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श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’ की रचनायें-4 : सन्नाटा शहर में!

मेरी उपलब्ध रचनाएं यहाँ शेयर करने का आज चौथा दिन है, इस प्रकार जहाँ इन सबको, जितनी उपलब्ध हैं, एक साथ शेयर कर लूंगा जिससे यदि कभी कोई संकलनकर्ता इनको ऑनलाइन संकलन में शामिल करना चाहे तो कर ले। इसके लिए मैं अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में जिस क्रम में कविताएं पहले शेयर की हैं, उसी क्रम में उनको लेकर यहाँ पुनः एक साथ शेयर कर रहा हूँ।

जैसा मैंने पहले भी बताया है, हमेशा ‘श्रीकृष्ण शर्मा’ नाम से रचनाएं लिखता रहा, उनका प्रकाशन/ प्रसारण भी हमेशा इसी नाम से हुआ, नवगीत से संबंधित पुस्तकों/ शोध ग्रंथों में भी मेरा उल्लेख इसी नाम से आया है, लेकिन अब जबकि मालूम हुआ कि इस नाम से कविताएं आदि लिखने वाले कम से कम दो और रचनाकार रहे हैं, इसलिए अब मैं अपनी कविताओं को पहली बार श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’ नाम से प्रकाशित कर रहा हूँ, जिससे एक अलग पहचान बनी रहे।

लीजिए आज इस क्रम की इस चौथी पोस्ट में दो और रचनाओं को शेयर कर रहा हूँ-

दिल्ली में रहते हुए, प्रगतिशील लेखक सम्मेलन की अनेक बैठकों में मैंने भाग लिया था, सामान्यतः ये बैठकें दिल्ली विश्वविद्यालय में कहीं होती थीं और इनमें काफी बहादुरी भरी बातें होती थीं। आपातकाल में ऐसी ही बैठक दिल्ली में मंडी हाउस के पास स्थित कम्युनिस्ट पार्टी के मुख्यालय में हुई और मैंने देखा कि इस बैठक में सभी बहादुरों ने किसी न किसी बहाने से आपातकाल का समर्थन किया।

इस बैठक के अनुभव से प्रभावित होकर मैंने ये कविता लिखी थी-

 

सन्नाटा शहर में

 

 

श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’

 

बेहद ठंडा है शहरी मरुथल
लो अब हम इसको गरमाएंगे,
तोड़ेंगे जमा हुआ सन्नाटा
भौंकेंगे, रैंकेंगे, गाएंगे।

 

दड़बे में कुछ सुधार होना है,
हमको ही सूत्रधार होना है,
ये जो हम बुनकर फैलाते हैं,
अपनी सरकार का बिछौना है।
चिंतन सन्नाटा गहराता है,
शब्द वमन से उसको ढाएंगे।
तोड़ेंगे जमा हुआ सन्नाटा
भौंकेंगे, रैंकेंगे, गाएंगे।

 

परख राजपुत्रों की थाती है,
कविता उस से छनकर आती है,
ऊंची हैं अब जो भी आवाज़ें,
सारी की सारी बाराती हैं,
अपनी प्रतिभा के चकमक टुकड़े
नगर कोतवाल को दिखाएंगे।
तोड़ेंगे जमा हुआ सन्नाटा
भौंकेंगे, रैंकेंगे, गाएंगे।

 

अंत में मेरी कुछ पंक्तियां, जो दिल्ली में यमुना पार निवास के दर्द को भी दर्शाती हैं-

हर एक मुक़ाम पर
ठहरा, झुका, सलाम किया,
वो अपना घर था, जिसे रास्ते में छोड़ दिया।

 

उधर हैं पार नदी के बहार-ओ-गुल कितने,
इधर हूँ मैं कि ये जीवन
नदी के पार जिया।

 

-श्रीकृष्णशर्मा ‘अशेष’

आज के लिए इतना ही,
आपकी प्रतिक्रियाओं का स्वागत है।
नमस्कार।

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