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कैसे नादान हैं, शोलों को हवा देते हैं!

आज एक बहुत पुरानी फिल्म और उसका एक गीत याद आ रहे हैं। आज का यह गीत है 1963 में रिलीज़ हुई फिल्म- ताज महल का, साहिर लुधियानवी जी के लिखे इस गीत को सुर सम्राज्ञी लता मंगेशकर जी ने रोशन जी के संगीत निर्देशन में अनूठे ढंग से गाया है।

कुल मिलाकर इतना है कि दुनिया में हुक़ूमतें हैं, सरमायेदारी है, पूरी दुनिया को जीत लेने का, सब कुछ अपने कब्ज़े में कर लेने का ज़ुनून है और दूसरी तरफ मुहब्बत है, जो अपना सब कुछ लुटा देने को तैयार है, सब तरह के ज़ुल्म हंसते-हंसते सह जाती है। तख्त और ताज की उसके लिए कोई अहमियत नहीं है। लीजिए मुहब्बत के इस अमर गीत का आनंद लेते हैं-

 

जुर्म-ए-उल्फ़त पे हमें लोग सज़ा देते हैं, 
कैसे नादान हैं, शोलों को हवा देते हैं|
कैसे नादान हैं

 

हमसे दीवाने कहीं तर्क-ए- वफ़ा करते हैं, 
जान जाये कि रहे बात निभा देते हैं।
जान जाये…

 

आप दौलत के तराज़ू मैं दिलों को तौलें, 
हम मोहब्बत से मोहब्बत का सिला देते हैं।
हम मोहब्बत से…

 

तख़्त क्या चीज़ है और लाल-ओ-जवाहर क्या है, 
इश्क़ वाले तो खुदाई भी लुटा देते हैं।
इश्क़ वाले …

 

हमने दिल दे भी दिया, अहद-ए-वफ़ा ले भी लिया, 
आप अब शौक से दीजे जो सज़ा देते हैं।
जुर्म-ए-उल्फ़त पे हमें लोग सज़ा देते हैं।

 

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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मन के पंछी उड़-उड़ हारे!

हिंदी कविताओं पर चर्चा करने के क्रम में मैंने पिछली बार, हिंदी कवि सम्मेलनों में अपने समय में धूम मचाने वाले एक कवि स्व. श्री गोपाल सिंह नेपाली जी की एक कविता शेयर की थी, आज उनकी एक और लोकप्रिय कविता आपको समर्पित कर रहा हूँ, एकाकी जीवन के अनुभव, जीवन का राही अपने अंदाज़ में कैसे बयान करता है कविता में, लीजिए इसका आनंद लीजिए –

 

तन का दिया, प्राण की बाती,
दीपक जलता रहा रात-भर ।

 

दु:ख की घनी बनी अँधियारी,
सुख के टिमटिम दूर सितारे,
उठती रही पीर की बदली,
मन के पंछी उड़-उड़ हारे ।

 

बची रही प्रिय की आँखों से,
मेरी कुटिया एक किनारे,
मिलता रहा स्नेह रस थोडा,
दीपक जलता रहा रात-भर ।

 

दुनिया देखी भी अनदेखी,
नगर न जाना, डगर न जानी;
रंग न देखा, रूप न देखा,
केवल बोली ही पहचानी,

 

कोई भी तो साथ नहीं था,
साथी था ऑंखों का पानी,
सूनी डगर सितारे टिमटिम,
पंथी चलता रहा रात-भर ।

 

अगणित तारों के प्रकाश में,
मैं अपने पथ पर चलता था,
मैंने देखा, गगन-गली में,
चाँद-सितारों को छलता था ।

 

आँधी में, तूफ़ानों में भी,
प्राण-दीप मेरा जलता था,
कोई छली खेल में मेरी,
दिशा बदलता रहा रात-भर ।

 

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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Unbiased news in India!

Again submitting my views on an #IndiSpire prompt. This time the point of discussion is “News” , and obviously it includes ‘views’ also. Most of the time our news channels are presenting 10% news and 90% views.

 

 

It generally happens that when we listen to somebody discussing present Indian political situation, in a few moments we can understand whether he or she is a follower of Ravish Kumar, Barkha Dutt, Vinod Dua, Punya Prasun Vajpayee etc. or on the other hand – Arnab Goswami, Rajat Sharma etc.

In film industry and literary world also there are hundreds of persons who would never find a good thing in Mr. Narendra Modi, they are always ready to write open letters, whenever they find a point for doing so. Many of them had signed a letter requesting US government not to issue a VISA for Mr. Narendra Modi, for visiting America, since they felt he is guilty of Gujrat riots, while they do not find anybody guilty of so many riots that have happened in India and also in case of anti-sikh riots or the exodus and heinous crimes against Hindu families from Kashmir, since they feel that it does not add to their ‘secular’ image. Now the supreme court might have absolved Mr. Modi of these charges, they would never do that.

Further when these people wrote to US against VISA for Mr. Modi, they considered America to be the custodian of democracy and human rights. But now when the US presidents, first Mr. Obama and then the present president Mr. Donald Trump have praised Mr. Modi like anything, and not only USA but the whole world community has honored Mr. Modi and praised him like anything, these learned people in India are not going to change their ‘secular’ stand. Further it is felt that in India, if you follow certain religions, you have to hate Mr. Modi otherwise you may be considered out-caste.

Anyway I was just discussing how pure news is not possible today in India. It is true that today one kind of anti-social people find that it is their time and they try to do atrocities on other people, the government needs to prove through its actions that they do not have any soft corner for these rowdy people. Though It has been happening earlier also, when some other type of people felt free to do wrong acts.

Anyway I only feel that the news channels also need to earn the reputation of delivering unbiased news and allow the audience to form their considered opinion based on news which is neither exaggerated, nor hidden, just presented in a totally unbiased manner, but I think it is not happening at present.

People also get awarded for spreading a particular type of opinion, they would keep repeating a small fault they find with the government but would not ever mention  the positive achievements, since then they may not be considered for these favors. It is a fact that many so called journalists were going on government sponsored world tours earlier and getting many facilities, which they are not getting now.

I still hope that true journalists would not allow ‘News’ to become a sponsored activity and report everything in true perspective without any bias, favor or otherwise.

• These are my humble views on the #IndiSpire prompt, in the Indian context- News today is nothing but sensational entertainment that attempt to tilt public opinion towards one or the other point-of-view. Write a post on your opinion of news today. #News

Thanks for reading.

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घर तो रखवारों ने लूटा!

हिंदी कविता की जो श्रवण परंपरा रही है, कवि सम्मेलनों के माध्यम से लोगों तक पहुंचने की, उसमें बहुत से लोकप्रिय कवि रहे हैं और उन्होंने हिंदी कविता कोश को बहुत समृद्ध किया है। यह अलग बात है कि बाद में कवि सम्मेलन के मंच चुटकुलेबाजी को ज्यादा समर्पित हो गए, हालांकि आज भी कुछ खास आयोजनों में अच्छी हिंदी कविता सुनी जाती है।

आज मैं हिंदी कवि सम्मेलनों में अपने समय में धूम मचाने वाले एक कवि स्व. श्री गोपाल सिंह नेपाली जी की एक लोकप्रिय कविता आपको समर्पित कर रहा हूँ-

 

बदनाम रहे बटमार मगर, घर तो रखवारों ने लूटा
मेरी दुल्हन-सी रातों को, नौ लाख सितारों ने लूटा
दो दिन के रैन बसेरे की,
हर चीज़ चुराई जाती है।
दीपक तो अपना जलता है,
पर रात पराई होती है।
गलियों से नैन चुरा लाए
तस्वीर किसी के मुखड़े की,
रह गए खुले भर रात नयन, दिल तो दिलदारों ने लूटा।
मेरी दुल्हन-सी रातों को, नौ लाख सितारों ने लूटा॥

 

शबनम-सा बचपन उतरा था,
तारों की गुमसुम गलियों में।
थी प्रीति-रीति की समझ नहीं,
तो प्यार मिला था छलियों से।
बचपन का संग जब छूटा तो,
नयनों से मिले सजल नयना।
नादान नये दो नयनों को, नित नये बजारों ने लूटा।
मेरी दुल्हन-सी रातों को, नौ लाख सितारों ने लूटा॥

 

हर शाम गगन में चिपका दी,
तारों के अक्षर की पाती।
किसने लिक्खी, किसको लिक्खी,
देखी तो पढ़ी नहीं जाती।
कहते हैं यह तो किस्मत है,
धरती के रहनेवालों की।
पर मेरी किस्मत को तो इन, ठंडे अंगारों ने लूटा।
मेरी दुल्हन-सी रातों को, नौ लाख सितारों ने लूटा॥

 

अब जाना कितना अंतर है,
नज़रों के झुकने-झुकने में।
हो जाती है कितनी दूरी,
थोड़ा-सी रुकने-रुकने में।
मुझ पर जग की जो नज़र झुकी,
वह ढाल बनी मेरे आगे।
मैंने जब नज़र झुकाई तो, फिर मुझे हज़ारों ने लूटा।
मेरी दुल्हन-सी रातों को नौ लाख सितारों ने लूटा॥

 

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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अंधेरी रात के दिल में दिये जला के जियो!

आज महेंद्र कपूर जी का गाया एक गीत शेयर करूंगा और इस बहाने से भी अपने प्रिय गायक मुकेश जी की तारीफ करूंगा।

हाँ तो यह गीत 1967 में रिलीज़ हुई फिल्म- ‘हमराज़’ का है, गीत लिखा है साहिर लुधियानवी जी ने, जो ज़िंदगी में मुसीबतों का सामना हिम्मत के साथ करने का संदेश देता है। इसका संगीत- रवि जी ने दिया था और महेंद्र कपूर जी को शायद पहली बार इस फिल्म में ही गीत गाने का मौका मिला था और उनके गाये इस फिल्म के सभी गीत बहुत लोकप्रिय हुए थे।

 

मेरा इस फिल्म का एक विशेष प्रकार का संबंध बना था। जी हाँ, इस बात का ज़िक्र मैंने पहले भी अपनी ब्लॉग पोस्ट में किया है।  मैं उस समय बेरोज़गार था, मेरी उम्र तब 17 वर्ष की रही होगी और मैंने एक सप्ताह तक इस फिल्म के सभी ‘शो’ देखे थे!

मैं उस समय शाहदरा-दिल्ली में रहता था और गांधी नगर के एक सिनेमा हॉल में जहाँ यह फिल्म चल रही थी, वहाँ डिस्ट्रीब्यूटर की तरफ से मेरी ड्यूटी लगी थी, प्रत्येक शो शुरू होने पर मैं यह देखता था कि प्रत्येक श्रेणी में कितनी सीटें खाली हैं। अब उसके बाद वे लोग इस जानकारी का जो भी इस्तेमाल करते हों। अक्सर लोग गाना शुरू होने पर हॉल से बाहर चले जाते हैं, मैं गाना शुरू होने पर अंदर जाता था।

हाँ तो महेंद्र कपूर जी ने इस फिल्म के गीतों को बहुत सुंदर तरीके से गाया था और इसके लिए उनको फिल्मफेयर एवार्ड भी मिला था। विशेष बात यह थी कि उस समय के किसी स्थापित गायक ने महेंद्र कपूर को यह अवार्ड मिलने पर बधाई नहीं दी।

मुकेश जी जो उस समारोह में उपस्थित नहीं थे, वे अगले दिन बधाई देने के लिए महेंद्र कपूर जी के घर चले गए। महेंद्र कपूर उनको देखकर चकित रह गए और बोले ‘भापे जी आप क्यों आए, मुझे बुला लिया होता!’  ऐसे थे हमारे प्यारे मुकेश जी।

खैर आज के लिए महेंद्र कपूर जी का गाया यह प्यारा सा गीत प्रस्तुत है-

 

न मुँह छुपा के जियो और न सर झुका के जियो
ग़मों का दौर भी आये तो मुस्कुरा के जियो
न मुँह छुपा के जियो, और न सर झुका के जियो।

 

घटा में छुपके सितारे फ़ना नहीं होते,
अँधेरी रात में दिये जला के जियो।
न मुँह छुपा के जियो और न सर झुका के जियो।

 

ये ज़िंदगी किसी मंज़िल पे रुक नहीं सकती,
हर इक मक़ाम से आगे क़दम बढ़ा के जियो,
न मुँह छुपा के जियो और न सर झुका के जियो।

 

न जाने कौन सा पल मौत की अमानत हो,
हर एक पल की खुशी को गले लगा के जियो।
न मुँह छुपा के जियो और न सर झुका के जियो।

 

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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स्रोत- गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता

आज मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य संकलन- ‘PoemHunter.com’ से लेता हूँ। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘The Source’ का भावानुवाद-

 

 

गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता

 

स्रोत!

 

वह निद्रा जो आकर चुपचाप, नन्हे शिशु की आंखों में बैठ जाती है-

क्या किसी को मालूम है, वह कहाँ से आती है?

हाँ, लोग ऐसा कहते हैं कि इसका अपना बसेरा है वहाँ,

परियों के देश में,  वन की छाया में,

जो जुगनुओं के कारण बहुत हल्के प्रकाश में डूबा है,

मोहकता की दो शर्मीली कलियां लटकी हुई हैं, वहाँ से यह नींद आती है,

शिशु की आंखों को चूमने के लिए।

 

वह मुस्कान जो सोते हुए शिशु की आंखों में टिमटिमाती है-

क्या कोई जानता है कि वह कहाँ पैदा हुई थी?

हाँ, ऐसा बताते हैं लोग बढ़ते हुए चांद से निकली एक नाज़ुक सी किरण ने

पतझड़ के एक मिटते हुए बादल के किनारे को छुआ,

और वहीं यह मुस्कान सबसे पहले पैदा हुई थी,

ओस से धुली एक सुबह के स्वप्न में-

वह मुस्कान जो सोते हुए शिशु के होठों पर खेलती है।

 

वह मधुर, मृदुल ताज़गी जो शिशु के अंगों में खिलती है-

क्या कोई जानता है कि वह इतने लंबे समय से कहाँ छिपी थी?

हाँ, जब उसकी मां, एक नवयुवती थी,

यह उसके हृदय में व्याप्त थी, प्रेम के सुकोमल और शांत रहस्य के रूप में,

वह मधुर, सुकोमल ताज़गी, जो शिशु के

अंगों में खिल रही है। 

-रवींद्रनाथ ठाकुर

 

और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-

The Source!

The sleep that flits on baby’s eyes- does anybody know from where it comes? Yes, there is a rumour that it has its dwelling where,
in the fairy village among shadows of the forest dimly lit with glow-worms,
there hang two shy buds of enchantment. From there it
comes to kiss baby’s eyes.
The smile that flickers on baby’s lips when he sleeps- does anybody know where it was born? Yes, there is a rumour that a young pale beam
of a crescent moon touched the edge of a vanishing autumn cloud,
and there the smile was first born
in the dream of a dew washed morning- the smile that flickers on baby’s lips when he sleeps.
The sweet, soft freshness hat blooms on baby’s limbs-
does anybody know where it was hidden so long?
Yes, when the mother was a young girl,
it lay pervading her heart in tender and silent mystery
of love-the sweet, soft freshness that has
bloomed on baby’s limbs.top

Rabindranath Tagore

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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नींद कहाँ सीने पे कोई, भारी कदमों से चलता है!

आज फिर से अपने परम प्रिय गायक मुकेश जी का गाया एक अलग तरह का गीत शेयर कर रहा हूँ। सुकवि शैलेंद्र जी के लिखे इस गीत को मुकेश जी ने शंकर जयकिशन की प्रसिद्ध जोड़ी के संगीत निर्देशन में फिल्म- बेगुनाह के लिए गाया था और इसे राजेश खन्ना जी पर फिल्माया गया था।

मुकेश जी की मधुर वाणी सीधे दिल में उतर जाती है और दर्द की अभिव्यक्ति में तो वे माहिर थे ही, उनके गाये गीतों में कहीं ऐसा नहीं लगता कि धुन की मजबूरी में कहीं कथ्य की क़ुर्बानी दी जा रही है। हर शब्द को उसकी पूरी अर्थवत्ता और गहराई के साथ निभाते हैं मुकेश जी।

आइए गीत के बोलों को पढ़कर उनके गाये गीत को याद करते हैं-

 

 

ऐ प्यासे दिल बेज़ुबां,
तुझको ले जाऊं कहाँ।
आ..आ..आ।
आग को आग में ढाल के, कब तक जी बहलाएगा,
ऐ प्यासे दिल बेज़ुबां।

 

घटा झुकी और हवा चली तो हमने किसी को याद किया,
चाहत के वीराने को उनके गम से आबाद किया।
ऐ प्यासे दिल बेज़ुबां, मौसम की ये मस्तियां,
आ..आ..आ,
आग को आग में ढाल के, कब तक जी बहलाएगा,
ऐ प्यासे दिल बेज़ुबां।

 

तारे नहीं अंगारे हैं वो, चांद भी जैसे जलता है,
नींद कहाँ, सीने पे कोई भारी कदमों से चलता है,
ऐ प्यासे दिल बेज़ुबां, दर्द है तेरी दास्तां,
आ आ आ ।
आग को आग में ढाल के, कब तक जी बहलाएगा।
ऐ प्यासे दिल बेज़ुबां।

 

कहाँ वो दिन अब कहाँ वो रातें,
तुम रूठे, किस्मत रूठी,
गैर से भेद छुपाने को हम
हंसते फिरे हंसी झूठी।
ऐ प्यासे दिल बेज़ुबां, लुटके रहा तेरा जहाँ,
आ..आ..आ
ऐ प्यासे दिल बेज़ुबां।

 

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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Paying fine in money or with Life!

Again discussing on an # IndiSpire prompt. The issue is whether the fines recently made applicable by the Indian government for traffic violations are justifiable or not!

 

 

The very first thing to be noted is that the purpose of making such rules is not earning revenue for the government. As I understand the decision was taken by representatives of several governments together and the purpose is to make it an effective deterrent.

We want to see that nobody from our country loses life due to accident. Since it has been observed, that maximum deaths take place due to accidents. It is also observed that sometimes parents surrender before their young wards, when they are bent upon moving out with the vehicle, in spite of not being well prepared or trained and not following traffic rules, using safety gadgets.

Sometimes people tell themselves, I am going just that far, safety gadgets are not needed for this much distance I can say. They do not consider that road death is just a step, just a moment of unpreparedness away on road. You may be very conscious, moving very rightly but somebody in speed rush, may hit you suddenly, then it does not matter whether you were going just 500 meters away or even less than that.
We are not supposed to be casual for a moment while driving on the road since it is just one moment when accident happens. If one has to urgently talk to somebody, have to receive a call, he must stop at a safe place for some time and do that. No talking and driving and not at all drinking and driving. Our lives are precious and so are of those whom we may hit suddenly, when we are driving carelessly.

So I am very clear that the fines could also help in making those people responsible, who do not care for their lives or lives of others while driving, but do care for the money they may have to pay for violation of traffic rules.

Further what can be done is that awareness must be spread regarding importance of observing traffic rules and also the information of the fines applicable for violating traffic rules also must be spread, so that there are no people who do not know about traffic rules well and also about the fines applicable for violation of traffic rules.

I sincerely wish that everybody follows traffic rules and this helps us ‘keep death off the road’ and also people do not have to pay heavy fines. If there is some scope for reducing the fines it could be considered but they must act as a good deterrent, since our purpose is not collecting money for the government but to make people behave responsibly on the road so that accidents do not happen.

Yes there is one thing which needs to be taken care of. Our system must be corruption free. Whether the applicable fines are the new or the previous ones, there have been a tendency among people to settle the issues by paying bribes to the traffic policemen and these people are also so willing to oblige them, they are sometimes sitting at some prime locations just to collect the bribe income from people passing through these areas. If there is corruption on the road, the whole purpose would get defeated.

So I feel that the system of fines on road should become an effective deterrent, so that everybody follows the traffic rules and there are no casualties and they also do not have to pay fines, whether heavy or light.

This is my humble submission on the #Indispire prompt – Are hefty traffic violation fines justifiable? #trafficrule .

Thanks for reading.

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वापस अपने हिंदुस्तान!

डेढ़ माह के प्रवास के बाद लंदन से वापस चले और बंगलौर में आकर टपक गए। एयर इंडिया से ही हमने दोनो तरफ की यात्रा की। एक बात कहने का मन हो रहा ‘एयर इंडिया’ के बारे में, अपनी सरकारी एयरलाइन है, इसमें जो परिचारिकाएं हमारी सेवा के लिए उपस्थित होती हैं, उनकी उम्र देखते हुए कई बार खयाल आता है कि इनसे सेवा कराई जाए अथवा इनकी सेवा की जाए!

 

 

खैर रात में साढ़े तीन बजे बंगलौर पहुंचने के बाद आप्रवास अर्थात इमिग्रेशन की प्रक्रिया में सामान्य से कुछ अधिक समय लगा लेकिन फिर उसके बाद मैंने ‘कस्टम’ वालों के विशेष किले से गुज़रने की प्रक्रिया को देखा, जहाँ सभी यात्रियों के हैंड-बैगेज को ‘एक्स-रे’ किया जा रहा था, जैसा कि बोर्डिंग के समय किया जाता है और इस काम में वे अपनी अक्षमता भी भरपूर दिखा रहे थे।

 

 

इससे पहले मैं जब विदेश से वापस आया हूँ, तब या तो दिल्ली आया हूँ अथवा गोवा (मुंबई होते हुए) में इमिग्रेशन संबंधी कार्रवाई हुई है। जहाँ तक ‘कस्टम’ संबंधी कार्रवाई की बात है, उसके लिए बेल्ट से अपना सामान लेने के बाद जब यात्री बाहर की तरफ जाते हैं, मैंने देखा है कि वहाँ कस्टम वाले कुछ या सभी लोगों का सामान एक्स-रे कर लेते थे, लेकिन उसके लिए कोई लंबी लाइन लगते मैंने अब तक नहीं देखी थी।

 

 

 

हाँ तो बंगलौर पर कस्टम की परेशान करने वाली प्रक्रिया से गुजरने के बाद जब मैं बाहर आया तब दूसरी तरफ खड़े उनके एक सरगना, मेरा उसको ‘अधिकारी’ कहने का मन नहीं हो रहा, वह बोला कि आपने अपनी जेब से मोबाइल स्कैन करने के लिए नहीं निकाला। मैंने झुंझला कर कहा कुछ नहीं है भाई, सब तो निकाल दिया। इस पर वो बोला- ‘गुस्सा क्यों दिखा रहे हो, इधर खड़े हो जाओ’, तब मुझे लगा कि मैंने इस इंसान की ‘न्यूसेंस वेल्यू’ का उचित सम्मान नहीं किया। कुछ नहीं होने पर भी यह मुझे 2-4 घंटे रोककर रख सकता है, कुछ वस्तुएं भी सामान से निकालकर रख सकता है! शुक्र है ऐसा कुछ नहीं हुआ।  बाद में बेल्ट से सामान लेकर निकलने के बाद भी कस्टम का क्षेत्र था, लेकिन वहाँ किसी ने सामान स्कैन कराने के लिए नहीं कहा।

 

 

मुझे एक घटना याद आ गई, वह भी लंदन और ‘कस्टम’ से जुड़ी हुई थी। मैं ऑनलाइन अंग्रेजी से हिंदी अनुवाद का काम करता हूँ, नियमित नहीं लेकिन जब मिल जाए तब, क्योंकि मैं ‘रेट’ कम रखकर यह काम नहीं करना चाहता। अनुवाद के लिए एजेंसियां, ज्यादातर विदेशी, अपनी सामग्री की सॉफ्ट-कॉपी ऑनलाइन भेज देती हैं और मैं अनुवाद करके भी ऑनलाइन वापस भेज देता हूँ।

 

 

एक बार एक ब्रिटिश एजेंसी से रेट संबंधी सहमति बनी और उन्होंने कहा कि वे कूरियर द्वारा सामग्री भेज रहे हैं, जिसका अनुवाद करना है। शायद सामग्री का वजन एक-दो किलो रहा होगा। वैसे यह पहली बार था कि कोई एजेंसी अनुवाद के लिए सामग्री की ‘हार्ड कॉपी’ भेज रही थी। उन्होंने मुझे कूरियर के संबंध में ‘ट्रैकिंग नंबर’ भेजा। बाद में पता लगा कि वह ‘कूरियर’ नई दिल्ली के इंदिरा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे पर रुका हुआ था, क्योंकि किसी वीर ‘कस्टम अधिकारी’ ने उस पर, पाउंड्स में इतना कस्टम जुर्मानालगा दिया था, जितने में कोई व्यक्ति हवाई जहाज से लंदन जाकर, वह सामग्री लेते हुए वापस आ सकता है। खैर मैंने फिर उस काम की उम्मीद छोड़ दी और शायद उस एजेंसी ने भी।

 

 

बस ऐसे ही खयाल आया कि हमारे देश में कुछ ऐसी एजेंसियां हैं जिनमें जनता को परेशान करने वाले लोग हैं, भ्रष्टाचार जहाँ का शिष्टाचार है, और लोगों को परेशान करने में ही जिनको अपनी सफलता नज़र आती है। जिन गतिविधियों को रोकने के लिए ये बनी हैं, उनके सरगनाओं से अक्सर इनकी मिलीभगत  भी होती है।

खैर लंदन महानगर और वहाँ के अति सुंदर हीथ्रो एयरपोर्ट की स्मृतियों के साथ हम वापस अपने लोगों के बीच, अपने हिंदुस्तान में आ गए, कहते हैं ना ‘पुनः कॉमन इंडियन भव’।

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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सोच समझ वालों को थोड़ी नादानी दे मौला!

आज फिर से पुराने ब्लॉग का दिन है, लीजिए प्रस्तुत है ये पुरानी ब्लॉग पोस्ट-

इंटरनेट पर ज्ञान देने वाले तो भरे पड़े हैं, मैं तो अज्ञान का ही पक्षधर हूँ। जो व्यक्ति आज भी दिमाग के स्थान पर दिल पर अधिकतम भरोसा करते हैं, उनमें कवि-शायर काफी बड़ी संख्या में आते हैं। वहाँ भी सभी ऐसे हों, ऐसा नहीं है।

आज मन हो रहा है निदा फाज़ली साहब की शायरी के बारे में कुछ बात करूं। इस इंसान ने कितना अच्छा लिखा है, देख-सुनकर आश्चर्य होता है, पूरी तरह ज़मीन से जुड़े हुए व्यक्ति थे निदा फाज़ली साहब। अपने दोहों में ही उन्होंने आत्मानुभूति का वो अमृत उंडेला है कि सुनकर मन तृप्त हो जाता है।शुरू में तो उसी गज़ल के अमर शेर प्रस्तुत कर रहा हूँ, जिससे शीर्षक लिया है-

 

गरज-बरस प्यासी धरती पर फिर पानी दे मौला,
चिड़ियों को दाने, बच्चों को, गुड़धानी दे मौला।
फिर मूरत से बाहर आकर, चारों ओर बिखर जा,
फिर मंदिर को कोई मीरा दीवानी दे मौला।
दो और दो का जोड़ हमेशा चार कहाँ होता है,
सोच समझ वालों को थोड़ी नादानी दे मौला।

और कितनी सादगी से कितनी बड़ी बात कहते हैं, कुछ गज़लों से कुछ शेर यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ-

उसको रुखसत तो किया था, मुझे मालूम न था,
सारा घर ले गया, घर छोड़ के जाने वाला।
एक मुसाफिर के सफर जैसी है सबकी दुनिया,
कोई जल्दी तो कोई देर में जाने वाला।
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अपनी मर्ज़ी से कहाँ अपने सफर के हम हैं,
रुख हवाओं का जिधर का है, उधर के हम हैं।
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घर से मस्ज़िद है बहुत दूर चलो यूं कर लें,
किसी रोते हुए बच्चे को हंसाया जाए।
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बच्चों के छोटे हाथों को, चांद सितारे छूने दो,
चार किताबें पढ़कर ये भी, हम जैसे हो जाएंगे।
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दुनिया जिसे कहते हैं, जादू का खिलौना है,
मिल जाए तो मिट्टी है, खो जाए तो सोना है।
बरसात का बादल तो, दीवाना है क्या जाने,
किस राह से बचना है, किस छत को भिगोना है।
***********
वृंदाबन के कृष्ण कन्हैया अल्ला हू,
बंसी, राधा, गीता, गैया अल्ला हू।
एक ही दरिया नीला, पीला, लाल, हरा,
अपनी अपनी सबकी नैया अल्ला हू।
मौलवियों का सज़दा, पंडित की पूजा,
मज़दूरों की हैया हैया, अल्ला हू।
***********
दुनिया न जीत पाओ तो हारो न खुद को तुम,
थोड़ी बहुत तो ज़ेहन में नाराज़गी रहे।
***********
हर आदमी में होते हैं दस-बीस आदमी,
जिसको भी देखना हो, कई बार देखना।

 

मुझको निदा जी के जो शेर बहुत अच्छे लगते हैं, उन सभी को लिखना चाहूं तो दस-बीस ब्लॉग तो उसमें निकल जाएंगे, मैंने कुछ गज़लों से एक- या दो शेर लिखे हैं, लेकिन उनमें से कोई शेर भी छोडने योग्य नहीं है।

अंत में उनके कुछ दोहे, जिनमें बड़ी सादगी से गहरा दर्शन प्रस्तुत किया गया है-

मैं रोया परदेस में, भीगा मां का प्यार,
दुख ने दुख से बात की, बिन चिट्ठी, बिन तार।
छोटा करके देखिए जीवन का विस्तार,
आंखों भर आकाश है, बांहों भर संसार।
सबकी पूजा एक सी, अलग अलग हर रीत,
मस्ज़िद जाए मौलवी, कोयल गाए गीत।
सपना झरना नींद का, जागी आंखें प्यास,
पाना, खोना, खोजना, सांसों का इतिहास।

मैंने कुछ शेर यहाँ दिए, क्योंकि यहाँ लिखने की कुछ सीमाएं हैं। इन कुछ उद्धरणों के माध्यम से मैं उस महान शायर को याद करता हूँ, जिसने हिंदुस्तानी शायरी में अपना अनमोल योगदान किया है।

नमस्कार।

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