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उर सागर के सीप!

आज फिर से मन है कि मेरे प्रिय गीत कवियों में से एक, मेरठ के सुमधुर गीत-सर्जक स्व. भारत भूषण जी का एक गीत शेयर करूं। अभिव्यक्ति में भावों की सघनता क्या होती है, यह इन गीतों से मालूम होता है, थोड़े से शब्दों में कितनी गहरी बात कह दी जाती है।

आइए इस गीत का अवगाहन करते हैं-

ये उर-सागर के सीप तुम्हें देता हूँ ।
ये उजले-उजले सीप तुम्हें देता हूँ ।
है दर्द-कीट ने, युग-युग इन्हें बनाया
आँसू के खारी पानी से नहलाया
जब रह न सके ये मौन,
स्वयं तिर आए
भव तट पर,
काल तरंगों ने बिखराए
है आँख किसी की खुली
किसी की सोती
खोजो,
पा ही जाओगे कोई मोती
ये उर सागर के सीप तुम्हें देता हूँ
ये उजले-उजले सीप तुम्हें देता हूँ

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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