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तासु दूत मैं जा करि, हरि आनेहु प्रिय नारि।

गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित महाकाव्य श्रीरामचरितमानस के सुंदरकांड से कुछ अंश प्रस्तुत करने का सिलसिला शायद दो दिन और चलेगा। मैं मुकेश जी द्वारा गये गए अंश में से ही जितना मुझे याद आ रहा है वह मैं यहाँ दे रहा हूँ।

कल के प्रसंग में सीता माता को श्रीराम जी की निशानी देकर, उनका संदेश सुनाकर और माता का आशीर्वाद प्राप्त करने के बाद हनुमान जी बताते हैं कि वन में लगे फलों के वृक्षों को देखकर उनको भूख लग गई है, इसके बाद की जो लीला है, हनुमान जी की, जिसमें वे अपने बल और बुद्धि का भरपूर परिचय देते हैं, फल खाने जाते हैं तो वहाँ रखवाली कर रहे राक्षसों को मारते हैं और फिर रावण का किया भी कैसे उस पर उल्टा पड़ जाता है, आप इस सरस काव्य को पढ़कर समझ ही जाएंगे-

चलेऊ नाइ सिर पैठेऊ बागा, फल खाएसि तरु तोरे लागा।
रहे तहाँ बहु भट रखवारे, कछु मारे कछु जाइ पुकारे।
पुनि रावण पठए भट नाना, तिन्हई देख गरजेऊ हनुमाना।
सब रजनीचर कपि संहारे, गए पुकारत कछु अधमारे।
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पुनि पठयऊ तेही अच्छकुमारा, चला संग लै सुभट अपारा,
आवत देखि विटप गहि तरजा, ताहि निपाति महाधुनि गरजा।
सुनि सुत वध लंकेश रिसाना, पठयसि मेघनाद बलवाना।
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चला इंद्रजित अतुलित जोधा, बंधु निधन सुनि उपजा क्रोधा,
मुठिका मार चढ़ा तरु धाई, ताहि एक छन मुर्छा आई,
उठि बहोरि कीन्हेसि बहु माया, जीति न जाई प्रभंजन जाया।
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ब्रह्म-अस्त्र तेहि साधा, कपि मन कीन्ह विचार,
जो न ब्रह्म सर मानहुं, महिमा मिटई अपार।
सो देखा कपि मुर्छित भयऊ, नागपाश बांधेसि लै गयऊ।
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कह लंकेश कवन तैं कीसा, केहि के बल घालेहि बन खीसा,

सुनु रावण ब्रह्मांड निकाया, पाई जासु बल बिरचित माया।
जाके बल बिरंचि हरि ईसा, पालत, सृजत, हरत दससीसा।
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जाके बल लवलेस तें, जितेहु चराचर झारि,
तासु दूत मैं जा करि, हरि आनेहु प्रिय नारि।
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सुनि कपु वचन बहुत खिसियाना, बेगि न हरहु मूढ़ करि प्राना।
सुनत निसाचर मारन धाए, सचिवन सहित विभीषण आए।
नाइ सीस करि विनय बहूता, नीति विरोध न मारिय दूता।
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सुनत बिहंसि बोला दसकंधर, अंग भंग करि पठइय बंदर।
कपि के ममता पूंछ पर, सबहिं कहऊं समुझाई,
तेल बोरि पट बांध पुनि, पावक देहु लगाई।
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पावक जरत देखि हनुमंता, भयहु परम लघु रूप तुरंता।
निबुकि चढेऊ कपि कनक अटारी, भईं सभीत निसाचर नारी।
उलटि-पलटि लंका सब जारी, कूद पड़ा पुनि सिंधु मझारी।
जारा नगर निमिष एक माहीं, एक विभीषण कर गृह नाहीं।
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पूंछ बुझाय खोई श्रम, धरि लघु रूप बहोरि,
जनक सुता के आगे, ठाढ़ भयऊ कर जोरि।
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मातु मोहि दीजे कछु चीन्हा, जैसे रघुनायक मोहि दीन्हा।
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चूड़ामनि उतारि तब दयऊ, हरस समेत पवनसुत लयऊ।
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कहऊ तात अस मोर प्रणामा, प्रभु दयाल अति पूरनकामा,
दीनदयाल बिरिदु संभारी, हरेहु नाथ मम संकट भारी।
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जनकसुतहि समुझाय पुनि, बहुविधि धीरज दीन्ह,
चरण कमल सिर नाइ कपि, गंवन राम पहिं कीन्ह।

 

आज के लिए इतना ही, आगे का प्रसंग कल शेयर करने का प्रयास करूंगा।
नमस्कार।

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2 replies on “तासु दूत मैं जा करि, हरि आनेहु प्रिय नारि।”

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