Categories
Uncategorized

श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’ की रचनायें-9 : कोई तो आसपास हो होश-ओ-हवास में!

मेरी उपलब्ध रचनाएं यहाँ शेयर करने का आज नौवां दिन है, इस प्रकार जहाँ इन सबको, जितनी उपलब्ध हैं, एक साथ शेयर कर लूंगा जिससे यदि कभी कोई संकलनकर्ता इनको ऑनलाइन संकलन में शामिल करना चाहे तो कर ले। इसके लिए मैं अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में जिस क्रम में कविताएं पहले शेयर की हैं, उसी क्रम में उनको लेकर यहाँ पुनः एक साथ शेयर कर रहा हूँ।

जैसा मैंने पहले भी बताया है, हमेशा ‘श्रीकृष्ण शर्मा’ नाम से रचनाएं लिखता रहा, उनका प्रकाशन/ प्रसारण भी हमेशा इसी नाम से हुआ, नवगीत से संबंधित पुस्तकों/ शोध ग्रंथों में भी मेरा उल्लेख इसी नाम से आया है, लेकिन अब जबकि मालूम हुआ कि इस नाम से कविताएं आदि लिखने वाले कम से कम दो और रचनाकार रहे हैं, इसलिए अब मैं अपनी कविताओं को पहली बार श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’ नाम से प्रकाशित कर रहा हूँ, जिससे एक अलग पहचान बनी रहे।

लीजिए आज इस क्रम की इस नौवीं पोस्ट में तीन और रचनाओं को शेयर कर रहा हूँ-

 

 

 

पहली कविता- जीवन की नीरसता, निस्संगता में लोग किस प्रकार कहीं जुड़ाव महसूस नहीं करते, रोज़गार और अन्य अनेक कारणों से नए स्थानों और नए लोगों के पास जाते हैं और एकांतिक जीवन बिताते जाते हैं, केवल व्यावहारिक संबंध बनते हैं बस-

बनवासी राम की तरह

श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’

 

पांवों से धूल झाड़कर,
पिछले अनुबंध फाड़कर
रोज जिए हम-
बनवासी राम की तरह।

 

छूने का सुख न दे सके-
रिश्तों के धुंधले एहसास,
पंछी को मिले नहीं पर-
उड़ने को सारा आकाश।

 

सच की किरचें उखाड़कर,
सपनों की चीरफाड़ कर,
टांक लिए भ्रम,
गीतों के दाम की तरह।

कहते हैं कि मौसम पर बात करना सबसे आसान होता है लेकिन जब मौसम अपनी पर आ जाए तब उसको झेलना सबसे मुश्किल होता है।

मैंने भी अपने कुछ गीतों में और एक गज़ल में मौसम का ज़िक्र किया था, एक गज़ल के कुछ शेर यहाँ दे रहा हूँ-

आज मौसम पे तब्सिरा कर लें,
और कुछ ज़ख्म को हरा कर लें।

 

जिनके नुस्खों पे रोग पलते हैं,
उन हक़ीमों से मशविरा कर लें।

 

आह के शेर, दर्द की नज़्में,
इक मुसलसल मुशायरा कर लें।

श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’

 

और अंत में, राजनीतिज्ञ अपनी ही अलग दुनिया में रहते हैं, चमचों की जयकार के बीच उनको यह एहसास ही नहीं रहता कि उनके पैरों के नीचे ज़मीन है भी या नहीं।

इस विषय में मुझे अपनी लिखी हुई पंक्तियां याद आ रही हैं-

वे खुद बने हैं रोशनी, लिपटे कपास में,
कैसे अजीब भ्रम पले दिन के उजास में।

 

कुछ अपनी बदहवासियां उनको पता चलें,
कोई तो आसपास हो होश-ओ-हवास में।

-श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’

आज के लिए इतना ही,
आपकी प्रतिक्रियाओं का स्वागत है।
नमस्कार।

******

Leave a Reply