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68. हाय रे हाय ओ दुनिया, हम तेरी नज़र में आवारे!

आज फिर से पुरानी ब्लॉग पोस्ट का दिन है और प्रस्तुत है मेरी यह पुरानी पोस्ट-

एक फिल्मी गाना याद आ रहा है, फिल्म थी- ’मैं नशे में हूँ’, यह गीत राज कपूर जी पर फिल्माया गया है, शैलेंद्र जी ने लिखा है, शंकर जयकिशन का संगीत और आवाज़ है मेरे प्रिय गायक मुकेश जी की। बोल हैं-

हम हैं तो चांद और तारे
जहाँ के ये रंगी नज़ारे
हाय री हाय ओ दुनिया
हम तेरी नज़र में आवारे..

ये आवारगी भी अज़ीब चीज है, कहीं इसको पवित्र रूप भी दिया जाता है। यायावर कहते हैं, परिव्राजक कहते हैं, और भी बहुत से नाम हैं। जब हम एक रूटीन से बंधे होते हैं, तब हम चाहें तब भी आवारगी नहीं कर सकते। आवारगी में मुख्य भाव यही है कि कोई उद्देश्य इसमें नहीं होता, वैसे नकारात्मक अर्थों में ऐसी भी आवारगी होती है, जिसमें उद्देश्य गलत होता है, लेकिन उसके लिए कुछ दूसरे शब्द भी हैं, इसलिए उसको हम अपनी इस चर्चा में नहीं लाएंगे।

भंवरा जो फूलों पर मंडराता रहता है, वह भी प्रकृति की सुंदरता को बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, परागण करके, फूलों की सुंदरता को फैलाने में सहायक होता है। मधुमक्खी की आवारगी तो जैसे हमारे मधु-उद्योग को ही चलाती है, लेकिन कहीं अगर उनके इस कार्य के दौरान, उनके हत्थे चढ़ गए तो खैर नहीं। इंसान तो खैर बहुत चालाक है, उनकी मेहनत से भी खूब वसूली करता है, और इस काम में बाबा रामदेव भी पीछे नहीं रहते।

खैर निरपेक्ष भाव से गीतों, गज़लों में आए ‘आवारगी’ के ज़िक्र पर चर्चा करते हैं, पवित्र आवारगी के बारे में-

जिस गीत का उल्लेख पहले किया, उसमें ही आगे पंक्तियां हैं-

जीवन के ये लंबे रस्ते, काटेंगे गाते-हंसते,
मिल जाएगी हमको मंज़िल, एक रोज़ तो चलते चलते,
अरमान जवां हैं हमारे, छूने को चले हैं सितारे,
हाय रे हाय ओ दुनिया—
एक जोश है अपने दिल में, घबराए नहीं मुश्किल में,
सीखा ही नहीं रुक जाना, बढ़ते ही चले महफिल में,
करते हैं गगन पे इशारे, बिजली पे कदम हैं हमारे,
हाय रे हाय ओ दुनिया—
राहों में कोई जो आए, वो धूल बने रह जाए,
ये मौज़ हमारे दिल की, न जाने कहाँ ले जाए,
हम प्यार के राजदुलारे, और हुस्न के दिल से सहारे,
हाय रे हाय ओ दुनिया, हम तेरी नज़र में आवारे।

एक और गीत है, जो भगवान दादा पर फिल्माया गया है-

हाल-ए-दिल हमारा, जाने न बेवफा ये ज़माना-ज़माना
सुनो दुनिया वालों, आएगा लौटकर दिन सुहाना-सुहाना।
एक दिन दुनिया बदलकर, रास्ते पर आएगी,
आज ठुकराती है हमको, कल मगर शर्माएगी,
बात ये तुम जान लो, अरे जान लो भैया।
दाग हैं दिल पर हज़ारों, हम तो फिर भी शाद हैं,
आस के दीपक जलाए देख लो आबाद हैं,
तीर दुनिया के सहे और खुश रहे भैया।

और फिर आवारगी की पवित्रता का संकल्प-

झूठ की मंज़िल पे यारों, हम न हर्गिज़ जायेंगे
हम ज़मीं की खाक सही पर, आसमां पर छाएंगे।
क्यूं भला दबकर रहें, डरते नहीं भैया।

आवारगी को प्रोमोट करने का मेरा कोई इरादा नहीं है, मेरा यही मानना है कि जो कवि-कलाकार होते हैं, वे मन से आवारा होते हैं, दूसरे शब्दों में कहें तो लीक पर चलने वाले नहीं होते, अज्ञेय जी ने कहा, वे राहों के अंवेशी होते हैं। इस पवित्र आवारगी को प्रणाम करते हुए बता दूं कि इस विषय पर आगे भी बात करूंगा।

आखिर में गुलाम अली जी की गाई गज़ल का एक शेर-

एक तू कि सदियों से मेरे हमराह भी, हमराज़ भी,
एक मैं कि तेरे नाम से ना-आशना आवारगी।

नमस्कार।

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वसंत के एक दिन – रवींद्रनाथ ठाकुर

आज मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य संकलन- ‘PoemHunter.com’ से लेता हूँ। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘One Day In Spring’ का भावानुवाद-

गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता

वसंत के एक दिन

वसंत के एक दिन, एक महिला आई
मेरे एकांत वन में,
प्रेमिका के प्यारे से रूप में।
वह आई, मेरे गीतों को, मधुरता प्रदान करने,
मेरे स्वप्नों में मिठास भरने को।
अचानक एक भयानक लहर आई
और मेरे हृदय के किनारों को ध्वस्त कर गई
समूची भाषा उसमें डूब गई।
मेरे होठों पर कोई नाम नहीं आया,
वह पेड़ के नीचे खड़ी रही, मुड़ी,
उसने मेरे चेहरे पर निगाह डाली, जो दर्द से उदास हो गया था,
वह तेज कदमों से मेरे पास आई, और मेरी बगल में बैठ गई।
उसने मेरे हाथ को अपने हाथ में लेकर कहा:
‘न तुम मुझे जानते हो, न मैं तुम्हे-
मुझे आश्चर्य है कि ऐसा, कैसे हो सकता है?’
मैंने कहा:
‘हम दोनो मिलकर, हमेशा के लिए एक पुल बनाएंगे
दो व्यक्तियों के बीच, जिनमें से प्रत्येक दूसरे के लिए अनजान है,
यही आतुर आश्चर्य, सभी कुछ के मूल में है।’
जो पुकार मेरे दिल में है, वही पुकार उसके दिल की भी है;
जो धागा वह मुझे बांधती है, वही उसको भी बांधता है,
उसको ही मैंने हर जगह ढूंढा है,
उसकी ही मैंने पूजा की है, अपने मन में,
उस पूजा में छिपे रहकर ही उसने भी मुझे चाहा है। .
विशाल समुद्र लांघते हुए, वह मेरा दिल चुराने आई।
जिसे वह वापस करना भूल गई, क्योंकि उसने अपना खो दिया था।
उसका अपना सौंदर्य ही उसको धोखा दे जाता है,
वह जाल फैलाती है, और यह नहीं जानती
कि इसमें वह किसी को क़ैद करेगी, या खुद क़ैद हो जाएगी।

 

-रवींद्रनाथ ठाकुर

 

और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-

One Day In Spring

 

One day in spring, a woman came
In my lonely woods,
In the lovely form of the Beloved.
Came, to give to my songs, melodies,
To give to my dreams, sweetness.
Suddenly a wild wave
Broke over my heart’s shores
And drowned all language.
To my lips no name came,
She stood beneath the tree, turned,
Glanced at my face, made sad with pain,
And with quick steps, came and sat by me.
Taking my hands in hers, she said:
‘You do not know me, nor I you-
I wonder how this could be?’
I said:
‘We two shall build, a bridge for ever
Between two beings, each to the other unknown,
This eager wonder is at the heart of things.’
The cry that is in my heart is also the cry of her heart;
The thread with which she binds me binds her too.
Her have I sought everywhere,
Her have I worshipped within me,
Hidden in that worship she has sought me too.
Crossing the wide oceans, she came to steal my heart.
She forgot to return, having lost her own.
Her own charms play traitor to her,
She spreads her net, knowing not
Whether she will catch or be caught.

 

Rabindranath Tagore

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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ज़िंदगी और कुछ भी नहीं, तेरी मेरी कहानी है!

आज मैं 1972 में रिलीज़ हुई मनोज कुमार जी की फिल्म – शोर का एक प्रसिद्ध गीत शेयर करना चाहता हूँ जिसे मुकेश जी और लता मंगेशकर जी ने गाया है। श्री संतोषानंद जी के लिखे इस गीत का संगीत लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल जी की अमर जोड़ी ने दिया था।

 

अपने प्रिय गायक मुकेश जी के बारे में तो मैं बात करता ही रहता हूँ और लता जी के बारे में मैं क्या विशेष बता सकता हूँ। आज इस गीत के लेखक- संतोषानंद जी के बारे में बात करना चाहता हूँ।

मैं बहुत पहले से दिल्ली में कवि सम्मेलनों और कवि गोष्ठियों का आनंद लेता रहा हूँ। लाल किले पर पहले बहुत प्रसिद्ध कवि सम्मेलन हुआ करता था, राष्ट्रीय आयोजन के रूप में शायद 26 जनवरी के आसपास। स्व. गोपालप्रसाद व्यास जी, जो उस समय हिंदी साहित्य सम्मेलन के सर्वेसर्वा हुआ करते थे, वे इस आयोजन को कराते थे और इसमें देश के बड़े-बड़े कवि भाग लेते थे, जिनमें दिनकर जी, बच्चन जी, नीरज जी, बैरागी जी आदि-आदि श्रेष्ठतम कवि शामिल थे।

इसी आयोजन में व्यास जी जब संतोषानंद जी को आवाज लगाते थे, अक्सर वो मंच से दूर होते थे, वे दौड़कर आते और व्यास जी के चरणों में गिर जाते थे, और व्यास जी बोलते थे चल बेटा सुना दे कविता, और संतोषानंद ‘जी गुरुदेव’ कहकर कविता पाठ प्रारंभ करते थे।

संतोषानंद जी उस समय भी कविता के रूप में जो पढ़ते थे, उस पर तालियां तो खूब बजती थीं, ‘मेरे देश को बचा लो, मेरे प्राण ले लो रे’, ‘ओ मेरे देशवासी कुछ काम कर लो, थोड़ी सी ये ज़िंदगी है नाम कर लो’। कुल मिलाकर वे कवि-सम्मेलन मंच के गुलशन नंदा थे। कवि लोग उनको गंभीरता से नहीं लेते थे। हम लोग उस समय दिल्ली पब्लिक लायब्रेरी में कवि गोष्ठी किया करते थे, उसमें भी वे एक-दो बार आए थे।

समय बीता और संतोषानंद जी को फिल्मों में भी कुछ गीत लिखने को मिल गए और मानना पड़ेगा कि ये कुछ गीत भी बहुत सुंदर बन पड़े हैं, जिनमें आज का यह गीत भी शामिल है।

मुझे याद है कि लंबे समय के बाद जब संतोषानंद जी फिल्मों में भी कुछ गीत लिख चुके थे, तब मैंने उनको एक कवि सम्मेलन में बुलाया, तब उसमें भी अन्य, अपने को साहित्यिक मानने वाले उन पर ज्यादा ध्यान नहीं दे रहे थे, तब संतोषानंद बोले थे कि ‘ये सब लोग मुझसे जलते हैं, कि मुझे फिल्मों में गीत लिखने का मौका मिला और वो हिट भी हो गए।

खैर ये सब बातें छोड़कर आइए यह प्यारा सा गीत गुनगुनाइए-

एक प्यार का नगमा है, मौजों की रवानी है,
ज़िंदगी और कुछ भी नहीं, तेरी मेरी कहानी है।

कुछ पाकर खोना है, कुछ खोकर पाना है,
जीवन का मतलब तो, आना और जाना है,
दो पल के जीवन से, इक उम्र चुरानी है,
ज़िंदगी और कुछ भी नहीं, तेरी मेरी कहानी है।

तू धार है नदिया की, मैं तेरा किनारा हूँ,
तू मेरा सहारा है, मैं तेरा सहारा हूँ,
आँखों में समंदर है, आशाओं का पानी है।
ज़िंदगी और कुछ भी नहीं, तेरी मेरी कहानी है।

तूफ़ान को आना है, आ कर चले जाना है,
बादल है ये कुछ पल का, छा कर ढल जाना है,
परछाइयाँ रह जाती, रह जाती निशानी है।
ज़िंदगी और कुछ भी नहीं, तेरी मेरी कहानी है

तुम साथ न दो मेरा, चलना मुझे आता है,
हर आग से वाक़िफ हूँ, जलना मुझे आता है,
तदबीर के हाथों से, तक़दीर बनानी है।
ज़िंदगी और कुछ भी नहीं तेरी मेरी कहानी है।

 

आज के लिए इतना ही।
नमस्कार।

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Learning and Life

We do several things in our life for survival, maintaining our status etc. but I have a feeling that the basic purpose of life is learning. A person is living as long as he or she is open to learning. The moment a person feels that he has learnt everything; he is as good as dead.

 

 

It is said in our holy scriptures ‘Sa Vidya Ya vimuktaye’ , learning or knowledge is that which liberates us. We are bound by so many misconceptions, also in spiritual terms by attractions, including love and affections. A learned person deals with everything in a just and balanced manner.

But for learning, and one must always keep learning, for that one has to have a clear belief that he knows very less and is always ready to learn from anybody of whatever level. There are many people who can’t believe or say accept that there is something which is not known to them. We had a boss, when somebody gave him any information, his simple reply was- ‘I know that’. So some people had started giving him any new information, in this manner- ‘Sir, I know you must be knowing this, but I want to share this information with you, since I just gathered it!’

When a person stops accepting new knowledge, he stops growing, age does not in any way come in the way of learning. When we grow old, we might become physically weak, so we may not be adventurous, but knowledge is not adventure. It is also possible that a person while becoming physically weak in old age might become mentally stronger.

As we say ‘Age is just a number’, I think except becoming physically less capable with growing age, there is nothing a grown up person loses, and further since younger persons remain very much engaged in activities connected with earning- service, business etc., older people also as long they are involved in these activities, they are just like their younger friends, and when they give up this activity, retire or handover the business activity to the younger generation, they have more time to learn and keep learning.

In today’s world, it is also necessary to decide wisely what to learn and what not! I think this is much more important today. A lot of information is available on the net, there is much misinformation. We can become a part of the ever growing hate-community, or rumor spreading brigade through the net. There are so many preachers in the form or ‘Guru or Baba’s’ in the Ashrams spread all around our country and those giving the message of hatred on the net.

So, my submission is that we must keep learning as long as we live and must understand what is to be learnt and what not. Any message, information or learning that promotes hate among human beings, is not learning and is dangerous for the society.

This is my humble submission on the #IndiSpire prompt- Learning has no age bar. It is a limitation that we put in our mind. Share your views. #selfimprovement .

Thanks for reading.

 

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मुझे अक्सर अचंभा होता है -रवींद्रनाथ ठाकुर

आज मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य संकलन- ‘PoemHunter.com’ से लेता हूँ। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘I Often Wonder’ का भावानुवाद-

गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता 

मुझे अक्सर अचंभा होता है

मुझे अक्सर अचंभा होता है कि कहाँ छिपी हैं
पहचान की सीमाएं, मनुष्य और
उस क्रूर पशु के बीच, जिसका हृदय
बोली जाने वाली, किसी भाषा को नहीं समझता।
सृष्टि के सुदूर उषाकाल के, किस आदिकालीन स्वर्ग से होकर
वह सरल रास्ता जाता था,
जिसके माध्यम से इनके हृदय
एक दूसरे तक पहुंचते थे।
उनके उस निरंतर आवागमन के चिह्न
अभी तक मिटे नहीं हैं, यद्यपि
उनका आपसी संबंध, कब का भुलाया जा चुका है।
फिर भी अचानक किसी निःशब्द
संगीत को सुनकर, उनकी धुंधली याद कभी जाग जाती है,
और वह जानवर मनुष्य के चेहरे की तरफ,
मृदुल विश्वास के साथ देखता है, और मनुष्य भी
उसकी आंखों में देखता है,
मधुर स्नेह के साथ,
ऐसा लगता है कि दोनो मित्र मिलते हैं,
मुखौटा लगाए हुए, और मोटे तौर पर एक दूसरे को पहचानते हैं,
इस नकली वेश के माध्यम से।

-रवींद्रनाथ ठाकुर

और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-

 

I Often Wonder

 

I often wonder where lie hidden
the boundaries of recognition between
man and the beast whose heart knows
no spoken language.
Through what primal paradise in a
remote morning of creation ran the
simple path by which their hearts
visited each other.
Those marks of their constant tread
have not been effaced though their
kinship has been long forgotten.
Yet suddenly in some wordless
music the dim memory wakes up
and the beast gazes into the man’s
face with a tender trust, and the
man looks down into its eyes with
amused affection.
It seems that the two friends meet
masked, and vaguely know each other
through the disguise.

 

Rabindranath Tagore

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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मुझसे बात करो मेरे प्रिय – रवींद्रनाथ ठाकुर

आज मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य संकलन- ‘PoemHunter.com’ से लेता हूँ। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘Speak To Me My Love’ का भावानुवाद-

गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता

मुझसे बात करो मेरे प्रिय

मुझसे बात करो, मेरे प्यारे! मुझे बताओ शब्दों में, जो कुछ भी  तुमने गाया था।
रात अंधेरी है, सितारे-
बादलों के आंचल में छिप गए हैं। हवा आह भर रही है
पत्तों के बीच से।

मैं अपने केश खुले छोड़ दूंगी, मेरा नीला
लबादा, मेरे चारों ओर लिपटा रहेगा, रात की तरह,
मैं तुम्हारे सिर को अपने सीने पर चिपका लूंगी; और
मधुर एकांत में तुम्हारे हृदय
की धड़कन को भी, मैं अपनी आंखें बंद करूंगी
और सुनूंगी। मैं तुम्हारे चेहरे की तरफ नहीं देखूंगी।

जब तुम्हारे शब्द समाप्त हो जाएंगे, तब हम
शांत और स्थिर होकर बैठ जाएंगे। केवल वृक्ष
अंधकार में फुसफुसाएंगे।

रात फीकी होती जाएगी, पौ फट जाएगी।
हम एक-दूसरे की आंखों में देखेंगे, और फिर
और अलग-अलग रास्तों पर चले जाएंगे।

मुझसे बोलो, मेरे प्यारे! मुझे शब्दों में
बताओ, कि तुमने क्या गाया था।

-रवींद्रनाथ ठाकुर

और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-

Speak To Me My Love

Speak to me, my love! Tell me in
words what you sang.
The night is dark. The stars are
lost in clouds. The wind is sighing
through the leaves.

I will let loose my hair. My blue
cloak will cling round me like night. I
will clasp your head to my bosom; and
there in the sweet loneliness murmur
on your heart. I will shut my eyes
and listen. I will not look in your face.

When your words are ended, we will
sit still and silent. Only the trees will
whisper in the dark.

The night will pale. The day will
dawn. We shall look at each other’s
eyes and go on our different paths.

Speak to me, my love! Tell me in
words what you sang.

Rabindranath Tagore

 

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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नींद मेरी आँखों से दूर-दूर भागे!

आज लता मंगेशकर जी और मुकेश जी का गाया एक बहुत मस्त गीत, फिल्म- ‘हरियाली और रास्ता’ का याद आ रहा है, 1962 में रिलीज़ हुई इस फिल्म के नायक थे मनोज कुमार जी और नायिका थीं- माला सिन्हा, वैसे इस फिल्म में शशिकला भी थीं और यह एक प्रकार से प्रेम त्रिकोण वाली फिल्म है।

आइए इस सुरीले और नशीले गीत को याद करते हैं, जिसके बोल- शैलेंद्र जी ने लिखे हैं और इसमें संगीत- शंकर जयकिशन की विख्यात जोडी ने दिया था-

इब्तिदा-ए-इश्क़ में, हम सारी रात जागे
अल्लाह जाने क्या होगा आगे
मौला जाने क्या होगा आगे।
दिल में तेरी उलफ़त के, बंधने लगे धागे, अल्लाह…

क्या कहूँ कुछ कहा नहीं जाए
बिन कहे भी रहा नहीं जाए
रात-रात भर करवट मैं बदलूँ
दर्द दिल का सहा नहीं जाए
नींद मेरी आँखों से दूर-दूर भागे, अल्लाह…

दिल में जागी प्रीत की ज्वाला
जबसे मैंने होश संभाला
मैं हूँ तेरे प्यार की सीमा
तू मेरा राही मतवाला
मेरे मन की बीना में, तेरे राग जागे, अल्लाह…

तूने जब से आँख मिलाई
दिल से इक आवाज़ ये आई
चल के अब तारों में रहेंगे
प्यार के हम तो हैं सौदाई
मुझको तेरी सूरत भी चाँद-रात लागे।

अल्लाह जाने क्या होगा आगे
मौला जाने क्या होगा आगे।

 

आज के लिए इतना ही।
नमस्कार।

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वनवास का क्षेत्र- रवींद्रनाथ ठाकुर

आज मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि  गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य संकलन- ‘PoemHunter.com’ से लेता हूँ। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘The Land Of The Exile’  का भावानुवाद-

गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता

वनवास का क्षेत्र

मां, आकाश मे प्रकाश भूरा हो गया है, मुझे नहीं मालूम
कि समय क्या हुआ है।
मुझे मेरे खेल में कोई आनंद नहीं आ रहा था, इसलिए मैं तुम्हारे पास आ गया हूँ। आज शनिवार है, हमारी छुट्टी का दिन्।  
अपना काम छोड़ दो मां, यहाँ बैठो खिड़की के पास, और मुझे बताओ
परीकथाओं वाला वह तेपंतर का रेगिस्तान कहाँ है। 

बरसात की छाया ने पूरा दिन, एक छोर से दूसरे तक पूरी तरह ढक दिया है।  
तीव्र तड़ित, पूरे आकाश को अपने नाखूनों से घायल कर रही है।
बादल जब गरजते हैं और  गड़गड़ाहट होती है, तब मुझे डरना अच्छा लगता है,
जिससे मैं तुम्हारे सीने से चिपक जाऊं।

भारी वर्षा जब घंटों तक बांस की पत्तियों पर पटपटाती है,  
और हमारी खिड़कियां, हवा के आवेग के कारण  भड़भड़ाती हैं, तब मैं चाहता हूँ
कि मैं कमरे में बैठा रहूं तुम्हारे पास, और तुमसे सुनूं
परीकथा वाले तेपंतर के रेगिस्तान के बारे में।
कहाँ है वह मां, किस समुद्र के किनारे पर, किस पहाड़ की
तलहटी में, कौन से शासक के राज्य में ?

क्या वहाँ खेतों के किनारों पर बाड़ नहीं हैं, कोई पगडंडी भी नहीं हैं
उसमे, जिनसे होकर ग्रामीण, शाम होने पर अपने गांवों को
जा सकें, या जो महिलाएं जंगल में सूखी लकड़ियां बीनती हैं,
वे अपनी गठरी लेकर बाजार जा सकें। रेत में पीली घास वाले कुछ स्थान
और मात्र एक वृक्ष, जिसमें चतुर बूढ़े पक्षियों ने अपना घौसला बनाया है,
कहाँ है तेपंतर का रेगिस्तान।

मैं कल्पना कर सकता हूँ कि, ऐसे ही बादलों से घिरे एक दिन में युवा राजकुमार 
अकेला एक भूरे घोड़े पर बैठकर, उस रेगिस्तान के बीच से जाता है, 
 राजकुमारी की तलाश में, जो उस अज्ञात जल क्षेत्र के पार,  
एक दानव के महल में कैद है।

जब सुदूर आकाश से वर्षा का धुंधलका नीचे आता दिखाई देता है, और  
दर्द की  उठने वाली कसक की तरह, बिजली चमकती है, तब क्या उसे अपनी
दुखी मां की याद आती है, जिसे राजा ने त्याग दिया है, वह गायों का बाड़ा साफ करती, अपनी आंखें पोंछती जाती है,                                                             जबकि वह परीकथा वाले तेपंतर के रेगिस्तान के बीच से,
घोड़े पर सवार चला जा रहा है?

देखो मां, दिन डूबने से पहले ही, लगभग पूरी तरह अंधेरा छा गया है, और
सामने गांव की सड़क पर, अब कोई यात्री नहीं हैं।
वो गडरिया लड़का भी, चरागाह से जल्दी अपने घर वापस लौट गया है, लोग  
खेतों से निकल चुके हैं, अपनी झौंपडियों में छज्जे के नीचे चटाई पर बैठकर
बादलों की क्रिधित भंगिमाओं को देखने के लिए।

मां, मैंने अपनी सभी किताबें, उनकी जगह पर रख दी हैं
अब मुझसे कोई पाठ याद करने को मत कहना।
जब मैं बड़ा होकर, अपने पिता जैसा हो  जाऊंगा, तब वह सभी कुछ सीख लूंगा,
जो सीखना जरूरी है।

लेकिन सिर्फ आज के लिए, मुझे बताओ मेरी मां, कि परीकथा वाला वह
तेपंतर का रेगिस्तान कहाँ है। 

 

-रवींद्रनाथ ठाकुर

और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ- 

The Land Of The Exile

Mother, the light has grown grey in the sky; I do not know what
the time is.
There is no fun in my play, so I have come to you. It is
Saturday, our holiday.
Leave off your work, mother; sit here by the window and tell
me where the desert of Tepantar in the fairy tale is.

The shadow of the rains has covered the day from end to end.
The fierce lightning is scratching the sky with its nails.
When the clouds rumble and it thunders, I love to be afraid
in my heart and cling to you.

When the heavy rain patters for hours on the bamboo leaves,
and our windows shake and rattle at the gusts of wind, I like to
sit alone in the room, mother, with you, and hear you talk about
the desert of Tepantar in the fairy tale.
Where is it, mother, on the shore of what sea, at the foot of
what hills, in the kingdom of what king?

There are no hedges there to mark the fields, no footpath
across it by which the villagers reach their village in the
evening, or the woman who gathers dry sticks in the forest can
bring her load to the market. With patches of yellow grass in the
sand and only one tree where the pair of wise old birds have their
nest, lies the desert of Tepantar.

I can imagine how, on just such a cloudy day, the young son
of the king is riding alone on a grey horse through the desert, in
search of the princess who lies imprisoned in the giant’s palace
across that unknown water.
When the haze of the rain comes down in the distant sky, and
lightning starts up like a sudden fit of pain, does he remember his
unhappy mother, abandoned by the king, sweeping the cow-stall and
wiping her eyes, while he rides through the desert of Tepantar in
the fairy tale?

See, mother, it is almost dark before the day is over, and
thee are no travellers yonder on the village road.
The shepherd boy has gone home early from the pasture, and men
have left their fields to sit on mats under the eaves of their
huts, watching the scowling clouds.

Mother, I have left all my books on the shelf-do not ask me
to do my lessons now.
When I grow up and am bid like my father, I shall learn all
that must be learnt.
But just for today, tell me, mother, where the desert of
Tepantar in the fairy tale is.

 

                                              Rabindranath Tagore

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार।

                                 ************

 

 

 

 

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67. इसलिए प्यार को धर्म बना!

आज फिर से पुराने ब्लॉग का दिन है, लीजिए प्रस्तुत है एक और पुराना ब्लॉग-

(यह पोस्ट मैंने बाबा राम रहीम को सज़ा होने के समय लिखी थी)

एक बाबा को सज़ा का ऐलान होने वाला है।

अच्छा नहीं लगता कि बाबाओं को इस हालत से गुज़रना पड़े। हमारे देश में परंपरा रही है, राजा-महाराजाओं के ज़माने से, महाराजा दशरथ हों या कोई अन्य प्राचीन सम्राट, वे सभी महात्माओं को आदर देते थे, उनसे मार्गदर्शन लेते थे। मैं समझता हूँ यह परंपरा आज के लोकतांत्रिक शासकों तक जारी रही है।

एक विचार रहा है कि तामसिक वातावरण में, ऐश्वर्य और भोग-विलास के बीच रहते हुए व्यक्ति के विचार भ्रष्ट हो सकते हैं, इसलिए शासक महत्वपूर्ण और जनहित के मुद्दों पर अपने गुरू की सलाह लेते थे, जो इस राजसी वातावरण से दूर, नगर के किनारे एक कुटिया अथवा सादगीपूर्ण आश्रम में रहता था।

लेकिन आज जिस तरह के गुरुओं के कारनामे सामने आ रहे हैं, मुझे ये कहने में कोई संकोच नहीं है कि वे स्वयं पुराने राजाओं से कहीं ज्यादा शान-औ-शौकत भरे, तामसिक माहौल में रहते है। संभव है कि इनकी शुरुआत यदि पवित्र भी रही हो, यह शान-औ-शौकत और निरंकुशता ही उनको बिगाड़ देती हो।

जहाँ तक आज की और सामान्य लोगों की बात है, मैं नहीं समझ पाता कि लोगों को गुरू बनाने की आवश्यकता क्यों होती है! ऐसा भी माना जाता है कि वह गुरू अपने चेलों को गुरुमंत्र देता है, जिससे उनका कल्याण सुनिश्चित होता है। और उस गुरुमंत्र के बदले, ये चेले अपने गुरू के आदेश पर कुछ भी करने को तैयार हो जाते हैं। मेरा इसमें कतई विश्वास नहीं है और मैं यह मानता हूँ कि यह खतरनाक है।

आजकल टीवी पर ढेर सारे गुरू प्रवचन देते हुए मिल जाते हैं। मुझे यह स्वीकार करने में कोई संकोच नहीं कि मुझे अक्सर उनके प्रवचन सुनकर बहुत अच्छा लगता है। जैसे जब मुरारी बापू रामकथा करते हैं तब उसको सुनकर मेरी आंखों में आंसू आ जाते हैं। ऐसे कई लोग हैं जिनको सुनना बहुत अच्छा लगता है।

जब आसाराम बापू प्रवचन देते थे तब वे भी बातें तो अच्छी करते थे परंतु उनका व्यक्तित्व और बॉडी लैंग्वेज मुझे कभी प्रभावित नहीं करते थे। विशेष रूप से जब वे सीटी बजाने लगते थे। आजकल तो सभी बाबा लोगों ने शायद बाबा रामदेव की प्रेरणा से, अपने साथ व्यवसाय भी काफी हद तक जोड़ लिया है।

जो बाबा अभी गिरफ्त में आए हैं, ये फिल्मों में रॉबिनहुड बनने के अलावा, किस तरह अपने भक्तों को प्रभावित करते थे, मुझे पता नहीं।

मैं परम प्रिय शिष्यों से यही अनुरोध करता हूँ कि जिस तरह आप आजकल अपने बच्चों को पढ़ाने वाले गुरुओं को परखते हैं, उसी तरह इन गुरुओं को भी परखें। इनके पास इतनी धन-संपत्ति जमा न होने दें कि उसके कारण ही इनका दिमाग खराब हो जाए।
सरकार चलाने वालों से भी अनुरोध करूंगा कि एक व्यक्ति के रूप में आप इन गुरुओं पर श्रद्धा रख सकते हैं, इनको पैसों का दान भी दे सकते हैं, लेकिन अपनी जेब से, सरकारी पैसा आपके पिताजी का नहीं है!

जो श्रद्धा के केंद्र हैं, उनके प्रति नफरत विकसित हो, यह अच्छा नहीं लगता, इसलिए  प्यारे शिष्यों, और जो शिष्य अंध भक्ति की ओर बढ़ रहे हैं, उनके आसपास के समझदार लोगों से भी अनुरोध है कि उन्हें समझाएं कि अंधभक्त न बनें। जो अच्छी बातें हैं, उनको ही स्वीकार करें।

एक और बात, जब ऐसी कोई घटना होती है, तब राजनैतिक रूप से सक्रिय स्वयंसेवक ऐसा वातावरण बनाने लगते हैं, कि हमारी मनचाही सरकार होती तो पता नहीं क्या होता, सारे दोष वर्तमान सरकार में ही हैं, ऐसे लोगों को बात करने के लिए कुछ लाशें भी मिल जाएं तो क्या बात है!

मुझे श्री रमानाथ अवस्थी के गीत की पंक्तियां याद आ रही हैं, सभी के लिए-

जो मुझ में है, वो तुझ में है
जो तुझ में है वो सब में है।
इसलिए प्यार को धर्म बना,
इसलिए धर्म को प्यार बना।

नमस्कार।


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यह तो कहो किसके हुए!

आज फिर से एक बार, मेरे प्रिय मंचीय कवियों में से एक स्व. भारत भूषण जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ। उनका यह गीत भी मुझे विशेष रूप से प्रिय है, इस गीत में कवियों और विशेष रूप से मंचीय कवियों की व्यथा की अभिव्यक्ति की गई है और यह पूछा गया कि सारी उम्र कविता के लिए, कवि सम्मेलनों में कविता-पाठ के लिए भटकते रहे, आखिर आपने हासिल क्या किया? किसने आपको दिल से अपनाया, किसको आपने हासिल किया- परिवार को, प्यार को, गीत को या देश को?

 

 

वैसे गीत को किसी भूमिका की आवश्यकता नहीं है, लीजिए प्रस्तुत है उनका यह गीत-

 

आधी उमर करके धुआँ, यह तो कहो किसके हुए
परिवार के या प्यार के, या गीत के या देश के।
यह तो कहो किसके हुए।

कंधे बदलती थक गईं सड़कें तुम्हें ढोती हुईं
ऋतुएँ सभी तुमको लिए दर-दर फिरीं रोती हुईं
फिर भी न टँक पाया कहीं, टूटा हुआ कोई बटन
अस्तित्व सब चिथड़ा हुआ गिरने लगे पग-पग जुए।

संध्या तुम्हें घर छोड़ कर, दीवा जला मंदिर गई
फिर एक टूटी रोशनी, कुछ साँकलों से घिर गई
स्याही तुम्हें लिखती रही, पढ़ती रहीं उखड़ी छतें,
आवाज़ से परिचित हुए, केवल गली के पहरूए ।

हर दिन गया डरता किसी, तड़की हुई दीवार से
हर वर्ष के माथे लिखा, गिरना किसी मीनार से
निश्चय सभी अँकुरान में, पीले पड़े मुरझा गए
मन में बने साँपों भरे, जालों पुरे अंधे कुएँ।

यह तो कहो किसके हुए ।

 

आज के लिए इतना ही।
नमस्कार।

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