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मुझे अक्सर अचंभा होता है -रवींद्रनाथ ठाकुर

आज मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य संकलन- ‘PoemHunter.com’ से लेता हूँ। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘I Often Wonder’ का भावानुवाद-

गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता 

मुझे अक्सर अचंभा होता है

मुझे अक्सर अचंभा होता है कि कहाँ छिपी हैं
पहचान की सीमाएं, मनुष्य और
उस क्रूर पशु के बीच, जिसका हृदय
बोली जाने वाली, किसी भाषा को नहीं समझता।
सृष्टि के सुदूर उषाकाल के, किस आदिकालीन स्वर्ग से होकर
वह सरल रास्ता जाता था,
जिसके माध्यम से इनके हृदय
एक दूसरे तक पहुंचते थे।
उनके उस निरंतर आवागमन के चिह्न
अभी तक मिटे नहीं हैं, यद्यपि
उनका आपसी संबंध, कब का भुलाया जा चुका है।
फिर भी अचानक किसी निःशब्द
संगीत को सुनकर, उनकी धुंधली याद कभी जाग जाती है,
और वह जानवर मनुष्य के चेहरे की तरफ,
मृदुल विश्वास के साथ देखता है, और मनुष्य भी
उसकी आंखों में देखता है,
मधुर स्नेह के साथ,
ऐसा लगता है कि दोनो मित्र मिलते हैं,
मुखौटा लगाए हुए, और मोटे तौर पर एक दूसरे को पहचानते हैं,
इस नकली वेश के माध्यम से।

-रवींद्रनाथ ठाकुर

और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-

 

I Often Wonder

 

I often wonder where lie hidden
the boundaries of recognition between
man and the beast whose heart knows
no spoken language.
Through what primal paradise in a
remote morning of creation ran the
simple path by which their hearts
visited each other.
Those marks of their constant tread
have not been effaced though their
kinship has been long forgotten.
Yet suddenly in some wordless
music the dim memory wakes up
and the beast gazes into the man’s
face with a tender trust, and the
man looks down into its eyes with
amused affection.
It seems that the two friends meet
masked, and vaguely know each other
through the disguise.

 

Rabindranath Tagore

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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2 replies on “मुझे अक्सर अचंभा होता है -रवींद्रनाथ ठाकुर”

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