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शांत कदम – रवींद्रनाथ ठाकुर

आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य संकलन- ‘PoemHunter.com’ से लेता हूँ। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘Silent Steps’ का भावानुवाद-

 

 

गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता

 

शांत कदम

 

क्या आपने उसके शांत कदमों की आहट सुनी है?
वह आता है, आता है, हमेशा आता है।

 

हर क्षण और हर युग में,
हर दिन और हर रात, वह आता है, आता है, हमेशा आता है।

 

बहुत से गीत मैंने गाये हैं, अपनी अनेक मनोदशाओं में,
परंतु उन गीतों के स्वरों से हमेशा यही घोषणा हुई है,
` वह आता है, आता है, हमेशा आता है।’

 

धूप भरे अप्रैल माह के गंधयुक्त समय में, वन मार्ग से वह आता है,
आता है, हमेशा आता है।

 

जुलाई की बरसाती रातों के उदास परिवेश में, गरजते बादलों के रथ पर सवार होकर
वह आता है, आता है, हमेशा आता है।

 

लगातार उदासियों का सामना करने पर भी उसके कदम मेरे हृदय पर दस्तक देते हैं,
और उसके चरणों का स्वर्णिम स्पर्श ही है, जो मेरी प्रसन्नता को उजली चमक देता है।

 

-रवींद्रनाथ ठाकुर

 

और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-

 

Silent Steps

 

Have you not heard his silent steps?
He comes, comes, ever comes.
Every moment and every age,
every day and every night he comes, comes, ever comes.
Many a song have I sung in many a mood of mind,
but all their notes have always proclaimed,
`He comes, comes, ever comes.’
In the fragrant days of sunny April through the forest path he comes,
comes, ever comes.
In the rainy gloom of July nights on the thundering chariot of clouds
he comes, comes, ever comes.
In sorrow after sorrow it is his steps that press upon my heart,
and it is the golden touch of his feet that makes my joy to shine.

 

Rabindranath Tagore

 

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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बीते हुए दिन!

आज फिर से एक पुरानी ब्लॉग पोस्ट शेयर कर रहा हूँ-

 

 

 

अतीत में रहना अक्सर लोगों को अच्छा लगता है, मेरी उम्र के लोगों को और भी ज्यादा। कुछ लोग तो जब मौका मिलता है अतीत में जाकर दुबक जाते हैं, या ऐसा कहते रहते हैं, हमारे समय में तो ऐसा होता है। वैसे मेरा तो यही प्रयास है कि हर समय, मेरा समय रहे, लेकिन अनुभव को मन में दोहराने के लिए कभी-कभार अतीत में डुबकी लगा लेना तो अच्छी बात है।

आज एक दृश्य याद आ रहा है, आकाशवाणी जयपुर में सेवा के समय का, वहाँ मैं 1980 से 1983 तक रहा था। मैं अपने पुराने ब्लॉग्स में उस अवधि के बारे में बता चुका हूँ। हाँ तो एक दृश्य याद आ रहा है, रिकॉर्डिंग स्टूडियो का, एक लाइन का संवाद, लेकिन उससे पहले लंबी-चौड़ी भूमिका तो बांध सकता हूँ, कैरेक्टर्स के बारे में बताने के बहाने।

हाँ तो आकाशवाणी में मैं प्रशासन शाखा में था, हिंदी अनुवादक होने के नाते, रिकॉर्डिंग स्टूडियो से मेरा सीधे तौर पर कोई नाता नहीं था, लेकिन मैं अक्सर रिकॉर्डिंग स्टूडियो में रहता था कभी किसी कवि-गोष्ठी में, कभी कविता रिकॉर्ड कराने के लिए और कभी अपनी आवाज़ में कोई कहानी रिकॉर्ड कराने के लिए।

मेरी मित्रता भी प्रशासन शाखा से बाहर, प्रोग्राम विभाग के लोगों से अधिक थी, जबकि प्रशासन शाखा के बहुत से लोग प्रोग्राम विभाग के लोगों से ईर्ष्या करते थे, क्योंकि उनको पैसा और ख्याति, दोनों अधिक मिलते हैं।

हाँ तो कार्यक्रम विभाग में एक थे- श्री राजेंद्र वोहरा, कार्यक्रम निष्पादक, बहुत ही सृजनशील व्यक्ति थे, बाद में वे केंद्र निदेशक के स्तर तक पहुंचे थे। एक थे मेरे मित्र- बैजनाथ गौतम, कृषि विभाग में कार्यक्रम सहायक थे। ईसुरी के लोकगीत बड़े सुरीले अंदाज में गाते थे। और एक थे श्री एस.एस.धमौरा, वे बहुत अच्छे कलाकार थे, पगड़ी बांधकर, पूरी तरह राजस्थानी परिधान में रहते थे। इस दृश्य में ये तीन व्यक्ति ही प्रमुख रूप से थे, वैसे आकाशवाणी में अनेक कलाकार मेरे मित्र थे, जिनमें बहुत जाने-माने तबला वादक ज़नाब दायम अली क़ादरी भी शामिल थे।

हाँ तो एक लाइन के संवाद वाले इस दृश्य के बारे में बात करते हैं। मैं किसी रिकॉर्डिंग के मामले में स्टूडियो गया था और इस दृश्य में मेरी कोई भूमिका नहीं थी।

दरअसल कृषकों के लिए चौपाल की रिकॉर्डिंग होनी थी, धमौरा जी ने कहा- ‘राम राम बैजनाथ भाई, क्या हाल है, आज की चौपाल में चर्चा शुरू की जाए? इस पर श्री बैजनाथ गौतम बोले- ‘हाँ धमौरा भाई मैं तो मजे में हूँ, चर्चा शुरू करते हैं, बस थोड़ा ‘वोहरा साहब’ आ जाएं।‘

इतना बोलना था, कि धमौरा जी, जो रुतबे में गौतम जी से बहुत छोटे थे, लेकिन अनुभवी कलाकार थे, उन्होंने रिकॉर्डिंग बंद करा दी और चिल्लाए- ‘ये वोहरा साहब क्या होता है? यहाँ प्रोग्राम में कोई किसी का साहब नहीं है!

बस यही अचानक याद आया, हर जगह का अलग संस्कार होता है, दफ्तर में अगर नाम के साथ साहब न लगाएं तो वह अशिष्टता है और चौपाल में अगर किसी के नाम के साथ साहब लगाएं तो वह गलत है।

आज के लिए यही एक बहाना था, अतीत में झांकने का, और उन पलों को दोहराने का, जगजीत जी की गाई गज़ल के शेर याद आ रहे हैं-

झूठ है सब तारीख हमेशा अपने को दोहराती है,
फिर से मेरा ख्वाब-ए-जवानी थोड़ा सा दोहराए तो।
शफक़, धनुख, महताब, घटाएं, तारे, नगमे, बिजली, फूल,
उस दामन में क्या-क्या कुछ है, वो दामन हाथ में आए तो।

 

नमस्कार।

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रतनारे नयनों में एक सपन डूब गया- किशन सरोज

प्रसिद्ध गीत कवि स्व. श्री किशन सरोज जी का स्मरण करते हुए उनके कुछ गीत शेयर कर रहा था, वैसे तो किशन जी ने इतने सुंदर गीत लिखे हैं कि लगता है कि उनको शेयर करता हि जाऊं। लेकिन फिलहाल इस क्रम में मैं इस गीत के साथ यह क्रम समाप्त करूंगा।

मुझे याद है कि किशन सरोज जी जब भी मिलते थे एक दोस्त की तरह मिलते थे, इतने सरल स्वभाव के व्यक्ति थे। वे प्रेम के और विरह के गीतों के सुकुमार बादशाह थे, आज का उनका गीत, जिसे आजकल ‘ब्रेक-अप’ कहा जाता है उसके संबंध में है। लेकिन उस समय यह ‘ब्रेक-अप’ कोई फैशन का हिस्सा नहीं था और इसका कारण समाज के बंधन होते थे। यह उनका एक अलौकिक गीत है, लीजिए आज प्रस्तुत है, फिलहाल इस कड़ी का अंतिम गीत-

 

छोटी से बड़ी हुईं तरुओं की छायाएं
धुंधलाईं सूरज के माथे की रेखाएं
मत बांधो‚ आंचल मे फूल चलो लौट चलें
वह देखो! कोहरे में चंदन वन डूब गया।

 

माना सहमी गलियों में न रहा जाएगा
सांसों का भारीपन भी न सहा जाएगा
किन्तु विवशता यह यदि अपनों की बात चली
कांपेंगे आधर और कुछ न कहा जाएगा।
वह देखो! मंदिर वाले वट के पेड़ तले
जाने किन हाथों से दो मंगल दीप जले
और हमारे आगे अंधियारे सागर में
अपने ही मन जैसा नील गगन डूब गया।

 

कौन कर सका बंदी रोशनी निगाहों में
कौन रोक पाया है गंध बीच राहों में
हर जाती संध्या की अपनी मजबूरी है
कौन बांध पाया है इंद्रधनुष बाहों में।
सोने से दिन चांदी जैसी हर रात गयी
काहे का रोना जो बीती सो बात गयी
मत लाओ नैनों में नीर कौन समझेगा
एक बूंद पानी में‚ एक वचन डूब गया।

 

भावुकता के कैसे केश संवारे जाएं?
कैसे इन घड़ियों के चित्र उतारे जाएं?
लगता है मन की आकुलता का अर्थ यही
आगत के आगे हम हाथ पसारे जाएं।
दाह छुपाने को अब हर पल गाना होगा
हंसने वालों में रह कर मुसकाना होगा
घूंघट की ओट किसे होगा संदेह कभी
रतनारे नयनों में एक सपन डूब गया।

 

-किशन सरोज

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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कर दिए लो आज गंगा में प्रवाहित – -किशन सरोज

प्रसिद्ध गीत कवि स्व. श्री किशन सरोज जी का स्मरण करते हुए उनके कुछ गीत शेयर करने के क्रम में आज प्रस्तुत है उनका एक और प्रसिद्ध गीत। किशन सरोज जी प्रेम के और विरह के गीतों के सुकुमार बादशाह थे, किशन सरोज जी का एक ऐसा ही प्रेम-विरह का गीत आज प्रस्तुत है-

 

 

कर दिए लो आज गंगा में प्रवाहित,
सब तुम्हारे पत्र, सारे चित्र, तुम निश्चिन्त रहना।

 

धुंध डूबी घाटियों के इंद्रधनु तुम
छू गए नत भाल पर्वत हो गया मन,
बूंद भर जल बन गया पूरा समंदर
पा तुम्हारा दुख तथागत हो गया मन,
अश्रु जन्मा गीत कमलों से सुवासित
यह नदी होगी नहीं अपवित्र, तुम निश्चिन्त रहना।

 

दूर हूँ तुमसे न अब बातें उठें
मैं स्वयं रंगीन दर्पण तोड़ आया,
वह नगर, वे राजपथ, वे चौंक-गलियाँ
हाथ अंतिम बार सबको जोड़ आया।
थे हमारे प्यार से जो-जो सुपरिचित,
छोड़ आया वे पुराने मित्र, तुम निश्चिंत रहना।

 

लो विसर्जन आज वासंती छुअन का
साथ बीने सीप-शंखों का विसर्जन,
गुँथ न पाए कनुप्रिया के कुंतलों में
उन अभागे मोर पंखों का विसर्जन,
उस कथा का जो न हो पाई प्रकाशित
मर चुका है एक-एक चरित्र, तुम निश्चिंत रहना।

 

-किशन सरोज

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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रत्नों मढ़ी किताब, हमारे पास नहीं – किशन सरोज

प्रसिद्ध गीत कवि स्व. श्री किशन सरोज जी का स्मरण करते हुए उनके कुछ गीत शेयर कर रहा हूँ, वैसे तो उनका हर गीत बेमिसाल है, आज एक और गीत शेयर कर रहा हूँ। किशन सरोज जी प्रेम के और विरह के गीतों के सुकुमार बादशाह थे, अक्सर उन्होंने कवि सम्मेलनों में ईमानदार और सृजनशील कवियों की जो स्थिति होती है, हल्की-फुल्की कविताओं के माहौल में उनको क्या कुछ सहना पड़ता है, इस व्यथा को अभिव्यक्ति दी है, किशन सरोज जी का एक ऐसा ही गीत आज प्रस्तुत है-

 

 

नागफनी आँचल में बांध सको तो आना
धागों बिंधे ग़ुलाब हमारे पास नहीं।
हम तो ठहरे निपट अभागे
आधे सोये, आधे जागे,
थोड़े सुख के लिये उम्र भर
गाते फिरे भीड़ के आगे,
कहाँ-कहाँ हम कितनी बार हुए अपमानित,
इसका सही हिसाब, हमारे पास नहीं।

 

हमने व्यथा अनमनी बेची,
तन की ज्योति कंचनी बेची,
कुछ न मिला तो अंधियारों को,
मिट्टी मोल चांदनी बेची।
गीत रचे जो हमने उन्हें याद रखना तुम
रत्नों मढ़ी किताब, हमारे पास नहीं।

 

झिलमिल करतीं मधुशालाएँ,
दिन ढलते ही हमें रिझाएँ,
घड़ी-घड़ी हर घूँट-घूँट हम,
जी-जी जाएँ, मर-मर जाएँ,
पीकर जिसको चित्र तुम्हारा धुंधला जाए,
इतनी कड़ी शराब, हमारे पास नहीं।

 

आखर-आखर दीपक बाले,
खोले हमने मन के ताले,
तुम बिन हमें न भाए पल भर,
अभिनन्दन के शाल-दुशाले,
अबके बिछुड़े कहाँ मिलेंगे, ये मत पूछो,
कोई अभी जवाब, हमारे पास नहीं।

-किशन सरोज

 

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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ले न पाए हम प्रशंसा-पत्र कोई भीड़ से – किशन सरोज

भारतीय गणतंत्र दिवस के अवसर पर सभी को हार्दिक बधाई।

कल ही मैंने प्रसिद्ध गीत कवि स्व. श्री किशन सरोज जी का स्मरण करते हुए उनका एक गीत शेयर किया था, आज मन हो रहा है कि उनका एक और गीत शेयर कर लूं। प्रेम के और विरह के गीतों के सुकुमार बादशाह, किशन सरोज जी का एक और गीत प्रस्तुत है-

 

 

बाँह फैलाए खड़े,
निरुपाय, तट के वृक्ष हम
ओ नदी! दो चार पल, ठहरो हमारे पास भी ।

 

चाँद को छाती लगा
फिर सो गया नीलाभ जल
जागता मन के अंधेरों में
घिरा निर्जन महल
और इस निर्जन महल के
एक सूने कक्ष हम
ओ भटकते जुगनुओ ! उतरो हमारे पास भी ।

 

मोह में आकाश के
हम जुड़ न पाए नीड़ से
ले न पाए हम प्रशंसा-पत्र
कोई भीड़ से
अश्रु की उजड़ी सभा के,
अनसुने अध्यक्ष हम
ओ कमल की पंखुरी! बिखरो हमारे पास भी ।

 

लेखनी को हम बनाए
गीतवंती बाँसुरी
ढूंढते परमाणुओं की
धुंध में अलकापुरी
अग्नि-घाटी में भटकते,
एक शापित यक्ष हम
ओ जलदकेशी प्रिये! सँवरो हमारे पास भी ।

 

-किशन सरोज

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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जन्म जन्मों ताल सा हिलता रहा मन!

कुछ दिन पहले ही प्रसिद्ध गीत कवि श्री किशन सरोज जी के निधन की खबर आई थी, मैं बाहर था अतः समय पर उनके बारे में नहीं लिख पाया।

स्व. किशन सरोज जी बहुत ही प्यारे गीतकार थे, एनटीपीसी में सेवा के दौरान हमारे कई आयोजनों में मैंने उनको आमंत्रित किया था, श्री सोम ठाकुर जी के साथ भी उनकी घनिष्ठ मित्रता थी, दोनो एक-दूसरे की सृजनशीलता का बहुत सम्मान करते थे।
मुझे विंध्यनगर का एक आयोजन याद आ रहा है, जो सुबह 4 बजे तक चला था और उसमें श्री किशन सरोज जी ने बहुत मन से कई प्यारे गीत सुनाए थे। उस कवि सम्मेलन का संचालन करते हुए श्री सोम ठाकुर ने कहा था कि यह आपके लिए एक स्मरणीय घटना है कि आप इस आयोजन में श्री किशन सरोज जी के गीत सुन रहे हैं।

उस महान गीत ऋषि का स्मरण करते हुए, आज मैं श्रद्धांजलि स्वरूप उनका एक प्रसिद्ध गीत यहाँ शेयर कर रहा हूँ-

 

 

 

धर गये मेंहदी रचे
दो हाथ जल में दीप,
जन्म जन्मों ताल सा हिलता रहा मन।

 

बांचते हम रह गये अन्तर्कथा,
स्वर्णकेशा गीतवधुओं की व्यथा,
ले गया चुनकर कमल कोई हठी युवराज,
देर तक शैवाल सा हिलता रहा मन।

 

जंगलों का दुख, तटों की त्रासदी
भूल सुख से सो गयी कोई नदी,
थक गयी लड़ती हवाओं से अभागी नाव,
और झीने पाल सा हिलता रहा मन।

 

तुम गये क्या जग हुआ अंधा कुँआ,
रेल छूटी रह गया केवल धुँआ,
गुनगुनाते हम भरी आँखों फिरे सब रात,
हाथ के रूमाल सा हिलता रहा मन।

 

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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कब और क्यों- रवींद्रनाथ ठाकुर

आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य संकलन- ‘PoemHunter.com’ से लेता हूँ। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘When And Why’ का भावानुवाद-

 

 

 

 

गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता 

कब और क्यों

 

जब मैं लाता हूँ तुम्हारे लिए रंगीन खिलौने, मेरे बच्चे, तब मैं समझता हूँ कि क्यों
रंगों का ऐसा उत्सव -बादलों में, जल स्रोतों के ऊपर छाता है, और क्यों पुष्प
रंगीन आभा से युक्त होते हैं, जब मैं तुम्हे रंगीन खिलौने देता हूँ, मेरे बच्चे।
जब मैं गीत गाता हूँ, तुम्हे नचाने के लिए, मैं जानता हूँ कि क्यों वास्तव में संगीत है-
पत्तियों में, और क्यों लहरें, अपनी ध्वनियों के समवेत स्वर भेजती हैं, सुन रही पृथ्वी के
हृदय तक –जब मैं तुम्हे नचाने के लिए गीत गाता हूँ।
जब मैं तुम्हारे ललचाते हाथों के लिए, मिष्ठान्न लाता हूँ, मैं जानता हूँ
कि पुष्प के गर्भ में शहद क्यों मौज़ूद है, और क्यों फलों में गुप्त रूप से
मधुर रस भर जाता है-जब मैं तुम्हारे ललचाते हाथों के लिए
मिष्ठान्न लाता हूँ।.
जब मैं तुम्हारे चेहरे पर मुस्कान लाने के लिए, तुम्हारा मुख चूमता हूँ, मेरे प्रिय, मैं
खूब समझता हूँ, कैसा आनंद, आकाश से सुबह के प्रकाश में प्रवाहित होता है और
कैसा उल्लास, ग्रीष्म की हवा मेरे शरीर में लाती है, जब मैं तुम्हारे चेहरे पर मुस्कान लाने के लिए,                                             तुम्हारा मुख चूमता हूँ।

-रवींद्रनाथ ठाकुर

 

और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-

 

When And Why

 

When I bring you coloured toys, my child, I understand why there
is such a play of colours on clouds, on water, and why flowers are
painted in tints-when I give coloured toys to you, my child.
When I sing to make you dance, I truly know why there is music
in leaves, and why waves send their chorus of voices to the heart
of the listening earth-when I sing to make you dance.
When I bring sweet things to your greedy hands, I know why
there is honey in the cup of the flower, and why fruits are
secretly filled with sweet juice-when I bring sweet things to your
greedy hands.
When I kiss your face to make you smile, my darling, I surely
understand what pleasure streams from the sky in morning light, and
what delight the summer breeze brings to my body-when I kiss you
to make you smile.

 

Rabindranath Tagore

 

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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सिंगर शबाब साबरी का नया गाना – बेक़रार माही!

Noted for massive hit “Hud Hud Dabang” from film-Dabangg, famous singer Shabab Shabri’s new song will hit the market soon. The first look poster of the next single is out and has gone viral!

The song is titled ‘Beqaraar Maahi’ and it’s been written by noted lyricist Qaseem Haider Qaseem, who will also be seen featuring in the song along with actress Aarti Saxena.

 

Talking about the song, Qaseem Haider Qaseem said that the shooting of the song ‘Beqaraar Maahi’ has been done in different areas of Mumbai. The poster of this song, produced under the banner of BB Entertainment, went viral as soon as it is expected that people will like this song too. Our team has worked very hard on this song which you will see in the video song. Qaseem told that our team will soon launch this song worldwide.

This song is directed by Shadab Siddiqui. Producer is NK Moosvi. The DOP and Editor of the song is Nitish Chandra, Story and Screen Play is by Shadab Siddiqui, Costumes by Roli Chaturvedi, Makeup artist is Satwinder Kalsi, Sound Mixing is by Yoggendra Vaghe, Colourist Nitish Chandra.

 

NK Music Company has given the music with special contribution from Yoggendra Vaghe, who has not only composed the song but also created guitar and mandolin score. Mrinal Das has mixed the song.

दबंग से बड़े हिट “हद हद दबंग” के लिए प्रसिद्ध गायक शबाब साबरी का नया गाना जल्द ही बाजार में आएगा। अगले सिंगल का फर्स्ट लुक पोस्टर रिलीज़ हो गया है और वायरल हो गया है!

इस गीत का शीर्षक ‘बेकरार माही’ है और इसे जाने-माने गीतकार क़सीम हैदर क़सीम ने लिखा है, जिन्हे अभिनेत्री आरती सक्सेना के साथ गाने में भी दिखाया जाएगा।

गाने के बारे में बात करते हुए, क़सीम हैदर क़सीम ने कहा कि गीत  ‘बेकरार माही’ की शूटिंग मुंबई के विभिन्न क्षेत्रों में की गई है। बीबी एंटरटेनमेंट के बैनर तले निर्मित इस गाने का पोस्टर जैसे  वायरल हुआ है, उम्मीद है कि लोगों को यह गाना भी पसंद आएगा। हमारी टीम ने इस गीत पर बहुत मेहनत की है जो आप वीडियो गीत में देखेंगे। कसीम ने बताया कि हमारी टीम जल्द ही इस गाने को दुनिया भर में लॉन्च करेगी।

इस गाने को शादाब सिद्दीकी ने डायरेक्ट किया है। निर्माता एनके मूसवी हैं। गाने के डीओपी और एडिटर नीतीश चंद्र हैं, शादाब सिद्दीकी की कहानी और स्क्रीन प्ले है, रोली चतुर्वेदी के कॉस्ट्यूम, मेकअप आर्टिस्ट सतविंदर कलसी का है, साउंड मिक्सिंग योगगेंद्र वाघे, कोलॉरिस्ट नीतीश चंद्र की है।

एनके म्यूजिक कंपनी ने योगेन्द्र वाघे के विशेष योगदान के साथ संगीत दिया है, जिन्होंने न केवल गीत तैयार किया है, बल्कि गिटार और मैंडोलिन स्कोर भी बनाया है। मृणाल दास ने गीत की मिक्सिंग की है।

अभी जिस तरह से लोगों ने पोस्टर को देखा और इसे बहुत पसंद किया, गाने के सुपरहिट होने की जबर्दस्त संभावना  है।

यह रिपोर्ट तथा इससे संबंधित चित्र बॉलीवुड एवं मीडिया फोटोग्राफर- श्री कबीर एम. लव  (कबीर अली) द्वारा उपलब्ध कराए गए।

नमस्कार।

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उसकी फटी क़मीज मेरे साथ हो गई|

आज निदा फाज़ली साहब की लिखी एक गज़ल शेयर करने का मन है। निदा साहब सधुक्कडी‌ भाषा में, सामान्य सी शब्दावली में बहुत गहरी बात कह जाते थे। आज यह गज़ल पढ़ लीजिए, जो अपने आप ही अपनी बात कह देती है-

 

कुछ भी बचा न कहने को हर बात हो गई,
आओ कहीं शराब पिएं रात हो गई।

 

फिर यूं हुआ कि वक़्त का पांसा पलट गया,
उम्मीद जीत की थी मगर मात हो गई।

 

सूरज को चोंच में लिए मुर्ग़ा खड़ा रहा,
खिड़की के पर्दे खींच दिए रात हो गई।

 

वो आदमी था कितना भला कितना पुर-ख़ुलूस,
उस से भी आज लीजे मुलाक़ात हो गई।

 

रस्ते में वो मिला था मैं बच कर गुज़र गया,
उसकी फटी क़मीज मेरे साथ हो गई।

 

नक़्शा उठा के कोई नया शहर ढूंढिए,
इस शहर में तो सब से मुलाक़ात हो गई।

 

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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