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ऐसे ही मैं सिमटा- सिहरा, बिखरा तेरे वक्षस्थल में!

आज एक बार फिर से मेरे प्रिय कवियों में से एक, स्वर्गीय भारत भूषण जी का एक मधुर गीत शेयर कर रहा हूँ। श्री भारत भूषण जी बड़ी नाज़ुक भावनाओं को बड़ी खूबसूरती से अभिव्यक्त करने में माहिर थे और अपने समय में कवि सम्मेलनों की शान हुआ करते थे।

लीजिए प्रस्तुत हैं स्व. भारत भूषण जी का यह प्यारा सा गीत –

 

 

 

जैसे पूजा में आँख भरे, झर जाय अश्रु गंगाजल में
ऐसे ही मैं सिमटा, सिहरा
बिखरा तेरे वक्षस्थल में!

 

रामायण के पारायण सा, होठों को तेरा नाम मिला,
उड़ते बादल को घाटी के, मंदिर में जा विश्राम मिला,
ले गये तुम्हारे स्पर्श मुझे,
अस्ताचल से उदयाचल में!

 

मैं राग हुआ तेरे मन का, यह देह हुई वंशी तेरी,
जूठी कर दे तो गीत बनूँ, वृंदावन हो दुनिया मेरी,
फिर कोई मनमोहन दीखा,
बादल से भीने आँचल में!

 

अब रोम रोम में तू ही तू , जागे जागूँ सोये सोऊँ,
जादू छूटा किस तांत्रिक का, मोती उपजें आँसू बोऊँ ,
ढाई आखर की ज्योति जगी,
शब्दों के बीहड़ जंगल में!

 

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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