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जाने कब इन आंखों का शरमाना जाएगा!

पिछले तीन दिनों से मैं राजकपूर जी की प्रसिद्ध फिल्म- ‘संगम’ के कुछ गीत शेयर कर रहा हूँ। सचमुच वह एक अलग ही समय था जब किसी-किसी फिल्म का हर गीत मास्टरपीस होता था और हर गीत सुपरहिट होता था।


जैसा कि मैंने पहले भी लिखा है- प्रेम-त्रिकोण आधारित फिल्म- संगम की कहानी को आगे बढ़ाने में गीतों की भी महत्वपूर्ण भूमिका थी। इस प्रेम त्रिकोण का एक कोण नायक- सुंदर (राज कपूर)- हमेशा बेझिझक, बिंदास, जो उसके मन में आया कह देने वाला, वह राधा (वैजयंती माला) से प्रेम करता है तो मान लेता है कि वह भी करती ही होगी, या करने लगेगी। उधर शांत प्रकृति वाला- गोपाल (राजेंद्र कुमार)। और इन दोनों के बीच, इनकी दोस्त राधा बेचारी कितना सहन करती है।

मैंने शांत प्रकृति वाले गोपाल की प्रेम- भावनाओं को प्रकट करने वाला गीत, जो एक प्रेम पत्र के रूप में है शेयर किया और गोपाल की बिंदास और लाउड प्रेम-भावनाओं को खुलेआम जाहिर करने वाला एक गीत भी शेयर किया है।

आज मैं इन तीनों की प्रेम संबंधी फिलासफी को व्यक्त करने वाला एक गीत शेयर कर रहा हूँ, देखिए इस गीत में कैसे इनमें से हर किसी की अलग छवि उभरकर आती है। इस गीत में गोपाल (राज कपूर) के लिए पहला अंतरा मुकेश जी ने गाया है, राधा (वैजयंती माला) के लिए दूसरा अंतरा लता मंगेशकर जी ने और गोपाल (राजेंद्र कुमार) के लिए तीसरा अंतरा महेंद्र कपूर जी ने गाया है। एक ही गीत में इन तीनों फिल्मी कैरेक्टर्स की प्रेम त्रिकोण में स्थिति और उनका व्यक्तित्व बहुत खूबी से उभरकर आए हैं।

इस गीत को लिखा है- हसरत जयपुरी जी ने और संगीत तो शंकर जयकिशन जी का है ही।

लीजिए अब  इस मधुर गीत के बोल प्रस्तुत कर रहा हूँ–

हर दिल जो प्यार करेगा, वो गाना गायेगा
दीवाना सैंकड़ों में पहचाना जायेगा

आप हमारे दिल को चुरा के आँख चुराये जाते हैं
ये इक तरफ़ा रस्म-ए-वफ़ा हम फिर भी निभाये जाते हैं
चाहत का दस्तूर है लेकिन
आपको ही मालूम नहीं,
जिस महफ़िल में शमा हो, परवाना जायेगा
दीवाना सैंकड़ों में पहचाना जायेगा, दीवाना।

भूली बिसरी यादें मेरे हँसते गाते बचपन की
रात बिरात चली आती हैं, नींद चुराने अंखियन की
अब कह दूँगी, करते करते, कितने सावन बीत गये
जाने कब इन आँखों का शरमाना जायेगा
दीवाना सैंकड़ों में पहचाना जायेगा।

अपनी-अपनी सब ने कह ली, लेकिन हम चुपचाप रहे
दर्द पराया जिसको प्यारा, वो क्या अपनी बात कहे
ख़ामोशी का ये अफ़साना रह जायेगा बाद मेरे
अपना के हर किसी को, बेगाना जायेगा
दीवाना सैंकड़ों में पहचाना जायेगा।

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।


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सब देखते रह जाएंगे, ले जाऊंगा एक दिन!

मैंने राजकपूर जी की प्रसिद्ध फिल्म- ‘संगम’ के दो गीत शेयर किए हैं अभी तक, दो गीतों का मैंने सिर्फ ज़िक्र  करके छोड़ दिया। क्या समय था वह, फिल्म के हर गीत पर मेहनत होती थी। हर गीत सुपरहिट होता था। कभी-कभी तो फिल्म नहीं चलती थी, लेकिन गीत धूम मचाते रहते थे।

खैर प्रेम-त्रिकोण आधारित फिल्म- संगम की कहानी को आगे बढ़ाने में गीतों की भी महत्वपूर्ण भूमिका थी। इस प्रेम त्रिकोण का एक कोण, नायक- सुंदर (राज कपूर), हमेशा बेझिझक, बिंदास, जो उसके मन में आया कह देने वाला। वह राधा (वैजयंती माला) से प्रेम करता है तो मान लेता है कि वह भी करती ही होगी, या करने लगेगी। उधर शांत प्रकृति वाला- गोपाल (राजेंद्र कुमार)।

कल मैंने एक गीत शेयर किया था, जो शांत प्रकृति वाले गोपाल की भावनाओं को व्यक्त करता है, जो वह डरते-डरते एक प्रेम पत्र के रूप में लिखता है।

आज जो गीत मैं शेयर कर रहा हूँ वह है सुंदर का तरीका, अपनी भावनाओं को खुलेआम जाहिर करने का। एक मोटर-बोट में बड़े खतरनाक ढंग से लहराते हुए वह ये गाना गाता है, जबकि दूसरी बोट में गोपाल और राधा जा रहे हैं। मुकेश जी की मधुर आवाज में यह गीत भी राजेंद्र राजकपूर जी पर फिल्माया गया है। गीत लिखा है- हसरत जयपुरी जी ने और संगीत तो शंकर जयकिशन जी का है ही।

लीजिए अब इस मधुर गीत के बोल प्रस्तुत कर रहा हूँ–

ओ महबूबा, ओ महबूबा
तेरे दिल के पास ही है मेरी मंज़िल-ए-मकसूद
वो कौन सी महफ़िल है जहाँ तू नहीं मौजूद
ओ महबूबा, ओ महबूबा
तेरे दिल के पास ही है मेरी मंज़िल-ए- मकसूद

किस बात पे नाराज़ हो, किस बात का है गम
किस सोच में डूबी हो तुम, हो जाएगा संगम।
ओ महबूबा, ओ महबूबा..
तेरे दिल के पास ही है मेरी मंज़िल-ए- मकसूद।

गुज़रूं मैं इधर से कभी, गुज़रूं मैं उधर से
मिलता है हर एक रास्ता जाकर तेरे घर से।
ओ महबूबा, ओ महबूबा..
तेरे दिल के पास ही है मेरी मंज़िल-ए- मकसूद|

बाहों के तुझे हार मैं पहनाउंगा एक दिन
सब देखते रह जाएँगे, ले जाऊँगा एक दिन।
ओ महबूबा, ओ महबूबा..

तेरे दिल के पास ही है मेरी मंज़िल-ए- मकसूद
वो कौनसी महफ़िल है जहाँ तू नहीं मौजूद
ओ महबूबा, ओ महबूबा
तेरे दिल के पास ही है मेरी मंज़िल-ए- मकसूद|

 

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार।


 

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ये मेरा प्रेम पत्र पढ़कर कि तुम नाराज ना होना

कल मैंने राजकपूर जी की प्रसिद्ध फिल्म- ‘संगम’ का एक गीत शेयर किया था, फिर खयाल आया कि इस फिल्म के सभी गीत लाजवाब थे। हर गीत का इस सुपर हिट प्रेम-त्रिकोण आधारित फिल्म की कहानी को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण रोल था।

जैसे दो गीत ग्लैमर और राज साहब की शोमैनशिप की मिसाल थे- ‘बोल राधा बोल संगम होगा कि नहीं’ और ‘मैं का करूं राम मुझे बुड्ढ़ा मिल गया’। इन दो गीतों को तो मैं छोड़ देता हूँ, लेकिन अन्य कम से कम तीन गीतों को मुझे अवश्य शेयर करने का मन हो रहा है।

आज जो गीत मैं शेयर कर रहा हूँ वह गीत भी है और प्रेमपत्र भी है। यह गीत रफी साहब की मधुर आवाज में है। जिस प्रकार अन्य कलाकारों की फिल्मों मे मुकेश साहब के गाने कभी-कभार ही पाए जाते हैं, वैसे ही राज साहब की फिल्मों में रफी साहब के गाने कम ही होते थे, क्योंकि राज साहब की आवाज तो मुकेश जी ही थे या कभी-कभी मन्ना डे जी। यह गीत भी राजेंद्र कुमार साहब पर फिल्माया गया है। गीत लिखा है- हसरत जयपुरी जी ने और संगीत तो शंकर जयकिशन जी का है ही।


लीजिए अब बिना किसी भूमिका के इस मधुर गीत के बोल प्रस्तुत कर रहा हूँ–

मेहरबां लिखू, हसीना लिखू या दिलरुबा लिखू
हैरान हू कि आप को इस खत में क्या लिखू?

ये मेरा प्रेम पत्र पढ़कर कि तुम नाराज़ ना होना,
के तुम मेरी जिंदगी हो, कि तुम मेरी बंदगी हो।

तुझे मैं चाँद कहता था, मगर उस में भी दाग है,
तुझे सूरज मैं कहता था, मगर उस में भी आग है,
तुझे इतना ही कहता हूँ, कि मुझको तुम से प्यार है।

तुझे गंगा मैं समझूँगा , तुझे जमुना मैं समझूँगा
तू दिल के पास है इतनी, तुझे अपना मैं समझूँगा
अगर मर जाऊँ रूह भटकेगी तेरे इंतजार में।

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।


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ज़िंदगी हमें तेरा ऐतबार न रहा!

सदाबहार गायक मुकेश जी के गाये गीतों के क्रम में आज प्रस्तुत कर रहा हूँ, 1964 में रिलीज़ हुई राज कपूर जी की ब्लॉक बस्टर फिल्म- संगम का एक गीत। इस फिल्म में महान निर्माता, निर्देशक, अभिनेता और शो-मैन राज कपूर जी ने ऐसे लापरवाह किस्म के नायक की भूमिका निभाई है जो किसी बात को सीरियसली नहीं लेता। प्रेम-त्रिकोण पर बनी इस फिल्म में, उनका मित्र, जिसकी भूमिका राजेंद्र कुमार जी ने निभाई है, वह उनके लिए अपने प्रेम की कुर्बानी देता है। लेकिन फिर कहानी में ऐसा घुमाव आता है कि उनके मरने की खबर आती है और उनके मित्र- राजेंद्र कुमार और नायिका- वैजयंती माला फिर से नज़दीक आने लगते हैं, और लौटकर आया यह हंसोड़ नायक बहुत सीरियस हो जात है।

इस परिस्थिति को अभिव्यक्त करने वाला गीत भी एक अमर गीत है जिसे लिखा है शैलेंद्र जी ने, संगीत है- शंकर-जयकिशन की सदाबहार जोड़ी का, और यह गीत है मुकेश जी कि अमर आवाज में! गीतों के फिल्मांकन में तो राज साहब का कोई जवाब है ही नहीं, प्रस्तुत है यह अमर गीत-

दोस्त, दोस्त ना रहा, प्यार, प्यार ना रहा,
ज़िंदगी हमें तेरा ऐतबार ना रहा।

अमानतें मैं प्यार की, गया था जिसको सौंपकर
वो मेरे दोस्त तुम ही थे, तुम्हीं तो थे
जो ज़िंदगी की राह में, बने थे मेरे हमसफ़र
वो मेरे दोस्त तुम ही थे, तुम्हीं तो थे
सारे भेद खुल गए, राज़दार ना रहा
ज़िंदगी हमें तेरा…

गले लगीं सहम सहम, भरे गले से बोलतीं
वो तुम ना थीं तो कौन था, तुम्हीं तो थीं
सफ़र के वक्त में पलक पे मोतियों को तौलती
वो तुम ना थीं तो कौन था, तुम्हीं तो थीं
नशे की रात ढल गयी, अब खुमार ना रहा
ज़िन्दगी हमें तेरा…

वफ़ा का ले के नाम जो, धड़क रहे थे हर घड़ी
वो मेरे नेक नेक दिल, तुम्हीं तो हो
जो मुस्कुराते रह गए, जहर की जब सुई गड़ी
वो मेरे नेक नेक दिल, तुम्हीं तो हो
अब किसी का मेरे दिल, इंतज़ार ना रहा
ज़िन्दगी हमें तेरा…

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।


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मुझे तलाश है सुनहरे हिरण की – रवींद्रनाथ ठाकुर

आज मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य संकलन- ‘PoemHunter.com’ से लेता हूँ। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘I Hunt For The Golden Stag’ का भावानुवाद-

 

गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता

मुझे तलाश है सुनहरे हिरण की

मैं भटक रहा हूँ, सुनहरे हिरण की तलाश में।
मुस्कुरा सकते हो आप, मेरे मित्रो, लेकिन मैं
तलाश रहा हूँ, वह दृष्टि, जो मेरे हाथ नहीं आ रही है,
मैं दौड़ता फिरता हूँ पहाडों और घाटियों में, मैं भटकता हूँ
अनाम प्रदेशों में, क्योंकि मुझे तलाश है
सुनहरे हिरण की।

आप आते हैं, खरीदारी करते हैं बाजार में
और फिर अपने घर वापस लौटते हैं, लदे हुए
सामान से, लेकिन बेघर हवाओं की शृंखला ने
पता नहीं कब मुझे कब और कहाँ
ऐसा छुआ है कि- .
मेरे मन में कोई परवाह बाकी नहीं है, मेरी सारी
संपत्ति की, जो मैंने कहीं दूर पीछे छोड़ दी है।

मैं भागता रहता हूँ, पहाड़ों और घाटियों में, मैं भटकता हूँ
अनाम प्रदेशों में—क्योंकि मैं शिकार
पर निकला हूँ, सुनहरे हिरण के।

-रवींद्रनाथ ठाकुर

और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-

 

I Hunt For The Golden Stag

I hunt for the golden stag.
You may smile, my friends, but I
pursue the vision that eludes me.
I run across hills and dales, I wander
through nameless lands, because I am
hunting for the golden stag.

You come and buy in the market
and go back to your homes laden with
goods, but the spell of the homeless
winds has touched me I know not when
and where.

I have no care in my heart; all my
belongings I have left far behind me.
I run across hills and dales, I wander
through nameless lands–because I am
hunting for the golden stag.

-Rabindranath Tagore

नमस्कार।


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दुष्ट डाकिया-रवींद्रनाथ ठाकुर

आज मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य संकलन- ‘PoemHunter.com’ से लेता हूँ। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘The Wicked Postman’ का भावानुवाद-

गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता 

दुष्ट डाकिया

आप क्यों वहाँ बैठती हो फर्श पर इतनी शांत और निःशब्द, बताओ प्यारी मां?
खुली खिड़की से वर्षा की बौछार आ रही है, जिसने आपको पूरा भिगो दिया है
और आपको इसकी परवाह नहीं है!
क्या आपने सुना कि गजर ने चार बजने की सूचना दी, चार बार बजकर?         यह समय है मेरे भाई के स्कूल से घर लौटने का।

क्या हो गया है आपको मां, आप कुछ अजीब सी दिख रही हो?
क्या आपको आज पिताजी का कोई पत्र नहीं मिला है?
मैंने देखा था डाकिए को, थैले में चिट्ठियां भरकर लाते हुए,
लगभग नगर में हर किसी के लिए।
सिर्फ पिताजी के पत्र वो रख लेता है, खुद पढ़ने के लिए, मुझे पता है कि वह
डाकिया एक दुष्ट मनुष्य है।

लेकिन इसके लिए दुखी मत हो प्यारी मां,
कल बगल के गांव मे बाजार लगेगा, आप अपनी काम वाली से
कुछ कलम और कागज़ मंगा लेना,
मैं खुद पिताजी के पत्र लिखूंगा, आप देख लेना
उनमें कोई गलती नहीं मिलेगी,
मैं ‘अ’ से लेकर ‘ह’ तक पूरा लिखूंगा,
लेकिन मां, आप मुस्कुरा क्यों रही हो?
क्या आपको विश्वास नहीं है कि मैं पिता जितना सुंदर लिख सकता हूँ!
मैं अपने कागज़ पर साफ लाइनें खींचूंगा, और सारे अक्षर लिखूंगा
सुंदर और बड़े।

जब मैं पूरा पत्र लिख लूंगा, तब क्या आपको लगता है कि मैं इतनी मूर्खता करूंगा
कि पिताजी की तरह अपना पत्र उस वीभत्स डाकिए के थैले में डाल दूं?
मैं खुद आऊंगा यह पत्र लेकर आपके पास, बिना आपको प्रतीक्षा कराए,  
और एक के बाद एक पत्र के माध्यम से आप                                                             मेरा लिखा पढ़ती रहेंगी, .
मुझे मालूम है कि वह डाकिया नहीं चाहता कि आप                                             वास्तव में अच्छे पत्र पढो‌।

-रवींद्रनाथ ठाकुर

और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-

The Wicked Postman

Why do you sit there on the floor so quiet and silent, tell me,
mother dear?
The rain is coming in through the open window, making you all
wet, and you don’t mind it.
Do you hear the gong striking four? It is time for my brother
to come home from school.
What has happened to you that you look so strange?
Haven’t you got a letter from father today?
I saw the postman bringing letters in his bag for almost
everybody in the town.
Only father’s letters he keeps to read himself. I am sure the
postman is a wicked man.
But don’t be unhappy about that, mother dear.
Tomorrow is market day in the next village. You ask your maid
to buy some pens and papers.
I myself will write all father’s letters; you will not find
a single mistake.
I shall write from A right up to K.
But, mother, why do you smile?
You don’t believe that I can write as nicely as father does!
But I shall rule my paper carefully, and write all the letters
beautifully big.
When I finish my writing do you think I shall be so foolish
as father and drop it into the horrid postman’s bag?
I shall bring it to you myself without waiting, and letter by
letter help you to read my writing.
I know the postman does not like to give you the really nice
letters.

-Rabindranath Tagore

नमस्कार।


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लिखा गया दीवारों पर!

लीजिए चुनाव के परिणाम भी आ गए। प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने धन्यवाद देते हुए कहा कि ‘जनता ने इस फक़ीर की झोली भर दी’। प्रधानमंत्री के उच्च पद पर सुशोभित व्यक्ति की इस सरलता को ‘लुटियंस दिल्ली’ के खास किस्म का चश्मा पहनने वाले बुद्धिजीवी नहीं समझ पाएंगे।


चुनाव परिणामों पर चर्चा के दौरान किसी चैनल पर एक व्यक्ति ने कहा-‘हम ‘बिटवीन द लाइंस’ पढ़ने में इतने डूब गए कि हम ‘राइटिंग ऑन द वॉल’ नहीं पढ़ पाए! जो भी हो सामान्य जन में तो जोश बहुत था मोदी सरकार को फिर से सत्ता में लाने का और जनता ने उनको कुछ ज्यादा ही संख्या बल दे दिया है।

लोकतंत्र में विपक्ष भी मजबूत होना चाहिए लेकिन विपक्ष ने राज्य सभा में अपने संख्या बल का किस प्रकार दुरुपयोग किया है, ये किसी से छिपा नहीं है। जनहित के कई बिल उन्होंने पारित नहीं होने दिए, जिनमें मुस्लिम महिलाओं पर अत्याचार का विरोधी ‘ट्रिपल तलाक बैन’ बिल भी है। एक ऐसी प्रथा जिसे अधिकतम मुस्लिम राष्ट्रों ने भी नकार दिया है लेकिन हमारे वोटकामी पॉलिटिशियन उसको नहीं जाने दे रहे हैं।

कमियां सभी पार्टियों में हैं, बीजेपी में भी हैं, लेकिन सरकार ने जनहित के जैसे कार्य पिछले 5 वर्षों में किए हैं, जिनमें उज्ज्वला योजना, मुफ्त इलाज की सुविधा, शौचालय, सुदूर गांवों तक सड़कें और बिजली, और गरीबों के लिए मकान भी, इन्हें अति बौद्धिकता के ‘मोतिया बिंद’ से ग्रस्त बुद्धिजीवी नहीं समझ पाएंगे।

अब जबकि मुझे लगता है कि कुछ समय बाद राज्य सभा वाला अवरोध भी समाप्त हो जाएगा, तब सरकार के पास ये कहने को नहीं रह जाएगा कि यह रुकावट थी, अब जो कुछ वो करेंगे उसके लिए पूरी तरह जवाबदेह होंगे!

इस बीच, अगले चुनावों तक विपक्ष के पास यह अवसर है कि वे एक भरोसेमंद विकल्प तैयार करें। न तो देश को 50 साल का ऐसा बालक चाहिए जो प्रचार के नाम पर गालियां देता घूम रहा था और न ऐसा अवसरवादी गठबंधन, जिसमें अपनी क्षेत्रीय महत्वाकांक्षाओं वाले ऐसे दल जो एक दिन एक-दूसरे को भयंकर गाली देते हैं और दूसरे दिन मोदी के डर से गले मिल जाते हैं। ये सच्चाई है कि इन चुनावों में कोई प्रभावी विकल्प था ही नहीं।

बीजेपी के लिए भी यह बहुत जरूरी है अपने गंदी ज़ुबान वाले नेताओं को नियंत्रित करे या बाहर का रास्ता दिखाएं और पूरा ध्यान जनता के हित पर दें।

आज के लिए इतना ही, लोकतंत्र के इस उत्सव के संपन्न होने पर सभी को बधाई।

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार।


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61. अरुण यह मधुमय देश हमारा

आज फिर से पुराने ब्लॉग का दिन है, लीजिए प्रस्तुत है एक और पुराना ब्लॉग-

आज याद आ रहा है, शायद 27 वर्ष तक, मैं स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस के अवसर पर संदेश तैयार किया करता था, ये संदेश होते थे पहले 5 वर्ष (1983 से 1987) हिंदुस्तान कॉपर लिमिटेड की इकाइयों (मुसाबनी और खेतड़ी) और बाद में 22 वर्ष तक एनटीपीसी की कुछ इकाइयों के कर्मचारियों के लिए, और यह संदेश पढ़ते थे वहाँ के परियोजना प्रधान, महप्रबंधक आदि। यह सिलसिला 2010 में बंद हो गया, क्योंकि 1 मई 2010 से मैं सेवानिवृत्त हो गया था। वरना जैसे 3 ईडियट्स में भाषण लिखने वाले पंडित जी बोलते थे कि आप सुनिए उसको और देखिए मुझको, क्योंकि ये भाषण मैंने ही लिखा है, की हालत थी। खैर वैसा परिणाम कभी मुझे नहीं भुगतना पड़ा।

सेवानिवृत्ति के 9 वर्ष बाद, आज मन हो रहा है कि अपनी ओर से, अपने स्वाभिमान और राष्ट्राभिमान के लाल किले की प्राचीर पर खड़े होकर आज राष्ट्र के नाम संदेश जारी करूं। ये अलग बात है कि उस समय हजारों की कैप्टिव ऑडिएंस होती थी, कुछ शुद्ध राष्ट्रप्रेम की भावना से समारोह में आते थे, बहुत से ऐसे भी थे जिन्हें इस अवसर पर पुरस्कार आदि मिलते थे और बहुत सारे अभिभावक, स्कूल स्टाफ के सदस्य आदि इसलिए भी आते थे कि वहाँ स्कूली बच्चों के सांस्कृतिक कार्यक्रम होते थे, उन बच्चों को प्रोत्साहित करना होता था, उनके फोटो खींचने होते थे और फिर उनको अपने साथ घर लेकर जाना होता था।

परियोजनाओं में होने वाले उस भाषण में, उस अवधि की उपलब्धियों का उल्लेख होता था, और एनटीपीसी में एक शब्द समूह जो बार-बार आता था, वह था ‘प्लांट लोड फैक्टर’ (संयंत्र सूचकांक), जिसका आशय होता था कि हम कितनी अधिक क्षमता के साथ विद्युत उत्पादन कर रहे हैं।

आज वह सीमित परिवेश नहीं है मेरा, और मैं उस सेवा-क्षेत्र से दूर, राजधानी क्षेत्र से दूर, जहाँ मैं सेवा में न होने की अवधि में अधिकतर रहा, आज देश के सुदूर छोर पर, गोआ में हूँ।

संदेश क्या, मेरे जैसा साधारण नागरिक देशवासियों को शुभकामना ही दे सकता है। हम सभी मिल-जुलकर प्रगति करें। देश में विकास के नए अवसर पैदा हों। हमारी प्रतिभाओं को देश में ही महान उपलब्धियां प्राप्त करने और देश की सर्वांगीण प्रगति में अंशदान करने का अवसर मिले। जो नफरत फैलाने वाले लोग और संगठन हैं, उनकी समाप्ति हो और सभी भारतीय प्रेम से रहें।

आज परिस्थितियां बड़ी विकट हैं, हमारे दो पड़ौसी हमेशा ऐसा वातावरण बनाए रहते हैं, कि जैसे अघोषित युद्ध चल रहा हो और वास्तविक युद्ध की आशंका भी बनी रहती है। हम यह आशा ही कर सकते हैं कि ऐसी स्थितियां न बनें, लेकिन यह पूरी तरह हमारे हाथ में नहीं है। यदि अनिच्छित स्थिति आती हैं तो हमारी सेनाएं अपने पराक्रम से उनका मुकाबला करें और पूरा देश उनके साथ हो, वैसे युद्ध न हो, यही सबके लिए श्रेयस्कर है, हमारे लिए भी और अन्य देशों के लिए भी।

श्री जयशंकर प्रसाद जी की पंक्तियां हैं-

अरुण यह मधुमय देश हमारा।
जहाँ पहुँच अनजान क्षितिज को मिलता एक सहारा॥
लघु सुरधनु से पंख पसारे, शीतल मलय समीर सहारे।
उड़ते खग जिस ओर मुँह किए, समझ नीड़ निज प्यारा॥
बरसाती आँखों के बादल, बनते जहाँ भरे करुणा जल।
लहरें टकरातीं अनन्त की, पाकर जहाँ किनारा॥

आज अपनी एक कविता भी शेयर कर रहा हूँ, जैसी मुझे याद है अभी तक, क्योंकि गीत तो याद रह जाते हैं, स्वच्छंद कविता को याद रखने में दिक्कत होती है-

काबुलीवाला, खूंखार पठान-
जेब में बच्ची के हाथ का जो छापा लिए घूमता है,
उसमें पैबस्त है उसके वतन की याद।
वतन जो कहीं हवाओं की महक,
और कहीं आकाश में उड़ते पंछियों के
सतरंगे हुज़ूम के बहाने याद आता है,
आस्थाओं के न मरने का दस्तावेज है।

इसकी मिसाल है कि हम-
हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई होने के नाते नहीं
नागरिक होने के नाते बंधु हैं,
सहृदय होने के नाते सखा हैं,
वतन हमसे आश्वासन चाहता है-
कि अब किसी ‘होरी’ के घर और खेत-
महाजनी खाते की हेरे-फेर के शिकार नहीं होंगे,
कि ‘गोबर’ शहर का होकर भी-
दिल में बसाए रखेगा अपना गांव
और घर से दूर होकर भी
हर इंसान को भरोसा होगा-
कि उसके परिजन सदा सुरक्षित हैं।

सभी भारतीयों को स्वाधीनता दिवस की शुभकामनाएं।
नमस्कार।

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हमको अपना साया तक अक्सर बेज़ार मिला!

आज गुरुदत्त जी की 1957 में रिलीज़ हुई प्रसिद्ध फिल्म-प्यासा का एक गीत शेयर कर रहा हूँ, साहिर लुधियानवी जी के लिखे इस बेहद खूबसूरत गीत को, एस.डी.बर्मन जी के संगीत निर्देशन में हेमंत कुमार जी ने अपनी सघन, गहन, अनुगूंज भरी  आवाज में गाकर अमर कर दिया है।


यह गीत अपने आप ही इतना कुछ कहता है कि मुझे अलग से कुछ कहने की जरूरत नहीं है, लीजिए इस गीत के बोल पढ़कर इसकी यादें ताजा कर लीजिए।

 

जाने वो कैसे लोग थे जिनके प्यार को प्यार मिला,
हमने तो जब कलियां मांगी कांटों का हार मिला।

खुशियों की मंज़िल ढूँढी तो ग़म की गर्द मिली,
चाहत के नग़मे चाहे तो आहें सर्द मिली,
दिल के बोझ को दूना कर गया जो ग़मखार मिला।
हमने तो जब कलियां मांगी…

बिछड़ गया हर साथी देकर पल दो पल का साथ,
किसको फ़ुरसत है जो थामे दीवानों का हाथ,
हमको अपना साया तक अक्सर बेज़ार मिला।
हमने तो जब कलियां मांगी…

इसको ही जीना कहते हैं तो यूँ ही जी लेंगे
उफ़ न करेंगे लब सी लेंगे आँसू पी लेंगे
ग़म से अब घबराना कैसा, ग़म सौ बार मिला।

हमने तो जब कलियां मांगी कांटों का हार मिला।
जाने वो कैसे लोग थे जिनके प्यार को प्यार मिला॥

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।


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यहीं रहती थी वह- रवींद्रनाथ ठाकुर

आज मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य संकलन- ‘PoemHunter.com’ से लेता हूँ। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘She Dwelt Here’ का भावानुवाद-

गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता


यहीं रहती थी वह!

यहीं रहती थी वह, खंडहर हो चुकी सीढ़ियों वाले तालाब के किनारे। बहुत सी शामों को उसने देखा था, शाम में सूरज को चक्कर खाते बांस की पत्तियों के पीछे,
और बहुत से बरसात वाले दिनों में, भीगी मिट्टी की सौंधी गंध
उसके घर तक आती थी, धान की छोटी-छोटी टहनियों को लांघते हुए।

लोगों द्वारा उसको दिया गया नाम, यहाँ खजूर-ताड़ के वृक्षों में
और उन आंगनों को याद है, जहाँ लड़कियां बैठकर सर्दियों के लिए रजाई में टांके लगाते हुए, बात करती हैं। 

तालाब का जल, अपनी गहराइयों में, यादें समोए हुए है
उसके तैरने वाले अंगों और गीले पैरों की, जो अपनी छाप छोड़ते थे,
दिन-प्रतिदिन, गांव को जाने वाली पगडंडी पर।

महिलाएं जो आज आती हैं, अपने बर्तन लेकर पानी भरने को
उन सभी ने, देखा है, हंसी-मजाक में खिलने वाली उसकी मुस्कान को , अपने बैलों को नहलाने ले जाने वाले वृद्ध किसान भी, प्रतिदिन उसके दरवाजे पर रुककर उसका अभिवादन करते थे।

बहुत सी यात्री-नावें इस गांव से होकर गुजरती हैं; बहुत से यात्री सुस्ताते हैं, वटवृक्ष के नीचे; फेरा लगाने वाली बहुत सी नावें, नदी-मार्ग से यात्रियों को बाजार तक ले जाती हैं; ; परंतु उनका ध्यान, गांव की सड़क के किनारे, ध्वस्त हो चुकी सीढ़ियों वाले, तालाब के किनारे इस स्थान पर नहीं जाता, -जहाँ रहती थी वह, जिसे मैं प्रेम करता हूँ।

-रवींद्रनाथ ठाकुर

और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-

She Dwelt Here

She dwelt here by the pool with its landing-stairs in ruins. Many an evening she had watched the moon made dizzy by the shaking of bamboo leaves,
and on many a rainy day the smell of the wet earth
had come to her over the young shoots of rice.

Her pet name is known here among those date-palm groves and
in the courtyards where girls sit and talk while stitching their
winter quilts.

The water in this pool keeps in its depth the memory
of her swimming limbs, and her wet feet had left their marks, day
after day, on the footpath leading to the village.

The women who come to-day with their vessels to the water have
all seen her smile over simple jests, and the old peasant, taking his bullocks to their bath, used to stop at her door every day to greet her.

Many a sailing-boat passes by this village; many a traveler takes rest beneath that banyan tree; the ferry-boat crosses to yonder ford carrying crowds to the market; but they never notice this spot by the village road, near the pool with its ruined landing-stairs, -where dwelt she whom I love.

-Rabindranath Tagore

नमस्कार।