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मैंने वो घर बदल लिया है!

बहुत सी बार मंच के कुछ ऐसे पुराने कवि याद आते हैं जिनकी कुछ रचनाएं बहुत लोकप्रिय हुई थीं, ऐसे ही एक कवि थे स्व. शिशुपाल सिंह ‘निर्धन’ जी, उनकी बहुत सी अच्छी रचनाएं होंगी, लेकिन यह रचना बहुत प्रसिद्ध थी, जिसे वे एक पुराने दुख के साथ बहुत चुनौती पूर्ण अंदाज में संवाद के साथ शुरू करते हैं।

लीजिए प्रस्तुत है यह प्रसिद्ध रचना-

एक पुराने दुःख ने पूछा
क्या तुम अभी वहीं रहते हो?
उत्तर दिया,चले मत आना
मैंने वो घर बदल लिया है ।

जग ने मेरे सुख-पंछी के,
पंखों में पत्थर बांधे हैं।
मेरी विपदाओं ने अपने,
पैरों मे पायल साधे हैं ।
एक वेदना मुझसे बोली
मैंने अपनी आँख न खोली।
उत्तर दिया,चली मत आना
मैंने वो उर बदल लिया है।
एक पुराने दुख ने पूछा… ।

वैरागिन बन जाएँ वासना,
बना सकेगी नहीं वियोगी।
साँसों से आगे जीने की,
हठ कर बैठा मन का योगी।
एक पाप ने मुझे पुकारा,
मैंने केवल यही उचारा-
जो झुक जाए तुम्हारे आगे
मैंने वो सर बदल लिया है।
एक पुराने दुख ने पूछा …।

मन की पावनता पर बैठी,
है कमजोरी आँख लगाए।
देखें दर्पण के पानी से,
कैसे कोई प्यास बुझाए।
खंडित प्रतिमा बोली आओ,
मेरे साथ आज कुछ गाओ।
उत्तर दिया, मौन हो जाओ
मैंने वो स्वर बदल लिया है ।

एक पुराने दुःख ने पूछा
क्या तुम अभी वहीं रहते हो?
उत्तर दिया,चले मत आना
मैंने वो घर बदल लिया है ।

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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