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लंदन की आंख!

लंदन प्रवास जारी है और आज हम ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी देखने गए थे। इसका विवरण कल दूंगा, फिलहाल पिछले वर्ष ‘लंदन आइ’ देखने का अनुभव दोहरा रहा हूँ-
चलिए एक बार फिर से लंदन की यात्रा पर निकलते हैं। लंदन के बहुत सारे स्थान जैसा मैंने पहले बताया था, हमने क्रूज़ की यात्रा के दौरान देखे था। अब बारी थी इनमें से एक-दो को पास से देखने की। इसी प्रयास में हम कल ‘लंदन आइ’ और ‘टॉवर ब्रिज’ की यात्रा में निकले।

 

एक बात मैं जरूर कहना चाहता हूँ, मुझमें ‘ट्रैवल ब्लॉगर्स’ जैसा धैर्य नहीं है, मैं सामान्यतः किसी भाव को लेकर ब्लॉग लिखना शुरू करता हूँ और बहुत सी बार ब्लॉग पोस्ट खत्म होते-होते सोचता हूँ, अरे क्या मैंने इस विषय में लिखने के बारे में सोचा था! लेकिन ट्रैवल ब्लॉगिंग में एक जगह ‘फोकस’ रखकर लिखना होता है। ठीक है जी, मैं कोशिश करूंगा।

 

 

तो कल हम निकले, यह लक्ष्य बनाकर कि आज ‘लंदन आइ’ और ‘टॉवर ब्रिज’ देखना है। अधिक समय बर्बाद न हो, इसलिए हमने घर से सीधे ‘लंदन आइ’ का रुख किया। ‘लंदन आइ’ जैसा कि आप जानते ही होंगे एक ‘आकाशीय झूला’ है, जो इतना बड़ा है और इतना धीरे चलता है कि अगर आप इसे थोड़ा भी दूर से देखें तो यह हमेशा रुका हुआ ही लगता है, एकदम पास जाने के बाद पता चलता है कि यह धीरे-धीरे चल रहा है। अपना एक फेरा यह लगभग आधे घंटे में पूरा करता है।

 

जिस ऊंचाई पर यह झूला ले जाता है, वहाँ जाने के बाद लंदन में ऐसा कौन सा प्रमुख स्थान है, जो आप नहीं देख सकते, लेकिन कुछ स्थानों को देखने के लिए दूरदृष्टि भी जबर्दस्त चाहिए ना जी!

खैर बड़े काम के लिए प्रयास भी बड़े करने पड़ते हैं। बाधाएं भी बड़ी आती हैं। मेरे बेटा-बहू, जो लंदन में ही रह रहे हैं और इन स्थानों को कई बार देख चुके हैं, वे हमें- पति-पत्नी को ये दिखाने ले गए थे। आधा घंटा तक बेटा लाइन में लगा रहा, तब टिकट मिल पाया। इस बीच हम वहाँ आसपास घूम लिए, जहाँ लगभग मेले जैसा माहौल रहता है।

एक बात और मैंने देखी लंदन में पैसा कमाने के लिए लोग सार्वजनिक स्थानों में बाकायदा माइक और साज़ के साथ गाना गाते हैं। बहुत से वेश बनाते हैं, जैसे कि कल हम वहाँ एक ‘चार्ली चैप्लिन’ और एक ‘गोल्डन लेडी’ से मिले। हाँ चैप्लिन जी कुछ मोटे ज्यादा हो गए थे, मुझे लगा कि ऐसे में वो फुर्ती कैसे दिखा पाएंगे, जो उनकी फिल्मों में देखने को मिलती है। (मुझे यह भी खयाल आता है कि भारत में ज्यादा जोर लोग एटीएम लूटने अथवा अन्य प्रकार के फ्रॉड सीखने पर लगा रहे हैं!)

 

बेटा जब टिकट लेकर आ गया, तब हम सबने वहाँ 360 डिग्री अनुभव वाली लगभग 10-15 मिनट की फिल्म देखी, जो ‘लंदन आइ’ अनुभव का एक हिस्सा है। भारत में भी ‘छोटा चेतन’ जैसी 3-डी फिल्म पहले बनी थी, और विशेष चश्मा पहनकर कुछ अलग अनुभव कराने का प्रयास किया गया था, लेकिन मानना पड़ेगा कि इस अनुभव के सामने वह सब कुछ भी नहीं था, ऐसा लगा कि सब कुछ अपने तीन तरफ हो रहा है, कबूतर जैसे कान से टकराते हुए चला गया, कई बार अपना सिर हिलाना पड़ा, लगा कि कोई वस्तु टकरा जाएगी। सचमुच ‘लंदन आइ’ के आकाशीय झूले’ पर चढ़ने से पहले मिला यह अनुभव दिव्य था।

इसके बाद लगभग आधा घंटा और लाइन में लगे रहने के बाद आकाश-यात्रा का अपना नंबर आया, मैंने गिना नहीं लेकिन बहुत सारे अति सुंदर केबिन इस झूले में हैं, हर केबिन में 15-20 लोग तो आराम से आ ही जाते हैं, कुछ बैठ भी जाते हैं, वैसे चारों तरफ के दिव्य नजारे को देखने, अपने कैमरों में कैद करने के लिए अधिकतर लोग खड़े रहना ही पसंद करते हैं। नीचे बहती विशाल थेम्स नदी, उसके दोनो किनारों से झांकता लंदन का इतिहास और वर्तमान। ये सब ऐसा है जो बयान करने की चीज नहीं है और मेरी इतनी क्षमता भी नहीं है। बस यही कि अगर जीवन में मौका मिले तो ये अनुभव अवश्य कर लेना चाहिए।

(इस पोस्ट में मैंने रात में घर के पास से होकर गुज़रने वाले विशाल वाइकिंग शिप का चित्र भी डाल दिया है, जो मुझे बहुत सुंदर लगा था)।

आगे और बात कल करेंगे, आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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दर्द के साज़ को, तू सुने ना सुने!

काफी दिन से कविता, गीत-संगीत की बात नहीं हुई, ऐसे थोड़े ही चलेगा जी!
ठीक है कि अभी इंग्लैंड में हैं, लेकिन हैं तो हिंदुस्तानी ही ना जी। लंदन तो यहीं रहेगा और हम भी अभी कुछ दिन और यहाँ ही हैं।

अभी 27 अगस्त को मेरे परम प्रिय गायक और महान इंसान- मुकेश जी की पुण्य तिथि निकल गई। कितने महान इंसान और गायक थे वो, यह जो लोग उनके साथ रहे हैं उन्होंने विस्तार से बताया है और यह सरलता और निश्छलता उनकी आवाज में भी झलकती है।

 

बहुत से ऐसे गीत हैं जिनकी फिल्म और नायक लोगों को याद नहीं हैं, लेकिन मुकेश जी की अमर आवाज के कारण आज भी लोग उनको गुनगुनाते हैं। ऐसा ही एक गीत मैं आज शेयर कर रहा हूँ, जिसे जनाब नक्श लायलपुरी जी ने लिखा था, इसका संगीत दिया था- श्री सपन जगमोहन जी ने और चेतना – फिल्म के लिए मुकेश जी का गाया यह गीत – श्री अनिल धवन पर फिल्माया गया था।

लीजिए आज इस गीत को याद कर लेते हैं-

 

मैं तो हर मोड़ पर तुझको दूँगा सदा
मेरी आवाज़ को, दर्द के साज़ को, तू सुने ना सुने।
मुझे देखकर कह रहे हैं सभी
मोहब्बत का हासिल है दीवानगी,
प्यार की राह में, फूल भी थे मगर
मैंने कांटे चुने।
मैं तो हर मोड़ पर…

 

जहाँ दिल झुका था वहीँ सर झुका
मुझे कोई सजदों से रोकेगा क्या,
काश टूटे ना वो, आरज़ू ने मेरी
ख्वाब हैं जो बुने।
मैं तो हर मोड़ पर…

 

मेरी ज़िन्दगी में यही गम रहा
तेरा साथ भी तो बहुत कम रहा,
दिल ने साथी मेरे, तेरी चाहत में थे-
ख्वाब क्या क्या बुने।
मैं तो हर मोड़ पर…

 

तेरे गेसूओं का वो साया कहाँ
वो बाहों का तेरी सहारा कहाँ,
अब वो आँचल कहाँ, मेरी पलकों से जो,
भीगे मोती चुने।
मैं तो हर मोड़ पर तुझको दूँगा सदा।

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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फिर वापस लंदन में!

लंदन में रहते हुए, आज जो अनुभव शेयर कर रहा हूँ वह पिछले वर्ष का है। आज स्कॉटलैड यात्रा के बाद लंदन वापसी पर जो कुछ मन में आया था, उन मनोभावों की अभिव्यक्ति को फिर से दोहरा रहा हूँ-

 

 

स्कॉटलैंड की तीन दिन की यात्रा के बाद वापस लंदन लौट आए, हाँ एक बात है- ‘स्कॉटलैंड यार्ड’, जिसे बहुत बार फिल्मों में देखा और सुना, वो कहाँ है, न किसी ने पूछा और न बताया! खैर एक महीने के लंदन प्रवास में से आधा पूरा हो गया है। रोज जब सैर पर जाता हूँ तो वे ही गोरे दिखाई देते हैं, जिन्होंने लंबे समय तक हम पर राज किया था।

 

जैसा मैंने पहले बताया था, एशियाई मूल के लोग भी बड़ी संख्या में यहाँ हैं और कुछ खास इलाकों में अधिक बसे हैं।

 


एक बात जो शुरू में अजीब लगी थी, अब आदत पड़ गई है, सुबह जितनी जल्दी आंख खुल जाए सूरज की रोशनी दिखाई देती है और रात में साढ़े नौ-दस बजे तक रहती है। आजकल गर्मी और डे लाइट सेविंग के समय यह हालत है, जबकि घड़ी का समय भी एक घंटा आगे कर दिया जाता है ताकि बिजली की बचत की जा सके।

आजकल जहाँ लगभग 18 घंटे दिन की रोशनी रहती है वहीं सर्दियों में इसका उल्टा हो जाता है, और शाम 3 बजे ही अंधेरा हो जाता है।

जैसे भारत के अलग-अलग नगरों में स्थानों के अलग तरह के नाम होते हैं, जैसे पुरानी दिल्ली में- कटरा, हाता, छत्ता आदि, मंडी, बाग आदि भी बहुत से स्थानों में शामिल होते हैं, हैदराबाद में पेठ होते हैं, इंग्लैंड में जो नाम सबसे ज्यादा सुनने को मिला अभी तक, वह है- ‘व्हार्फ’, जैसे पास में ही ट्यूब स्टेशन है- ‘कैनरी व्हार्फ’। ‘व्हार्फ’ होता है नदी किनारे विकसित किया गया वह, सामान्यतः ढलान वाला प्लेटफार्म, जिसके माध्यम से यात्री और सामान आसानी से बाहर आ सकें। और यहाँ नगर को एक सिरे से दूसरे तक जोड़ती, बीच में बहती थेम्स नदी है, तो इस तरह ‘व्हार्फ’ भी होंगे ही।


जैसे मुम्बई में नगर के बीचों-बीच दो रेलवे लाइनें हैं, जो मुम्बई की लाइफ-लाइन कहलाती हैं, उसी तरह लंदन में नगर के बीच से बहती ‘थेम्स’ नदी, मुझे लगता है कि सामान और यात्रियों के यातायात में इसकी काफी बड़ी भूमिका है।

भारत में जो लकड़ी की बॉडी वाले ट्रक दिखाई देते हैं, वे यहाँ नहीं दिखे, कुछ बड़े बंद ट्रक तो हैं, इसके अलावा कार के पीछे ट्रॉली जोड़कर भी सामान का यातायात होता है और नदी के मार्ग से भी जहाँ तक संभव है।

जैसा मैंने पहले बताया था यहाँ हमारे घर के पीछे ही थेम्स नदी बहती है, दिन भर जहाँ हम यात्री नौकाओं को देखते हैं, वहीं ऐसी नौकाएं भी देखते हैं, जिनके पीछे एक बड़ा कंटेनर जोड़कर, उसके माध्यम से, सामान्य ट्रक से शायद ज्यादा सामान ढ़ोया जाता है।

एक बात है कि दो चित्र जो मूर्तियों के हैं, एक खड़े हुए युवक की और दूसरी बैठे हुए वृद्ध व्यक्ति की। ये मूर्तियां हाल ही में कलात्मक गतिविधि के अंतर्गत एक अंडरग्राउंड ‘कैनरी व्हार्फ स्टेशन (जुबिली लाइन) के सामने’ और दूसरी उसके पास ही ‘कैबट पार्क’ में लगाई गई हैं और इनको मैंने इस बार जोड़ा है। ऊपर का चित्र तो ग्रीनविच रिवर फ्रंट का है, और वहाँ नदी के नीचे से उस पार जाने वाली सुरंग ‘टनल’  का भी चित्र है।

आज बस ऐसे ही कुछ ऑब्ज़र्वेशन लंदन नगर के बारे में देने का मन हुआ, आगे जो कुछ बताने लायक लगेगा, वो भी लिखूंगा।

आज के लिए इतना ही।
नमस्कार।

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‘आइल ऑफ वाइट’ और ‘नीडल क्लिफ्स’!

आज जो यात्रा वृतांत आपके शेयर कर रहा हूँ वह इस बार सप्ताहांत के अतिरिक्त दिन- सोमवार का है, जब यहाँ लंदन में ‘बैंक हॉलिडे’ के कारण छुट्टी थी।

 

इस बार प्रोग्राम बना था ‘आइल आफ वाइट’ (Isle of Wight) जाने का, यह शायद इंग्लैंड का सबसे अधिक आबादी वाला द्वीप अथवा टापू है, जहाँ पर फैली प्रकृति की सुंदरता के बीच अनेक सुंदर आकर्षण शामिल हैं, जिनमें से शायद सबसे प्रमुख हैं नोकदार खडी चट्टानें अर्थान ‘नीडल क्लिफ्स’ (Needle cliffs)।

चलिए शुरू से ही शुरू करते हैं न! प्रोग्राम के अनुसार हम सुबह साढ़े आठ बजे के लगभग ट्यूब रेल से होते हुएहुए ‘वाटरलू’ पहुंचे जहाँ ट्यूब स्टेशन के अलावा इंग्लैंड की नेशनल रेलवे का स्टेशन भी है, जहाँ से हमें लंदन से बाहर जाने के लिए यात्रा प्रारंभ करनी थी।


यात्रा प्रारंभ करने पर ट्रेन में घोषणा हुई कि कोई दुर्घटना हो जाने के कारण ट्रेन का रूट थोड़ा बदल दिया गया है। इससे हमें कुछ फर्क नहीं पड़ने वाला था, सिवाय कुछ देरी होने के, जो हुई भी, लेकिन इसका उल्लेख मैं इसलिए कर रहा हूँ कि इस बार के प्रवास के दौरान दो बार ऐसा हुआ है कि जैसे किसी ने ट्रेन के सामने कूदकर आत्महत्या कर ली हो। दुनिया भर के लोग यहाँ रहते हैं, शायद फ्रस्ट्रेशन भी दुनिया भर की आ जाती है!

खैर विषयांतर को यहीं छोड़ते हैं, हमारा टिकट था ‘वाटरलू’ या कहें ‘लंदन टर्मिनल्स’ से लेकर यार्मौथ आइओडब्लू (आइल ऑफ वाइट) तक के लिए, जिसमें ‘ब्रोकन हर्स्ट’ से दूसरी ट्रेन ‘लाइमिंग्टन’ तक लेना और वहाँ से फैरी द्वारा समुद्र में ‘आइल ऑफ वाइट’ द्वीप तक जाना शामिल था। इसमें मुख्य यात्रा ‘ब्रोकन हर्स्ट’ तक डेढ़ घंटे की थी, जिसके बाद दूसरी ट्रेन से सिर्फ दो स्टेशन पार करने थे और उसके बाद लगभग 40 मिनट की यात्रा ‘फैरी’ के द्वारा थी। अब यह तो शायद कहने की जरूरत ही नहीं है कि हम जहाँ भारत में ‘स्वच्छता की ओर’ बढ़ने का प्रयास कर रहे हैं, वहीं लंदन में अगर कहीं स्वच्छता में कमी आती है तो वह हम जैसे किसी आयातित व्यक्ति के कारण होती है!

फैरी में चढ़ने से पहले उसे दूर से देखा तो मैं शुरू में यही समझा कि यह कोई इमारत है, इतनी विशाल और आकार भी इमारत की तरह और जब उसमें से गाड़ियां निकलने लगीं तो ‘एक के बाद एक’ लगा कि पूरा मोहल्ला ही इसमें आ गया है।

हाँ तो फैरी में लोग बैठे कम, ज्यादा लोफ खड़े होकर चित्र खींचते रहे और हम उस पार ‘यार्मोथ’ में पहुंच गए, जहाँ हम एक ‘हॉप ऑन-हॉप ऑफ’ बस में बैठे, जिसमें उद्घोषक ने हमें इस द्वीप के अनेक प्रमुख आकर्षणों के बारे में बताया, जब हम उन स्थानों के पास से होकर आगे बढ़े।

मार्ग में हम जहाँ उतरे उनमें से एक तो जाहिर है कि वह स्थल है जहाँ ‘नीडल क्लिफ’ हैं, जिनमें वास्तव में, खड़ी चट्टानों के दो समूह शामिल हैं- ‘नीडल्स ओल्ड बैटरी, और न्यू बैटरी’। ‘चाक क्लिफ’ वाला यह इलाका यहाँ सबसे अधिक ऊंचाई पर स्थित है और यहाँ से प्रकृति का नजारा अद्भुद दिखाई देता है, समुद्र में सुहाने नीले और हरे रंगों का पानी, जिसमें और भी अनेक शेड देखी जा सकती हैं, और चट्टानों में भी, वहाँ मौज़ूद खनिजों के कारण अनेक चित्तार्षक रंग देखे जा सकते हैं। यह यात्रा वास्तव में मन को स्फूर्ति और संतोष प्रदान करने वाली थी।

द्वीप के कुछ प्रमुख आकर्षण इस प्रकार हैं- बेम्ब्रिज किला, बेम्ब्रिज विंडमिल, नीडल्स-(खड़ी चट्टानें) पुरानी और नई, न्यूटन पुराना टाउन हाल, कॉम्पटन खाड़ी (Bay) आदि-आदि। वैसे तो लगता है कि ऐसे स्थान पर कुछ दिन रुककर ही वहाँ की प्राकृतिक सुंदरता का भरपूर आनंद लिया जा सकता है। वहाँ रोपवे द्वारा कुर्सियों पर बिठाकर (चेयरलिफ्ट करके) वहाँ के सुंदर नजारे को दिखाने की व्यवस्था भी है, यह उनके लिए और भी उपयोगी है जो वृद्धावस्था आदि के कारण ऊंचाई पर नहीं चढ़ पाते।

मैं यह कहना चाहूंगा कि जो लंदन घूमने आते हैं उनको कम से कम एक दिन इस स्थान की सैर के लिए भी रखना चाहिए, यहाँ अधिक समय रुककर और भी अधिक आनंद लिया जा सकता है।

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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Vipashyanaa- Am I Right?

Several things come to my mind while thinking over the #IndiSpire prompt this time. I would just randomly share the memories, incidents that come to my mind!

 

 

I remember lines of a Hindi poem written by Ms. Neelam Singh which I read long back-

सिक्का है बंटा और बिखरा है आदमी,
झूठा भ्रम क्यूं पालें, भुनना है लाज़िमी,
जेब क्या- हथेली क्या, चुप्पी क्या- बोली क्या,
विनिमय की दुनिया में, जिसे भी कबूलना,
मूल्य भर वसूलना।

Really as we say the world is a market, there is continuous exchange of services and everything! we all are selling ourselves, selling our ideas and what not.

So we present ourselves, our services before people and try to get accepted, to get appreciation for all that. Sometimes we can market ourselves by our own efforts, sometimes have to take help of others, we call them our promoters or PR people.

In the field of writing, like many other fields- there are ‘critics’ who review the literary creations, be those poems, short stories, novels or any other type of book writing etc. People also say that those who could not become creative writers, they became critics.

In our country the tradition of western literature was followed and there were movements like ‘New Short Stories’ (Nayi Kahaani), New Poetry etc. I remember reading somewhere that the famous writers of ‘New Hindi Short Story Movement’ like Mohan Rakesh, Kamleshwar and Rajendra Yadav- they wrote very nice reviews regarding stories written by each other not only in their own names but by fake names also to promote each other!

There could be many such examples but I would directly come to the present times. Recently famous actress Kangna Ranaut blamed some film critics in general and one in particular that he is being paid by some rivals to malign her image.

I remember somebody was telling recently about an incident, some hotel which started business invited some opinion makers treated them well gave nice gifts and got some very nice reviews about his hotel and got it upgraded very soon. But ultimate test is the satisfaction of the customers. The hotel could not serve the customers well, got very bad comments from them and was again downgraded.

I would give one more example, I was very young that time when the famous film by my favorite actor-director Raj Kapur Ji- ‘Mera Naam Joker’ got released. I read the special review written by famous Hindi writer- Kamleshwar Ji, about this film. He wrote that Raj Saheb has surpassed a very famous Hollywood director (I forgot the name), left him far behind in dealing with the dreamy love by a young boy Rishi Kapur, in second part he was magnificently in dealing with the pure love that does not care for the barriers of language and country etc. and he wrote that in third part Raj Saheb ran away from himself.

This was an example of a review written by a competent critic on a powerful creative piece. It is good that today so many people write reviews about films, books, literature etc. It does help a person reading them to decide whether to go for that film, creative piece or not. Many times the conclusions of the reviewer may not be important for us but the information given may help us take our own considered decision.

For people writing the reviews, reviewing is there passion in some cases and profession in some others. In both cases they can make a good contribution and make an impact. The important factors are their talent, knowledge and most importantly integrity. The basic thing is that review should not become a promotional effort.

One must write reviews with total honesty and integrity, if he or she lacks in talent that could be developed over a period of time, but if there is no honesty and integrity, it would not take the person anywhere.

Yes, reviewers are needed in today’s world. When we write or do anything, we need to check it once again after completion. But it is not much possible to do it by ourselves. For example we sometimes count like say 8+6 = 15. It is wrong but sometimes when it happens with us, it keeps repeating, if we try again without much gap. Therefore a third person is needed as a reviewer or say as a shef (in case of cooking or say dishes)!

It today’s world where we are relying on so many activities, Yoga, Reiki for taking care of ourselves, one more thing is there in Which we practice and develop the habit of looking at ourselves, by virtually coming out of our body and looking at ourselves, our activity as a third person, it is called Vipashyanaa, Am I right!

Reviewing is needed because we can’t do Vipashyanaa, everywhere and with full effectiveness.

These are my humble views on the #IndiSpire prompt for the week- How reliable are reviews? You may consider films, books, gadgets, lifestyle, fashion or any other genre… #reviews

Thanks for reading.

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लंदन डे टूर- ’स्टोनहेंज’ और ‘बाथ’ !

कई दिन से पिछले साल के अनुभव शेयर कर रहा था, लेकिन आज जो अनुभव शेयर कर रहा हूँ वह कल का ही है।

मेरे बेटे ने ‘लंदन डे टूर’ में बुकिंग की थी जिसके अंतर्गत हमने दो महत्वपूर्ण स्थान कल देखे। सुबह 7-45 बजे की बस बुकिंग थी, हम घर से 7 बजे सुबह निकले, दो ट्यूब ट्रेन बदलने और काफी दूर तक भागने के बाद हम बस तक पहुंच पाए, क्योंकि वहाँ तक पहुंचने के टाइम की केल्कुलेशन में थोड़ी गड़बड़ हो गई थी।

खैर काफी आरामदायक बस थी, उसमें कमेंट्री करने वाला व्यक्ति भी काफी जानकारी रखने वाला था और उसकी प्रस्तुति भी काफी रोचक थी। वह जहाँ रास्ते में पड़ने वाले सभी स्थानों के बारे में बताता जा रहा था, मैं यहाँ उन दो महत्वपूर्ण स्थानों के बारे में ही बात करूंगा जो इस यात्रा के पड़ाव और प्रमुख आकर्षण थे।

जी हाँ लगभग 2 घंटे यात्रा करने के बाद हम अपने पहले पड़ाव ‘स्टोनहेंज’ पहुंचे जो प्रागैतिहासिक काल का निर्माण है, लगभग 5,000 वर्ष पुराना और विश्व धरोहरों में शामिल है। कुल मिलाकर देखा जाए तो इसमें बड़े-बड़े पत्थर के लंबे आयताकार स्लैब, कुछ खड़े और कुछ पड़े, खड़े हुए स्लैब्स के ऊपर पड़े स्लैब टिकाए गए हैं, जैसे कोई बच्चा स्ट्रक्चर बनाता है। कितने लंबे समय से प्रागैतिहासिक काल का गोलाकार रूप में बना यह ढांचा बना हुआ है। बताया जाता है कि इसका निर्माण सूर्य की गति के अनुसार किया गया है, सुबह जब सूरज उगता है तब कहाँ से दिखता है और सूर्यास्त के समय उसकी रोशनी किधर पड़ती है। यह विश्व धरोहर है और अवश्य देखने का स्थान है। यहाँ पर पुरानी झौंपड़ियों के स्वरूप भी प्रस्तुत किए गए हैं, टिकट के साथ एक वॉकी टॉकी जैसा यंत्र दिया जाता है, इसमें आप जिस स्थान पर पहुंचे हैं, उससे संबंधित बटन दबाने पर आपको उसका विवरण सुनने को मिलता है।

एक बात और कि यहाँ भेड़ें बहुत अधिक संख्या में हैं और उनको नजर न लग जाए, बहुत स्वस्थ भी दिखाई देती हैं। कमेंट्री करने वाला व्यक्ति भी विभिन्न जीवों की संख्या बता रहा था और उसके बाद उसने कहा कि भेड़ों की संख्या का अनुमान लगाना बहुत कठिन है। यहाँ अंदर एक स्थान से दूसरे पर ले जाने के लिए काफी आरामदेह बसों की व्यवस्था भी है। एक बार अवश्य देखने के लायक है।

इसके बाद हम फिर से अपनी दैनिक टूर वाली बस में बैठ गए और उद्घोषक से रोचक विवरण सुनते हुए दिन के दूसरे और अंतिम पड़ाव की तरफ आगे बढ़ने लगे। लगभग डेढ़ घंटे की यात्रा के बाद हम वहाँ पहुंचे, इस स्थान का नाम है- ‘बाथ’, जी हाँ नहाने वाला ‘बाथ’ यह नाम है इस नगर का, प्रकृति की मनोरम छटा के बीच बसा। बस से यहाँ पहुंचते समय ही पहाड़ी चढ़ाई से सामने घाटी में और उसके पार बने रॉयल निवास बहुत सुंदर लग रहे थे, जैसे अपने किसी हिल-स्टेशन में दूर घर दिखाई देते हैं, लेकिन यहाँ क्योंकि रॉयल लोगों के घर थे सो इनकी बनावट भी अतिरिक्त आकर्षक थी।
यह अत्यंत सुंदर नगर है, यहाँ आपको अनेक सुंदर रेस्टोरेंट, पब अपनी तरफ खींचते हैं, एक आइस-क्रीम की दुकान हैं जहाँ लाइन लगी रहती है क्योंकि कुछ लोग कहते हैं कि यहाँ जैसी आइस क्रीम कहीं नहीं मिलती। इमारतें अर्द्ध-गोलाकार रूप में बनी हैं और इस कारण मुहल्ले का नाम ‘सर्कस’ पड़ जाता है, (जो वास्तव में सर्किल ही है)।
सुंदर पार्क, ब्रिज, झील आदि इस नगर को और भी आकर्षित बनाते हैं। हाँ बाथ के लिए जो नेचुरल वाटर का स्रोत है, उसने तो इस नगर को यह नाम ही दिया है।

यहाँ जो रईस लोग रहते थे, उनके घरों के बारे में बताते हैं कि ये तीन मंज़िला होते हैं, अभी भी हैं। भूतल पर प्रवेश और रसोई, प्रथम तल पर ‘ड्राइंग रूम’ मेहमानों के स्वागत के लिए और द्वितीय तल में शयन- कक्ष होता था। उसके ऊपर नौकर रहते थे। मालिकों को सामान्यतः नौकर लोग कुर्सी पर बैठी स्थिति में उठाकर एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाते थे।

इस सुंदर नगर में भ्रमण का, यहाँ खाने-पीने का हमने 3 घंटे तक आनंद लिया और इसके बाद वापसी यात्रा का प्रारंभ, उद्घोषक द्वारा दी जा रही जानकारी, हंसी-मज़ाक के साथ प्रारंभ किया।

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।


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स्कॉटलैंड यात्रा-3 (2018)

लंदन में रहते हुए, आज फिर से जो अनुभव शेयर कर रहा हूँ वे पिछले वर्ष के हैं। आज स्कॉटलैड यात्रा के अनुभव शेयर करने का तीसरा और अंतिम दिन है। लीजिए प्रस्तुत है स्कॉटलैंड यात्रा से जुड़ा यह अंतिम विवरण-

 

अब स्कॉटलैंड यात्रा में तीसरे और अंतिम दिन के बारे में बात करते हैं, जैसा कि प्रोग्राम था, उसके अनुसार नाश्ता करने के बाद होटल से चेक आउट करके निकलना था और हम लोगों ने ऐसा ही किया।

अंतिम दिन का प्रमुख आकर्षण था- एडिनबर्ग, जो कि एक ऐतिहासिक नगर होने के अलावा स्कॉटलैंड की राजधानी भी है। नगर में पहुंचने के बाद हमने रानी का महल देखा, जहाँ वे अपने एडिनबर्ग प्रवास के दौरान रहती हैं। जैसा कि होता है बहुत भव्य महल है। उसके सामने ही स्कॉटलैंड की संसद का भवन भी है।

इन दो प्रमुख भवनों के पास ही, ऊंची कार्ल्टन पहाड़ी पर विकसित की गई एक सिटी ऑब्ज़र्वेटरी है जहाँ से नगर का बहुत सुंदर दृश्य दिखाई देता है। इस पहाड़ी पर एक पुर्तगाली तोप भी है, और लोगों ने यहाँ से नगर के बहुत सुंदर चित्र लिए।

 

इसके बाद अनेक स्थानों का भ्रमण करते हुए टूर ऑपरेटर ने हम लोगों को ‘एडिनबर्ग कैसल’ के पास छोड़ दिया क्योंकि इसके पास का इलाका बहुत सुंदर और गतिविधिपूर्ण है, मानो दिल्ली का कनॉट प्लेस, हालांकि वहाँ जो दृश्य देखने को मिले वे बहुत ही भव्य थे। वहाँ पास ही में राष्ट्रीय संग्रहालय,राष्ट्रीय पुस्तकालय आदि भी हैं।

‘एडिनबर्ग कैसल’ काफी ऊंचाई पर स्थित है और बहुत भव्य है, वहाँ देखने वालों की भारी भीड़ होती है। वहाँ से नीचे उतरते हुए सेंट गाइल्स कैथेड्रल और बाजार में अनेक जीवंत आकर्षण हैं। वहाँ एक भव्य मूर्ति है, जिसके बारे में माना जाता है कि उसके पांव के पंजे पर हाथ रगड़ने से लोगों की किस्मत चमक जाती है। बाजार में लगातार आकर्षण देखने को मिलते हैं, बहुत से डॉगी चश्मा पहने बैठे दिखाई देते हैं और उनका स्वामी संगीत का साज़ बजाते हुए उन दोनो के लिए कमाई कर रहा होता है।

इसी बाज़ार के पास राष्ट्रीय संग्रहालय है, जिसमें अत्यधिक आकर्षक वस्तुओं का संग्रह है। इसके पास ही ‘बॉबी’ नाम के एक कुत्ते की मूर्ति बनी है, जिसके बारे में कहा जाता है कि वह अपने मालिक की मृत्यु के बाद, अपनी मृत्यु तक उसकी कब्र पर ही बैठा रहता था। इस कुत्ते को देखने के लिए बहुत लोग आते थे, अब उसकी मूर्ति को देखने आते हैं।
इस प्रकार तीन दिन की इस यात्रा में अनेक दर्शनीय स्थानों और प्रकृति की अनूठी छवियों को देखने, उसे यथासंभव अपने कैमरों में कैद करने के बाद हम लोग वापसी की लगभग 9 घंटे लंबी यात्रा पर रवाना हुए और रास्ते में कुछ स्थानों पर चाय-पानी के रुकते हुए हम वापस चले, और रात को 12 बजे के बाद हम वापस लंदन पहुंचे।

जैसे कि हर अनुभव करता है, इस यात्रा ने भी हम लोगों को भीतर से समृद्ध किया।
नमस्कार।

आज के लिए इतना ही।
नमस्कार।

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212. स्कॉटलैंड यात्रा-2

लंदन में रहते हुए, आज फिर से जो अनुभव शेयर कर रहा हूँ वे पिछले वर्ष के हैं। उस समय पहली बार लंदन आया था तो मैं नए अनुभव के साथ-साथ पुराने अनुभव भी लंदन यात्रा के शेयर करता रहूंगा, आज से पिछले वर्ष की स्कॉटलैड यात्रा के अनुभव शेयर करने का दूसरा दिन है-

तीन दिन की स्कॉटलैंड यात्रा में दूसरे दिन के बारे में बात करने से पूर्व यह बता दूं कि यात्रा के दौरान पहली रात हमने ग्लास्गो एयरपोर्ट के पास ही ‘ट्रैवेलॉज’ समूह के होटल में बिताई, जहाँ टूर ऑपरेटर ने हमारे रुकने की व्यवस्था की थी। इस होटल में कांटिनेंटल ब्रेकफास्ट की व्यवस्था थी, जिसमें मुझ जैसे लोगों को बार-बार यह पूछना पड़ता है, ‘ये डिश वेजीटेरिअन है न जी!’

खैर नाश्ता करके हम सुबह 9 बजे भ्रमण के लिए रवाना हुए। चलिए शुरू में संक्षेप में अपने सहयात्रियों के बारे में बता दूं। टूर ऑपरेटर-कम-ड्राइवर महोदय के बारे में तो मैं बता ही चुका हूँ। बस में शुरू की दो पंक्तियों में एक गुजराती परिवार था जिसमें एक पति-पत्नी, उनकी दो बेटियां, जिनमें से एक ‘सी.ए.’ थी जैसा उन्होंने बताया और एक बेटा जो शायद बारहवीं कक्षा में पढ़ रहा था। उनके बाद दो मद्रासी वृद्धाएं थीं, जो सहेलियां थीं, जिनमें से एक के संबंधी लंदन में रहते हैं। दोनो महिलाएं 70 वर्ष के आसपास उम्र की थीं, एक का बेटा अमरीका में है, जहाँ वह इसके बाद जाने वाली थीं।

वैसे सभी लोग क्योंकि लंदन से इस यात्रा पर रवाना हुए थे, तो जाहिर है कि सभी के संबंधी लंदन में रहते थे और वे वहाँ से ही रवाना हुए थे। हाँ तो बाकी लोग तो रह ही गए, एक परिवार केरल का था, जिसमें युवा माता-पिता और उनकी एक 8-10 साल की बेटी थी। उनके पीछे था कलकत्ता से आया एक परिवार, जो थोड़ा अंग्रेजी संस्कृत्ति से ज्यादा मुतमइन था। मियां-बीबी और छोटा बेटा, जो या तो कभी-कभी बंगला बोलते थे, या ज्यादातर तीनों मिलकर अंग्रेजी में कोई गेम खेलते रहते थे।

अंत में चार लोगों की एक सीट थी, जिस पर हम पति-पत्नी, और हमारे अलावा बंगलौर से आए एक और पति-पत्नी थे, शायद 50 वर्ष के आसपास उम्र के थे।

दूसरे दिन के भ्रमण के बारे में अधिक नहीं बता पाऊंगा, क्योंकि यह शुद्ध प्रकृति की गोद में यात्रा थी, लंबी-चौड़ी सुंदर फैली-पसरी झीलें, बीच-बीच में पहाड़ों घाटियों के बीच सुंदर व्यू-पाइंट, जिसकी खूबसूरती ही उसका वर्णन होती है।

खैर नाम के तौर पर बताऊं तो दूसरे दिन हम इन स्थानों पर गए- लोच-लोमंड जो स्कॉटलैंड की बहुत सुंदर और विशाल झील है, जिसके पास लाल हिरण काफी रहते हैं। यहाँ अत्यंत सुंदर झरना है- ‘फाल ऑफ फलोच, जिसका दृश्य देखते ही बनता है। ब्रिटेन के सबसे ऊंचे पहाडों की छाया में बसे फोर्ट विलियम नगर में गए, वहाँ हमने भोजन किया और उसके बाद आगे ऊंचे पहाडों ‘बेन नेविस’ के बीच रोपवे ट्रॉली ‘गोंडोला’ से ऊपर गए, लेकिन अचानक बरसात आ जाने के कारण हम इसका अधिक आनंद नहीं ले पाए।

लौटते समय हमने फोर्ट विलियम में ही एक दुकान से थ्री डाइमेंशन तस्वीरें लीं जो हमें देखने में बहुत अच्छी लगीं। टूर ऑपरेटर ने बताया था कि यहाँ से सस्ते गिफ्ट आइटम, इधर कहीं नहीं मिलेंगे। कुछ ऐसा ही लगा भी। लौटते समय भी सुंदर पहाड़ और झीलें लुभाते रहे, नाम में क्या रखा है लेकिन कुछ नाम थे- कैलेडोनिअन कैनाल, फोर्ट ऑगस्टस विलेज, लोच (झील) नेस मॉन्स्टर, जिसमें माना जाता है कि दैत्याकार जानवर रहते थे।

हाँ एक फोटो मैं यहाँ लंदन में अपने उस समय के घर से लिया गया डाल रहा हूँ जो बगल में ही थेम्स नदी से होकर गुजरने वाले विशाल शिप का लिया था।

दूसरे दिन की यात्रा का विवरण इतना ही, इसके बाद बात करेंगे तीसरे और अंतिम दिन के बारे में।

आज के लिए इतना ही।
नमस्कार।

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राष्ट्रीयता और राष्ट्रद्रोह

मैं इन दिनों लंदन प्रवास में हूँ और यहाँ की वर्तमान और पिछले वर्ष की यात्राओं के अनुभव इन दिनों शेयर कर रहा हूँ। ये अनुभव मैं आगे भी शेयर करता रहूंगा।

इस बीच एक और विषय पर बात करने का मन है, अभी ‘राष्ट्र, राष्ट्रीयता और राष्ट्रद्रोह’ विषय पर चर्चा चल रही थी, इस विषय में मैंने भी अपने विचार रखे, आज अलग से इससे जुड़े विषय पर अपनी सम्मति देने का मन है।

 

 

हमने पिछले कुछ वर्षों में ऐसी गतिविधियां देखी हैं, जिनको राष्ट्रद्रोही कहने में कम से कम मुझे तो कोई संदेह नहीं है। मैं  जेएनयू में हुई गतिविधियों का उल्लेख कर रहा हूँ, जिनमें हमारे सैनिकों के शहीद होने पर खुशी मनाना, बुरहान बानी को फांसी का विरोध और इस प्रकार के नारे लगाया जाना शामिल है- ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे, इंशा अल्लाह, इंशा अल्लाह’। अभी कश्मीर के संबंध में सरकार द्वारा लिए गए ऐतिहासिक कदम के बाद ‘जेएनयू’ फैक्ट्री से ही निकली एक कश्मीरी युवती ‘शेहला रशीद’  द्वारा ट्वीट करके, झूठी अफवाह फैलाया जाना भी इसका उदाहरण है कि यह प्रतिष्ठित संस्थान आज राष्ट्रद्रोह का अड्डा बन गया है।

इस सबके पीछे देखा जाए तो लॉर्ड मैकाले द्वारा भारत को मानसिक रूप से गुलाम बनाए रखने के लिए चलाई गई शिक्षा पद्यति का बहुत बड़ा हाथ है। हमारी बहुत समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर रही है और लॉर्ड मैकाले का यही सिद्धांत था कि भारतीयों को अपने सांस्कृतिक मूल्यों से काट दो, उनके मन से राष्ट्र-गौरव निकाल दो, तब उनको गुलाम बनाए रखना आसान होगा और वे भौतिक रूप से आज़ाद हो जाएं तब भी वे मानसिक रूप से गुलाम बने रहेंगे, और इसके लिए अंग्रेजी शिक्षा व्यवस्था लानी होगी और तभी इस देश में शरीर से भारतीय लेकिन दिमाग से अंग्रेज पैदा होंगे और जब इस देश की यूनिवर्सिटी से निकलेंगे तो हमारे हित में काम करेंगे।

हम विश्व की प्राचीनतम सभ्यताओं में से एक हैं, हमें विश्व-गुरू का दर्जा प्राप्त था। मैक्समूलर जैसे अनेक विदेशी विद्वान भारतीय संस्कृति का लंबे समय तक अध्ययन करते रहे, फादर क़ामिल बुल्के जैसे विदेशी मानस मर्मज्ञ रहे।

हमारे राष्ट्रकवि श्री रामधारी सिंह ‘दिनकर’ जी ने संस्कृति के चार अध्याय पुस्तक और कितना सुंदर साहित्य लिखा। उनका एक प्रसंग याद आ रहा है। दिनकर जी ने एम.ए. नहीं किया था, सो उनके मन में आया और उन्होंने एम.ए. के लिए फॉर्म भर दिया। उस समय बिहार विश्वविद्यालय के कुलपति भी विख्यात हिंदी साहित्यकार थे, मुझे उनका नाम अभी याद नहीं आ रहा, उन्होंने दिनकर जी को बुलाया और कहा- ये क्या कर रहे हो दिनकर, लोग आपकी पुस्तकें, कवितायें आदि कोर्स में पढ़ रहे हैं, उन पर शोध कर रहे हैं, तुम्हे क्या जरूरत है एम.ए. करने की!

मैं जिस तरफ संकेत करना चाहता हूँ वो ये हि कि हमारे यहाँ डिग्री वाले नहीं अध्यवसाय वाले विद्वान रहे हैं, भारत एक सांस्कृतिक रूप से समृद्ध देश रहा है। हमारे अनपढ़ कबीर को पूरी दुनिया पढ़कर समझने का प्रयास कर रही है। तुलसीदास जी कहाँ के पढ़े-लिखे थे, जिनकी चौपाइयां आज भी गांवों में अनपढ़ बुज़ुर्ग संदर्भ के लिए जब-तब दोहराते हैं।

एक लंबी संस्कृति रही है, पीढ़ी दर पीढ़ी ज्ञान को आगे बढाने की परंपरा रही है। एक भारतीय संत- स्वामी विवेकानंद जब विश्व धर्म संसद में खड़ा होकर बोलता है, तब उसका संबोधन-‘भाइयो और बहनो’ सबको अकस्मात चौंका देता है, जो तब तक ‘देवियो और सज्जनो’ ही सुनते आए थे, विश्व बंधुत्व की अवधारणा को मन से अपनाने वाले इस संत की वाणी को दुनिया मंत्रमुग्ध होकर सुनती है, यह कोई किस्सा-कहानी नहीं है!

लेकिन आज, मैकाले की सफलता इस बात में है कि हमारे डिग्रीधारी विद्वान इस पश्चिमी अवधारणा को स्वीकार करते हैं कि ‘राष्ट्र’ एक काल्पनिक इकाई है, एक कल्पना है, हम बस यह मान लेते हैं कि यह हमारा देश है।

हाँ यह भी सच है कि बहुत सी बातें विश्वास पर ही कायम हैं, वरना कोई किसी को अपना पिता अथवा संतान भी नहीं माने। सुना है कि ओशो रजनीश के व्याख्यान स्थल पर लिखा रहता था, ‘कृपया अपने जूते और दिमाग बाहर छोड़कर आएं।‘

आज के डिग्रीधारी विद्वानों के साथ दिक्कत यह है कि जो बात कोई बाहरी विद्वान कहता है उसे वे तुरंत मान लेते हैं, लेकिन जो उनको भारतीय परंपरा से मिलती है उसको वे मानने को तैयार नहीं होते और इसकी परिणति यहाँ तक होती है जैसा जेएनयू में देखने को मिला।

अंत में एक बात अवश्य जोड़ना चाहूंगा, जो लोग दूसरों को सुधारने का, अपने हिसाब से भारतीय बनाने का और जाति और धर्म के नाम पर अत्याचार का काम करते हैं वे भारतीयता के सबसे बड़े दुश्मन हैं।

ऐसे ही आज कुछ विचार मन में आए, मैं यहाँ किसी को संतुष्ट करने का प्रयास नहीं कर रहा हूँ, मैं कोई विदेशी लेखक नहीं हूँ इसलिए कुछ लोगों का तो मेरी बात से सहमत होना संभव ही नहीं है।

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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स्कॉटलैंड यात्रा- 2018, भाग-1

लंदन में रहते हुए, आज फिर से जो अनुभव शेयर कर रहा हूँ वे पिछले वर्ष के हैं। उस समय पहली बार लंदन आया था तो मैं नए अनुभव के साथ-साथ पुराने अनुभव भी लंदन यात्रा के शेयर करता रहूंगा, आज से पिछले वर्ष की स्कॉटलैड यात्रा के अनुभव शेयर करने का प्रारंभ कर रहा हूँ, जो तीन दिन तक तो चलेंगे ही-

लीजिए जैसा मैंने पहले कहा था, अपनी लंदन से स्कॉटलैंड यात्रा के अनुभव शेयर कर लेता हूँ, रिकॉर्ड भी हो जाएगा बाद में याद रखने के लिए, क्योंकि मैं बहुत जल्दी सब भूल जाता हूँ!

तीन दिन की यह यात्रा, जैसा कि टूर ऑपरेटर का शेड्यूल है, सप्ताह में वह दो बार संचालित करता है। वैसे मुझे इस तरह की शेड्यूल्ड यात्राओं में, जहाँ थोड़े समय में काफी कुछ कवर करने का प्रयास होता है, उसमें बड़ी दिक्कत ये लगती है कि बड़ी जल्दी उठकर निकलना होता है।

हाँ तो शुक्रवार को हमारी यात्रा प्रारंभ हुई, मैं और मेरी पत्नी इस यात्रा पर रवाना हुए, लंदन में ‘ईस्ट हैम’ से जहाँ बड़ी संख्या में एशियन लोग, मुख्यतः हिंदुस्तानी और पाकिस्तानी रहते हैं, और अच्छी बात ये है कि ये पूछने पर पता चलता है कि सामने वाला हिंदुस्तानी है या पाकिस्तानी! उनके बीच यहाँ तो कोई हिंदुस्तान-पाकिस्तान नहीं है!

खैर जो सज्जन टूर ऑपरेटर हैं, वो खुद ही हमारी बस चला रहे थे, जो कि लग्ज़री मिनी बस थी, यात्रियों की संख्या के आधार पर बड़ी बसें भी चलाई जाती हैं, उनकी बहुत सी बसें हैं, मूलतः गुजरात से हैं और अपनी संपत्ति के बारे में बता रहे थे लगा कि ये छोटे-मोटे मुकेश अंबानी हैं। इनकी बसों में सामान्यतः हिंदुस्तानी यात्री यात्रा करते हैं और रास्ते में वे खुद अथवा उनका संबधित चालक गाइड का काम भी करते हैं। ‘ईस्ट हैम’ के अलावा भारतीय आबादी वाले दो और स्टॉप और ऐसे हैं जहाँ से यात्री बैठते हैं और अलग-अलग पैकेज हैं, हमारा पैकेज तीन दिन और दो रात का था, जिसमें होटल में ठहरना, ब्रेकफास्ट और डिनर आदि शामिल थे, 250 पाउंड प्रति व्यक्ति की दर से!
ईस्ट हैम से सुबह 4-45 बजे रवाना होने के लिए हम अपने घर से सुबह 4-15 बजे चले और समय पर टीम में शामिल हो गए।

बस में सवारियां इकट्ठा करने के बाद, रास्ते में चाय-भोजन आदि के ब्रेक लेते हुए, पहला मुकाम जो था वो था बालाजी मंदिर। वैसे मेरा मानना है कि मैं सही मायनों में आस्तिक हूँ, ऐसा जिसकी आस्था किसी मंदिर अथवा मूर्ति की मोहताज नहीं है।

बर्मिंघम में मंदिर पर पहला पड़ाव पड़ा, काफी सुंदर मंदिर बना है वहाँ दर्शन भी किए और फिर आगे बढ़ गए। अगला पड़ाव क्या, वैसे तो कई बार रास्ता ही मंज़िल बन जाता है, क्योंकि रास्ते की दृश्यावली बहुत सुंदर थी, लोगों के मोबाइल और कैमरे कम पड़ रहे थे उन दृश्यों को क़ैद करने के लिए, अब कितने दिन तक वे छवियां सुरक्षित रहेंगी, ये अलग बात है।

अगला पड़ाव, जो इसी सुंदर दृश्यावली का महत्वपूर्ण हिस्सा है, वो थी ‘लेक ड्रिस्ट्रिक्ट’, उसी में हमने ‘विंडरमेयर लेक’ जो कि इंग्लैंड में ताजा पानी की सबसे बड़ी झील है, उसमें नौका विहार किया था। इस प्रकार के दृश्य हमने पहले ‘केरल’ में देखे थे, जिसे ‘भगवान का अपना घर’ (गॉड्स ऑव्न कंट्री) कहते हैं, वैसे सच्चाई तो यह है कि पूरी दुनिया में ही सुंदरता बिखरी पड़ी है और पूरी दुनिया ही उसका अपना घर है, जिसके बारे में कहा गया कि-

‘ये कौन चित्रकार है!’

 

एक बात और वहाँ देखी, झील के पास बतख और हंस आदि लोगों के एकदम पास चले आते थे, कोई डर नहीं लगता उनको, लोगों के हाथ से खाना खा रहे थे। ऐसा ही अनुभव कई वर्ष पहले अंडमान में हुआ था, जहाँ बारहसिंघे आकर हमारे हाथ से बिस्कुट आदि खा रहे थे।

स्कॉटलैंड में प्रवेश करने पर, बताया गया कि पहला घर एक ‘लोहार का घर’ था, जो घोड़े की नाल बनाता था, कुछ कहानियां जुड़ी हैं उससे, शायद शादियां ज्याद मजबूत बनाने में उसकी कोई भूमिका थी, लोग घर से भागकर, स्कॉटलैंड में आकर शादी करते थे।

अंत में हम उस स्थान पर पहुंचे जहाँ पर भारतीय डिनर की व्यवस्था थी, परदेस में ऐसी व्यवस्था मिल जाए तो बहुत सुकून मिलता है। विशेष रूप से हमारे जैसे शाकाहारियों के लिए।

भोजन करके हम अपने होटल में चले गए विश्राम करने और अगले दिन समय पर निकलने के लिए तैयार रहने के लिए।

चित्र मौका मिलेगा तो किसी और पोस्ट में डालूंगा।

आज के लिए इतना ही।
नमस्कार।

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