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वापस अपने हिंदुस्तान!

डेढ़ माह के प्रवास के बाद लंदन से वापस चले और बंगलौर में आकर टपक गए। एयर इंडिया से ही हमने दोनो तरफ की यात्रा की। एक बात कहने का मन हो रहा ‘एयर इंडिया’ के बारे में, अपनी सरकारी एयरलाइन है, इसमें जो परिचारिकाएं हमारी सेवा के लिए उपस्थित होती हैं, उनकी उम्र देखते हुए कई बार खयाल आता है कि इनसे सेवा कराई जाए अथवा इनकी सेवा की जाए!

 

 

खैर रात में साढ़े तीन बजे बंगलौर पहुंचने के बाद आप्रवास अर्थात इमिग्रेशन की प्रक्रिया में सामान्य से कुछ अधिक समय लगा लेकिन फिर उसके बाद मैंने ‘कस्टम’ वालों के विशेष किले से गुज़रने की प्रक्रिया को देखा, जहाँ सभी यात्रियों के हैंड-बैगेज को ‘एक्स-रे’ किया जा रहा था, जैसा कि बोर्डिंग के समय किया जाता है और इस काम में वे अपनी अक्षमता भी भरपूर दिखा रहे थे।

 

 

इससे पहले मैं जब विदेश से वापस आया हूँ, तब या तो दिल्ली आया हूँ अथवा गोवा (मुंबई होते हुए) में इमिग्रेशन संबंधी कार्रवाई हुई है। जहाँ तक ‘कस्टम’ संबंधी कार्रवाई की बात है, उसके लिए बेल्ट से अपना सामान लेने के बाद जब यात्री बाहर की तरफ जाते हैं, मैंने देखा है कि वहाँ कस्टम वाले कुछ या सभी लोगों का सामान एक्स-रे कर लेते थे, लेकिन उसके लिए कोई लंबी लाइन लगते मैंने अब तक नहीं देखी थी।

 

 

 

हाँ तो बंगलौर पर कस्टम की परेशान करने वाली प्रक्रिया से गुजरने के बाद जब मैं बाहर आया तब दूसरी तरफ खड़े उनके एक सरगना, मेरा उसको ‘अधिकारी’ कहने का मन नहीं हो रहा, वह बोला कि आपने अपनी जेब से मोबाइल स्कैन करने के लिए नहीं निकाला। मैंने झुंझला कर कहा कुछ नहीं है भाई, सब तो निकाल दिया। इस पर वो बोला- ‘गुस्सा क्यों दिखा रहे हो, इधर खड़े हो जाओ’, तब मुझे लगा कि मैंने इस इंसान की ‘न्यूसेंस वेल्यू’ का उचित सम्मान नहीं किया। कुछ नहीं होने पर भी यह मुझे 2-4 घंटे रोककर रख सकता है, कुछ वस्तुएं भी सामान से निकालकर रख सकता है! शुक्र है ऐसा कुछ नहीं हुआ।  बाद में बेल्ट से सामान लेकर निकलने के बाद भी कस्टम का क्षेत्र था, लेकिन वहाँ किसी ने सामान स्कैन कराने के लिए नहीं कहा।

 

 

मुझे एक घटना याद आ गई, वह भी लंदन और ‘कस्टम’ से जुड़ी हुई थी। मैं ऑनलाइन अंग्रेजी से हिंदी अनुवाद का काम करता हूँ, नियमित नहीं लेकिन जब मिल जाए तब, क्योंकि मैं ‘रेट’ कम रखकर यह काम नहीं करना चाहता। अनुवाद के लिए एजेंसियां, ज्यादातर विदेशी, अपनी सामग्री की सॉफ्ट-कॉपी ऑनलाइन भेज देती हैं और मैं अनुवाद करके भी ऑनलाइन वापस भेज देता हूँ।

 

 

एक बार एक ब्रिटिश एजेंसी से रेट संबंधी सहमति बनी और उन्होंने कहा कि वे कूरियर द्वारा सामग्री भेज रहे हैं, जिसका अनुवाद करना है। शायद सामग्री का वजन एक-दो किलो रहा होगा। वैसे यह पहली बार था कि कोई एजेंसी अनुवाद के लिए सामग्री की ‘हार्ड कॉपी’ भेज रही थी। उन्होंने मुझे कूरियर के संबंध में ‘ट्रैकिंग नंबर’ भेजा। बाद में पता लगा कि वह ‘कूरियर’ नई दिल्ली के इंदिरा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे पर रुका हुआ था, क्योंकि किसी वीर ‘कस्टम अधिकारी’ ने उस पर, पाउंड्स में इतना कस्टम जुर्मानालगा दिया था, जितने में कोई व्यक्ति हवाई जहाज से लंदन जाकर, वह सामग्री लेते हुए वापस आ सकता है। खैर मैंने फिर उस काम की उम्मीद छोड़ दी और शायद उस एजेंसी ने भी।

 

 

बस ऐसे ही खयाल आया कि हमारे देश में कुछ ऐसी एजेंसियां हैं जिनमें जनता को परेशान करने वाले लोग हैं, भ्रष्टाचार जहाँ का शिष्टाचार है, और लोगों को परेशान करने में ही जिनको अपनी सफलता नज़र आती है। जिन गतिविधियों को रोकने के लिए ये बनी हैं, उनके सरगनाओं से अक्सर इनकी मिलीभगत  भी होती है।

खैर लंदन महानगर और वहाँ के अति सुंदर हीथ्रो एयरपोर्ट की स्मृतियों के साथ हम वापस अपने लोगों के बीच, अपने हिंदुस्तान में आ गए, कहते हैं ना ‘पुनः कॉमन इंडियन भव’।

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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