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फटे पुराने इक एलबम, में चंचल लड़की जैसी माँ!

आज एक बार फिर मुझे अपने एक प्रिय शायर स्व. निदा फाज़ली जी याद आ रहे हैं। उनकी रचनाओं में, गज़लों में, दोहों में एक अलग तरह की रवानी, सादगी, ताज़गी और मिट्टी का सौंधापन देखने को मिलता है।

आज मैं उनकी जो रचना शेयर कर रहा हूँ, वह ‘मां’ के बारे में है और मां के बारे में इस तरह की बातें निदा फाज़ली साहब ही कह सकते थे। लीजिए प्रस्तुत है उनकी यह रचना-

 

 

बेसन की सोंधी रोटी पर, खट्टी चटनी जैसी माँ,
याद आती है चौका, बासन, चिमटा, फूंकनी जैसी माँ।

 

बांस की खुर्री खाट के ऊपर, हर आहट पर कान धरे,
आधी सोई आधी जागी, थकी दोपहरी जैसी माँ।

 

चिड़ियों के चहकार में गूंजे, राधा – मोहन  अली- अली,
मुर्गी की आवाज़ से खुलती, घर की कुण्डी जैसी माँ।

 

बीवी, बेटी, बहन, पड़ोसन, थोड़ी थोड़ी सी सब में,
दिन भर इक रस्सी के ऊपर, चलती नटनी जैसी माँ।

 

बाँट के अपना चेहरा, माथा, आँखें, जाने कहाँ गयी,
फटे पुराने इक एलबम, में चंचल लड़की जैसी माँ।

-निदा फ़ाज़ली

 

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार।

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