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एक पंछी भी यहाँ शायद नहीं है!

दुष्यंत कुमार जी हिंदी के एक श्रेष्ठ रचनाकार रहे हैं, हिंदी कविता में उनका अच्छा-खासा योगदान है लेकिन आम जनता के बीच उनको विशेष ख्याति उस समय मिली जब उन्होंने आपात्काल में विद्रोह का स्वर गुंजाने वाली गज़लें लिखीं, बाद में इन गज़लों को एक संग्रह में सम्मिलित किया गया, जिसका शीर्षक है- ‘साये में धूप’। इस संग्रह में एक से एक बेहतरीन गज़लें थीं।

मैंने पहले भी उनकी कुछ श्रेष्ठ गज़लों को अपने ब्लॉग में शामिल किया है, आज प्रस्तुत है दुष्यंत जी की यह गज़ल-

 

 

ज़िंदगानी का कोई मक़सद नहीं है,
एक भी क़द आज आदमक़द नहीं है।

 

राम जाने किस जगह होंगे क़बूतर,
इस इमारत में कोई गुम्बद नहीं है।

 

आपसे मिल कर हमें अक्सर लगा है,
हुस्न में अब जज़्बा—ए—अमज़द नहीं है।

 

पेड़—पौधे हैं बहुत बौने तुम्हारे,
रास्तों में एक भी बरगद नहीं है।

 

मैकदे का रास्ता अब भी खुला है,
सिर्फ़ आमद—रफ़्त ही ज़ायद नहीं।

 

इस चमन को देख कर किसने कहा था,
एक पंछी भी यहाँ शायद नहीं है।

 

 

आज के लिए इतना ही।
नमस्कार।

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सुबह का सूर्य भी रथ से उतरकर, सुनेगा जुगनुओं का हुक्मनामा!

आज सोम ठाकुर जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ। जब अपनी नियोजक कंपनी के लिए मैं कवि सम्मेलनों का आयोजन किया करता था तब अनेक बार उनसे मिलने का अवसर मिला, बहुत सहृदय व्यक्ति और अत्यंत उच्च कोटि के रचनाकार हैं। उनके अनेक गीत मन पर अंकित हैं। राष्ट्र, राष्ट्रभाषा और रचनाकर के स्वाभिमान को लेकर उनकी अनेक अत्यंत प्रभावशाली रचनाएं हैं।
आज उनका जो गीत शेयर कर रहा हूँ, वह एक व्यंग्य गीत है, जिसमें यह अभिव्यक्त किया गया है कि आज हर क्षेत्र में, लोगों के पास चिंतन-मनन, संवेदन और भावनाओं की गहराई नहीं है लेकिन अहंकार अक्सर प्रदर्शित होता रहता है। लीजिए प्रस्तुत है यह भावपूर्ण गीत-

 

 

नज़रिए हो गये छोटे हमारे,
मगर बौने बड़े दिखने लगे हैं।
चले इंसानियत की राह पर जो,
मुसीबत में पड़े दिखने लगे है।

 

समय के पृष्ठ पर हमने लिखी थी
छबीले मोर पंखों से ऋचाएँ,
सुनी थी इस दिशा में उस दिशा तक
अंधेरो ने मशालों की कथाएँ।
हुए हैं बोल अब दो कौड़ियों के,
कलम हीरे- जड़े दिखने लगे हैं।

 

हुआ होगा कही ईमान मँहगा
यहाँ वह बिक रहा है नीची दरों पर,
गिरा है मोल सच्चे आदमी का
टिका बाज़ार कच्चे शेयरों पर,
पुराने दर्द से भीगी नज़र को
सुहाने आँकड़े दिखने लगे हैं।

 

हमारा घर अजायब घर बना है
सपोले आस्तीनों में पले हैं,
हमारा देश हैं खूनों नहाया
यहाँ के लोग नाखूनों फले हैं,
कहीं वाचाल मुर्दे चल रहे है
कही ज़िंदा गड़े दिखने लगे हैं।

 

मुनादी द्वारका ने यह सुना दी
कि खाली हाथ लौटेगा सुदामा,
सुबह का सूर्य भी रथ से उतरकर
सुनेगा जुगनुओं का हुक्मनामा,
चरण जिनके सितारों ने छुए वे
कतारों में खड़े दिखने लगे हैं।

 

यहाँ पर मज़हबी अंधे कुए हैं
यहाँ मेले लगे है भ्रांतियों के
लगी है क्रूर ग्रहवाली दशा भी,
महूरत क्या निकालें क्रांतियों के
सगुन कैसे विचारें मंज़िलो के,
हमें सूने घड़े दिखने लगे हैं।

 

आज के लिए इतना ही।
नमस्कार।

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शरमा न जाएं फूलों के साये!

आज ऐसे ही एक पुरानी फिल्म का गीत याद आ रहा है, यह गीत है 1961 में रिलीज़ हुई फिल्म- ‘नज़राना’ का, जिसके नायक राज कपूर जी थे और नायिका थीं वैजयंती माला जी। इस गीत को लिखा है राजिंदर कृष्ण जी ने और रवि जी के संगीत निर्देशन में इसे गाया है- मेरे प्रिय गायक मुकेश जी और स्वर सम्राज्ञी लता मंगेशकर जी ने।

बस यूं ही इस गीत को सुनकर यह खयाल आता है कि प्रेम में, रोमांस में अपनी बात कहने के लिए, कवि-शायर लोग क्या-क्या बेतुकी लगने वाली कल्पनाएं कर लेते हैं। बहुत सुंदर गीत है, इसकी लिरिक को पढ़कर इस मधुर गीत को याद कर लीजिए-

 

 

बिखरा के जुल्फें चमन में न जाना
क्यों-
इसलिए, कि शरमा न जाएं फूलों के साये,
मोहब्बत के नग्में तुम भी ना गाना
क्यों-
इसलिए, कि भँवरा तुम्हारी हँसी ना उड़ाये।

 

मोहब्बत की भँवरे को पहचान क्या
ये कलियों से पूछो हमें क्या पता,
सौदाई होगा
हम तो नहीं हैं
कहीं सीख लेना ना इसकी अदा,
ज़ुबां पर कभी बात ऐसी ना लाना
क्यों-
इसलिए, कि दुनिया से रस्म-ए-वफ़ा मिट ना जाये।

 

कहो साथ दोगे कहाँ तक मेरा
वहाँ तक जहाँ आसमान झुक रहा,
बोलो चलोगी
जो तुम ले चलोगे,
कहीं राह में हो ना जाना जुदा।
मेरा प्यार देखेगा सारा ज़माना,
क्यों-
इसलिए, कि वादे किए और कर के निभाए।

 

आज के लिए इतना ही।
नमस्कार।
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क़ैदी – रवींद्रनाथ ठाकुर

आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य संकलन- ‘PoemHunter.com’ से लेता हूँ। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘Prisoner’ का भावानुवाद-

 

 

 

गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता

 

क़ैदी

`क़ैदी, बताओ मुझे, कौन था जिसने तुम्हे बंधन में बांध दिया?’

 

`वह मेरा मालिक था,’ क़ैदी ने कहा।
`मैंने सोचा कि मैं धन और शक्ति के मामले में हर किसी को पीछे छोड़ सकता हूँ,
और मैंने अपने धन भंडार में खूब धन एकत्र किया, जो मेरे राजा को देय था।
 जब नींद ने मुझे अपने आगोश में ले लिया, तब मैं अपने स्वामी के बिस्तर में सो गया था,
और जब मेरी आंख खुली था, तब मैं क़ैदी बन चुका था, अपने ही धन-भंडार में।‘

 

`क़ैदी, बताओ मुझे, कौन था जिसने यह अटूट जंजीर बनाई?’

 

`वह मैं ही था,’ क़ैदी ने कहा, `जिसने बड़ी सावधानी से यह जंज़ीर तैयार की।
मैंने सोचा था कि अपनी अजेय शक्ति के बल पर मैं दुनिया पर कब्ज़ा कर लूंगा
और इस प्रकार मैं निर्बाध स्वतंत्रता अर्जित कर लूंगा।
इस प्रकार मैंने दिन-रात लगकर यह जंज़ीर तैयार की,
अग्नि की क्रूर लपटों और हथौड़े की कठोर चोटों के बल पर।
और जब आखिरकार यह काम पूरा हो गया
और जंज़ीर की कड़ियां पूरी और अभेद्य बन गईं,
तब मैंने पाया कि मैं ही इनके बंधन में जकड़ा हुआ हूँ।’

 

-रवींद्रनाथ ठाकुर

 

और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-

 

Prisoner

 

`Prisoner, tell me, who was it that bound you?’
`It was my master,’ said the prisoner.
`I thought I could outdo everybody in the world in wealth and power,
and I amassed in my own treasure-house the money due to my king.
When sleep overcame me I lay upon the bed that was for my lord,
and on waking up I found I was a prisoner in my own treasure-house.’
`Prisoner, tell me, who was it that wrought this unbreakable chain?’
`It was I,’ said the prisoner, `who forged this chain very carefully.
I thought my invincible power would hold the world captive
leaving me in a freedom undisturbed.
Thus night and day I worked at the chain
with huge fires and cruel hard strokes.
When at last the work was done
and the links were complete and unbreakable,
I found that it held me in its grip.’

 

-Rabindranath Tagore

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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काल-बली बोला मैंने तुझसे बहुतेरे देखे हैं!

आज एक अनुभव शेयर कर रहा हूँ और उस बहाने से जो कुछ बातें मन में आईं, उनके बारे में बात करूंगा। एक बात का खयाल कई बार आता है, बहुत से ऐसे मित्र हैं जो दफ्तर में मेरे साथ थे, मुझसे उम्र में कम थे, मुझसे काफी बाद रिटायर हुए, लेकिन ऊपर जाने का टिकट उनका कट चुका है और मैं अभी तक यहीं हूँ। यह तो दुनिया की व्यवस्था है- ‘कोई पहले तो कोई बाद में जाने वाला!’ हम यह सब होता हुए देखते रहते हैं, जब नज़दीक में कुछ होता है तब ज्यादा संवेदना के साथ उसको महसूस करने की गुंजाइश रहती है।

 

 

मैं आज बात करना चाहूंगा अपने एक निकट संबंधी की मृत्यु के बारे में, मेरे इस संबंधी का अभी हाल ही में स्वर्गवास हुआ है। जिस दिन उनकी तेरहवीं हुई उसके 2 दिन बाद ही उनका जन्मदिन आया और यदि वे जीवित रहे होते तो तब वे 50 वर्ष के हुए होते। मेरे इस संबंधी के पास कोई उच्च डिग्री अथवा विशेषज्ञता नहीं थी, परंतु अपनी मेहनत के दम पर उन्होंने अपने कार्यक्षेत्र में अच्छा नाम कमाया, उनके मित्रों की कमी नहीं थी, वे आस्तिक भी बहुत थे, नियमित रूप से पूजा-पाठ किया करते थे और अपने कार्य-क्षेत्र में हुए अनुभव के बल पर उन्होंने हाल ही में अपना व्यवसाय शुरू किया था और ईश्वर की दया से व्यवसाय बहुत सही गति से आगे बढ़ रहा था।

मेरे इस दिवंगत संबंधी का एक बेटा है, जो अभी तक ज़िंदगी के झमेलों से दूर संगीत की दुनिया में अपना भाग्य आज़माने में लगा था, कई बार मुंबई हो आया था संगीत कार्यक्रमों में भाग लेने के लिए। अब इस कहानी को ज्यादा लंबा नहीं करूंगा, अचानक मेरे इस संबंधी को पेट में तकलीफ हुई, पहले भी शायद ऐसी तकलीफ पहले भी कुछ बार हुई थी, लेकिन उन्होंने ध्यान नहीं दिया था। इस बार की यह तकलीफ उनकी आखिरी रही और अचानक उनकी पत्नी और बेटा, जिसने अभी तक दुनियादारी के बारे में कुछ सोचा ही नहीं था, उन पर सारा बोझ पड़ गया, अब व्यवसाय की बारीकियां उनको समझनी होंगी और हाँ समय तो सब कुछ सिखा ही देता है।

यहाँ फिर से मैं दोहराना चाहता हूँ कि मेरे इस संबंधी ने संघर्ष करते हुए अच्छा-खासा बिज़नस प्रारंभ कर लिया था, भविष्य बहुत उज्ज्वल था, लेकिन इसी बीच यह हादसा, जीवन का अचानक अंत और ऐसे में एक कमी जिसके बारे में मेरे मन में बार-बार प्रश्न उठ रहा था, और पता करने पर यह मालूम हुआ कि मेरे इस संबंधी ने जीवन-बीमा नहीं कराया था, असमय मृत्यु की स्थिति में यह सबसे बड़ा सहारा होता है परिवार के लिए, लेकिन यहीं मेरा यह संबंधी चूक गया, बताया गया कि वह इस संबंध में बात कर रहा था, लेकिन असमय मृत्यु ने इसका अवसर ही नहीं दिया और उसकी मृत्यु के बाद परिवार के लिए जो बहुत बड़ा सहारा हो सकता था, वह उनको नहीं मिल पाया।

मैं इसलिए सभी मित्रों का ध्यान इस ओर दिलाना चाहूंगा कि जीवन और मौत तो इंसान के हाथ में नहीं होता लेकिन यदि इंसान अच्छी राशि का बीमा करा ले तो असमय मृत्यु की स्थिति में यह बहुत बड़ा सहारा बन सकता है।

मुझे सोम ठाकुर जी की हिंदी गज़ल का एक शेर याद आ रहा है, जो उन्होंने बड़े संदर्भ में लिखा था, लेकिन यहाँ भी तो वह लागू होता है-

कोई दीवाना जब होंठों तक अमृत घट ले आया,
काल बली बोला मैंने, तुझसे बहुतेरे देखे हैं।

आज यही याद आया और मैंने महसूस किया कि बीमा एक अच्छा निवेश तो नहीं है, लेकिन अगर अचानक मृत्यु आ जाए तो इससे अधिक सहायक कुछ नहीं है।

आज के लिए इतना ही।
नमस्कार।

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अब किसी भी बात पर खुलती नहीं हैं खिड़कियां!

आज शहरयार जी की एक गज़ल के बहाने आज के हालात पर चर्चा कर लेते हैं। इससे पहले दुष्यंत जी के एक शेर को एक बार फिर याद कर लेता हूँ-

 

 

 

इस शहर में वो कोई बारात हो या वारदात

अब किसी भी बात पर खुलती नहीं हैं खिड़कियां।

आज की ज़िंदगी इतनी आपाधापी से भरी हो गई है कि किसी के पास, किसी के लिए बिल्कुल टाइम नहीं है। खास तौर जीवित या जीवन से जूझ रहे व्यक्ति के लिए तो बिल्कुल नहीं है। ये बात बड़े शहरों पर तो विशेष रूप से लागू होती है।

बहुत बार देखा है कि कोई व्यक्ति दुर्घटना का शिकार हो गया हो और जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहा हो, तब लगभग सभी लोग उसकी तरफ एक बार देखकर आगे बढ़ जाते हैं। इतना ही नहीं लोगों के सामने कोई किसी को चाकू मार दे तब भी कोई उसको बचाने के लिए आगे नहीं बढ़ता, और उसके बाद उसे चिकित्सा सुविधा दिलाने के लिए भी नहीं। ऐसे में लोगों को अपने अर्जेंट काम याद आ जाते हैं या ड्यूटी के लिए देर होने लगती है। जो लोग ऐसे में सहायता के लिए आगे बढ़ते हैं, वे वास्तव में सराहना के पात्र हैं और आज के समय में इंसानियत के जीवित होने की मिसाल हैं।

इसके विपरीत जब कोई लाश दिखाई दे जाती है, तब लोग घंटों वहाँ खड़े रहते हैं, पता करते रहते हैं, कौन था, कहाँ का था, क्या हुआ था । ऐसे में लोगों को कोई काम याद नहीं आता, कोई जल्दी नहीं होती।

खास तौर पर नेताओं को ऐसी लाशों की तलाश रहती है, जिनको झंडे की तरह इस्तेमाल किया जा सके। जिनको लेकर किसी पर इल्ज़ाम लगाए जा सकें। भुखमरी, कानून व्यवस्था की बदहाली, किसी भी मामले को जोरदार ढंग से उठाया जा सके। ऐसे मामले भी सामने आए हैं, जब लोगों ने किसी को आत्महत्या करने के लिए मानसिक रूप से तैयार किया, जिससे बाद में उस पर राजनीति की जा सके।

शायद यही कारण है कि, औद्योगिक अशांति की स्थिति में भी मैंने देखा है कि जब लोग कोई लाश बीच में रखकर आंदोलन करना चाहते हैं, तब पुलिस वालों का प्रयास यह होता है कि सबसे पहले किसी तरह समझा-बुझाकर, लाश को वहाँ से हटाया जाए वरना आंदोलन लंबा चल सकता है।

खैर इन सब बातों पर ज्यादा चर्चा किए बिना, शहरयार जी की वह गज़ल यहाँ दे रहा हूँ, जिसे हरिहरन जी ने गाया है, ‘गमन’ फिल्म के लिए। मैंने जितना कुछ ऊपर लिखा है, उससे कहीं ज्यादा बात ये गज़ल अपने आप में कह देती है-

 

अजीब सानेहा मुझ पर गुज़र गया यारो
मैं अपने साये से कल रात डर गया यारो।

 

हर एक नक़्श तमन्ना का हो गया धुंधला,
हर एक ज़ख्म मेरे दिल का भर गया यारो।

 

भटक रही थी जो कश्ती वो गर्क-ए-आब हुई
चढ़ा हुआ था जो दरिया उतर गया यारो।

 

वो कौन था, वो कहाँ का था, क्या हुआ था उसे,
सुना है आज कोई शख्स मर गया यारो।

 

नमस्कार।

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Our world and the evil forces!

Long back I had given an example from famous science fiction by H.G.Wells – The Island of Dr. Moreau, in an essay written by me for some competitive exam. In that novel the writer had woven a story according to which a famous Doctor Moreau keeps several animals in a far away Island, he treats them and trains them to act like human beings. He succeeds to a great extent but when with time they grow in number, they slowly start returning to their original form, they start behaving the way they did earlier, become aggressive and he himself runs away saving his own life.

 

 

The same is happening in human society, all over the world now. As they say that humans are the developed version of animals of the past and it appears that as we are growing more and more in number, the primitive habits are returning and many humans become animals, wherever they feel that it would be more beneficial for them.

Though we are getting latest gadgets to enjoy, we have so many societies- real and virtual, we come together sometimes in the name of one nation, sometimes because of one school or college, sometimes because of a caste or tribe, city or a village, language or religion. But we think of ourselves, our own benefits, may be at the cost of others.

Today we easily come to know many things about everybody out there, their qualities to some extent but mostly about their social status, richness, sometimes muscle power also. With growing population there is going to be disparity and nobody likes to lag behind.

There are people who acquire good qualification, some get some technical expertise, there are governments which are supposed to provide opportunities to people to grow and get into some profession to make a nice living possible for their families.

But in today’s world it is not possible that everybody could get a suitable job or profession to earn as per his or her dreams. Further there are people who do not make sufficient efforts and in some cases luck also plays a great role.

In such circumstances the social networks or platforms, pressure groups can also play a positive role, may be in some cases they also do so, but where they play a negative role, such things are more obvious.
I discussed  the possible reasons and background for the negative things, tendencies in the society, we may call it something toxic in society, as there are people working in offices or factories, there are also people who earn by thefts and deceit.

Our society keeps growing through real and virtual platforms and there are so many groups working in positive direction and also those which spread hatred against other people and in some cases even against our nation. In reaction to that sometimes there are feelings of excess nationalism, some such self proclaimed patriots who come out to set-right anybody who is not a nationalist as per their standards. So ‘Class divide, Chauvinism, Social media validation, Alarming increase of criminals in politics, Lack of civic sense’ etc. are different forms of alienation from our society, losing faith in our endeavor to grow together as a society, everybody playing his or her role, contributing for our society, our nation and the world at large.

So everybody need to think about his or her own role and think how he or she is contributing for the society and obviously one must keep away from the divisive forces, like Class divide, Chauvinism, criminal activities and should not in any way become an instrument to promote criminals in politics etc. Further the posts on social media, spreading rumors or hatred should be opposed and appropriately reported wherever required.
For the society, nation and the world of today, everybody needs to make his or her positive contribution and also oppose the negative forces.

This is my humble submission on the IndiSpire prompt- Class divide, Chauvinism, Social media validation, Alarming increase of criminals in politics, Lack of civic sense and so on. there’s something toxic everywhere around you. So what is that one toxic thing you want to get rid of? #ThrowAwayTheToxic

Thanks for reading.

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मेरा नाम क्या है जी!

आज बाकी बातें छोड़कर, देश के एक प्रमुख बैंक के साथ हुए अनुभव के बारे में बात कर लेते हैं। आईसीआईसीआई देश का एक प्रमुख प्राइवेट बैंक है और मेरे मन में अक्सर इनकी सेवाओं को लेकर संतुष्टि का भाव रहा है।

 

लेकिन एक नया अनुभव हुआ मुझे, जब मेरा डेबिट कार्ड कुछ कारणों से लॉक हो गया। मैं आजकल गोवा में और कभी-कभी बंगलौर में रहता हूँ और कुछ कारणों से मुझे कुछ दिन के लिए भोपाल जाना पड़ा। भोपाल में एक निकासी करते हुए कुछ कारणों से मेरा कार्ड ब्लॉक हो गया। इत्तफाक़ से उस समय मैं स्वयं यह निकासी नहीं कर रहा था। उसके बाद एक एसएमएस आया जिससे मैं यह नहीं समझ पाया कि मेरा कार्ड ब्लॉक हो गया है। बाद में, जब मैंने बंगलौर में मैंने कार्ड का प्रयोग किया तब मुझे मालूम हुआ कि कार्ड ब्लॉक हो चुका है।

यह अनुभव जो मैं यहाँ शेयर करना चाह रहा हूँ वह इसके बाद का है। मैंने जो नंबर एसएमएस में आया था, 18601207777  उस पर कॉल किया, जो-जो नंबर प्रेस करने को कहा गया वे मैंने प्रेस किए, उसके बाद मुझे 12 अंकों की डेबिट कार्ड संख्या दर्ज करने के लिए कहा गया, वह मैंने दर्ज की, मुझे उत्तर मिला-‘क्षमा करें, यह सही नहीं है’। मुझे लगा कि शायद गलत दर्ज हो गया हो, इसलिए मैंने 4-5 बार यह प्रयास किया और मैं ऐसा तो नहीं मान पाऊंगा कि यह हर बार गलत हुआ होगा, लेकिन उत्तर हर बार यही मिला।

उसके बाद मैंने सोचा कि ऑनलाइन इस संबंध में शिकायत की जाए, यहाँ भी मुझे आवश्यक विवरण देने को कहा गया, जो मैंने दे दिया, लेकिन हर बार पूरा विवरण देने के बाद जब मैं उसको ‘सबमिट’ करता तब यह उत्तर आता-आता- ‘Please enter a valid name’, अब ये तो हद हो गई न! मुझे मेरा नाम तो कम से कम ठीक ही याद है, और फिर मैं वही नाम लिख रहा था जो मेरे डेबिट कार्ड पर अंकित था। लेकिन अनेक बार प्रयास करने पर भी कोई नतीजा नहीं निकला।

मुझे आशा है कि इसका हल जल्दी ही निकल आएगा, लेकिन मैं यह पोस्ट इस समस्या की ओर ध्यान दिलाने के लिए लिख रहा हूँ, क्योंकि ऐसी समस्याएं तो हल होनी चाहिएं, जहाँ व्यक्ति के मन में यह संदेह पैदा हो जाए कि उसको अपना नाम भी ठीक से याद है या नहीं।

यह पोस्ट मात्र, सिस्टम की इस समस्या की तरफ ध्यान दिलाने के लिए लिखी गई है, इस संदर्भ में मैं अपना फोन नंबर और ई मेल आईडी भी यहाँ दे रहा हूँ। मेरा नंबर-9013973660 ई मेल आईडी- kris230450@gmail.com)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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तू भी हुआ रखैल — बदरा पानी दे !

जब स्व. रमेश रंजक जी के दो गीत पहले शेयर किए तो खयाल आया कि गरीब किसान की हालत को लेकर बादल से फरियाद वाला उनका गीत भी शेयर करूं। गरीब किसान का पूरा भविष्य, उसकी खेती पर और उसकी खेती वर्षा पर निर्भर होती है। इस गीत में उन्होंने बादलों को यह भी उलाहना दे दिया कि वह भी अमीरों की रखैल बन गया है और गरीब किसान का साथ नहीं दे रहा। लीजिए प्रस्तुत है ये गीत-

 

पास नहीं है बैल — बदरा पानी दे ।
ज़ालिम है ट्यूवैल — बदरा पानी दे !

 

इज़्ज़तदार ग़रीब पुकारे,
ढोंगी मारे दूध-छुआरे,
चटक रही खपरैल — बदरा पानी दे !

 

ठनगन मत दिखला मेरे भाई,
खबसूरत औरत की नाँई,
तू भी हुआ रखैल — बदरा पानी दे !

 

छोड़ पछाँही लटके-झटके,
एक बार नहला जा डट के,
तू ! ग़रीब की गैल — बदरा पानी दे !

 

ऐसी झड़ी लगा दे प्यारे,
भेद-भाव मिट जाएँ हमारे,
छूटे सारा मैल — बदरा पानी दे !

 

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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तीस दिन में एक मुट्ठी दाम याद आए!

पिछली बार मैंने स्व. रमेश रंजक जी का एक प्रेम गीत, शेयर किया था, आज उनका एक गीत जो जुझारूपन का, आम आदमी की बेचारगी का, बड़ी सरल भाषा में सजीव चित्रण करता है, कैसे एक आम इंसान के दिन और महीने बीतते हैं, उसका वर्णन इस गीत में है, लीजिए प्रस्तुत है ये गीत-

 

 

दोपहर में हड्डियों को शाम याद आए,
और डूबे दिन हज़ारों काम याद आए।

 

काम भी ऐसे कि जिनकी आँख में पानी,
और जिनके बीच मछली-सी परेशानी,
क्या बताएँ किस तरह से ’राम’ याद आए।

 

घुल गई जाने कहाँ से ख़ून में स्याही,
कर्ज़ पर चढ़ती गई मायूस कोताही,
तीस दिन में एक मुट्ठी दाम याद आए।

 

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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