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जिसमें नया कुछ दिख सके, वह एक दर्पण चाहिए

आज हिंदी काव्य मंचों के अत्यंत प्रसिद्ध कवियों में से एक, स्व. रमानाथ अवस्थी जी का एक गीत शेयर करने का मन हो रहा है। जैसे किसी ने कहा है-

मंज़िलें उन्हीं को मिलती हैं, जिनके सपनों में जान होती है,
सिर्फ पंखों से कुछ नहीं होता, हौसलों से उड़ान होती है।’

कुछ वैसी ही बात श्री अवस्थी जी के इस गीत में है, एक पुस्तक मैंने पढ़ी थी- ‘इच्छा से संकल्प, संकल्प से सिद्धि।’ वास्तव जब हम अपने मन को, अपनी इच्छाओं को, संकल्प को मजबूत बना लेते हैं, तब हम कुछ भी हासिल कर सकते हैं।

 

 

लीजिए यह खूबसूरत गीत एक बार फिर से याद कर लेते हैं-

कुछ कर गुज़रने के लिये मौसम नहीं, मन चाहिए !

थककर बैठो नहीं प्रतीक्षा कर रहा कोई कहीं
हारे नहीं जब हौसले
तब कम हुए सब फासले
दूरी कहीं कोई नहीं, केवल समर्पण चाहिए।

कुछ कर गुज़रने के लिये मौसम नहीं, मन चाहिए।

 

हर दर्द झूठा लग रहा, सहकर मजा आता नहीं
आँसू वही, आँखें वही
कुछ है ग़लत कुछ है सही
जिसमें नया कुछ दिख सके, वह एक दर्पण चाहिए।

कुछ कर गुज़रने के लिये मौसम नहीं, मन चाहिए।

 

राहें पुरानी पड़ गईं, आख़िर मुसाफ़िर क्या करे
संभोग से सन्यास तक
आवास से आकाश तक
भटके हुये इन्सान को, कुछ और जीवन चाहिए।
कुछ कर गुज़रने के लिये मौसम नहीं, मन चाहिए।

 

कोई न हो जब साथ तो, एकान्त को आवाज़ दें।
इस पार क्या उस पार क्या,
पतवार क्या मझधार क्या,
हर प्यास को जो दे डुबा, वह एक सावन चाहिए।

कुछ कर गुज़रने के लिये मौसम नहीं, मन चाहिए।

 

कैसे जियें कैसे मरें, यह तो पुरानी बात है,
जो कर सकें आओ करें,
बदनामियों से क्यों डरें,
जिसमें नियम-संयम न हो, वह प्यार का क्षण चाहिए।

कुछ कर गुज़रने के लिये मौसम नहीं, मन चाहिए।

 

आज के लिए इतना ही।
नमस्कार।

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