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आजकल वो इस तरफ देखता है कम!

आज मुकेश जी का गाया एक बहुत सुंदर गीत याद आ रहा है, राज कपूर साहब द्वारा अभिनीत इस फिल्म- ‘फिर सुबह होगी’ का यह गीत साहिर लुधियानवी जी ने लिखा है और इसे मुकेश जी ने खय्याम साहब के संगीत में गाया है।

असल में यह गीत आज के हालात पर बहुत सुंदर व्यंग्य है, गीत में कुछ ऐसा कहा गया है कि भगवान आजकल इस दुनिया की तरफ देख ही नहीं रहा है और फिर यह भी कि इतना फैल चुकी इस दुनिया को सुधारने के लिए भगवान के पास पर्याप्त मानव-बल नहीं है, इसलिए लोग स्वयं ही अपने तरीके से अपनी समस्याओं को हल कर रहे हैं।

 

लीजिए इस गीत का आनंद लेते हैं-

 

आसमां पे है खुदा और जमीं पे हम,
आज कल वो इस तरफ देखता है कम,
आसमां पे है खुदा और जमीं पे हम।

 

आजकल किसी को वो टोकता नहीं,
चाहे कुछ भी कीजिये रोकता नहीं,
हो रही है लूटमार फट रहें हैं बम।
आसमां पे है खुदा और जमीं पे हम,
आज कल इस तरफ देखता है कम।

 

किसको भेजे वो यहाँ खाक छानने,
इस तमाम भीड़ का हाल जानने,
आदमी हैं अनगिनत देवता हैं कम।
आसमां पे है खुदा और जमीं पे हम,
आज कल इस तरफ देखता है कम।

 

जो भी है वो ठीक है फिक़्र क्यों करे,
हम ही सब जहान की फ़िक्र क्यों करें,
जब तुम्हे ही गम नहीं तो क्यों हमें हो गम।
आसमां पे है खुदा और जमीं पे हम,
आज कल इस तरफ देखता है कम।

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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पुरातन और नूतन – गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता

आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य संकलन- ‘PoemHunter.com’ से लेता हूँ। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘Old And New’ का भावानुवाद-

 

गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता

 

 

 पुरातन और नूतन

 

तुमने मुझे परिचित कराया उन मित्रों से, जिनको मैं जानता नहीं था।
तुमने मुझे ऐसे घरों जा बिठाया, जो मेरे नहीं थे।
तुम दूर के लोगों को पास ले आए और अजनबी को बंधु बना दिया।

 

मेरे दिल में बहुत बेचैनी होती है, जब मुझे अपने बसेरे से दूर जाना होता है,                                                                                                      जिसकी मुझे आदत है;
मैं भूल जाता हूँ कि नये में भी पुराना वास करता है,
और वहाँ तुम भी रहते हो!

 

जन्म और मृत्यु के फेरे में, इस दुनिया में या किसी और में,
तुम मुझे जहाँ भी ले जाते हो, वहाँ तुम वही एक होते हो,
एकमात्र साथी मेरी अनंत जीवन-यात्रा के,
जो हमेशा मेरे हृदय को जोड़ते हो,                                                                                                                                                              अपरिचितों के साथ आनंद के बंधनों में,

 

जब कोई तुमको जान जाता है, तब कोई पराया नहीं रहता, कोई दरवाजा बंद नहीं रहता,
आह, मेरी प्रार्थना स्वीकार करो कि मैं,                                                                                                                                                              अनेकों के साथ क्रीड़ा में रत रहते हुए, कभी भी उस एक के स्पर्श मात्र से
मिलने वाले परमानंद को न भूल जाऊं।

 

 

-रवींद्रनाथ ठाकुर

और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-

Old And New

Thou hast made me known to friends whom I knew not.
Thou hast given me seats in homes not my own.
Thou hast brought the distant near and made a brother of the stranger.

 

I am uneasy at heart when I have to leave my accustomed shelter;
I forget that there abides the old in the new,
and that there also thou abidest.

 

Through birth and death, in this world or in others,
wherever thou leadest me it is thou, the same,
the one companion of my endless life
who ever linkest my heart with bonds of joy to the unfamiliar.

 

When one knows thee, then alien there is none, then no door is shut.
Oh, grant me my prayer that I may never lose
the bliss of the touch of the one
in the play of many.

 

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-Rabindranath Tagore

 

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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What Is Success As A Blogger?

I remember a movie song from Hindi film- ‘Jis Desh Mein Ganga Behti Hai’ by Raj Kapur Ji. What all happens in that film is not, what I am discussing, just a song from that film comes to my mind, the hero wanders in streets, composes his songs and sings them for the people-

 

 

 

Mera naam Raju, gharaana anaam,
Behti hai Ganga jahaan mera dhaam,

Kaam naye nit geet banana,
Geet banaa ke jahaan ko sunaana,
Koi na mile to akele me, gaana …

 

The hero, a simple village person tells that he likes to write new songs and sing them for the people, he further says that if nobody listens, he sings for his own satisfaction. Further he says that this kingdom, the king and his family, nothing would remain forever but the songs of love would always remain.

Yes there are so many activities which people do for their satisfaction, to earn appreciation from others, to give some message to people and to display their talent etc.

To begin with I remember people, who sang ‘Alha Udal’ patriotic songs and some others sang Raginis etc. in village chaupal, or  who did some acts there to make people laugh, are also performers, artists. Further in our childhood we found many street performers, snake charmers, magicians, who made sound by their ‘Damru’ to make people gather in the street and then to please people and make them pay to the performer, they made some very nice performances. Rope walking also is a very old street performance.

As we move further there were circus shows, theatre shows, Raas Lila, Ram Lila etc., which while connecting us with our cultural heritage also provide a great chance for the artists to show their talent.

I would not go in much details here but writing poems, short stories, articles in papers etc. are also some ways of expressing ourselves and showcasing our talent.

There are some forms of art which needed some set up, infrastructure etc. like stage, a group of performers, directors etc. etc. Films are a great combination of all such departments and a great package in itself.

Anyway everybody does not have access to such facilities and platforms etc. Further publishing books etc. also was not an easy job. For those who write, in whatever field, after the spread of internet facilities, it is now easy to reach people with their creative pieces and to make their message reach and their talent be displayed before an unlimited audience worldwide. Blogging is such a great platform available to everybody today and yes we can expect anything from this be it name, fame or money, depends on our talent and how far we know the techniques of exploiting the possibilities in this limitless field.

I just want to wish that all bloggers get whatever best they can get from this activity by putting before people their best creative talent and efforts made in the field of research and in this way enrich the vast arena of internet publishing etc.

Success would have different meaning for different people depending on their talent, what they produce and what they look for.

This is my humble submission on the #IndiSpire prompt – What success meant for you as a blogger ? And why you want to be a successful blogger is you are doing this for fame and money ? Say Me Your Opinion #IAMABLOGGER

Thanks for reading.

 

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नग़मों की खिलती कलियां चुनने वाले!

आज फिर से एक पुरानी ब्लॉग पोस्ट शेयर कर रहा हूँ-

अज्ञेय जी की एक कविता है-‘नए कवि से’, काफी लंबी कविता है, उसका कुछ हिस्सा यहाँ उद्धृत कर रहा हूँ-

 

आ, तू आ, हाँ, आ,
मेरे पैरों की छाप-छाप पर रखता पैर,
मिटाता उसे, मुझे मुँह भर-भर गाली देता-
आ, तू आ।

 

तेरा कहना है ठीक: जिधर मैं चला
नहीं वह पथ था:
मेरा आग्रह भी नहीं रहा मैं चलूँ उसी पर
सदा जिसे पथ कहा गया, जो
इतने-इतने पैरों द्वारा रौंदा जाता रहा कि उस पर
कोई छाप नहीं पहचानी जा सकती थी।

 

मेरी खोज नहीं थी उस मिट्टी की
जिस को जब चाहूँ मैं रौंदूँ: मेरी आँखें
उलझी थीं उस तेजोमय प्रभा-पुंज से
जिस से झरता कण-कण उस मिट्टी को
कर देता था कभी स्वर्ण तो कभी शस्य,
कभी जीव तो कभी जीव्य,
अनुक्षण नव-नव अंकुर-स्फोटित, नव-रूपायित।

 

मैं कभी न बन सका करुण, सदा
करुणा के उस अजस्र सोते की ओर दौड़ता रहा जहाँ से
सब कुछ होता जाता था प्रतिपल——

कविता का इतना ही भाग यहाँ दूंगा अन्यथा बहुत ज्यादा हो जाएगा। अज्ञेय जी कवि थे, महान रचनाकार थे, सो वे अपने बाद के रचनाकारों को संबोधित कर रहे थे। कह रहे थे कि सृजन के इस पथ पर, नई राहों के अंवेषी के रूप में, उनसे जो बन पड़ा उन्होंने किया, अब नए रचनाकार की बारी है कि वह अपने झंडे गाड़े, अपनी रचनाधर्मिता का लोहा मनवाए।

साहित्य का क्षेत्र हो, पत्रकारिता का या कोई भी क्रिएटिव फील्ड हो, हर क्षेत्र में कितने महारथी आए, उन्होंने अपने कृतित्व से लोगों को चमत्कृत किया और फिर पताका नए लोगों के हाथों में सौंपकर आगे बढ़ गए। आज खयाल आया कि रचनाधर्मिता की इस अनंत यात्रा को सलाम करूं, क्योंकि जो ऊंचाई एक तारीख में एक मिसाल होती है वही कभी बहुत छोटी लगने लगती है, ऐसे में कुछ लोग हैं जो हमेशा नए लोगों के लिए चुनौती और प्रेरणा बने रहते हैं।

हालांकि एक क्षेत्र ऐसा भी है- राजनीति का, जहाँ बहुत से लोग पूरी तरह अपनी चमक खो देते हैं-

जो आज रौनक-ए-महफिल दिखाई देता है,
नए लिबास में क़ातिल दिखाई देता है।

खैर आज की चर्चा का विषय यह नहीं है। आज तो इस चर्चा का समापन साहिर लुधियानवी जी की इन पंक्तियों से करना सर्वथा उपयुक्त होगा-

कल और आएंगे नग़मों की खिलती कलियां चुनने वाले,
मुझसे बेहतर कहने वाले, तुमसे बेहतर सुनने वाले,
कल कोई मुझको याद करे, क्यों कोई मुझको याद करे,
मसरूफ ज़माना मेरे लिए, क्यों वक्त अपना बर्बाद करे।
मैं पल दो पल का शायर हूँ——

कुल मिलाकर शायरों, कलाकारों की यह परंपरा, जिसमें भले ही कोई किसी समय विशेष कालखंड में ही सृजनरत रहा हो, लेकिन यह निरंतर चलने वाली परंपरा हमारी महान धरोहर है।

इस परंपरा को प्रणाम करते हुए आज यहीं समापन करते हैं।
नमस्कार।

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क्या दीप जलाएं हम, तक़दीर ही काली है!

दीपावली के अवसर पर, एक बार फिर से मुझे अपने प्रिय गायक मुकेश जी का गाया एक गीत याद आ रहा है।

दीपावली भी हमारी खुशियों को जाहिर करने का एक अवसर है, हम जितने अधिक खुश होंगे, उतने ही अधिक उत्साह के साथ हम इन त्यौहारों के अवसर पर उल्लास के साथ भाग लेंगे।

यह गीत फिल्म नज़राना में दो बार आया है, एक बार खुशी के मूड में और एक बार उदासी के मूड में, राजिंदर कृष्ण जी ने गीत को लिखा है और संगीत दिया है- रवि जी ने।

खुशी के मूड वाला गीत, जिसे लता जी ने गाया है उसका मुखड़ा इस प्रकार है-

 

मेले हैं चरागों के, रंगीन दिवाली है,
खिलता हुआ गुलशन है, हंसता हुआ माली है।

 

और इसके बाद मैं उदासी के महौल में मुकेश जी द्वारा गाये गए इस गीत को यहाँ शेयर कर रहा हूँ-

 

एक वो भी दिवाली थी, एक ये भी दिवाली है
उजड़ा हुआ गुलशन है, रोता हुआ माली है|

 

बाहर तो उजाला है मगर दिल में अँधेरा,
समझो ना इसे रात, ये है ग़म का सवेरा|
क्या दीप जलायें हम, तक़दीर ही काली है,
उजड़ा हुआ गुलशन है, रोता हुआ माली है।

 

ऐसे न कभी दीप किसी दिल का बुझा हो,
मैं तो वो मुसाफ़िर हूँ जो रस्ते में लुटा हो।
ऐ मौत तू ही आ जा, दिल तेरा सवाली है
उजड़ा हुआ गुलशन है, रोता हुआ माली है।

 

एक वो भी दिवाली थी, एक ये भी दिवाली है,
उजड़ा हुआ गुलशन है, रोता हुआ माली है।

 

यह तो गीत की बात थी, जीवन में दुख-सुख तो लगे ही रहते हैं।

आप सभी को दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं।

नमस्कार।

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घर – गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की कविता

आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य संकलन- ‘PoemHunter.com’ से लेता हूँ। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘The Home’ का भावानुवाद-

गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता

 

घर

 

मैं खेत के बीचों बीच मार्ग पर तेजी से कदम बढ़ा रहा था, जबकि सूर्यास्त
अपने अंतिम स्वर्ण भंडार को किसी कंजूस की तरह छिपा रहा था।
दिन का प्रकाश, अंधकार की गहराई में गहरा, और गहरा डूबता गया, और
विधवा बना मैदान, जिसकी फसल काटी जा चुकी थी, शांत पड़ा था।

 

अचानक एक लड़के की तेज आवाज आकाश में गूंज उठी। उसने
उस गहन अदृश्य क्षेत्र को लांघ लिया, अपने गीत की स्वर-लहरी को शाम के झुटपुटे में
फैला दिया।

 

गांव में उसका घर, बंजर मैदान के पार, गन्ने के खेतों के पीछे, दूसरे सिरे पर था,
केलों और दुबले से सुपारी वृक्षों, नारियल तथा कटहल के हरे वृक्षों की छाया में।

 

मैं अपने एकांत पथ में, तारों के प्रकाश में एक क्षण के लिए रुका,
और मैंने देखा कि मेरे सामने अंधियारे में डूबी पृथ्वी पसरी थी, जिसकी बांहों में
लिपटे थे असंख्य घर, जो सजे हुए थे पालनों और बिस्तरों से, माताओं के हृदय
और संध्या-बाती से, जिनमें मौजूद हैं युवा प्राणी, जो प्रसन्न हैं, ऐसी प्रसन्नता से, जिसको नहीं मालूम कि दुनिया के लिए
उसकी कीमत क्या है।

 

-रवींद्रनाथ ठाकुर

 

और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-

The Home

I paced alone on the road across the field while the sunset was
hiding its last gold like a miser.
The daylight sank deeper and deeper into the darkness, and the
widowed land, whose harvest had been reaped, lay silent.
Suddenly a boy’s shrill voice rose into the sky. He traversed
the dark unseen, leaving the track of his song across the hush of
the evening.
His village home lay there at the end of the waste land,
beyond the sugar-cane field, hidden among the shadows of the banana
and the slender areca palm, the coconut and the dark green jack-
fruit trees.
I stopped for a moment in my lonely way under the starlight,
and saw spread before me the darkened earth surrounding with her
arms countless homes furnished with cradles and beds, mother’s
hearts and evening lamps, and young lives glad with a gladness that
knows nothing of its value for the world.
Rabindranath Tagore

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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अपना घर तो गिरा, दरोगा के घर नए उठे!

 

आज डॉ. शांति सुमन जी का लिखा एक नवगीत याद आ रहा है, जो बहुत साल पहले झारखंड में आयोजित एक कवि सम्मेलन में पहली बार उनके मुंह से सुना था। उस समय मैं हिंदुस्तान कॉपर लिमिटेड की मुसाबनी माइंस में कार्यरत था, जो काफी पहले बंद हो चुकी हैं, यह शायद 1984-85 की बात है।

अक्सर यह गीत अचानक याद आ जाता है, जिसमें गांव के परिवेश में, बड़ी सरल भाषा में आम इंसानों की व्यथा का प्रभावी वर्णन किया गया है। वास्तव में बहुत अच्छा नवगीत है, लीजिए इसका आनंद लीजिए-

 

 

थाली उतनी की
उतनी ही
छोटी हो गई रोटी।
कहती बूढ़ी दादी
अपने गाँव की,
सबसे बूढ़ी दादी
अपने गाँव की ।

 

फेन फूल से
उठे मगर
राखों के ढेर हुए,
धँसे हुए
आँखों के किस्से
हम मुठभेड़ हुए,
भूख हुई
अजगर -सी
सूखी तन
की बोटी-बोटी
कहती बड़की काकी
अपने गांव की,
सबसे सुन्दर काकी
अपने गांव की ।

 

अपना तो घर
गिरा, दरोगा के
घर नए उठे,
हाथ और मुंह के
रिश्ते में
ऐसे रहे जुटे,
सिर से पांवों
की दूरी अब
दिन-दिन
होती छोटी ।
कहती नवकी भौजी
अपने गाँव की,
सबसे गोरी भौजी
अपने गाँव की ।

 

करना होगा
खत्म हमें यह,
सूद उगाही लहना,
लापरवाह
व्यवस्था के
खूँटे में बँधकर रहना
नाम भूख का
रोटी पर, 
जीतेगी अपनी गोटी ।
कहती रानी बहना
अपने गांव की,
सबसे प्यारी बहना
अपने गांव की ।

 

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार।

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Being Contributing Members of Society!

It is our life and we choose a role for ourselves and that determines what success means to us and it may be quite different from others. There are so many things which frame our personality, it starts with the ‘Samskaaras’ the values which we imbibe from our family and the atmosphere of initial neighborhood, relatives and schooling. Still there are so many other things which are instrumental in forming the unique personality of any person.

 

 

If we consider at the level of some failed country like Pakistan, there we find that young boys speak a language full of hatred towards India and Indians. Whether they can harm India or not is not an issue, my worry is how much they are harming themselves. Would such a young boy would become a good and successful human being, I have every doubt on that.

Today there are such organizations working at international level which train and send terrorists to various parts of the world to kill people for no reason. I feel worried about the future of the mankind after seeing these trends.

What is our role in this world, other than studying and being able to earn sufficient money to raise and maintain our families. We live in a human society, we are part of some country governed in a democratic or may be some other type of administration. Wherever we are, we need to play a positive role, make our humble contribution as a citizen, as a vigilant member of society.

So the basic requirement for every individual is to become a good human being and a contributing member of society. If people try to achieve their selfish goals at the cost of others, then there would be complete anarchy and people would keep fighting and everybody would be a loser. So to remain a vibrant and futuristic society and state, some basic values are to be adopted by everybody, every citizen or say every member of society.

All the scriptures, our religious books, reformers and even the text books our children read, all teach some basic values for becoming a good human being and a contributing member of society.

We need to develop a positive personality, adopt positive attitude to play a ‘win all’ game. So what could be the basic ingredients of a positive personality, positive attitude. We can mention say- we should always remain happy, for that we need to keep our hopes alive, which means one must be optimistic, one also must be kind and helpful to others, that also is a virtue which makes us help others and earn respect from other members of society. If all people help those, who need help, our society would grow very fast and all miseries would come to an end.

Helping or giving others, what they need, it could be material thing, it could also be attention, in whatever way we can contribute for other members of our society. Further it is not just that we do something for others, help them as a duty, basically we need to respect others, mutual respect is also a very strong binding force and makes any society a winning and progressive society.

I mentioned some kind of things which need to become a part of our attitude and it would project our personality as an individual. One could think which one of these values one should make a part of his personality. I would like to mention that these values need not be chosen to become a part of our attitude, but it is a complete package. If an individual carries high values, is optimistic, respects the institutions of society and state, that person would automatically make all these virtues  parts of his attitude and would make progress in life while making a positive contribution for the society also. Yes we also need to review our actions at regular intervals to see whether we have been positively contributing members of the society and not tried to achieve success at the cost of others.

These are my humble views on the #IndiSpire prompt- “Attitude is a choice. Happiness is a choice. Optimism is a choice. Kindness is a choice. Giving is a choice. Respect is a choice. Whatever choice you make makes you. Choose wisely.” Your reflection on those words of Roy T Bennett #WiseChoices

Thanks for reading.

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खगोलशास्त्री- रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता

आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि  गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य संकलन- ‘PoemHunter.com’ से लेता हूँ। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘Astronomer’  का भावानुवाद-

 

गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता

 

 खगोलशास्त्री

 

मैंने केवल इतना कहा, “शाम के समय जब  पूर्ण चंद्रमा फंस जाता है
दाड़म वृक्ष की शाखाओं के बीच, तब क्या कोई जाकर  
उसको पकड़ नहीं सकता?

 

परंतु दादा केवल हंसे और बोले,” जितने बच्चे मैंने देखे हैं, तुम उन सबसे
ज्यादा मूर्ख हो। चांद हमसे बहुत दूर है, कोई कैसे
उसको पकड़ सकता है?”

 

मैंने कहा, “दादा, आप कैसी मूर्खता की बात करते हो!  जब मां खिड़की से बाहर झांकती हैं  
और हमें नीचे खेलते देखकर मुस्कुराती हैं, तब क्या आप  कहोगे कि वह
बहुत दूर हैं?”

 

दादा ने फिर से कहा, “तुम एक मूर्ख बालक हो, तुमको ऐसा जाल कहाँ मिलेगा
जो इतना बड़ा हो कि उसमें चांद को पकड़ा जा सके?”
मैंने कहा, “बिल्कुल, आप उसे अपने हाथों से पकड़ सकते हो।’’

 

परंतु दादा हंसे और बोले, “जितने भी बच्चे मैंने देखे हैं, तुम उन सबसे मूर्ख हो,  
अगर यह पास आ जाए तब तुम देख पाओगे कि चांद कितना बड़ा है।”

 

मैंने कहा, “दादा, आपके स्कूल में वे लोग क्या मूर्खतापूर्ण बातें सिखाते हैं! जब मां
हम लोगों को चूमने के लिए नीचे झुकती है, तब क्या उनका चेहरा बड़ा
दिखता है?”

 

परंतु तब भी दादा कहते हैं, “तुम एक मूर्ख बालक हो।”

 

-रवींद्रनाथ ठाकुर

और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ- 

 

Astronomer!

 

I only said, “When in the evening the round full moon gets
entangled among the beaches of that Dadam tree, couldn’t somebody
catch it?”
But dada laughed at me and said, “Baby, you are the silliest
child I have ever known. The moon is ever so far from us, how could
anybody catch it?”
I said, “Dada, how foolish you are! When mother looks out of
her window and smiles down at us playing, would you call her far
away?”
Still dada said, “You are a stupid child! But, baby where
could you find a net big enough to catch the moon with?”
I said, “Surely you could catch it with your hands.”
But dada laughed and said, “You are the silliest child I have
known. If it came nearer, you would see how big the moon is.”
I said, “Dada, what nonsense they teach at your school! When
mother bends her face down to kiss us, does her face look very
big?”
But still dada says, “You are a stupid child.”.

                                              Rabindranath Tagore

 

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार।

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रोशनी को शहर से निकाला गया!

कभी हुआ कि घर में कामवाली अपने साथ अपने 5-6 साल के बेटे को ले आई, वह बच्चा घर में इधर-उधर घूमता है, कमर से हाथ पीछे करके निरीक्षण करता है, ये अच्छी बात है कि उसको यह एहसास नहीं है कि यहाँ उसकी मां की स्थिति क्या है! मुझे कभी लगता है कि मेरा बचपन भी ऐसा ही था, हालांकि मेरी मां को किसी के घर में काम नहीं करना पड़ा, लेकिन हम घर में करने के लिए कुछ काम लेकर आते थे, जैसे माला में मोती पिरोना आदि। मुझे अभी तक याद है कि अपने एक अमीर रिश्तेदार के घर में डाइनिंग टेबल और उसके ऊपर एक टोकरी में रखे ढेर सारे फल देखकर मुझे बहुत अचंभा हुआ था!

खैर सपनों की उड़ान तो वहाँ से ही शुरू होती है ना, जहाँ हम शुरू में होते हैं। मैंने अपने सेवाकाल के बारे में संक्षेप में लिखा, जहाँ समय पर पढ़ाई पूरी न कर पाने के कारण कोई मंज़िल सामने नज़र नहीं आती थी, वहाँ रु. 100 प्रतिमाह से लेकर उससे लगभग 100 गुना तक जाना, अपने आप में संतोषजनक तो कहा ही जा सकता है।

लेकिन मेरा स्वप्न कभी भी, या कहूं जबसे सोचना-समझना, लिखना शुरू किया, तब से यह कभी नहीं था कि मैं सेवा में किस स्तर तक अथवा कितने वेतन तक पहुंचूंगा! संघर्ष के दिनों के मेरे एक वरिष्ठ साथी थे श्री कुबेर दत्त, पता नहीं अब वे जीवित हैं या नहीं, मेरे पास उनके कई पत्र, पोस्ट कार्ड सुरक्षित रखे रहे, बहुत समय तक, वो अक्सर यही लिखते थे कि मैं तुमसे बहुत बात करना चाहता हूँ। वे दूरदर्शन में बहुत सफल प्रोड्यूसर और डाइरेक्टर रहे, बहुत से अच्छे प्रोग्राम उन्होंने तैयार किए लेकिन ये भी लागता है कि वे वहाँ जाकर कला की दृष्टि से समाप्त भी होते गए। उनके दो गीतों से पंक्तियां उद्धृत करने का मन हो रहा है, एक बहुत सुंदर गीत उनका बेरोज़गारी के दिनों का, उसकी पंक्तियां हैं-

नक्काशी करते हैं नंगे जज़्बातों पर, लिखते हैं गीत हम नकली बारातों पर,
बची-खुची खुशफहमी, बाज़ारू लहज़े में, करते हैं विज्ञापित कदम-दर-कदम।

एक गीत जो उन्होंने दूरदर्शन में सेवारत रहते हुए लिखा था, उसकी पंक्ति याद आ रही है-

उस पुराने चाव का, प्यार के बहलाव का,
दफ्तरों की फाइलें, अनुवाद कर पाती नहीं।

कुल मिलाकर बहुत से काम ऐसे हैं जो दूर से बहुत आकर्षक लगते हैं, जैसे दूरदर्शन में कार्यक्रम प्रोड्यूस करने वाला काम! मैंने भी आकाशवाणी में काम किया है, यद्यपि मैं प्रशासन में था, कलाकारों का सात बहुत मिला, लेकिन अक्सर लगता था कि कला प्रस्तुति के ऊपर दफ्तर की औपचारिकताएं ज्यादा हावी रहती हैं।

बहरहाल मैं यही कहना चाहता हूँ कि हमेशा से मेरा सपना अपनी कला के बल पर, कविताओं के बल पर नाम कमाने का था। मुझे राज कपूर जी का उदाहरण याद आता है, कितनी अच्छी टीम बनाई थी उन्होंने। इस टीम के एक सदस्य शैलेंद्र जी, वे इप्टा में नाटकों आदि के लिए डायलॉग और गीत लिखते थे, पृथ्वीराज जी ने उनसे प्रभावित होकर कहा कि मेरा बेटा फिल्म बना रहा है, उसके लिए गीत लिखो, शुरू में तो शैलेंद्र जी ने मना कर दिया लेकिन बाद में आर्थिक तंगी के कारण वे तैयार हो गया और हमें यह महान रचनाकर मिल गया!

मुझे नीता जी का किस्सा याद आ रहा है, जो उन्होंने कहीं शेयर किया था, उस समय उनका ‘सरनेम’ क्या था, पता नहीं। उन्होंने नृत्य का एक कार्यक्रम प्रस्तुत किया था जिसे मुकेश अंबानी ने देखा और उनको बहुत पसंद किया। बाद में उनके घर फोन आया, उन्होंने उठाया, उधर से आवाज आई-‘मैं धीरूभाई अंबानी बोल रहा हूँ’, उनको लगा कि कोई मजाक कर रहा है, और उन्होंने कहा- ‘मैं क्लिओपेट्रा बोल रही हूँ (शायद कोई और नाम था)’ और फोन रख दिया। ऐसा एक से अधिक बार हुआ बाद में उनके पिता से धीरूभाई जी की बात हुई और उन्होंने बताया कि उनका बेटा ‘मुकेश’ नीता जी से विवाह करना चाहता और इस प्रकार किस्मत धकेलते हुए उनके पास चली आई।

तो यह खेल है किस्मत का और सपनों का, मेरा सपना रहा है कि रचनात्मकता के आधार पर मैं अपना स्थान बनाऊं, कविता में, अनुवाद में भी मैं देखता हूँ कि भ्रष्ट अनुवाद करने वाले आसनों पर डेरा जमाए हैं और कोशिश करते हैं कि कोई वास्तव में क्रिएटिव व्यक्ति वहाँ घुसकर उनके नकलीपन को चुनौती न दे पाए। एक कवि की गीत पंक्ति याद आती है-

फ्यूज़ बल्बों के अद्भुद समारोह में,
रोशनी को शहर से निकाला गया।

बाकी सपनों का क्या है, वो रुकते थोड़े ही हैं आने से, कभी लगता है कि किसी प्रसिद्ध प्रोड्यूसर ने कुछ पढ़ा, वह मुरीद हो गया और उसने मुंबई बुला लिया, क्या मुंबई जाने के लिए व्यक्ति का भिक्षुक वाली स्थिति में पहुंचना जरूरी है।

बातें। तो बहुत हैं और सपने भी, लेकिन आज के लिए इतना ही,

नमस्कार।

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