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सुंदर सपना टूट गया!

सामान्यतः हर बड़ी घटना के साथ बहुत सारे लोगों के सपने जुड़े होते हैं। हाल ही में हुए लोकसभा के चुनाव भी ऐसी ही बड़ी घटना थे। इस अवसर पर जहाँ राजनैतिक दलों को तलाश होती है ऐसे उम्मीदवारों की जो चुनाव जीत सकें वहीं बहुत सारे अपने-अपने क्षेत्र के सेलीब्रिटी भी सोचते हैं कि राजनीति में ही क्यों न भाग्य आजमाया जाए। इस बार भी बहुत सारे लोग अनेक अन्य क्षेत्रों से राजनीति में आए और जहाँ तक राष्ट्रीय राजनैतिक पार्टियों की बात है, सामान्यतः जिन लोगों ने भाजपा को चुना वो फायदे में रहे और जिन्होंने कांग्रेस को चुना, उनकी लोकप्रियता काम नहीं आ सकी। कुल मिलाकर ऐसा लगा कि हर सीट पर मोदीजी ही चुनाव लड़ रहे थे।

 

 

पार्टियों का अपना निष्पादन, कमियां, खामियां अपनी जगह हैं, लेकिन मोदीजी ने अपनी मेहनत और निष्पादन के दम पर, लगभग अकेले अपने बूते जो परिणाम प्राप्त किए हैं वो आश्चर्यजनक हैं।

वैसे आज मैं बात राजनैतिक पार्टियों के बारे में नहीं बल्कि ‘पत्रकार’ के वेश में काम करने वाले राजनीतिज्ञों के बारे में करना चाहता हूँ। वास्तव में मोदीजी ने एक बार फिर से उनके पेट पर लात मार दी है। वो भी क्या दिन थे जब कांग्रेस की सरकार होती थी और पत्रकारों की टोली प्रधान मंत्री और अन्य लोगों के साथ ‘ऑल एक्स्पेंसिज़ पेड’ विश्व भ्रमण पर जाती थी और हवाई जहाज में बड़े उल्लसित मन से प्रधान मंत्री का इंटरव्यू लिया करते थे, जैसे बैकग्राउंड में हवाई जहाज की ध्वनि जुड़ जाने से इंटरव्यू की गुणवत्ता कुछ और बढ़ जाती है। बहुत से ‘पत्रकारों’ को मुफ्त घर आदि जैसे उपहारों से भी नवाज़ा गया था, ऐसा सुना है!

मैं यही कल्पना कर रहा था कि यदि फिर से मोदी सरकार बन जाने की यह दुर्घटना न हुई होती तो बहुत से ‘पत्रकारों’ का भाग्य कैसे बहुरा होता, जिनको आजकल ‘लुटियंस गैंग’ अथवा ‘खान मार्केट गैंग’ के नाम से जाना जाता है!

मैं मानता हूँ कि, जिस प्रकार किसी के भी साथ होता है, पत्रकार की भी अपनी विचारधारा हो सकती है और होनी भी चाहिए। पत्रकार अपनी विचारधारा के अनुसार घटनाओं और सरकार के निर्णयों का विश्लेषण कर सकता है, लेकिन विचारधारा उसे यह छूट नहीं देती कि पत्रकार के रूप में वह किस घटना का नोटिस ले और किसको नकार दे!

मैं यह विचार कर रहा था कि मान लीजिए नई सरकार का स्वरूप कुछ और होता तो पत्रकारों के भविष्य पर क्या असर पड़ता! मुझे चुनाव से कुछ समय पहले ही श्रीमान पुण्य प्रसून वाजपेयी के साथ हुई दुर्घटना याद आ रही है, एक चैनल के साथ उनका नियोजन समाप्त हो गया, यह दुखद है, परंतु जो कारण मालूम हुआ, वो यह बताया गया कि किसी किसान महिला द्वारा अपनी उपज के बारे में दिए गए बयान को पूरी तरह पलटकर श्रीमान वाजपेयी जी सरकार पर निशाना साधना चाह रहे थे।

मुझे यही खयाल आ रहा था कि अगर सरकार बदल जाती और अगर चमत्कार से केजरीवाल जी प्रधानमंत्री बन जाते, कल्पना करने में क्या जाता है जी! तब पुण्य प्रसून जी शायद सरकार के प्रेस-सेक्रेटरी बन जाते!

लेकिन यह सब इतना आसान नहीं है जी। मुझे दो महान पत्रकार एक साथ याद आ रहे हैं- एक तो विनोद दुआ जी, जो पहले लोगों के लिए खाते थे, काफी समय से उनका दाना-पानी बंद हैं और वे एक ‘वायर’ से लिपटे हुए, लोगों के सामने अपनी कल्पनाओं की दुनिया प्रस्तुत करते रहते हैं। और हाँ दूसरे इसी ब्रांड के पत्रकार हैं- श्रीमान रवीश जी। इन दोनो की विचारधारा का पर्दा, जिसे कहते हैं ना ‘ब्लाइंड स्पॉट’- वो इतना बड़ा है कि इनको मोदी जी की कोई अच्छाई नहीं दिखाई दे सकती और श्रीमान राहुल गांधी जी की कोई कमी इनको नज़र नहीं आ सकती।

मैं किसी ज़माने में इन दोनो महानुभावों की प्रस्तुतियों से बहुत प्रभावित होता था लेकिन जब इनके ऊपर चढ़ा झूठ और विचारांधता का मुलम्मा मोटा होता गया, इतना कि इन्हें कुछ भी सही-सही दिखना बंद हो गया, तब मैंने मान लिया कि ये महानुभाव कुछ भी हों, पत्रकार तो नहीं हैं।

वैसे इस प्रकार के यशस्वी पत्रकारों की सूची भी काफी लंबी है, एक दो चैनल हैं जो पूरी तरह ऐसे अभियानों में लगे रहते हैं। एक बरखा दत्त जी और एक ‘एनडीटीवी’ को इस मामले में विशिष्ट मैडल देकर मैं अपनी बात को समाप्त करूंगा।

कुछ नहीं जी, बस ऐसे ही खयाल आया कि अगर सरकार कुछ अलग तरह की बनी होती तो इनका सुनहरा भविष्य क्या हुआ होता। अब बाकी की कल्पना आप कर लीजिए न!

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।


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