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श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’ की रचनायें-6 : आम आदमी, बहेलिए!

मेरी उपलब्ध रचनाएं यहाँ शेयर करने का आज छठा दिन है, इस प्रकार जहाँ इन सबको, जितनी उपलब्ध हैं, एक साथ शेयर कर लूंगा जिससे यदि कभी कोई संकलनकर्ता इनको ऑनलाइन संकलन में शामिल करना चाहे तो कर ले। इसके लिए मैं अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में जिस क्रम में कविताएं पहले शेयर की हैं, उसी क्रम में उनको लेकर यहाँ पुनः एक साथ शेयर कर रहा हूँ।

जैसा मैंने पहले भी बताया है, हमेशा ‘श्रीकृष्ण शर्मा’ नाम से रचनाएं लिखता रहा, उनका प्रकाशन/ प्रसारण भी हमेशा इसी नाम से हुआ, नवगीत से संबंधित पुस्तकों/ शोध ग्रंथों में भी मेरा उल्लेख इसी नाम से आया है, लेकिन अब जबकि मालूम हुआ कि इस नाम से कविताएं आदि लिखने वाले कम से कम दो और रचनाकार रहे हैं, इसलिए अब मैं अपनी कविताओं को पहली बार श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’ नाम से प्रकाशित कर रहा हूँ, जिससे एक अलग पहचान बनी रहे।

लीजिए आज इस क्रम की इस छठी पोस्ट में दो और रचनाओं को शेयर कर रहा हूँ।

पहली रचना, देश और दुनिया में आम आदमी की स्थिति को अभिव्यक्त करती है-

 

 

अखबारों में, सेमीनारों में, जीता है आम आदमी!

 

श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’

मंदिर के पापों ने कर दिया,
नगरी का आचरण सियाह,
होता है रोज आत्मदाह।

 

मौलिक प्रतिभाओं पर फतवों का
बोझ लादती अकादमी,
अखबारों में सेमीनारों में
जीता है आम आदमी,
सेहरों से होड़ करें कविताएं
कवि का ईमान वाह-वाह।
होता है रोज आत्मदाह।।

 

जीने की गूंगी लाचारी ने,
आह-अहा कुछ नहीं कहा,
निरानंद जीवन के नाम पर,
एक दीर्घ श्वास भर लिया,
और प्रतिष्ठान ने दिखा दिया
पंथ ताकि हो सके निबाह।
होता है रोज आत्मदाह।।

 

हर अनिष्टसूचक सपना मां का,
बेटे की सुधि से जुड़ जाता है,
और वो कहीं पसरा बेखबर
सुविधा के एल्बम सजाता है।
ये युग कैसा जीवन जीता है,
उबल रहा तेल का कड़ाह।
होता है रोज आत्मदाह।।

 

और अब प्रस्तुत है आज की दूसरी कविता,जो हमारे देश में चुनावों के समय बनने वाले महौल को दर्शाती हैं-

 

बहेलिए

 

धागे तो कच्चे हैं, मनमोहक नारों के,
लेकिन जब जाल बुने जाते हैं यारों के,
और ये शिकारी, डालते हैं दाना,
हर रोज़ नए वादों का,
भाग्य बदल देने के
जादुई इरादों का,
फंसती है भोले कबूतर सी जनता तब,
जाल समेट, राजनैतिक बहेलिए
बांधते हैं, जन-गण की उड़ाने स्वच्छंद
और बनते हैं भाग्यविधाता-
अभिशप्त ज़माने के।

 

-श्रीकृष्णशर्मा ‘अशेष’

आज के लिए इतना ही,
आपकी प्रतिक्रियाओं का स्वागत है।
नमस्कार।

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2 replies on “श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’ की रचनायें-6 : आम आदमी, बहेलिए!”

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