पर लिखा रहता था-‘ अपना दिमाग और जूते, बाहर छोड़कर आएं।’ एक बात और कहीं पढ़ी थी कि एक पत्रकार को उनके किसी प्रतिद्वंद्वी पक्ष द्वारा उनका व्याख्यान सुनकर यह बताने के लिए भेजा गया कि वो ऐसा क्या बोलते हैं कि इतने सारे लोग उनको सुनने के लिए जाते हैं! वह पत्रकार उनके व्याख्यान सुनकर बहुत प्रभावित हुआ और उनका शिष्य बन गया।

बाद में उस पत्रकार ने उनको बताया कि वह किस उद्देश्य से वहाँ आया था। उस पत्रकार ने उनसे पूछा कि इतने लोग उनका व्याख्यान सुनने आते हैं, फिर ऐसा क्यों हुआ कि वह ही उनका शिष्य बन गया। इस पर रजनीश जी ने कहा कि मेरे व्याख्यान के लिए ये लोग टिकट लेकर भाषण सुनने आते हैं। इनका यह प्रयास होता है कि वे उस पैसे का परिणाम वसूल करें, जो उन्होंने खर्च किया है। वास्तव में वे मन से, पूरी तन्मयता से भाषण को सुनते ही नहीं हैं, वे केवल पैसा वसूल करते हैं। आपको यह काम सौंपा गया था कि आप मेरा भाषण सुनकर उस पर रिपोर्ट दो, इसलिए आपने पूरे ध्यान से भाषण सुना और आप इस हद तक प्रभावित हो गए कि मेरे शिष्य बन गए।

जब मैं एनटीपीसी की सेवा में था, तब मेरे एक विद्वान मित्र थे- डॉ. श्यामाकांत द्विवेदी, मध्यप्रदेश के सीधी जिले में वे अध्यापक थे और बहुत अच्छा व्याख्यान देते थे। मैं अक्सर उनको कर्मचारियों के लिए चलाई जाने वाली हिंदी कक्षाओं में व्याख्यान के लिए बुलाया करता था।

डॉ. द्विवेदी के बारे में आगे बताने से पहले उनका एक रोचक संस्मरण याद आ रहा है, जो उन्होंने स्वयं मुझे सुनाया था। वे एक सरकारी स्कूल में पढ़ाते थे, देहाती किस्म के इलाके में, अब कितने गंभीर होते हैं वहाँ पर छात्र, यह तो अनुमान आप लगा ही सकते हैं। उनकी यह आदत थी कि व्याख्यान देते समय वे अपनी आंखें बंद कर लेते थे और बोलते जाते थे। एक बार जब काफी समय तक बोलने के बाद उन्होंने आंखें खोलीं तो पाया कि उनके सामने छात्र नहीं भेड़-बकरियां हैं। इस बीच छात्रों ने यह शरारत कर दी थी, लेकिन एक बार तो उनको लगा कि कोई चमत्कार हो गया क्या?

जी हाँ, चमत्कार की बात मैं इसलिए कह रहा हूँ कि वे तंत्र-मंत्र-साधना के काफी अच्छे ज्ञाता थे, उन्होंने इस विषय में कई पुस्तकें भी लिखी थीं। एक पुस्तक उन्होंने मुझे भी दी थी, लेकिन सच्चाई यह है कि मैं उसे पढ़ ही नहीं पाया!

हाँ तो मुझे उनका बताया हुआ एक अनुभव ही अभी याद आ रहा है। उन्होंने जब ध्यान में सफलता प्राप्त की, तब शुरू में वह बहुत परेशान हो गए थे, जैसा कि उन्होंने मुझे बताया कि जब वे आंखें खोलते तब जो दिखाई देता, वही उनको तब दिख रहा था, जब वे आंखें बंद कर रहे थे। कुछ समय तो वे यह नहीं जान पा रहे थे कि उनकी आंखें खुली हैं या बंद, बाद में उन्होंने अपने इस अनुभव को संतुलित किया।

तर्कातीत अनुभव या कहें कि चमत्कारों की तो भारत में कमी नहीं है और हम चमत्कारों के पीछे भागते भी बहुत ज्यादा हैं। इसी कारण हम पाते हैं कि नए-नए देवता और नए-नए गुरू सामने आते जाते हैं। ये भी मालूम होता है कि अब अमुक देवता के दर पर भीड़ कम होती है और अमुक देवता की मार्केट ज्यादा है।

यह विषय ऐसा है कि इस पर बहुत कुछ कहा जा सकता है। यह सच है कि जीवन में, या कहें कि दुनिया में ऐसा बहुत कुछ जिसे तर्क के आधार पर परिभाषित नहीं किया जा सकता, चमत्कार भी हैं बहुत सारे, लेकिन यह चमत्कार-पिपासा कहीं हमें धोखे में डालने के लिए न इस्तेमाल की जा सके, इसके लिए सावधान रहना बहुत जरूरी है, अन्यथा हम चमत्कार के बहाने किसी ढोंगी गुरू के अंधभक्त बन सकते हैं।

अंत में गोस्वामी तुलसीदास जी की एक पंक्ति याद आ रही है, जो शायद सबसे बड़े चमत्कार की और संकेत करती है-

सोई जानहि, जेहि देऊ जनाई,
जानत तुम्हहि, तुम्हहि होई जाई।

आज के लिए इतना ही।

नमस्कार।


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अमर प्रेम कथा!

कुछ मंचों पर, साप्ताहिक रूप से जो विषय दिए जाते हैं ब्लॉग में आलेख लिखने के लिए, उनमें से ही इस बार #IndiSpire में यह विषय सुझाया गया था कि लोग अपने क्षेत्र अथवा दुनिया में किसी भी क्षेत्र से जुड़ी कोई प्रेम कहानी के संबंध में कोई रोचक आलेख लिखें। इस विषय में विचार करने पर लैला-मजनू, शीरीं-फरहाद आदि की प्रचलित प्रेम कहानियां याद आती हैं, जिनमें प्रेमी-प्रेमिका मिल नहीं पाते और अनेक प्रकार की यातनाएं प्रेमी झेलता है, दीवाना बनकर घूमता है।


विचार करने पर मुझे लगा कि मैं ऐसा आलेख तो नहीं लिख पाऊंगा जिसे मैं इस मंच पर साझा कर सकूं, लेकिन मेरा मन हुआ कि ऐसे ईश्वरीय प्रेम के बारे में लिखा जाए, जिसकी कोई मिसाल दुनिया में नहीं मिलती है!

योगीराज श्रीकृष्ण, जिन्हें हम ईश्वर का एल अवतार और सोलह कलाओं से संपूर्ण मानते हैं। जीवन का हर चरण उनका अद्वितीय है। बचपन है तो ऐसा कि उस पर सूरदास जी जैसे भक्त कवियों ने आस्था, प्रेम और वात्सल्य से परिपूर्ण अमर काव्य लिखा है। यौवन जिया तो ऐसा कि उस प्रेम की कोई मिसाल दुनिया में नहीं मिलती। राधा जी का श्रीकृष्ण जी से विवाह नहीं हुआ था, लेकिन उनका नाम हमेशा कृष्ण जी के नाम के साथ और उनसे पहले लिया जाता है। यह प्रेमी युगल, जिसमें श्रीकृष्ण जी को उनके श्याम वर्ण और नील वर्ण का भी कहा गया है और राधा रानी स्वर्णिम रंग की है और इनके बारे में महाकवि बिहारी ने बड़ी सुंदर पंक्तियां लिखीं हैं, जिनको श्लेष अलंकार का बहुत सुंदर उदाहरण माना जाता है।

मेरी भवबाधा हरौ, राधा नागरि सोय।
जा तन की झाँई परे स्याम हरित दुति होय।।

और फिर विषय प्रेम का है, इसलिए उस पर ही कुछ कहूंगा। ऐसा कहा जाता है कि स्वामी विवेकांद जी जब अमेरिका में विश्व धर्म संसद को संबोधित करने गए थे, तब वहाँ उनके प्रवास के दौरान यह घटना हुई थी। उनसे पूछा गया कि यह कैसे संभव है कि जब श्रीकृष्ण जी बांसुरी बजाते थे तब सभी नर-नारी, पशु आदि भी उधर खिंचे चले जाते थे। इस विषय पर बोलते हुए स्वामी जी अपने स्थान से चलकर काफी दूर तक चले गए और श्रोतागण भी उनके साथ-साथ चलते गए। बाद में स्वामी जी ने कहा कि जब मेरे साथ ऐसा संभव है, तब भगवान श्रीकृष्ण तो योगीराज और सोलह कलाओं से परिपूर्ण थे, उनके बारे में क्या कहा जाए!

प्रेम की बात मैंने शुरू की थी, इसके बारे में एक उदाहरण देना चाहूंगा! गोपियों के साथ श्रीकृष्ण जी के प्रेम को आत्मा और परमात्मा के प्रेम की तरह माना जाता है। श्रीकृष्ण जी जब गोकुल छोड़कर चले गए और गोपियां उनके विरह में परेशान थीं, तब वे अपने विद्वान साथी उद्धव से कहते हैं कि वह गोपियों को जाकर समझा दे। विद्वान उद्धव मानता है कि यह तो उसके लिए बाएं हाथ का खेल है। वह अपने ज्ञान के बल पर उनको समझा देगा कि यह सब मोह-माया है। होता फिर यह है कि गोपियां ही उद्धव की गुरू बन जाती हैं, उसका पूरा ज्ञान वहाँ जाकर निष्फल हो जाता है।

यह विषय तो वैसे लंबी चर्चा योग्य और बहुत गहराई वाला है, लेकिन मैं यहाँ इस पर संक्षेप में चर्चा को, सूरदास जी के शब्दों में, गोपियों की कही इस बात के साथ संपन्न करना चाहूंगा-

ऊधो मन न भए दस-बीस,
एक हुतोहुतो सो गयो स्याम संग को अवराधै ईस।
इंद्री सिथिल भई केशव बिनु, ज्यों देहि बिनु सीस।
आसा लागि रहत तन स्वासा, जीवहिं कोट बरीसबरीस॥

तुम तो सखा स्याम सुंदर के, सकल जोग के ईस,
सूर हमारे नंदनंदन बिनु और नहीं जगदीस।

आज की प्रेम-चर्चा मैं यहीं पर समाप्त करना चाहूंगा, जहाँ विशुद्ध प्रेम के आगे विद्वत्ता नतमस्तक हो जाती है।
नमस्कार।


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दिल दा मामला है!

आज पंजाबी गीतों के सम्राट- श्री गुरदास मान जी का गाया एक गीत शेयर करने का मन है। पंजाबी संगीत की एक अलग पहचान है और उसमें बहुत लंबे समय से गुरदास मान जी का स्थान ऐसा है, जिसके आसपास कोई दूसरा नहीं पहुंच पाया है।

श्री गुरदास मान जी का यह गीत भी बहुत प्रसिद्ध है, इसके कई स्वरूप हैं शायद, कभी वे कुछ इसमें जोड़ देते हैं, कभी कुछ छोड़ देते हैं। मुझे पंजाबी का अधिक ज्ञान नहीं है, इसलिए कुछ गल्तियां रह गई होंगी, लेकिन इस गीत को शेयर करने का बहुत मन था, इसलिए गल्तियों के लिए अग्रिम क्षमायाचना करते हुए यह गीत शेयर कर रहा हूँ-

दिल दा मामला है –
दिल दा मामला है, इतना करो सजन
तौबा खुदा दे वास्ते,
दिल तौं डरो सजन–
दिल दा मामला है।

नाज़ुक ज्या दिल है मेरा,
गल्ती दिल होया तेरा,
रातां नू नींद ना आवे,
खान नू पावे हनेरा,
सोचां विच गोते खांदा,
चढ़दा है नवा सवेरा,
एदा जे हुंदी ऐसी, होवेगा किवें बसेरा,
तौबा खुदा दे वास्ते, पीड़ा हरो सजन।

इको गल केहंदा तैनू, मर जैगा आशिक़ तेरा,
हो जिद ना करो सजन जी – दिल दा मामला है –
दिल दा मामला है।
मेरी गल जे मानो तां
दिल दे नाल दिल ना लाना, दिल नू ऐदा समझाना,
दिल नू ऐदा समझाना,
इश्क़ अनेया करे सजाखेया नू,
ऐदे नाल दी कोई ना मरज़ लोको,
जे कर ला बहिए फेर साथ दइये,
सिरा नाल निभाइये फरज़ लोको
दिल नू कहीं ला ना बैठी,
चक्कर कोई पा न बैठी,
दिल दी गल मनदी-मनदी, पंडियां करवां ना बैठी,
दुनिया दे ताने मेरे, झोली विच पा ना बैठी,
तौबा खुदा दे वास्ते, इतना करो सजन।
दिल दा मामला है।

जे कर किते लग वी जावे सजना दी गली ना जाना,
नही ते पै सी पछताउना, सजना दी गली च लड़के,
तेरे नाल खार खान गे, तैनू ले जान गे फड़के,
तेरे ते वार करण गे, लड़की दा प्यो बुलवा के,
ऐसी फिर मार करण गे,
हो कुछ ते करो सजन-
– दिल दा मामला है – दिल दा मामला है।

दिल दी गल पूच्छो ही ना, बहुता ही लापरवाह है,
पल विच एह कोल ए
पल विच लापता है, इसदे ने दरद अवाल्ले,
दर्दा दी दर्द दवा है,
मस्ती विच होवे जे दिल,
तां फिर एह बादशाह है, फेर तां एह कुछ नी देखदा
चंगा है कि बुरा है,
मैं हाँ, बस मैं हाँ सब कुछ,
केहरा सा और खुदा है,
दिल दे ने दर्द अवल्ले,
आशक़ ने रेहंदे कल्ले,
ताहिओ ते लोकी केहंदे आशक़ ने हौंदे झल्ले,
सजना दी याद बिना कुछ, हुंदा नी एन्ना पल्ले,
दिल नू बचा के रक्खो सोह्नियां चीजां कोल्लो,
एन्नू छुपा के रक्खो, नजरां किते ला न बैठे,
चक्कर कोई पा ना बैठे,
एह्दी लगाम कसो जी, धोखा किथे खा ना बैठे,
हो दिल तो डरो सजन, दिल – दिल दा मामला है –
दिल दा मामला है।

‘मान’ मरजाने दा दिल, तेरे दिवाने दा दिल,
हुणे चंगा भला सी,
तेरे परवाने दा दिल,
दोआं विच फरक बड़ा है,
अपने बेगाने दा दिल,
दिल नाल जे दिल मिल जावे,
सडदा जमाने दा दिल,
हरदम जो सड़दा रेहंदा,
ओही इक आने दा दिल,
दिल नू लाउना ही है,
बस इस ठां लां ही छड्डो,
छड्डो जी छड्डो – छड्डो,
मैं कहना जी छड्डो – छड्डो,
चंगा है जग्या रेहंदा,
करदा है बड़ी खराबी, जिथ्थे वी वेल्ला बेन्दा दिल,
वी ओस्नू देवो दिल, जो मरज़ पहचाने,
दुख-सुख सहाई हो के
अपना जो फरज़ पहचाने,
दिल है शीशे दा खिलौना,
टुट्टेया फेर रास नी औना,
हो पीरा, हरो सजना, दिल –
दिल दा मामला है – दिल दा मामला है।

आज के लिए इतना ही, नमस्कार।


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56. दैर-ओ-हरम में बसने वालो!

आज फिर से, लीजिए प्रस्तुत है एक और पुराना ब्लॉग-


यह जानकर, हर किसी को अच्छा लगता है कि कुछ लोग हमको जानते हैं। लेकिन दुनिया में हर इंसान अलग तरह का है, कितने लोग वास्तव में ऐसे होते हैं, जो किसी व्यक्ति को ठीक से जानते हैं।

कुछ लोग हैं, जो हमारे साथ मुहल्ले में रहते हैं, वे हमें इस लिहाज़ से जानते हैं कि हम किस प्रकार के पड़ौसी हैं, कैसे नागरिक हैं, सामुदायिक गतिविधियों में क्या हमारी कोई भूमिका होती है?

इसी प्रकार में दफ्तर में हमारे साथ काम करने वाले, हमको हमारे पद, विभाग और अन्य लोगों के साथ हमारे व्यवहार, दफ्तर में होने वाली गतिविधियों में हमारी भागीदारी तथा एक कर्मचारी के रूप में हमारी भूमिका उनको किस प्रकार प्रभावित करती है अथवा हमारी कैसी छवि बनाती है, उसके आधार पर जानते हैं।

एक और आधार होता है लोगों के मन में हमारी छवि बनाने का, यह आधार कुछ जगहों पर बहुत प्रभावी होता है, जैसे बिहार में जब मैं कार्यरत था तब एक अधिकारी बता रहे थे कि उनको वहाँ के कोई स्थानीय पत्रकार मिले और उनसे पूछा, जी आप कौन हैं? अब पत्रकार तो काफी जागरूक माने जाते हैं। उन्होंने अपना नाम बताया, वो संतुष्ट नहीं हुए, पद बताया वे नहीं माने, उन्होंने कहा कि मैं अमुक स्थान का रहने वाला हूँ, इंसान हूँ, वो फिर बोले वैसे आप क्या हैं? वैसे मतलब, उन्होंने पूछा, तब पत्रकार महोदय बोले, आपकी जाति क्या है जी!

कुछ लोगों के लिए यह जानकारी सबसे अधिक महत्वपूर्ण होती है। आप अच्छे इंसान हैं या नहीं, जहाँ आप हैं, आप अपनी भूमिका का निर्वाह कितनी ज़िम्मेदारी से, कितनी इंसानियत के साथ करते हैं, यह महत्वपूर्ण नहीं होता कुछ लोगों के लिए, पहले तो आपका धर्म और उसके बाद आपकी जाति, यही दो बातें उनके लिए महत्वपूर्ण होती हैं।

तो इस आधार पर अगर पूछा जाए कि मैं क्या हूँ, तो मुझे बताना होगा कि मैं हिंदू हूँ, ब्राह्मण हूँ। हालांकि इन दोनों पहचानों को विकसित करने में मेरी कोई भूमिका नहीं है। मेरा यज्ञोपवीत संस्कार विवाह से पहले तो कभी हुआ नहीं, विवाह के समय पंडित जी ने जनेऊ पहनाया था, जो मैंने आयोजन के बाद उतार दिया और उसके पहले अथवा बाद में कभी नहीं पहना। ईश्वर में मेरी गहरी आस्था है, लेकिन मैं कभी-कभार औपचारिक आयोजनों के अलावा कभी पूजा-पाठ नहीं करता।

मैं अक्सर देखता हूँ कि ब्राह्मण महासभा, क्षत्रिय महासभा आदि-आदि अनेक आयोजन होते रहते हैं, वास्तव में जहाँ यह भाव पनपना चाहिए कि सभी मनुष्य एक जैसे हैं, सभी का उनके गुणों के आधार पर सम्मान होना चाहिए, इस प्रकार के आयोजन आपस में विभाजन पैदा करने वाले होते हैं। आज आधुनिक समय की मांग है कि इंसानों को बांटने वाले इस प्रकार के संगठनों को समाप्त किया जाए।

न किसी धर्म के नाम पर, न जाति के नाम पर, अगर लोग इकट्ठा होते हैं, तो वे मानव-जाति के नाम पर एकत्र हों।

मुझे जगजीत सिंह जी की गाई एक गज़ल याद आ रही है, इस मौके पर-

दैर-ओ-हरम में बसने वालो
मय-ख्वारों में फूट न डालो।

तूफां से हम टकराएंगे
तुम अपनी कश्ती को संभालो।

आरिज़-ओ-लब सादा रहने दो
ताजमहल पर रंग न डालो।

मैखाने में आए वाइज़,
इनको भी इंसान बना लो।

आज के लिए इतना ही, नमस्कार।


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कारण बिनु रघुनाथ कृपाला!

आजकल चुनाव का मौसम है और एक के बाद एक नेताओं के असली चेहरे जनता के सामने उजागर हो रहे हैं। कुछ नेता तो ऐसे हैं, नवजोत सिंह सिद्धू जैसे- जो एक पार्टी से दूसरी में क्या गए, पूरा चरित्र ही बदल गया उनका। मुझे लगता है सिद्धू शायद इस बात का बहुत सटीक उदाहरण है कि आज के राजनेता कैसे हैं!


यूं ही किसी समाचार चैनल पर सिद्धू महाराज के कुछ नए-पुराने भाषणों की रिकॉर्डिंग देखी थी। क्या गज़ब के भाषण थे, जो-जो बातें कल मोदी जी की तारीफ में की थीं, बिल्कुल वही आज सोनिया जी और राहुल बाबा पर चस्पां कर दी हुज़ूर ने।

राजनीति में अच्छे लोग तलाशना तो वैसे ही कठिन काम है, लेकिन एक बात कहने का मन होता है कि शायद भारत की सबसे पुरानी पार्टी, आज जिस संस्कार विहीन व्यक्ति को अपने अध्यक्ष के रूप में ढो रही है, वह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है। खैर राजनीति पर ज्यादा लंबी बात नहीं करूंगा, जल्दी ही जनता अपना फैसला दे देगी अगले 5 सालों के लिए।

मुझे गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रामचरित मानस में लिखी गई चौपाइयों में से दो अलग-अलग संदर्भों की पंक्तियां याद आ रही थीं। वैसे देखा जाए तो मानस से हम हर परिस्थिति में मार्गदर्शन प्राप्त कर सकते हैं।

एक पंक्ति जो मुझे याद आ रही है, बहुत सुंदर पंक्ति है; प्रभु श्रीराम के स्वभाव के बारे में-

कोमल चित्त, अति दीनदयाला,
कारण बिनु रघुनाथ कृपाला।

क्या स्वभाव है, तुलसीदास जी के प्रभु का! अत्यंत कोमल हृदय वाले! किसी कारण से हम पर कृपा करने वाले तो बहुत मिल जाएंगे, आजकल नेता लोग भी वोट पाने के लिए कृपा बरसा रहे हैं, लेकिन बिना कारण लोगों पर कृपा करने वाले तो भगवान श्रीराम ही हैं।

यहीं मुझे संत लोगों के बारे में तुलसीदास जी द्वारा किया गया विस्तृत वर्णन भी याद आता है, जिसमें वे कहते हैं-

संत हृदय नवनीत समाना!

लेकिन फिर स्पष्ट करते हैं कि मक्खन (नवनीत) तो अपने को गर्मी लगने से पिघलता है, लेकिन संत तो दूसरे का दुख देखकर ही पिघल जाते हैं!

फिर वे संतों की विशेषता बताने के लिए दूसरा उदाहरण देते हैं-

वंदऊं संत समान चित, हित-अनहित नहीं कोय,
अंजलि गत शुभ सुमन जिमि, सम सुगंध कर दोय।

जिस प्रकार अंजुरी में पुष्प लेने से, उनके कारण व्यक्ति की दोनों हथेलियां महक जाती हैं, ऐसा ही संतों का स्वभाव होता है, सबका उपकार करने वाला।

अब इतनी तो हमें स्वतंत्रता है ही कि हम राजनीति की बात करते-करते भी संतों की बात कर सकते हैं। वैसे आजकल तो राजनीतिज्ञों के अलावा महात्मा वेशधारी लोगों से भी डर लगता है।

इतना ही कहने का मन है कि राजनीतिज्ञों में आस्था हो या न हो, ईश्वर में आस्था होने से बहुत बल मिलता है, प्रयास तो हमें खुद करने ही होंगे, परंतु हमारी आस्था, हमारा विश्वास- हमारी कामयाबी के लिए बहुत बड़ा संबल बन सकता है।

अंत में कुछ खास प्रकार के प्राणियों का उल्लेख, जो राजनीति में तो खूब मिलते ही हैं।

जैसे प्रभु श्रीराम बिना कारण के कृपा करते हैं, वैसे ही दुष्ट मनुष्य (खल) बिना कारण बाधाएं उत्पन्न करते हैं, आपत्तियां करते हैं, और इसीलिए गोस्वामी जी ने रामचरितमानस लेखन के प्रारंभ में ही इनकी वंदना की है, जिससे वे उनके इस पुनीत कार्य में बाधा उत्पन्न न करें। अंत में ये पंक्ति भी प्रस्तुत है-

वंदऊं खल अति सहज सुभाए,
जे बिनु बात दाहिने-बाएं।

मैं इस खल-वंदना के साथ अपना आलेख समाप्त करता हूँ जी!

आज के लिए इतना ही।
नमस्कार।


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जब इश्क़ तुम्हें हो जाएगा!

अभी कुछ दिन पहले ही आस्था (फेथ) पर एक प्रस्तुति दी थी। आज खयाल आ रहा है कि ‘प्रेम’ या उर्दू शायरी की ज़ुबान में कहें तो ‘इश्क़’ भी आस्था का बहुत बड़ा संबल होता है। जो प्रेम में होता है, वह स्वयं के लिए भले ही आस्तिक न हो, अपने प्रियजनों के लिए आस्तिक बन जाता है, और बड़ी से बड़ी चुनौती का सामना कर लेता है।


श्री दशरथ माझी का उदाहरण यही बताता है कि इंसान पहाड़ से भी टकरा जाता है।
आज जगजीत सिंह जी और चित्रा सिंह जी की युगल जोड़ी द्वारा गाई गई बहुत प्यारी सी गज़ल याद आ रही है, जिसके शायर हैं- ज़नाब सईद राही जी। लीजिए यह गज़ल आज के लिए प्रस्तुत है-

मेरे जैसे बन जाओगे
जब इश्क़ तुम्हें हो जाएगा।
दीवारों से टकराओगे,
जब इश्क़ तुम्हें हो जाएगा।

हर बात गंवारा कर लोगे,
मन्नत भी उतारा कर लोगे,
ताबीज़ें भी बँधवाओगे,
जब इश्क़ तुम्हें हो जाएगा।

तनहाई के झूले झूलोगे,
हर बात पुरानी भूलोगे,
आईने से घबराओगे,
जब इश्क़ तुम्हें हो जाएगा।

जब सूरज भी खो जाएगा
और चाँद कहीं सो जाएगा
तुम भी घर देर से आओगे,
जब इश्क़ तुम्हें हो जाएगा।

                                            बेचैनी जब बढ जायेगी,                                                    और याद किसी की आयेगी,
                                         तुम मेरी ग़ज़लें गाओगे,                                                     जब इश्क़ तुम्हें हो जायेगा।

आज के लिए इतना ही।
नमस्कार।


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मनुष्य पर कविताएं- रवींद्रनाथ ठाकुर

आज मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य संकलन- ‘PoemHunter.com’ से लेता हूँ। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘Poems on Man’ का भावानुवाद-

गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता

मनुष्य पर कविताएं!

मनुष्य जाता है, कोलाहल से भरी भीड़ में,  
अपनी चुप्पी के शोर को डुबो देने के लिए।

मनुष्य अमर है, इसलिए उसका अनंत बार मरना जरूरी है।
क्योंकि जीवन एक सृजनात्मक विचार है;
यह अपने आपको, बदलते स्वरूपों में ही पा सकता है।

मनुष्य की स्थायी प्रसन्नता कुछ पाने में निहित नहीं है,
अपितु यह प्राप्त होगी, स्वयं को अपने से बड़ी सत्ता को, समर्पित कर देने में,
ऐसे विचारों के लिए, जो उसके वैयक्तिक जीवन से अधिक व्यापक हैं,
विचार- उसके देश का,
मनुष्यता का,
ईश्वर का।

-रवींद्रनाथ ठाकुर

और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-

Poems on Man

Man goes into the noisy crowd
to drown his own clamour of silence.

Man is immortal; therefore he must die endlessly.
For life is a creative idea;
it can only find itself in changing forms.

Man’s abiding happiness is not in getting anything
but in giving himself up to what is greater than himself,
to ideas which are larger than his individual life,
the idea of his country,
of humanity,
of God.

-Rabindranath Tagore

नमस्कार।