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Teachers and Talent!

So it is time to present my views on the weekly prompt on #IndiSpire- Can teachers today be called “the untalented leftovers”? Give reasons. #Teachers

 

 

Yes, I do agree that when a young person chooses his career, mostly under the guidance of his parents and peers, ‘Teaching’ is not the first priority or in some cases not even the last priority too.

Mostly when parents guide their ward to choose the subjects of study and most of the time in India, it is the dream of the parents about what their child should become. Many times people try to fit their ward into a position which they could not reach.

Doctors, Engineers are the careers that parents want their wards to choose and many a times people opt for banking jobs after studying science subjects.

But life is not only about choosing the job where you can get the heaviest pay packet. And when we talk about a profession like teaching, it is not simply a ‘Career’.

Teachers are the people who attract the young students the maximum. When we ask little children what they would become on growing up, a very good percentage of the answers is ‘Teacher’. As they grow up and acquire practical knowledge, understand the monetary system and network, they get more attracted towards other careers.

I think, we should stop weighing the professions in terms of the earning potential. What I would like to underline here is that teaching is among the professions which affect the society the most. Like doctor can save a life, and there may be some other professions which make a great impact on some people, but teachers shape the future generations, the society, through the young people they teach and these students, in turn might be becoming whatever they can as a professional, but what kind of a human being, a citizen they become, the teachers are those who play a very important role in it, after only the parents I feel.

As far as earning is concerned I think now a days there are opportunities of earning high in many places in teaching profession also, but the sincere people everywhere have to make great sacrifice, since they try to give their best for the benefit of the students. Otherwise like any other profession, in teaching line also, especially in government type services, there are people who are not sincere, they anyhow dispose their job responsibilities. There focus is on earning more and more money, for which they also run ‘tution industry’, force the students to take tution also.

So I would just like to underline that teaching is a noble profession, a line in which people impress their audience by their knowledge and oratory. That is why in politics also, today there are people from teaching and legal fields who have made a great impact. Since those working in private field have no problem, if they get elected they can do politics otherwise continue teaching or practicing law. Some even continue doing that on being in active politics.

Times are changing and today there are people who choose teaching as their career above all other options and also try to become a contributing politicians. Inspiration from great scholars like Late Dr. S. Radhakrishnan Ji and Late A.P.J. Abdul Kalaam Ji have made a great impact on young minds and this profession weighs a lot now.

So I would not like to consider that ‘teachers are untalented leftovers’. Yes like any other profession there are sincere and insincere people in this profession also. It would be great for the society if more and more talented people get attracted towards this profession. I still remember some of my teachers, who made a great impact on my life.

This is my humble submission on the subject.

Thanks for reading.


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चुरा ले न तुमको ये मौसम सुहाना!

जीवन में सभी चाहते हैं कि कोई हमारा खयाल रखने वाला हो, कोई हो जो हमारी सलामती की चिंता करे, हमारी फिक्र करे!

लेकिन फिल्मों में और शायद ऐसा असली ज़िंदगी में भी होता है कुछ लोगों के साथ कि लोग उनका इतना खयाल रखते हैं, इतनी चिंता करते हैं, अपनी सेवाएं प्रदान करने के लिए इतने बेताब रहते हैं कि कहना पड़ता कि हुज़ूर मुझे माफ कीजिए, आप अपना ही खयाल रख लीजिए!

एक बड़ा प्यारा सा गीत याद आ रहा था, 1963 में रिलीज़ हुई फिल्म- ‘दिल ही तो है’ के लिए साहिर लुधियानवी जी के लिखे इस गीत को, मुकेश जी और सुमन कल्याणपुर जी ने, रोशन जी के संगीत निर्देशन में गाया है और इस गीत को राज कपूर जी और नूतन जी पर बड़ी खूबसूरती से फिल्माया गया है। इस गीत में नायक ने नायिका के साथ रहने के लिए कैसे-कैसे बहाने बनाए हैं और कैसे सुंदर जवाब नायिका ने दिए हैं, वही इस गीत की खूबसूरती बढ़ाते हैं।

 

 

चुरा ले ना तुमको ये मौसम सुहाना,
खुली वादियों में अकेली न जाना |

लुभाता है मुझको ये मौसम सुहाना,
मैं जाऊँगी तुम मेरे पीछे न आना |

लिपट जाएगा कोई बेबाक झोंका,
जवानी की रौ में ना आँचल उड़ाना।

मेरे वास्ते तुम परेशां न होना,
मुझे ख़ूब आता है दामन बचाना|

घटा भी कभी चूम लेती है चेहरा,
समझ सोच कर रुख़ से ज़ुल्फ़ें हटाना।

घटा मेरे नज़दीक आकर तो देखे,
इन आँखों ने सीखा है बिजली गिराना ।

तुम एक फूल हो तुमको ढूंढूंगा कैसे,
कहीं मिल के फूलों में गुम हो न जाना।

जो फूलों में रंगत मिले भी तो क्या है,
जुदा मेरी ख़ुश्बू, जुदा मुस्कुराना |

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।


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सुंदर सपना टूट गया!

सामान्यतः हर बड़ी घटना के साथ बहुत सारे लोगों के सपने जुड़े होते हैं। हाल ही में हुए लोकसभा के चुनाव भी ऐसी ही बड़ी घटना थे। इस अवसर पर जहाँ राजनैतिक दलों को तलाश होती है ऐसे उम्मीदवारों की जो चुनाव जीत सकें वहीं बहुत सारे अपने-अपने क्षेत्र के सेलीब्रिटी भी सोचते हैं कि राजनीति में ही क्यों न भाग्य आजमाया जाए। इस बार भी बहुत सारे लोग अनेक अन्य क्षेत्रों से राजनीति में आए और जहाँ तक राष्ट्रीय राजनैतिक पार्टियों की बात है, सामान्यतः जिन लोगों ने भाजपा को चुना वो फायदे में रहे और जिन्होंने कांग्रेस को चुना, उनकी लोकप्रियता काम नहीं आ सकी। कुल मिलाकर ऐसा लगा कि हर सीट पर मोदीजी ही चुनाव लड़ रहे थे।

 

 

पार्टियों का अपना निष्पादन, कमियां, खामियां अपनी जगह हैं, लेकिन मोदीजी ने अपनी मेहनत और निष्पादन के दम पर, लगभग अकेले अपने बूते जो परिणाम प्राप्त किए हैं वो आश्चर्यजनक हैं।

वैसे आज मैं बात राजनैतिक पार्टियों के बारे में नहीं बल्कि ‘पत्रकार’ के वेश में काम करने वाले राजनीतिज्ञों के बारे में करना चाहता हूँ। वास्तव में मोदीजी ने एक बार फिर से उनके पेट पर लात मार दी है। वो भी क्या दिन थे जब कांग्रेस की सरकार होती थी और पत्रकारों की टोली प्रधान मंत्री और अन्य लोगों के साथ ‘ऑल एक्स्पेंसिज़ पेड’ विश्व भ्रमण पर जाती थी और हवाई जहाज में बड़े उल्लसित मन से प्रधान मंत्री का इंटरव्यू लिया करते थे, जैसे बैकग्राउंड में हवाई जहाज की ध्वनि जुड़ जाने से इंटरव्यू की गुणवत्ता कुछ और बढ़ जाती है। बहुत से ‘पत्रकारों’ को मुफ्त घर आदि जैसे उपहारों से भी नवाज़ा गया था, ऐसा सुना है!

मैं यही कल्पना कर रहा था कि यदि फिर से मोदी सरकार बन जाने की यह दुर्घटना न हुई होती तो बहुत से ‘पत्रकारों’ का भाग्य कैसे बहुरा होता, जिनको आजकल ‘लुटियंस गैंग’ अथवा ‘खान मार्केट गैंग’ के नाम से जाना जाता है!

मैं मानता हूँ कि, जिस प्रकार किसी के भी साथ होता है, पत्रकार की भी अपनी विचारधारा हो सकती है और होनी भी चाहिए। पत्रकार अपनी विचारधारा के अनुसार घटनाओं और सरकार के निर्णयों का विश्लेषण कर सकता है, लेकिन विचारधारा उसे यह छूट नहीं देती कि पत्रकार के रूप में वह किस घटना का नोटिस ले और किसको नकार दे!

मैं यह विचार कर रहा था कि मान लीजिए नई सरकार का स्वरूप कुछ और होता तो पत्रकारों के भविष्य पर क्या असर पड़ता! मुझे चुनाव से कुछ समय पहले ही श्रीमान पुण्य प्रसून वाजपेयी के साथ हुई दुर्घटना याद आ रही है, एक चैनल के साथ उनका नियोजन समाप्त हो गया, यह दुखद है, परंतु जो कारण मालूम हुआ, वो यह बताया गया कि किसी किसान महिला द्वारा अपनी उपज के बारे में दिए गए बयान को पूरी तरह पलटकर श्रीमान वाजपेयी जी सरकार पर निशाना साधना चाह रहे थे।

मुझे यही खयाल आ रहा था कि अगर सरकार बदल जाती और अगर चमत्कार से केजरीवाल जी प्रधानमंत्री बन जाते, कल्पना करने में क्या जाता है जी! तब पुण्य प्रसून जी शायद सरकार के प्रेस-सेक्रेटरी बन जाते!

लेकिन यह सब इतना आसान नहीं है जी। मुझे दो महान पत्रकार एक साथ याद आ रहे हैं- एक तो विनोद दुआ जी, जो पहले लोगों के लिए खाते थे, काफी समय से उनका दाना-पानी बंद हैं और वे एक ‘वायर’ से लिपटे हुए, लोगों के सामने अपनी कल्पनाओं की दुनिया प्रस्तुत करते रहते हैं। और हाँ दूसरे इसी ब्रांड के पत्रकार हैं- श्रीमान रवीश जी। इन दोनो की विचारधारा का पर्दा, जिसे कहते हैं ना ‘ब्लाइंड स्पॉट’- वो इतना बड़ा है कि इनको मोदी जी की कोई अच्छाई नहीं दिखाई दे सकती और श्रीमान राहुल गांधी जी की कोई कमी इनको नज़र नहीं आ सकती।

मैं किसी ज़माने में इन दोनो महानुभावों की प्रस्तुतियों से बहुत प्रभावित होता था लेकिन जब इनके ऊपर चढ़ा झूठ और विचारांधता का मुलम्मा मोटा होता गया, इतना कि इन्हें कुछ भी सही-सही दिखना बंद हो गया, तब मैंने मान लिया कि ये महानुभाव कुछ भी हों, पत्रकार तो नहीं हैं।

वैसे इस प्रकार के यशस्वी पत्रकारों की सूची भी काफी लंबी है, एक दो चैनल हैं जो पूरी तरह ऐसे अभियानों में लगे रहते हैं। एक बरखा दत्त जी और एक ‘एनडीटीवी’ को इस मामले में विशिष्ट मैडल देकर मैं अपनी बात को समाप्त करूंगा।

कुछ नहीं जी, बस ऐसे ही खयाल आया कि अगर सरकार कुछ अलग तरह की बनी होती तो इनका सुनहरा भविष्य क्या हुआ होता। अब बाकी की कल्पना आप कर लीजिए न!

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।


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अजब तमाशा – रवींद्रनाथ ठाकुर

आज मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य संकलन- ‘PoemHunter.com’ से लेता हूँ। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘The Unheeded Pageant’ का भावानुवाद-

 

 

गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता 

अजब तमाशा

 

लेकिन वह छोटी सी रंगीन फ्रॉक वाली कौन है, मेरे बच्चे? वह क्या है जो तुम्हे हंसने पर मजबूर करता है, मेरी नन्ही जीवन-कली?
द्वार पर खड़ी मां तुम्हे देखकर मुस्कुराती है।
वह ताली बजाती है, कंगन खनकते हैं, और तुम नाचते हो,
अपने हाथ में बांस की डंडी लिए तुम नन्हे गडरिए लगते हो।

लेकिन यह क्या है जो तुम्हे हंसने पर मजबूर करता है, मेरी जीवन-कली?
अरे याचक, तुम किस वस्तु के लिए याचना करते हो, दोनो हाथों से अपनी
मां की गर्दन पकड़कर लटके हुए?
अरे लोभी हृदय, क्या मैं इस विश्व को, आकाश से एक फल की तरह तोड़कर
तुम्हारी गुलाब जैसी हथेली पर रख दूं?
अरे याचक, किस वस्तु की याचना कर रहे हो तुम?

हवा बहुत आनंद के साथ, तुम्हारी पायल की रुनझुन ध्वनि
अपने साथ ले जाती है।
सूर्य मुस्कुराता है, जब वह तुम्हे शौच किए देखता है।
आकाश भी तुम्हे निहारता है, जब तुम अपनी माता की बांहों में सोये होते हो,
और सुबह दबे पांव बिस्तर के पास आकर तुम्हारी आंखों को चूम लेती है।

पवन के झौंके, आनंदित होकर अपने साथ तुम्हारी पायल की रुनझुन ध्वनि
ले जाते हैं।
सपनों की राजकुमारी परी, तुम्हारी तरफ आ रही है, सांझ के
आकाश में उड़ते हुए।

विश्व माता ने अपना आसन, तुम्हारे पास ही लगाया हुआ है, तुम्हारी माता के हृदय में।

वह जो सितारों को अपना संगीत सुनाता है, तुम्हारी खिड़की के पास, अपनी बांसुरी लेकर खड़ा है।
और सपनों की राजकुमारी आ रही है, तुम्हारी तरफ,
सांझ के आकाश में उड़ते हुए।

-रवींद्रनाथ ठाकुर

और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-

The Unheeded Pageant

Ah, who was it coloured that little frock, my child, and covered
your sweet limbs with that little red tunic?
You have come out in the morning to play in the courtyard,
tottering and tumbling as you run.

But who was it coloured that little frock, my child?
What is it makes you laugh, my little life-bud?
Mother smiles at you standing on the threshold.

She claps her hands and her bracelets jingle, and you dance
with your bamboo stick in your hand like a tiny little shepherd.
But what is it makes you laugh, my little life-bud?
O beggar, what do you bed for, clinging to your mother’s neck
with both your hands?

O greedy heart, shall I pluck the world like a fruit from the
sky to place it on your little rosy palm?
O beggar, what are you begging for?
The wind carries away in glee the tinkling of your anklet
bells.
The sun smiles and watches your toilet.

The sky watches over you when you sleep in your mother’s arms,
and the morning comes tiptoe to your bed and kisses your eyes.
The wind carried away in glee the tinkling of your anklet
bells.
The fairy mistress of dreams is coming towards you, flying
through the twilight sky.

The world-mother keeps her seat by you in your mother’s heart.
He who plays his music to the stars is standing at your window with his flute.
And the fairy mistress of dreams is coming towards you, flying through the twilight sky.

-Rabindranath Tagore

 

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।


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जय श्रीराम बोलने वाले राक्षस!

आज एक ऐसा विषय जिस पर चर्चा करना मुझे बहुत जरूरी लग रहा है। हिंदू धर्म के और हमारे राष्ट्र के महान नायक, आदर्श पुरुष- मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम जी को आजकल कुछ ऐसे लोग बदनाम करने में लगे हैं, जो अपने आपको श्रीराम जी का भक्त बताना चाहते हैं, लेकिन वास्तव में वे शुद्ध रूप से गुंडे हैं।

 

 

महाबली, महा पराक्रमी और शंकर भगवान के परमभक्त – लंकापति रावण को, सारे गुणों से संपन्न होने के बावज़ूद, अपने दुष्कर्मों के कारण, साधु पुरुषों को सताने के कारण, राक्षस की श्रेणी में गिना गया और हर वर्ष हम बुराई के प्रतीक के रूप में श्रीराम जी के हाथों उसका वध होते देखते हैं और उसका पुतला जलने पर खुशी मनाते हैं।

आप यदि प्रभु के सच्चे भक्त हैं तो आप मानव मात्र से प्रेम करेंगे। श्रीराम जी का व्यक्तित्व ही ऐसा था कि कहा जाता है- ‘दैहिक, दैविक, भौतिक तापा- रामराज नहीं काहुहि व्यापा’। तुलसीदास जी कहते हैं- ‘सीयराममय सब जग जानी, करहुं प्रणाम जोरि जुग पाणि’। ‘विश्वरूप रघुवंशमणि, करहु वचन विश्वास’। जो इस दुनिया में लोगों से नफरत करता है, लोगों को कष्ट देता है, यहाँ तक कि लोगों के प्राण भी ले लेता है, वो भी भगवान के नाम पर, वह वास्तव में शुद्ध रूप से राक्षस है।

कुल मिलाकर बात है कि जो सच्चा इंसान और विशेष रूप से सच्चा हिंदू है, वह मानव मात्र से प्रेम करेगा। जो किसी भी बहाने से लोगों से नफरत करता है, वह न तो सच्चा भारतीय है, न सच्चा हिंदू है। आज ‘जय श्रीराम’ का नारा लगाने वाले ऐसे लोग सामने आने लगे हैं, जिनके हाथों में डंडे और अन्य हथियार होते हैं और जो व्यवहार से भक्त अथवा सच्चे हिंदू क्या, इंसान कहलाने के लायक भी नहीं हैं और शुद्ध रूप से गुंडे हैं। अभी एक घटना शायद झारखंड में सामने आई, जहाँ किसी मुस्लिम युवक को चोरी का इल्ज़ाम लगाकर पीटा गया और इस दौरान उससे कहा गया कि ‘जय श्रीराम’ का नारा लगाए और पीटते-पीटते उसकी जान ले ली!

आज भारी बहुमत से जो सरकार बनी है, उसके बनने पर अगर इस प्रकार के गुंडों का हौसला बढ़ता है तो यह सरकार के लिए चिंता की बात होनी चाहिए और इस प्रकार के तत्वों को ऐसी सज़ा मिलनी चाहिए कि कोई दूसरा ऐसी हिम्मत न कर सके।

मुझे इस प्रकार के तत्वों के खुला घूमने पर सख्त आपत्ति है क्योंकि ये मेरी आस्था को बदनाम करते हैं, मेरे धर्म को बदनाम करते हैं और मैं सरकार से अपील करना चाहूंगा कि ऐसे लोगों को सही सबक सिखाया जाए।

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।


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मेरे महबूब कहीं और मिला कर मुझसे!

आज फिर से एक ऐसा विषय जिस पर युग-युगों से चर्चा होती रही है, कार्रवाई होती रही है। फिल्म- ‘मिलन’ का एक युगल गीत है- ‘हम तुम, युग-युग से ये गीत मिलन के गाते रहे हैं, गाते रहेंगे’। जी हाँ प्रेम, जो वैसे तो पूरी दुनिया को बांधता है, दुनिया का सार प्रेम ही है, अगर प्रेम नहीं रहेगा तो दुनिया भी नहीं रहेगी!

लेकिन जो प्रेम हमारे साहित्य में, कविताओं और गीतों में महत्वपूर्ण स्थान पाता है, फिल्में अक्सर इसी पर आधारित रहती हैं, वो है प्रेमी-प्रेमिका, आशिक़-महबूबा वाला प्रेम!

मैं ज्यादा लंबा भाषण नहीं दूंगा, ताज महल को प्रेम की खूबसूरत निशानी माना गया है और उसी को लेकर साहिर लुधियानवी जी ने एक बहुत सुंदर नज़्म लिखी थी जिसको किसी रूप में एक फिल्म में भी लिया गया था। इस नज़्म में साहिर लुधियानवी कहते हैं कि ताजमहल प्रेम की नहीं राजसत्ता के ऐश्वर्य की निशानी है, यह गरीब प्रेमियों का मजाक उड़ाता है।

खैर यह भी विचारणीय है, लीजिए प्रस्तुत है साहिर लुधियानवी जी की यह नज़्म-

 

ताज तेरे लिए इक मज़हर-ए-उलफत ही सही,
तुम को इस वादी-ए-रँगीं से अक़ीदत ही सही,
मेरे महबूब कहीं और मिला कर मुझसे।

बज़्म-ए-शाही में ग़रीबों का गुजर क्या मानी,
सब्त जिस राह पे हों सतवत-ए-शाही के निशाँ,
उस पे उलफत भरी रूहों का सफर क्या मानी।
मेरी महबूब पस-ए-पर्दा-ए-तशरीर-ए-वफ़ा
तूने सतवत के निशानों को तो देखा होता,
मुर्दा शाहों के मक़ाबिर से बहलने वाली,
अपने तारीक़ मक़ानों को तो देखा होता।

अनगिनत लोगों ने दुनिया में मुहब्बत की है,
कौन कहता है कि सादिक़ न थे जज़्बे उनके,
लेकिन उनके लिये तश्शीर का सामान नहीं,
क्यूँकि वो लोग भी अपनी ही तरह मुफ़लिस थे,
ये इमारत-ओ-मक़ाबिर, ये फ़ासिले, ये हिसार,
मुतल-क़ुलहुक्म शहँशाहों की अज़्मत के सुतून,
दामन-ए-दहर पे उस रँग की गुलकारी है,
जिसमें शामिल है तेरे और मेरे अजदाद का ख़ून।

मेरे महबूब!उन्हें भी तो मुहब्बत होगी,
जिनकी सानाई ने बक़शी है इसे शक़्ल-ए-जमील,
उनके प्यारों के मक़ाबिर रहे बेनाम-ओ-नमूद,
आज तक उन पे जलाई न किसी ने क़ंदील।

ये चमनज़ार ये जमुना का किनारा, ये महल,
ये मुनक़्कश दर-ओ-दीवार, ये महराब ये ताक़,
इक शहंशाह ने दौलत का सहारा लेकर,
हम ग़रीबों की मुहब्बत का उड़ाया है मज़ाक़।
मेरे महबूब कहीं और मिला कर मुझसे।

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार।

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Living with Happiness!

Today I am making my submission based on the #IndiSpire prompt, which says-

Is happiness worthless today? Today so many people are running to earn money leaving some responsibilities behind , while running they forget to laugh or real happiness. #happinessworthless

 

 

While thinking on this subject, I remember an old story. There are so many such stories based on the wisdom of our forefathers, which teach us about moral values and give some practical lessons for life.

This very short story says that there was a person who was greedy to acquire more and more land, he got an offer from some king perhaps that as much land as you would cover by walking during day time, from sunrise to sunset would be yours. So that person started walking and due to his greed kept expanding the boundary, he wanted to acquire more and more and finally before that evening he , while walking relentlessly, without taking something to eat and drink, he fell down and died.

Practically he could get those 2 yards of land where he fell down and died for his burial. This story tells where our greed can take us.

Another instance I remember from the film- 3 Idiots, where we see the hero, the brilliant but easy going student- Rancho played by Aamir Khan, he believes that the students should enjoy their studies and should not become part of a mad race. And the professor there tells ‘Life is a race, nobody remembers who stood second, we have to be the first. What would happen when everybody aims to be first, only one person would achieve that goal.

But what has our lives become, specially that of those facing very difficult business targets, those in corporate sales teams or other those facing difficult production targets.

In today’s life, most people in big cities start early for catching the bus or train to reach their workplace, some people travel long distance for that, many keep honking their car horn at the traffic signals. There are so many stressors, traffic jams are also one of them. System does not accept these excuses, you have to be there in time and deliver in spite of all the odds.

Basically we have come here to live our lives, and living is useless if we do not enjoy life, do not remain happy. For living our life happily, there are other things that we have to do. But we have to keep in mind that these things we do to make our life happy and easy-going. Like, we have to do something to earn so that we can meet the requirements of our family. Now one thing that makes life miserable is that we keep expanding our desires. One can do something to meet the needs more easily, than meeting the desires. Since our desires keep expanding, especially we compare our standard of living with those who are living much lavished life, since that attracts us. This problem is much more among the middle class.

Somebody said that the middle class is like a motorcycle, they are like a bi-cycle, since they have two wheels, but they always try to compete with cars, since they are motor-driven.

I think this needs to be considered again and again that we have come in this world to live our lives, to enjoy it as much as we can and it is not only money that gives us joy. We should keep ourselves reminding that we have to enjoy our life and not to become part of a rat-race.

This is my humble submission on the subject. We should find occasions and reasons to laugh and smile with others. To enjoy every moment of our life.

Thanks for reading.


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दिन प्रतिदिन वह आता है – रवींद्रनाथ ठाकुर

आज मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य संकलन- ‘PoemHunter.com’ से लेता हूँ। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘Day After Day He Comes’ का भावानुवाद-

गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता

दिन प्रतिदिन वह आता है!

दिन प्रतिदिन वह आता है, और फिर चला जाता है
कहीं दूर। जाओ, उसे यह फूल दे दो, जो अभी मेरे बालों
में लगा है, मेरे मित्र।

अगर वह पूछे कि किसने भेजा है यह, तो
मेरी विनती है कि मेरा नाम न बताना उसे–
क्योंकि वह बस आता है, और वापस लौट जाता है।

वह बैठता है वृक्ष के तले धूल में,
वहाँ फूलों और पत्तियों को फैलाकर एक आसन
बनाता है, मेरे मित्र, और वापस लौट जाता है।

उसकी आंखें उदास होती हैं, और उनसे
मेरे हृदय में उदासी छा जाती है।

वह कुछ बताता नहीं है, कि क्या बात है
उसके मन में; बस वह आता है, और वापस लौट जाता है।

                                                                      -रवींद्रनाथ ठाकुर

 

और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-

 

Day After Day He Comes

 

Day after day he comes and goes
away.
Go, and give him a flower from my
hair, my friend.

If he asks who was it that sent it, I
entreat you do not tell him my name–
for he only comes and goes away.

He sits on the dust under the tree.
Spread there a seat with flowers and
leaves, my friend.
His eyes are sad, and they bring
sadness to my heart.

He does not speak what he has in
mind; he only comes and goes away.

-Rabindranath Tagore

नमस्कार।

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सिंहासन खाली करो कि जनता आती है!

आज मैं विख्यात हिंदी कवि स्व. रामधारी सिंह दिनकर जी, जिन्हें राष्ट्रकवि माना जाता था, उनकी एक प्रसिद्ध कविता शेयर कर रहा हूँ जिसकी कुछ पंक्तियां अक्सर उद्धृत की जाती हैं और जयप्रकाश जी के आंदोलन के दौरान भी यह एक नारा बन गया था- ‘सिंहासन खाली करो कि जनता आती है’।

दिनकर जी ने यह कविता 26, जनवरी 1950 के ऐतिहासिक अवसर पर लिखी थी जब हमारा संविधान लागू हुआ था और विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र का उदय हुआ था।
लीजिए प्रस्तुत है यह ऐतिहासिक कविता-

 

सदियों की ठंढी-बुझी राख सुगबुगा उठी,
मिट्टी सोने का ताज पहन इठलाती है;
दो राह,समय के रथ का घर्घर-नाद सुनो,
सिंहासन खाली करो कि जनता आती है।

जनता? हां,मिट्टी की अबोध मूरतें वही,
जाड़े-पाले की कसक सदा सहनेवाली,
जब अंग-अंग में लगे सांप हो चूस रहे
तब भी न कभी मुंह खोल दर्द कहनेवाली।

जनता? हां,लंबी – बड़ी जीभ की वही कसम,
“जनता, सचमुच ही, बड़ी वेदना सहती है।”
“सो ठीक, मगर, आखिर, इस पर जनमत क्या है?”
‘है प्रश्न गूढ़ जनता इस पर क्या कहती है?”

मानो,जनता ही फूल जिसे अहसास नहीं,
जब चाहो तभी उतार सजा लो दोनों में;
अथवा कोई दुधमुंही जिसे बहलाने के
जंतर-मंतर सीमित हों चार खिलौनों में।

लेकिन होता भूडोल, बवंडर उठते हैं,
जनता जब कोपाकुल हो भृकुटि चढाती है;
दो राह, समय के रथ का घर्घर-नाद सुनो,
सिंहासन खाली करो कि जनता आती है।

हुंकारों से महलों की नींव उखड़ जाती,
सांसों के बल से ताज हवा में उड़ता है,
जनता की रोके राह,समय में ताव कहां?
वह जिधर चाहती,काल उधर ही मुड़ता है।

अब्दों, शताब्दियों, सहस्त्राब्द का अंधकार
बीता;गवाक्ष अंबर के दहके जाते हैं;
यह और नहीं कोई,जनता के स्वप्न अजय
चीरते तिमिर का वक्ष उमड़ते जाते हैं।

सब से विराट जनतंत्र जगत का आ पहुंचा,
तैंतीस कोटि-हित सिंहासन तय करो
अभिषेक आज राजा का नहीं,प्रजा का है,
तैंतीस कोटि जनता के सिर पर मुकुट धरो।

आरती लिये तू किसे ढूंढता है मूरख,
मन्दिरों, राजप्रासादों में, तहखानों में?
देवता कहीं सड़कों पर गिट्टी तोड़ रहे,
देवता मिलेंगे खेतों में, खलिहानों में।

फावड़े और हल राजदण्ड बनने को हैं,
धूसरता सोने से श्रृंगार सजाती है;
दो राह,समय के रथ का घर्घर-नाद सुनो,
सिंहासन खाली करो कि जनता आती है।

                                                          (26 जनवरी,1950)

 

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।


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तेरा भी सामना हो कभी, ग़म की शाम से!

आज फिर एक पुराना गीत याद आ रहा है। जैसे कि दुनिया में होता ही है और फिल्में भी तो हमारी-आपकी दुनिया का आइना ही हैं! प्रेम जीवन का और इसीलिए साहित्य का, कथा-कहानियों का भी मुख्य तत्व होता है और इसी प्रकार फिल्मों में भी प्रेम के प्रसंग और प्रेम के गीत भी प्रमुखता से स्थान पाते हैं।

हाँ तो प्रेम की अभिव्यक्ति के रूप में जहाँ प्रेम की भावनाओं का, प्रेयसी के सौंदर्य का बखान होता है वहीं प्रेम से जुड़े गीतों में बहुत सारे गीत दिल टूटने से भी जुड़े होते हैं, और साहित्य में जहाँ हृदय की बात होती है, हिंदी फिल्मों में सामान्यतः दिल आता है, और यह माना जाता है कि अक्सर उसको टूटना ही होता है।

हाँ तो आज का यह गीत नायक के ऐसे अनुभव से जुड़ा है जहाँ उसको प्रेम में ऐसी स्थितियों से गुज़रना पड़ता है कि उसे प्रेम के नाम से ही नफरत हो जाती है।

आज का यह गीत है 1966 में रिलीज़ हुई फिल्म- ‘दिल दिया दर्द लिया’ से, गीत लिखा है- शकील बदायुनी साहब ने और इसे बड़े ही प्रभावी अंदाज़ में गाया है, स्वर सम्राट- मोहम्मद रफी साहब ने।

लीजिए प्रस्तुत है आज का यह गीत-

गुज़रे हैं आज इश्क़ में हम उस मक़ाम से,
नफ़रत सी हो गई है मुहब्बत के नाम से।

हमको न ये गुमान था, ओ संगदिल सनम,
राह-ए-वफ़ा से तेरे बहक जाएंगे क़दम,
छलकेगा ज़हर भी तेरी आँखों के जाम से।

ओ बेवफ़ा तेरा भी यूँ ही टूट जाए दिल,
तू भी तड़प-तड़प के पुकारे हाय दिल,
तेरा भी सामना हो कभी, ग़म की शाम से।

हम वो नहीं जो प्यार में रोकर गुज़ार दें,
परछाईं भी हो तेरी तो ठोकर से मार दें,
वाक़िफ़ हैं हम भी ख़ूब हर एक इंतक़ाम से।

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।